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Tuesday, February 28, 2017

...क्योंकि गुरमेहर कौर के विचारों से तुम डरते हो

(This article first appeared in Nav Bharat Times online Blog Hindivani)

किसी को अगर अभी मुगालता है कि भगवा ब्रिगेड से जुड़े संगठन, केंद्रीय मंत्री, पार्टी नेता देश की राष्ट्रीय अस्मिता बचाने के लिए जेएनयू (JNU) के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में भी कोई महान काम कर रहे हैं तो उन्हें अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए। ...लेडी श्रीराम (LSR) कॉलेज की छात्रा गुरमेहर कौर (#GurmeharKaur) ने अब खुद को सारे प्रदर्शनों से अलग कर लिया है। उसने कहा है कि वो अपने कैंपेन से पीछे हट रही है और जिसका जो भी मन आए करे। ....आप लोगों के लिए यह एक वाक्य हो सकता है लेकिन इसके पीछे छिपी टीस को अपने क्या महसूस किया।




....गुरमेहर ने भगवा ब्रिगेड (SaffronBrigade) की गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज उठाई और चंद ट्वीट किए...सिर्फ इतनी ही बात पर उसे रेप की धमकी दी गई...इतनी ही नहीं देश का जिम्मेदार गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू बयान देता है कि आखिर ऐसे लोगों को सिखाता कौन है यानी गुरमेहर ने कुछ लोगों के सिखाने में आकर गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज उठाई। कुछ और मंत्री भी गुरमेहर की निंदा करने से पीछे नहीं रहे...। क्या राष्ट्रवादियों की मानसिकता ऐसी ही होती है कि किसी लड़की को रेप की धमकी दी जाए और आप उसकी ही निंदा करते रहें, आप उसके ही सवालों पर सवाल उठाते रहें।...आखिर तुम लोगों को गुरमेहर जैसी लड़कियों और लड़कों के विचारों से इतनी नफरत क्यों हैं...तुम में दम है तो उनके विचारों की काट करो लेकिन जब तुमसे नहीं हो पाता तो तुम पत्थर उठा लेते हो...रेप की धमकी देते हैं। ...इतने कायर हो, और कर भी क्या सकते हो।

...तुम लोग विचारों से डरते हो।...

...लेकिन अब तुम लोग चैन की सांस ले सकते हो। गुरमेहर ने तुम्हारी गुंडागर्दी के खिलाफ अपना कैंपेन वापस ले लिया है।...तुम खुश हो सकते हो...जोर से खिलखिला सकते हो।...लेकिन गुरमेहर कौर के विचार तो नहीं मरे।...तुम उसके विचारों की हत्या तो नहीं कर सके...ठीक उसी तरह कि जैसे गांधी (Gandhi) की हत्या की गई थी लेकिन उनके विचारों की हत्या नाथूराम गोडसे (Godse) की औलादें भी न कर सकीं। ...तो गुरमेहर कौर के विचारों की हत्या यह देश नहीं होने देगा।...कितने गिर गए हो तुम लोग....गुरमेहर के पिता शहीद हुए थे....लेकिन तुम लोगों ने ढूंढ कर निकाला कि वो कूपवाड़ा में एक अभियान के दौरान मारे गए थे....अरे यही वो मानसिकता है जो सियाचिन की बर्फ में दब कर शहीद होने वाले जवानों को शहीद नहीं मानती है।...हद तो यह है कि कुछ गधों ने गुरमेहर के बयान को सेना के सभी शहीदों का अपमान बता डाला....यही वह मानसिकता थी जो उस सैनिक (तेज बहादुर यादव) की पानी वाली दाल में बागवत के बीज खोज रही थी। यही वह मानसिकता थी जो उस सैनिक की फेसबुक (Facebook) प्रोफाइल में धर्म विशेष के नामों को खोज रही थी।

...कितना गिरोगे यार...

