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Sunday, June 27, 2010

बिंदी के मोहपाश में फंसी एक अमेरिकी लेखिका

आजकल अनेक अमेरिकी लोग भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर उसके प्रचार-प्रसार में लग गए हैं। ब्रिटनी जॉनसन उनमें से एक हैं। अपनी किताब 'कलर फॉर किड्स' से चर्चा में आईं ब्रिटनी आजकल भारतीय बिंदी को अमेरिका में लोकप्रिय बनाने के लिए अपने ढंग से सक्रिय हैं। ब्रिटनी ने यूसुफ किरमानी को दिए ई-मेल इंटरव्यू में भारतीय संस्कृति और अपने बिंदी आंदोलन पर खुलकर बात की... ब्रिटनी का यह इंटरव्यू शनिवार (26 जून 2010) को नवभारत टाइम्स में संपादकीय पेज पर प्रकाशित किया गया है। इसे वहीं से साभार लिया जा रहा है।
अमेरिका में आजकल योग और भारतीय जीवन पद्धति की काफी चर्चा है। इसकी कोई खास वजह?
मैं भारतीय संस्कृति और योग की कहां तक तारीफ करूं। यह बहुत ही शानदार, उत्सुकता पैदा करने वाली और आपको व्यस्त रखने वाली चीजें हैं। आप जानकर हैरान होंगे कि न्यू यॉर्क शहर में योग इतना पॉपुलर है कि जब किसी संस्था को योग टीचर की जरूरत होती है तो दो सौ लोग उसके ऑडिशन में पहुंचते हैं। कीर्तन म्यूजिक के तो कहने ही क्या। मेरे जैसे बहुत सारे अमेरिकी ड्राइव करते हुए कार में कीर्तन सुनते हैं और गुनगुनाते हैं। योग क्लास रोजाना जाना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। मैं तो इससे इतनी ज्यादा प्रेरित हूं कि योग टीचर बन गई। इससे दिलोदिमाग लचीला बनता है। अपने प्रति रवैया तो बदलता ही है, हम दूसरों के प्रति भी सहिष्णु और दयालु होते हैं। सही मायने में भारतीय संस्कृति और योग जैसी चीजें अमेरिकी लोगों को उनकी रोजमर्रा जिंदगी के लिए गिफ्ट की तरह हैं।

आप तो अमेरिका की संस्कृति में पली-बढ़ी हैं। योग के बाद अचानक बिंदी की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ?
पहले योग, फिर आयुर्वेदिक दवाएं, कीर्तन म्यूजिक और हां अब बिंदी के प्रति मेरा झुकाव साफ है। मैं तो इन सभी को भारतीय संस्कृति की ओर से एक गिफ्ट मानती हूं...। परंपरागत भारतीय बिंदी लगाने का जो तरीका है, उसको मैंने यहां नए तरीके से पेश किया है। मैंने जिस योगा बिंदी (Yoga Bindi)को डिजाइन किया है, वह आज के फैशन सीन के मद्देनजर किया गया है। योगा बिंदियां साइज में बड़ी हैं और शरीर के किसी भी हिस्से में उन्हें लगाया जा सकता है। अमेरिका में टैटू और गोरी कलाइयों पर न जाने क्या-क्या बनवाने का फैशन जोरों पर है। मेरा मानना है कि योगा बिंदी (Yoga Bindi), जो आपकी स्किन को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती, उस टैटू से कहीं ज्यादा खूबसूरत है। इसे लगाने के लिए इंजेक्शन की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह टैटू के मुकाबले ज्यादा कलरफुल और मजे वाली चीज है।
क्या आप अमेरिका में बिंदी को इसके कल्चर का हिस्सा बनाने के लिए आंदोलन छेड़ने का इरादा रखती हैं?
हां बिल्कुल। मैं एक बिंदी बुक (Bindi Book)भी लिख रही हूं। मैंने योगा बिंदी को ओमेगा और कृपालु आनंद आश्रम में पेश भी किया है। उत्तर पूर्व अमेरिका में बहुत बड़े योग कॉन्फ्रेंस सेंटर हैं। सितंबर में मैं क्लोरेडो में होने वाली योगा जर्नल कॉन्फ्रेंस में जा रही हूं और योगा बिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्च करूंगी। मेरा मकसद है योगा बिंदी को लोकप्रिय बनाना, जो माथे पर लगाने के अलावा बॉडी स्टाइल की बिंदी (Body Style Bindi)भी है। मैं तो चाहती हूं कि सभी महिलाएं बिंदी लगाएं, बेशक वह अमेरिकी ही क्यों न हों।

