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Monday, January 18, 2010

क्या हो आज के मुसलमान की दिशा

भारतीय मुसलमानों की दशा और दिशा क्या हो, इसे लेकर तमाम बहसें चलती रहती हैं। भारतीय मुसलमानों के नए-नए स्वयंभू नेता भी रोजाना पैदा होते हैं और खुद को चमकाने के बाद वे परिदृश्य से गायब हो जाते हैं। देश के जाने-माने पत्रकार एम.जे. अकबर ने रविवार को पटना में एक व्याख्यानमाला के तहत दिए गए लेक्चर में मुसलमानों को लेकर कुछ बातें रखी हैं। मैं समझता हूं कि अकबर साहब ने जितनी सटीक और व्यावहारिक बातें कहीं हैं, वे मौजूदा पीढ़ी के मुसलमानों को भी जाननी चाहिए।

हालांकि अकबर साहब ने आतंकवाद जैसे मुद्दे पर कुछ नहीं बोला लेकिन जो बोला है, वह व्यावहारिक है। आइए जानते हैं कि दरअसल उन्होंने कहा क्या है...


प्रख्यात पत्रकार और लेखक एम. जे. अकबर ने कहा कि देश के मुसलामानों को सुरक्षा का भय दिखाने वालों को नहीं बल्कि उनके विकस की बात करने वालों के पक्ष में अपना मत देना चाहिए।

पटना में बिहार इंडस्ट्रीज एसोसियशन हॉल में आयोजित शाह मुश्ताक अहमद स्मृति व्याख्यान माला आर्थिक विकास एवं वंचित वर्ग पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अकबर ने कहा कि देश के मुसलामानों को सुरक्षा का भय दिखाने वाले को नहीं बल्कि उनके विकास की बात करने वालों के पक्ष में अपना मत देना चाहिए।

अकबर ने कहा कि देश की आजादी में बढ-चढकर हिस्सा लेने वाले और राष्ट्रवाद की भावना से ओत-प्रोत मुसलमान आजादी से पूर्व स्वयं को देश में अल्पसंख्यक महसूस नहीं करते थे पर वर्ष 1935 में किसी मुस्लिम नेता द्वारा इस्लाम खतरे में है का नारा दिये जाने के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई।
अकबर ने कहा कि अल्पसंख्यक का जनसंख्या से संबंध नहीं होता क्योंकि अगर ऐसा होता तो ब्राहमण सहित कई अन्य जातियां अल्पसंख्यक होतीं।

उन्होंने कहा कि देश पर राज करने वाला अल्पसंख्यक नहीं होता और मुसलमानों ने इस देश पर लंबे समय तक राज किया है तथा देश की आजादी में न केवल उन्होंने बढ-चढकर हिस्सा लिया बल्कि हमेशा राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत रहे।

अकबर ने कहा कि मुसलमान अल्पसंख्यक तब हुए जब वे देश में सत्ता से बाहर हुए और खासतौर से वर्ष 1935 में जब किसी मुस्लिम नेता ने यह नारा दे दिया कि इस्लाम खतरे में है।
उन्होंने कहा कि एक मुसलमान खतरे में हो सकता है पर इस्लाम कभी नहीं क्योंकि इस्लाम उस समय भी खतरे में नहीं रहा जब पैगंबर मोहम्मद साहब अकेले थे।

अकबर ने कहा कि मुसलमान की देश में यह स्थिति आत्मविश्वास खोने के कारण हुई और वे खौफ के साए में जीने लगे। आज वे अपने विकास के नाम पर नहीं बल्कि सुरक्षा का भरोसा दिलाने वालों के लिए अपना बहुमूल्य वोट बर्बाद कर देते हैं।