...गुरमेहर कौर के विचारों को काटने के लिए...उस सैनिक की पानी वाली दाल में बगावत खोजने के लिए...
...ऐसे विचार गुंडागर्दी के दम पर कुछ देर के लिए चुप्पी लगा जाएंगे लेकिन खत्म नहीं हो पाएंगे।...तुम्हारी गुंडागर्दी से रामजस कॉलेज (#RamjasCollege) के प्रोफेसर प्रशांत चक्रवर्ती के रीढ़ की हड्डी टूट गई। ....लेकिन क्या प्रशांत के विचारों को तुम लोग काट पाओगे....क्या शाहला राशिद को खामोश कर सकोगे। ....ऐसे विचार किसी दीनानाथ की दुकान पर नहीं मिलते और न किसी पुरातन काल में मिलते हैं कि जब कभी हाथी के नाक की सर्जरी की गई होगी। ...ऐसे विचार नॉर्थ कैंपस (#NorthCampus) या जेएनयू के क्लासरूम में पनपते हैं और फिजा में बिखर जाते हैं। ऐसे विचार हैदराबाद यूनिवर्सिटी (HU) या कोलकाता यूनिवर्सिटी से निकलकर देशभर में फैल जाते हैं। ऐसे विचार बीएचयू और एएमयू से भी आते हैं...उनकी रफ्तार तुमसे रोकी न जाएगी।...

...लेकिन तुम लोग विचारों से कंगाल हो...तभी काट भी नहीं कर पाते।...इतने कंगाल हो कि कभी शहीद-ए-आजम भगत सिंह में तो कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस में तो कभी राम प्रसाद बिस्मिल में अपने तथाकथित विचारों की समानता खोजते हो।...फिर भी खोज नहीं पाते।...अरे, बेवकूफो ये लोग गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं।....इन्हीं किसी सरकारी योजना का नाम देकर जिंदा नहीं रखा गया है।...ये देश के प्रतीक हैं किसी राजनीतिक पार्टी के नहीं... इनके विचार हमारी धरोहर हैं...तुम बीच में कहां से टपक पड़े। ...तुम इनसे तालमेल करके अपना भगवा चोला नहीं बदल सकते। वो तो भगवा ही रहेगा।...उसके अंदर का तथाकथित विचार भी भगवा रहेगा। ...ऐसे ही तथाकथित विचार तो वीर अब्दुल हमीद को बाकी शहीदों के मुकाबले कमतर आंकते हैं....ऐसे ही तथाकथित विचार तो बाकी अब्दुल हमीदों को अपनी पार्टी का टिकट देते हुए राष्ट्रवादी (Nationalist) हो जाते हैं।...ऐसे ही विचार तो किसी करीम-रहीम के पकड़े जाने पर उन्हें आतंकवादी करार दे देते हैं।...ऐसे ही विचार तो मध्यप्रदेश में जासूसी का नेटवर्क चलाने वालों को आरोपी मान लेते हैं।

...रोहित वेमुला ने तो विचार फैलाने के बाद खुदकुशी कर ली थी....लेकिन तुम उसके विचारों से इतना डरे कि उसके दलित होने पर ही सवाल उठा डाला।....इतने डरे कि उनके परिवार का दलित (Dalit) स्टेटस तक छिनवा डाला।...तुम्हारे जज...फैसला भी तुम्हारा।...तुम्हारी नजर में रोहित वेमुला कल भी अपराधी था, आज भी है। ...लेकिन रोहित ने जिन बातों को उठाया, क्या उसके विचारों को तुम लोग दफन कर पाए।...रोहित के विचारों का सामना करने की हिम्मत-ताकत तुम लोगों में नहीं है। ...देखों न ....एक रोहित वेमुला जाता है तो कोई गुरमेहर कौर आ जाती है...आज गुरमेहर कौर को चुप कराया है तो कल कोई और आएगा....विचारों का ऐसा सैलाब आएगा कि तुम लोग तिनके की तरह उड़ जाओगे।...
इतिहास गवाह है कि उसने न जाने कितने चे ग्वेरा, सकुरात, अरस्तू और काफ्का के विचारों को जिंदा रखा।...क्योंकि ये लोग भी गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ...इसलिए गुरमेहर कौर के विचार... प्रशांत चक्रवर्ती और रोहित वेमुला के विचार भी जिंदा रहेंगे....