दीपक चोपड़ा ने अमेरिका में जिस तरह योग और भारतीय जीवन पद्धति को पॉपुलर किया, उसे आप किस रूप में देखती हैं?
मैं दीपक चोपड़ा से काफी प्रभावित हूं। उनकी वजह से यूएस में योग और भारतीय कल्चर को पहचान मिली। बहुत साल पहले जब दीपक यूएस के सबसे लोकप्रिय टीवी शो ओपेरा विनफ्रे शो (Opera Winfray Show)में आए थे, तब मैंने उनको देखा था। जब उन्होंने अपनी किताब और अन्य चीजों पर बोलना शुरू किया तो मुझे लगा कि यह सब पूरी तरह सच है और मेरी सोच के करीब है। उसके बाद मैं उनकी फैन बन गई। मैंने अपनी किताब में दीपक को याद किया है।
अपनी किताब (Color4Kids)में आपने ब्लैक बच्चों को, जिन्हें भारतीय अपने नजदीक पाते हैं, क्यों फोकस किया?
मैं तो हर बच्चे को खूबसूरत मानती हूं, स्पेशल मानती हूं और मेरा मानना है कि उन्हें भी वही सम्मान और मान्यता मिलनी चाहिए जिसे सोसायटी के बाकी लोग चाहते हैं। चाहे वे बच्चे यूएस के हों, भारत के या फिर इथोपिया के। इन सभी देशों के बच्चों को गौर से देखिए, उनके बाल, उनकी आंखें और स्किन टोन क्या अलग लगते हैं? मेरी किताब बहुत ही सिंपल है जो बताती है कि किस बच्चे पर कौन सा रंग जमेगा और इससे वह बच्चा खुद को परफेक्ट मानते हुए उसे उसी रूप में स्वीकार करेगा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ गोरी चमड़ी वाले बच्चों पर कोई रंग जमता है। जब मैं इस किताब को छपवाने के लिए पब्लिशर्स के पास भटक रही थी तो उन्होंने भी यह सवाल किया था। सभी उस काले रंग वाली लड़की की तरफ आकर्षित हुए थे जो मेरी किताब के कवर पर थी, किसी ने उस गोरे लड़के का जिक्र नहीं किया जो मेरा बेटा है। वह उस कवर पर एक कोने में था।

Saturday, June 12, 2010

क्या हो मीडिया की भाषा



अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के सेंट लुई कैंपस में भाषा विज्ञान के प्रफेसर डॉ. एम. जे. वारसी मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं। अब तक भाषा विज्ञान से जुड़े उनके 25 शोधपत्र और अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। यूनिवर्सिटी आफ बर्कले ने उन्हें हाल ही में सम्मानित किया है। उसके बाद अमेरिका में भाषा विज्ञान के मामले में भारत की कद बढ़ी है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी (एएमयू) के छात्र रह चुके डॉ. वारसी से यूसुफ किरमानी की बातचीत। यह इंटरव्यू शनिवार 12 जून 2010 को नवभारत टाइम्स में संपादकीय पेज पर छपा है। वहां से इसे साभार लिया जा रहा है।



आपकी किताब लैंग्वेज एंड कम्युनिकेशन की काफी चर्चा हो रही है। आप मीडिया के लिए किस तरह की भाषा का सुझाव देना चाहते हैं?
मैंने इसी विषय से जुड़ा पेपर वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के लिए तैयार किया था। बाद में इस पर किताब लिखने का प्रस्ताव मिला। इस किताब में मैंने इस बात को उठाया है कि मीडिया की भाषा कैसी होनी चाहिए और चूंकि मीडिया सीधे आम आदमी से जुड़ा है तो इसके इस्तेमाल की क्या तकनीक होनी चाहिए। मैंने एक बात खासतौर पर रेखांकित की है कि मीडिया की भाषा साहित्यिक नहीं होनी चाहिए। उसमें उन शब्दों का ही इस्तेमाल हो जिसे सोसायटी ने अपना लिया है। मसलन आपके दफ्तर का चपरासी यह नहीं बोलेगा कि साहब आज कार्यालय नहीं आएंगे। वह यही कहेगा कि साहब आज ऑफिस नहीं आएंगे। मैंने एक और बात पर जोर दिया है कि वाक्य बहुत लंबे नहीं होने चाहिए। वाक्य लंबे होने से वह लेख या खबर बोझिल हो जाती है। अमेरिका के कई अंग्रेजी अखबार पहले इन सब चीजों की परवाह नहीं करते थे लेकिन अब उन्होंने भी इस तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है।