देश के मुसलमानों को अपनी वर्तमान हालत का स्वयं जिम्मेदार ठहराते हुए अकबर ने कहा कि इस कौौम ने अपनी हालत के बारे में स्वयं कभी नहीं सोचा. उन्होंने कहा किि मुसलमानों को अपनी संतान चाहे वह बेटा हो बेटी के प्रति बरते जाने वाले भेदभाव को समाप्त करना होगा, नहीं तो यह कौम कभी भी तरक्की नहीं कर सकती।
अकबर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारत कभी भी गरीब मुल्क नहीं रहा है चाहे वह आजादी के पूर्व या उसके बाद हो, क्योंकि किसी गरीब मुल्क पर कोई कभी हमला नहीं करता। जब आपके पास कुछ लूटने को नहीं होगा, कौन सात हजार मील की दूरी तय करके यहां पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में अगर दौलत नहीं होती तो अंग्रेज सहित कोई अन्य देश यहां फौज नहीं भेजता।

अकबर ने कहा कि 1750 में दुनिया में जिस किसी वस्तु का उत्पादन होता था उसमें चीन पूरे विश्व में 32 प्रतिशत उत्पादन करने वाला देश था जबकिि भारत द्वारा पूरे विश्व का 24 प्रतिशत उत्पादन किया जाता था और चीन और भारत दुनिया के सबसे अमीर मुल्क थे।

उन्होंने बताया कि उस समय जापान द्वारा पूरे विश्व का 5 प्रतिशत, फ्रांस द्वारा 4 प्रतिशत, ब्रिटेन द्वारा 2.8 प्रतिशत, रूस द्वारा दो प्रतिशत और अमेरिका द्वारा एक प्रतिशत उत्पादन किया जाता था।

अकबर ने कहा कि हिंदुस्तान हमेशा से एक अमीर मुल्क रहा है जहां गरीब लोग बसते हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के आने के पूर्व देश में जब किसी इलाके में अकाल पडता था पूरे इलाके की नाकेबंदी कर दी जाती थी ताकि वहां से अनाज वहां से बाहर नहीं जा सके। उन्होंने कहा कि उस समय अकाल के दौरान राजाओं और नवाबों की ओर से रसोई चलायी जाती थी जहां गरीब लोगों को खाना दिया जाता था।

अकबर ने कहा कि इतना ही लोगों को नापतौल में कमी करने वाले दुकानदारों के लिए भी सख्त सजा का प्रावधान था। उन्होंने कहा कि 1765 में 24 परगना में अंग्रेजों की हुकूमत बनने के बाद देश में अकाल के समय भी उतनी ही राशि लंदन भेजते जितनी राशि सामान्य दिनों में वे भेजा करते थे।
अकबर ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि अंग्रेजों ने क्या किया बल्कि सवाल यह है कि देश की आजादी के साठ साल बीत जाने केे बावजूद देश वासियों ने गरीबी दूर करने के लिए क्या किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में देश का आर्थिक विकास दर दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है पर बिहार सहित देश के अन्य प्रांतों में गरीब लोगों के चेहरे पर उस विकास का असर नहीं दिखता।

अकबर ने बताया कि पिछले साल प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी आंकडे़ के मुताबिक देश की करीब 80 अस्सी प्रतिशत आबादी बिल्कुुल गरीबी रेखा के समीप है या नीचे है।

अकबर ने कहा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने प्रयास करके दलितों के उत्थान के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान कराया। बाद में पिछड़े वर्गो के उत्थान के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया गया।
उन्होंने कहा कि आज जब सच्चर आयोग की रिपोर्ट जिसमें मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति ठीक नहीं बतायी गयी है और उस आधार पर उन्हें आरक्षण दिए जाने की बात की जाती है तो लोग उसका विरोध करते हैं, यह बिल्कुल गलत है।

उन्होंने अगर समाज के दबे-कुचले लोगों को आगे लाने के लिए आरक्षण देना ही नहीं है तो पूर्व में दलितों और बाद में पिछडे वर्ग के लोगों को क्यों दिया गया।