...और देखो, जब विचारों से कंगाल हो तो दूसरे विचारों से मत टकराओ, उनसे कुछ सीखो।...गुरमेहर कौर जैसी बहादुरों का सम्मान करना सीखो...अबदुल हमीदों को भी जगह दो।...बरेली जाने वाला हर कोई नावेल्टी चौराहे पर दीनानाथ की लस्सी जरूर पीता है। पूरा बरेली शहर दीनानाथ की लस्सी पीता है। क्योंकि दीनानाथ की उस लस्सी जैसी मिठास कहीं नहीं और उसके साथ प्यार मुफ्त मिलता है। लेकिन तुम्हारे तथाकथित विचार किसी और दीनानाथ की दुकान से निकल कर आए हैं, जिनसे देश को खतरा है। उसमें मिठास नहीं जहरीलापन है।

 ...क्या देश तुमको इसी तरह बर्दाश्त कर लेगा...


Saturday, February 25, 2017

उस दिन जो रामजस कालेज में हुआ...एक स्टूडेंट का पत्र....

देश के गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू का कहना है कि केंद्र सरकार किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों का अड्डा नहीं बनने देगी लेकिन यह मंत्री रामजस कॉलेज के उन सैकड़ों स्टूडेंस की आवाज सुनने को राजी नहीं है कि आखिर 22 फरवरी को उनके साथ क्या हुआ था...हिंसा करने वाले कौन थे। दिलीप सॉइमन के ब्लॉग पर मुझे रामजस कॉलेज के ही एक स्टूडेंट का पत्र मिला, जिससे सारी असलियत सामने आई है। मुख्यधारा की मीडिया में जो दिखाया गया और छापा गया, उससे भी ज्यादा बदमाशी उस दिन रामजस कॉलेज में हुई...कैसे पुलिस ने हिंसा करने वालों का साथ दिया कैसे एक गुंडागर्दी को अब देशभक्ति और गलत राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, रामजस की घटना उसका जीता जागता उदाहरण है।...आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं बढ़ने वाली हैं और उसके नतीजे उन लोगों को भी भुगतने होंगे जिन्हें इस तरह के राष्ट्रवाद पर अभी बहुत प्रेम उमड़ रहा है...

अगर मिल सके तो 23 फरवरी को अमर उजाला ने पहले पेज पर एक फोटो छापा है जो बताता है कि पुलिस ने किस तरह इस घटना में हरकत की। आपको एक पुलिस वाला एक छात्रा को आपत्तिजनक से ढंग से छूता हुआ दिखाई देगा। यह फोटो फेसबुक पर वायरल हो चुका है। इसी पेज पर नीचे भी वो फोटो मौजूद है।


हो सकता है आप लोगों में बहुत सारे लोग किसी भी विचारधारा से न जुड़े न हों लेकिन आप अपने दिमाग से यह तो जरूर सोचें कि जिससे आपका मतभेद है, क्या आप उसे बोलने भी नहीं देंगे...आप पहले सुनते कि रामजस कॉलेज के सेमिनार में उमर खालिद और अन्य वक्ता क्या बोलने वाले हैं। आप उसकी विडियो रेकॉर्डिंग करते और उसके बाद वहां अगर वाकई कुछ राष्ट्रविरोधी बोला गया हो तो आपको भी विरोध करने का अधिकार है...लेकिन आप किसी को पहले ही न बोलने देने के लिए हिंसा करेंगे...

नीचे एक विडियो का लिंक है, जो पत्रकार रवीश कुमार के प्राइम टाइम का है। उसके जरिए आप जान सकते हैं कि दरअसल उस सेमिनार में तमाम वक्ता क्या बोलने वाले थे, जिसका एबीवीपी ने विरोध किया और उस सेमिनार को होने नहीं दिया। यह जानना महत्वपूर्ण है कि दरअसल एबीवीपी किन चीजों का विरोध कर रहा है।....