तो क्या नवभारत टाइम्स की भाषा इस मामले में यूनीक मानी जानी चाहिए?
यकीनन। इसी ने इस तरह की भाषा की शुरुआत की है तो इसका श्रेय इसे नहीं देंगे तो किसे देंगे। लेकिन मैं इस बात को फिर दोहरा रहा हूं कि आप हिंदी का कोई वाक्य बनाते समय सिर्फ उन्हीं शब्दों का चयन करें जिसे सोसायटी ने अपना लिया हो। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम लोग शब्दों को जबरन मनवाने पर तुल जाएं।

बतौर भाषा वैज्ञानिक आप भारत को किस स्थिति में पाते हैं?
भाषा के नजरिए से भारत दुनिया का सबसे धनी देश है। अमेरिका और अन्य देशों में लोग मुझसे बातचीत के दौरान इस बात पर हैरानी जताते हैं कि इतनी भाषाएं और संस्कृति होने के बाद भी यह देश कैसे सरवाइव कर रहा है। यहां की भाषा और संस्कृति से पूरी दुनिया में इसकी अलग पहचान है।

कहा जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन और शहरीकरण के कारण भारत में कम बोले जानी वाली भाषाओं का विकास नहीं हो सका। आपको क्या लगता है?
यह बात सही है। अगर भाषा खो गई तो सब कुछ खो जाएगा। भारत के किसी भी वर्ग या समाज की पहचान काफी हद तक उसकी भाषा से भी होती है। जिन भाषाओं के बोलने वाले कम लोग बचे हैं, उनकी पहचान कर उन्हें संरक्षण दिया जाना बेहद जरूरी है। समय आ गया है कि भारत सरकार अपनी देखरेख में भाषाई सर्वेक्षण कराए। देश के भाषा विज्ञानियों को इसके लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।

अगर भाषा विज्ञान का इतना ही महत्व है तो इसे करियर के साथ क्यों नहीं जोड़ा जाता?
बहुत अच्छा सवाल है। देखिए, भारत में सिर्फ सेंट्रल और कुछ राज्यों की यूनिवर्सिटी में ही इसकी पढ़ाई होती है। कई सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में तो यह ग्रैजुएशन लेवल पर और कहीं पोस्ट ग्रैजुएशन लेवल पर पढ़ाई जाती है। मैं आपको अपना अनुभव बता रहा हूं। एएमयू से अब तक जितने भी लोग लिंग्विस्टिक में पीएचडी या एमफिल कर निकले हैं वे तमाम यूरोपीय देशों और अमेरिका में अपने ज्ञान का लोहा मनवा रहे हैं। मैं किन-किन देशों का नाम लूं। लिंग्विस्टिक के लोगों की वहां बड़ी संख्या में जरूरत है। लेकिन भारत जैसा विशाल देश भी उतने लोग वहां नहीं भेज पा रहा। वैसे पश्चिम देशों की यूनिवर्सिटीज में भी लिंग्विस्टिक की पढ़ाई हो रही है लेकिन भारतीय भाषाओं के लिए भाषा विज्ञानियों की बहुत ज्यादा जरूरत है।

तो यह बताइए कि कमी कहां है, क्या करने की जरूरत है?
सरकार और यूजीसी को जरूरी कदम उठाने होंगे। वे बीए या एमए की पढ़ाई को लिंग्विस्टिक के साथ भी जोड़ दें। अगर कोई स्टूडेंट एमए उर्दू या एमए हिंदी करता है तो उसकी मार्केट वैल्यू उतनी नहीं है, लेकिन उसके साथ उसमें अगर लिंग्विस्टिक को भी जोड़ दिया जाए तो वह एक प्रफेशनल डिग्री के साथ मार्केट में आएगा और अपनी अलग जगह बना लेगा। भारत में लिंग्विस्टिक की ज्यादा मार्केटिंग न होने की वजह से इसका महत्व न तो यूजीसी को समझ में आ रहा है न ही प्राइवेट यूनिवर्सिटियों को। आप जब तक भाषा को भी साइंस नहीं मानेंगे, हालात ऐसे ही रहेंगे। इसे साइंस मानने और गंभीरता से लेने पर ही इसमें करियर की अपार संभावनाएं पैदा होंगी।

(साभारः नवभारत टाइम्स 12 जून 2010)