अकबर के बारे में


मशहूर पत्रकार एम.जे. अकबर का कॉलम टाइम्स आफ इंडिया में हर हफ्ते आता है। उनके तमाम लेख अंग्रेजी में उनके ब्लॉग और वेबसाइट पर भी पढ़े जा सकते हैं। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं, जिनकी सूचना आपको उनके ब्लॉग पर मिलेगी। उसका लिंक यहां दिया जा रहा है-

http://www.mjakbar.org

http://mjakbarblog.blogspot.com

Thursday, January 14, 2010

चीन की दीवार के पार गूगल

दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी गूगल ने चीन (Google China) से अपना कारोबार समेटने की धमकी देकर बड़ा धमाका कर दिया है। गूगल की इस घोषणा के चंद घंटे बाद ही अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैन्सी पलोसी (Nancy Pelosi) ने बयान देकर अमेरिका का नैतिक समर्थन भी गूगल को दे दिया। इंटरनेट और कारोबारी दुनिया की यह सबसे बड़ी खबर है। भारत के पड़ोस का घटनाक्रम के नाते इस पर हम लोगों को बात करनी चाहिए और उन मुद्दों को जानना चाहिए।

गूगल का चीन (Google China) में 35 फीसदी मार्केट शेयर है और आंकड़े बताते हैं कि वह लगातार बढ़ रहा था। यानी गूगल ने यह घोषणा ऐसे समय की है जब उसका कारोबार बढ़ रहा है। उसने चीन से कारोबार (Google China Business) समेटने की धमकी देने के पीछे जो खास वजह बताई है, उसके मुताबिक चीन में उसके कारोबार पर साइबर अटैक (Cyber Attack) हो रहे थे, वहां के टेक्नीशियन या आईटी एक्सपर्ट (IT Experts) गूगल के डेटा बेस (Google China Data Base) (आंकड़ों के भंडार में) में सेंध लगाकर उस डेटा को हैक (Data Hacking) कर रहे थे। गूगल के पास जिन कंपनियों का डेटा था, गूगल ने उन्हें उनसे फौरन अवगत करा दिया। वहां की सरकार भी गूगल को सहयोग नहीं कर रही है। गूगल की शिकायतों के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने सारी शिकायतों को अनसुना और अनदेखा कर दिया।

गूगल ने 2006 में चीन में कदम रखा था। उस समय वहां की सरकार ने सबसे पहली शर्त यही लगाई थी कि उसे सेंसरशिप (Censorship) माननी होगी। जब गूगल ने उस शर्त को मान लिया तो उसे कारोबार की इजाजत दे दी गई। मेरा इस तथ्य को बताने के पीछे कतई यह मकसद नहीं है कि मैं चीन में गूगल के खिलाफ जो कुछ हो रहा है, उसका समर्थन करता हूं। यह निहायत ही घटिया है और इसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है। कम्युनिस्टों की तानाशाही के जो उदाहरण दिए जाते हैं यह घटना उसकी ताजा मिसाल है।

पर, गूगल पर भी चीन में कई गंभीर आरोप हैं। उस पर यह आरोप अमेरिका में भी लगे हैं और वहां इसे लेकर मुकदमा भी लड़ा जा रहा है। यह मामला है कॉपीराइट कानून (Copyright Law) के उल्लंघन का। गूगल पर इस तरह के आरोप कई देशों में लगे हैं और इसके खिलाफ बाकायदा लॉबी बन गई है जो इसका विरोध भी कर रही है। ऐसा ही आरोप चीन में भी लगा, वहां की एक लेखिका के किताब के अंश उडा़कर गूगल ने उसे डिजिटल प्रकाशित कर दिया। इस पर वहां की लेखिका ने सख्त ऐतराज जताया और चीन सरकार ने भी इस पर आपत्ति की। लेकिन अमेरिका में गूगल पर यह आरोप एक-दो लेखकों ने नहीं लगाया, बल्कि तमाम लेखकों ने लगाए और उन्होंने गूगल पर कई करोड़ डॉलर रॉयल्टी लेने का मुकदमा भी कर दिया। गूगल आज तक अमेरिका में इस आरोप पर अपनी सफाई पेश नहीं कर पाया है।