बहरहाल, नीचे पढ़िए दिलीप सॉइमन के ब्लॉग पर रामजस कॉलेज के स्टूडेंट का पत्र, जिसे मैं यहां लगा रहा हूं...

A letter by a Ramjas student to a teacher: Date: Thursday, February 23, 2017, 10:07 AM 
I have not been able to sleep at night... The incidents, the violent scenes in the college were on a loop in my mind. They have all videographed us and hv given us rape threats and acid attack threats. They are constantly trying to instill fear in us... But we will not back down! We'll be out on the streets... protesting today as well...amidst their violence..their abuses..their threats! We won't let this fire to die down. 

The beauty of this movement of resistance by Ramjas was that neutral students who dont associate with any student organization or political ideology ave also joined in numbers against the ABVP hooliganism. And they were able to rationally engage with what was going around in the campus. And they were with us...And they became "US".. And it was not a left vs right struggle...as was out in the media.. It was Ramjas against ABVP goondaism. It was silence doing it's magic against violence.  We were peacefully sitting near canteen...fearful of the uncertainty looming around...




Questions of what next and who next...terrified us...traumatised us....as we saw friends getting beaten up...thrashed and manhandled by ABVP goondas..Our silence was hurting them...Our songs of resistance were pricking them.. They came up with the national flag...and hurled abuses...Chanted Bharat Mata ki Jai. We were silent. Although we were numerically less...Our silent mode of protest affected them so badly that they sporadically attacked us from different sides...trying to batter our strength. 

Although it was disappointing for a lot of us to silently sit there while they provoked us and we couldn't hit them back... But still from the way we've carried out our protest yesterday..I've  realized that sometimes silence works wonders! And it hit them at the right spot. As we were struggling inside ...Our friends outside the gate were carrying out the protest that we were not allowed to carry out... They were beaten up... But they didn't back down! We will not back down...The social media is flooded with their violence...first hand accounts of what happened. We are brutally exposing abvp...And will continue to do so. And hopefully this is the beginning of something DU has never seen or felt before! 

Some relevant news reports:
'They Tried To Strangle Me With My Muffler': A Day After, Shock And Anger At Ramjas College  All of last evening there was shock and anger surrounding a particular image that social media users kept sharing - that of Delhi University professor Prasanta Chakravarty, half-lying on the ground, dazed and disoriented, his shirt torn, and a patch of dirt on his face, as mayhem continued all around him on the campus of Ramjas college in the northern part of the national capital. An attempt was allegedly made by suspected members of the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) to strangle Chakravarty with his own muffler. He was attacked from behind, pushed to the ground, kicked and beaten up.

साभार....
Dilip Simeon's blog: State protected hooliganism in Ramjas College


पत्रकार रवीश कुमार के प्राइम टाइम शो को देखने के लिए इस विडियो लिंक पर जाएं... https://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/prime-time-question-raised-on-freedom-of-speech-due-to-ruckus-in-ramjas-college-450195?pfrom=home-khabar

Tuesday, February 21, 2017

ग़ालिब तेरे फरेब में ...ये किस मुकाम तक आ गए

मुझे एक विडियो मिला है। भारतीय राजनीति के मुश्किल दौर में यह विडियो हम लोगों को नया रास्ता दिखाता है। लेकिन ऐसे विडियो से कितनी बात बनेगी, खासकर जब भारतीय #राजनीति के मुश्किल दौर का अंत भयावह नजर आ रहा है। चुनाव तो फिर आएंगे, 11 मार्च के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता कोई न कोई दल या मिलाजुला गठबंधन संभाल ही लेगा लेकिन #हिंदूमुसलमान की जिस खाई को चौड़ा करके इस चुनाव में खाद-पानी दिया जा रहा है। वो एक खतरनाक खेल है। इस खेल के नतीजे अच्छे नहीं आने वाले यह तय है। आइए, पहले ये जानें कि उस विडियो में है क्या...

#मुस्लिम #उलेमा मौलाना कल्बे सादिक उस विडियो में बता रहे हैं। ...मैं हज पर जाने के लिए तैयार हूं, पासपोर्ट भी तैयार है। टिकट जेब में है। फिर मैंने एक रोजा भी रख लिया कि अल्लाह का शुक्र अदा करुं कि मुझे हज पर जाना नसीब हो रहा है। इसके बाद मैंने सोचा कि क्यों न #गोमतीनदी (#लखनऊ) के किनारे थोड़ा सा टहल लूं। फिर नमाज का वक्त हो गया। मैंने सोचा गोमती के किनारे पढ़ लूं।...यानि मैं एकसाथ तीन इबादत कर रहा हूं – हज पर जाने की तैयारी, मेरा एक दिन का रोजा और गोमती के किनारे नमाज। ....वो आगे बताते हैं कि नमाज की नीयत बांधी ही थी कि इतने में एक आवाज सुनाई दी...हाय राम मुझे बचाओ।...नजर उधर गई तो देखा नदी में पानी के बाहर दो हाथ दिख रहे हैं और आवाज वहीं से आ रही है।...जाहिर है कि वो आवाज एक हिंदू की थी। यानी गैर मुस्लिम की। जिसके मुंह से हाय राम निकला था। ...इधर मेरे #अल्लाह और #कुरान का आदेश है कि अगर किसी की जान इस तरह जा रही है तो तुम उसे बचाने की पहल करो। चाहे वो काफिर (नास्तिक) ही क्यों न हो। चाहे तुम नमाज पढ़ रहे हो या रोजा रखा है या हज पर जा रहे हो। अल्लाह और कुरान की नजर में पहले यह काम जरूरी है कि उस आदमी की जान बचाई जाए...चाहे वो किसी भी #मजहब, #जाति या #समुदाय का हो। 

....कल्बे सादिक कहते हैं कि गैर मजहब का होने के बावजूद #इस्लाम की नजर में सबसे पहले उस इंसान की जान बचाया जाना जरूरी है। ...उस वक्त उससे बड़ा कोई काम नहीं। बेशक आपकी #नमाज टूट जाए। बेशक आपका #रोजा टूट जाए। बेशक आपका #हज पर जाना रह जाए।...

...इस संदेश के आगे कुछ और नहीं है। ...लेकिन इसके आगे बहुत कुछ है।...इसके आगे #भारत है...#पाकिस्तान है। हिंदू-मुसलमान है। ...यह संदेश जितना मुसलमानों के लिए जरूरी है उतना ही हिंदुओं के लिए भी जरूरी है।...लेकिन हम लोग कहां उलझे हैं या उलझा दिए गए हैं... कि अगर #कब्रिस्तान हो तो #श्मशानघाट भी होना चाहिए। #रमजान में बिजली आए तो दिवाली पर भी #बिजली आनी चाहिए।...क्या किसी आम भारतीय ने या यूपी वालों ने इस हद तक गिरकर कभी सोचा था। ...नहीं...कभी नहीं। लेकिन एक नेता ने याद दिलाया और एक #टीवी चैनल ने लोगों के मुंह में माइक ठूंस-ठूंस कर पूछा कि आपकी गली में श्मशान घाट है...आपके मुहल्ले में कब्रिस्तान है।... वो यह नहीं पूछ रहे हैं कि स्कूल-कॉलेज-सड़क-अस्पताल-कारखाना है या नहीं ...क्योंकि ये सवाल अब अपना महत्व खो चुके हैं। जनता को कंडीशन्ड किया जा रहा है। पब्लिक के लिए श्मशान और कब्रिस्तान उसकी मूलभूत आवश्यकताएं बना दिए गए हैं। जब वो रोटी मांगे तो उसे गाय की सेवा के काम पर लगा दो। जब वो रोजगार मांगे तो #मंदिरमस्जिद में उलझा दो।  

आमिर किरमानी (हरदोई) के जरिए पहुंचा यह शेर इस वक्त मौजूं हो चला है...

#गालिब तेरे फ़रेब में ये किस मुक़ाम तक आ गये !