बहरहाल, चीन पर लौटते हैं। जिस देशों में नौजवानों के आंदोलन को थ्यानमन चौक पर चीनी फौजों ने अपने बूटों तले रौंद दिया हो, जिस देश के नानजिंग राज्य में वहां के अल्पसंख्यक लोगों पर जुल्म ढाए जा रहे हों, वहां की सरकार हैकर्स और साइबर चोरों को प्रश्रय दे रही हो तो उसे कॉपीराइट की घटना के संदर्भ में सही नहीं ठहाराया जा सकता। वहां कम्युनिस्ट पार्टी ने हर मल्टीनैशनल कंपनी में अपना सेल बना दिया है यानी उन कंपनियों में कुछ लोग ऐसे हैं जो चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करते हैं और उन्हें सूचनाएं देते हैं। कारोबार के मौजूदा सीन को देखते हुए इसे किसी भी देश के लिए खतरनाक संकेत माना जाएगा। पश्चिम बंगाल में वहां की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने भी तो यही किया था। लेकिन जब लालगढ़ और सिंगूर की घटनाएं हुईं तो सारी असलियत सामने आ गई। अब वहां भी सीपीएम की गद्दी सरकती दिखाई दे रही है।

गूगल के संस्थापकों में से एक सर्गेई ब्रिन (Sergey Brin) तो पूर्व के कम्युनिस्ट देश रूस में पैदा हुए और वहीं बड़े हुए। वह बहुत नजदीक से कम्युनिस्टों के बारे में जानते होंगे और जरूर अपनी राय रखते होंगे। सर्गेई के परिवार ने वहां कम्युनिस्ट सरकार का खात्मा होने के बाद रूस छोड़ दिया था और अमेरिका आ गए थे। वहां उन्होंने अपने दोस्त लैरी पेज (Larry Page) के साथ गूगल का बीज रोपा।

मार्क्सवादियों को सोचना होगा। चाहे वे चीन के माओ वाले कम्युनिस्ट हों या फिर बंगाल के। मार्क्स की नीतियां बुरी नहीं हैं, आप लोग जो प्रयोग और खिलवाड़ उसके साथ कर रहे हैं, उससे उसका अंत निकट दिखाई दे रहा है। क्या आप लोग भूल गए कि लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति किस तरह लोगों को इकट्ठा कर की थी। सोचो, मित्रो सोचो। बिजनेस पर डाका पड़ने पर आज तो चीन में सिर्फ गूगल (Google China) बिलबिलाया है, कल को सारी पब्लिक ही बिलबिलाने लगेगी तो क्या करोगे। रोजगार तो चीन के युवकों को भी चाहिए। थ्यानमन चौक पर कब तक कुचलोगे उनको...

Thursday, January 7, 2010

इडियट्स का ही है ज़माना

अब हम लोग इडियट्स के युग में प्रवेश कर चुके हैं। कलयुग भूल जाइए। अब इडियट्स इरा का जमाना है। वरना 3 इडियट्स की तमाम बेजा हरकतों के बावजूद एक जाने-माने भारतीय लेखक चेतन भगत को उलटा माफी मांगना पड़ जाए तो यह इडियट्स युग की देन है। लेकिन मैं भी अपने तमाम फेसबुक, जी टाक, ट्विटर, याहू मैसेंजर और दीगर मित्रों से माफी मांगता हूं कि मैं फालतू में ही चेतन भगत को पेड़ पर चढ़ा रहा था। यह शख्स तो चने के झाड़ पर भी चढ़ने के लायक नहीं है। भारत के बौद्धिक संपदा अधिकार (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) की जय हो।