घुट घुट के जिये ऐसे कि "श्मशान" तक आ गये !

...यकीन मानिए...हमें इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि हम अपने मूलभूत अधिकार और मूलभूत आवश्यकताएं भूल जाएं और उसकी जगह कब्रिस्तान, श्मशान, #डिजिटल मनी, #एटीएम कार्ड, ई-वैलेट याद रखें। जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरत यही चीजें हैं। दिल्ली के #अपोलो अस्पताल में हर नेता इलाज के लिए पहुंचता है लेकिन उस अस्पताल के सामने बने फ्लाईओवर की सड़क टूटी-फूटी है...उसकी मरम्मत हमारी जरूरत नहीं है। क्योंकि नेताजी इस तरह की कार में वहां से आते-जाते हैं, उन्हें उस कार में झटके नहीं लगते। उस सड़क की जरूरत बाइक वाले को, साइकल वाले को, सार्वजनिक परिवहन की बसों को, सामान ढोने वाले ट्रकों को है लेकिन अगर उन्हें रोजाना झटके लगेंगे तो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि उसकी मूलभूत आवश्यकताओं को नेताजी पहले ही बदल चुके हैं। नेताजी ने उसे सड़क की जगह डिजिटल मनी का झुनझुना पकड़ा दिया है।

#यूपी का चुनाव...भारतीय राजनीति के उसी मुश्किल दौर की तस्वीर दिखा रहा है। वो शख्स तो खैर कब्रिस्तान और श्मशान की बात कर रहा है लेकिन इस युवा नेता को देखिए...उनकी बातों की गिरावट उससे भी कई गुना ज्यादा है।...वे सदी के तथाकथित महानायक से फरियाद कर रहे हैं कि वो #गुजरात के गधों का प्रचार न करें।...अरे साहब ये क्या बात हुई।...आप #चुनाव #रैली में ऐसा क्यों बोल रहे हैं...क्या आपके पास कोई मुद्दा नहीं है। ....क्योंकि आप भी उसी नेता की तरह सोचते हैं कि अगर मूलभूत मुद्दों के बारे में जनता को बताया तो वो रोजाना डिमांड रखेगी। बेहतर है कि उसे गधों तक ही सीमित रखा जाए। ...इसमें सबसे आपत्तिजनक बात यह है कि क्या आपको सारे गुजराती ऐसे ही नजर आते हैं।...भले ही आप सफाई दें कि आपका संदर्भ अलग था लेकिन सवाल यह है कि आपने किसी चुनावी रैली में ही यह बात कहने के लिए क्यों चुना।

 ...जाहिर है कि सामने वाला नेता जनता को मुद्दों से भटकाकर हिंदू-मुसलमान में उलझा रहा है तो आप भी गधे की बात कहकर एक वर्ग की सहानुभूति का वोट बटोरना चाहते हैं।...क्योंकि वह वर्ग फिलहाल गधे को अपना दुश्मन नंबर 1 मान बैठा है तो वो आपकी ताली बजाकर वोट डालेगा। ...आप तो जीतने के बाद गधे की सवारी फिर से कर लेंगे...भले ही वो आपको दुलत्ती मारे।...लेकिन गधे की दुलत्ती खाकर माल मिलता रहे तो क्या हर्ज है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 50 फीसदी आबादी अभी भी खुले में शौच के लिए जाती है। लेकिन उसे #शौचालय देने की बजाय आप या तो श्मशान देना चाहते हैं या फिर कब्रिस्तान। #संयुक्तराष्ट्र की रिपोर्ट में इस आबादी को हिंदू-मुसलमान में नहीं बांटा गया है, क्योंकि गरीबी का कोई धर्म तो होता नहीं है।

...तो पता यह चलता है कि किसी की नीयत साफ नहीं है। ...लेकिन जनता की नीयत साफ लग रही है। उम्मीद है कि उसे अपने मूलभूत आवश्यकताओं की जानकारी जरूर होगी और इस चुनाव से यह पता चलेगा कि वो कितनी समझदार या बेवकूफ है। वो नेताओं की बातों में आकर कंडीशन्ड नहीं होगी यानी उनके हिसाब से वोट नहीं करेगी। लेकिन अगर उसने वाकई नेताओं के कहने के मुताबिक श्मशान-कब्रिस्तान या गधों में बंटकर वोट दिया तो यही नेता इसी जनता को हमेशा के लिए बेवकूफ मान लेंगे और उसी के अनुसार व्यवहार करेंगे। इसीलिए मैं इसे भारतीय राजनीति का सबसे मुश्किल दौर मान रहा हूं। #यूपीकाचुनाव कई चीजों को तय करेगा। इसमें नेताओं या राजनीतिक दलों से ज्यादा जनता की इज्जत दांव पर लगी है। 20 दिन और...बहुत कुछ बदल जाएगा।...

विडियो के बारे में – इस लेख की शुरुआत में मैने जिस #विडियो का जिक्र किया है, अगर आप उसे देखने की ख्वाहिश रखते हैं तो मेरी फेसबुक वॉल पर जाकर उसे देख और सुन सकते हैं। आप वहां से शेयर भी कर सकते हैं...क्या पता आपके शेयर करने से ही कुछ लोग समय रहते सजग हो जाएं और यूपी की इज्जत को बचा लें। मेरी फेसबुक वॉलका लिंक - https://www.facebook.com/yusuf.kirmaninbt




Tuesday, February 14, 2017

साहेब, मुसलमान तो वोट बैंक ही रहेगा, आप देख लो...



उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (#UPElection2017) का दूसरा चरण भी अब पूरा होने को है लेकिन राजनीतिक दलों में असहमति के स्वर अब गाली गलौच औऱ साजिश में बदलते जा रहे हैं। बिहार चुनाव के दौरान जो हथकंडे मुस्लिम वोटों को बरगलाने के लिए अपनाए गए, यूपी में वो सारी सीमाएं लांघ गया है। कोफ्त तो तब होती है जब पढ़े-लिखे पत्रकार भी उन साजिशों की काली कोठरी में शामिल हो गए हैं। 

मेरे पत्रकार मित्रों के दायरे में आने वाले कुछ लोगों ने एक दिन पहले मुझे चाय पर निमंत्रित किया और वहां यूपी चुनाव पर चर्चा छेड़ दी। तमाम असहमतियों के बाद उनमें से दो लोग ऐसे थे जिन्होंने कहा कि मुसलमान तो वोट बैंक (#MuslimVoteBank) है, इन लोगों ने सारे चुनाव की ऐसी तैसी कर दी है। अगर ये सुधर जाएं तो भारत के कुछ राजनीतिक दलों का दिमाग ठीक हो जाए।

मैंने उनसे पूछा कि आखिर वो मुसलमानों को वोट बैंक क्यों बता रहे हैं और क्यों समझ रहे हैं। उन्होंने कहा, क्योंकि ये लोग हमेशा किसी एक ही राजनीतिक दल को चुनकर वोट करते हैं। पहले कांग्रेस (#Congress) को, फिर समाजवादी पार्टी (#SP)को तो कभी बहुजन समाज पार्टी (#BSP) को। बिहार में आरजेडी या जेडीयू को। एमपी में कांग्रेस को। मैंने उनसे कहा, इसमें बुराई क्या है...वो कहने लगे इससे गलत तरह की राजनीति (#Politics) फलती फूलती है। मैंने उनसे कहा बहुजन समाज पार्टी को कौन वोट करता है, सपा को कौन वोट करता है, उन्होंने कहा कि दलित (#Dalit) और यादव। मेरा सवाल था कि क्या ये वोट बैंक नहीं हैं, उनकी परिभाषा के हिसाब से। फिर मैंने कहा कि कुर्मी सभा, जाट महासभा, ब्राह्मण सम्मेलन, वैश्य सम्मेलनों में जो राजनीतिक दलों के नेता जाते हैं, उसका क्या मकसद होता है। 