हुआ यह था कि आमिर खान की सुपरहिट फिल्म 3 इडियट्स (3 Idiots)के रिलीज होने के बाद जब चेतन भगत को क्रेडिट न देने का मामला उठा तो मैंने खुद को चेतन भगत के साथ खड़ा पाया। मैंने चेतन भगत को पूरा तो नहीं पढ़ा है लेकिन अपने अंग्रेजी उपन्यासों के अलावा उन्होंने यहां-वहां जो कुछ भी लिखा है, उस नाते मैं उनका प्रशंसक हूं। हालांकि अभी भी मैं उनको अरुंधति राय से ज्यादा गहरी समझ रखने वाला अंग्रेजी का भारतीय लेखक नहीं मान पाया हूं। बहरहाल, मुद्दा यह था कि 3 इडियट्स की कहानी चेतन भगत के अंग्रेजी उपन्यास (Five Point Someone) पर आधारित है। फिल्म रिलीज होने से पहले चेतन भगत से उस फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने बात भी की लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो चेतन भगत का नाम ढंग से न देकर बहुत अंत में चालू अंदाज में दे दिया गया।

इस विवाद के उठने पर भारतीय मीडिया (Indian Media)भी चेतन भगत के साथ खड़ा था लेकिन अचानक इसी मंगलवार को चेतन भगत ने आमिर खान समेत 3 इडियट्स के निर्माता-निर्देशक से माफी मांग ली। उन्होंने यह तक कहा कि मेरी किसी बात से अगर उन लोगों को ठेस लगी है तो वह माफी मांगते हैं। साथ ही उन्होंने खुद को आमिर खान का सबसे बड़ा फैन भी घोषित कर दिया। चेतन का यह बयान नवभारत टाइम्स ने प्रमुखता से छापा है।

जाहिर है कि बयान झटका देने वाला था। भारत में जिस तरह से बौद्धिक संपदा अधिकार का खुला मजाक उड़ाया जाता है उससे तमाम कलाकार, लेखक, पत्रकार व्यथित हैं लेकिन बेचारे कुछ नहीं कर पाते। बौद्धिक संपदा अधिकार का मजाक उड़ा कर भारत ने जिस कंपनी से सबसे पहले अपनी जड़े मजबूत कीं, उस कंपनी का नाम टी-सीरीज है। हालांकि आज इस कंपनी को भारत में कैसेट और सीडी को सस्ता बेचने और संगीत को घर-घर पहुंचाने के लिए महिमा मंडित किया जाता है। लेकिन इस कंपनी ने शुरुआत में जो छिछली हरकतें कीं, उसका सिलसिला आज भी थमा नहीं है। इस कंपनी के मालिक गुलशन कुमार ने स्वर कोकिला लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के पुराने गानों को नए गायकों से गवा कर कैसेट बाजार में उतार दी। फॉरमूला हिट रहा। रफी साहब तो जन्नत फरमा चुके थे लेकिन लता जी ने और एचएमवी कंपनी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत में पता नहीं क्या हुआ लेकिन टी-सीरीज का धंधा नहीं बंद हुआ। इसके बाद इस कंपनी ने तमाम क्षेत्रीय भाषाओं पर हाथ साफ किया। आज हमें पंजाबी, भोजपुरी, उड़िया जैसी भाषाओं के तमाम गायकों के नाम सुनने को मिलते हैं लेकिन इनके पीछे जो व्यथा है वह कोई नहीं जानता।
पंजाब के एक बहुत बड़े सूफी गायक ने अपनी निजी बातचीत में मुझे काफी पहले जो कुछ बताया है, आप सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। गायक का नाम बताना मैं उचित नहीं समझता लेकिन तथ्य बताता हूं। पंजाब में गुरदास मान का बड़ा नाम है और उन्हें आज भी पंजाबी संगीत का पुरोधा कहा जाता है। गुरदास मान और एचएमवी का पुराना साथ रहा है। टी-सीरीज को पंजाब से एक ऐसी आवाज की तलाश थी जिसके सहारे वे पंजाबी संगीत में अपना कदम रख सकें और दुकान चला सकें। गुलशन कुमार खुद भी पंजाबी थे। अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, फगवाडा़ उनका आए दिन का आना-जाना था। लोकल लोगों की मदद से उन्होंने वह आवाज खोज निकाली जो उन्हें चाहिए थी। उस गायक का जो पहला अलबम आया तो धूम मच गई। उसे स्टेज शो मिलने लगे और वह रातोंरात स्टार बन गया। इसके बाद टी-सीरीज ने उसे एक करोड़ रुपये देकर बॉन्ड भराया कि अगर वह गाएगा तो सिर्फ उन्हीं की कंपनी के लिए, चाहे वह फिल्म हो या अलबम। उसके बाद टी-सीरीज से जुड़ी कई फिल्मों में भी उस गायक ने अपनी आवाज दी। टी-सीरीज का खजाना भर रहा था लेकिन उस गायक को एक बंधी-बंधाई रकम ही मिल रही थी। वह कसमसाया। उसने विरोध किया तो टी-सीरीज ने उससे रिश्ता खत्म कर लिया। टी-सीरीज की मार्केटिंग रणनीति इतनी जबर्दस्त है कि सारी कंपनियां उसके आगे पानी भरती हैं। उसके बाद उस गायक के कई अलबम दूसरी कंपनियों ने जारी किए लेकिन उनको वह सफलता नहीं मिली। आवाज वही, रचनाएं भी पंजाबी के दिग्गज कवियों व शायरों की।


ऐसा नहीं है कि सिर्फ उसी गायक के साथ ऐसा हुआ। सोनू निगम को उस कैंप से निकलने में कई साल लगे। लेकिन हर कोई सोनू निगम नहीं होता। तमाम ऐसे गायक मुंबई में खाक छान रहे हैं। कुछ को ए.आर. रहमान मिल जाते हैं तो वह सामने आ जाता है लेकिन बाकी गुमनामी की जिंदगी बसर कर रहे हैं। टी-सीरीज आज भी भारतीय बौद्धिक संपदा अधिकार को ताक पर रखे हुए है।

चेतन भगत वाली घटना से एक उम्मीद बंधी थी कि इस बार बॉलिवुड की इस तरह की हरकतों पर लगाम लगेगी लेकिन ऐसा हो न सका। एक और छोटी सी घटना से इस अफसोसनाक लेख का अंत करना चाहूंगा।


अंग्रेजी और उर्दू के पत्रकार, लेखक, निर्माता-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम अब कम ही लोगों को याद होगा। अब्बास का इंतकाल बरसों पहले हो चुका था। वही ख्वाजा अहमद अब्बास जिन्होंने अमिताभ बच्चन को सबसे पहले 7 हिंदुस्तानी फिल्म में अभिनय का मौका दिया। प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक राजकपूर जब आखिरी फिल्म हिना बना रहे थे तो उसी दौरान उनका देहांत हो गया और वह फिल्म उनके लड़कों ने पूरी की। फिल्म जब आई तो उस पर प्रमुखता से जो बात दर्ज थी, उसकी स्टोरी के लिए अब्बास को श्रेय दिया गया था। बाद में राजकपूर के परिवार वालों ने बताया कि यह स्टोरी बरसों पहले अब्बास साहब ने राजकपूर को दी थी। राजकपूर को स्टोरी पसंद थी लेकिन फिल्म बनाने के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने स्टोरी रख ली। अब्बास के निधन के बावजूद राजकपूर चाहते तो स्टोरी के क्रेडिट से अब्बास साहब का नाम हटा देते और खुद ले लेते। लेकिन ऐसा न तो उन्होंने किया और न ही उनके लड़कों ने। हिना सुपरहिट फिल्म साबित हुई लेकिन अब्बास साहब के परिवार ने कपूर खानदान से उसके एवज में चवन्नी भी नहीं ली।

एक तरफ भारत में बौद्धिक संपदा की कदर करने वाले ऐसे भी हैं और दूसरी तरफ 3 इडियट्स भी हैं। बहरहाल, फिल्म अच्छी है...जरूर देखने जाएं।