जब उनसे कोई तर्क नहीं सूझा तो उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि मुसलमानों का कोई अपना नेता हो जैसे असाउद्दीन ओवैसी टाइप। जो उनके साथ कभी छल न करे जैसा सपा, बसपा और कांग्रेस ने किया है। मैंने कहा कि क्या आप एक और जिन्ना पैदा करना चाहते हैं। ....मुसलमानों की क्या ये एक अच्छी बात नहीं कि वो अपने धर्म (#Religion) से ऊपर उठकर किसी हिंदू (#Hindu) को औऱ उसकी पार्टी को अपना नेता मानकर उसको दिल से वोट करते हैं। ये तो उस पार्टी और नेता की समझ या नासमझी है जो वो उनके साथ छल कर रहा है।....आखिरकार उन पत्रकार मित्रों के मुंह से निकला कि मुसलमान भाजपा (#BJP) को वोट देकर तो देखें। ...मैंने कहा कि वो प्रयोग भी लखनऊ में किया जा चुका है, अटल बिहारी वाजपेयी को वोट देकर मुसलमानों ने ही उन्हें संसद में भेजा और वो पीएम बने। लेकिन भाजपा ने इस बार यूपी में नाम के लिए ही सही किसी मुसलमान को टिकट तक नहीं दिया।...दोनों पत्रकार बेचारे उठे और चुपचाप चले गए।...

...लेकिन ऐसी चर्चा आमतौर पर भाजपा की ही तरफ से चुनाव के दौरान शुरू और खत्म की जाती है। बड़ी तादाद में पत्रकार भाजपा की इस ध्रुवीकरण वाली रणनीति को आगे बढ़ाने का हिस्सा बन जाते हैं। 

कई ऐसी घटनाएं हो रही हैं जो बता रही हैं कि भाजपा कितने निचले स्तर पर जाकर मतदाताओं को बरगलाने की साजिश में शामिल हो गई है। देश में सबसे ज्यादा जगहों से प्रकाशित होने वाले एक हिंदी अखबार की वेबसाइट ने पहले चरण के वोट पड़ने के बाद एग्जिट पोल (#ExitPoll) निकाला कि भाजपा को वेस्ट यूपी की 73 सीटों पर सबसे ज्यादा बढ़त मिली है। फिर भाजपा के राष्ट्रीय प्रेजीडेंट अमित शाह ने इस एग्जिट पोल के आधार पर बयान दे डाला कि भाजपा को 50 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। चुनाव आयोग (#ElectionCommissionofIndia) पहले तो चुप रहा लेकिन जब सोशल मीडिया (#SocialMedia) में उस अखबार की करतूत के खिलाफ शोर मचा तो आय़ोग को कार्रवाई करनी पड़ी। यूपी में 15 जगह उस अखबार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है। बता दें कि ये वही अखबार (#Newspaper) है जिसने कभी मायावती के खिलाफ अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया था। ...ये सही है कि इस सारी करतूत के पीछे किसी प्रतिबद्ध पत्रकार और कर्मचारियों का हाथ रहा होगा, शायद अखबार मालिक और संपादक ऐसा नहीं चाहते रहे होंगे लेकिन फिर भी जिम्मेदारी तो उनकी भी बनती है कि ऐसे नाकारा लोग उनके संस्थान का हिस्सा हैं।


...बिजनौर में हाल ही में एक जाट (#JAT) युवक की हत्या कर दी गई और उसके पिता को घायल कर दिया गया। सभी अखबारों ने यह खबर छापी और यह भी लिखा कि हमले के पीछे कुछ मुसलमान थे। कुछ के खिलाफ नामजद रिपोर्ट भी है। लेकिन बिजनौर के लोकल अखबारों के अलावा किसी अखबार या टीवी ने वो रिपोर्ट नहीं दिखाई कि उस युवक का पिता चीख-चीख कर बता रहा है कि उस पर हमला करने वाले मुसलमान नहीं थे। ....लेकिन इस घटना को भाजपा ने रंग दिया और सारे पत्रकार उसमें नहा उठे। पड़ताल किसी ने नहीं की।

बागपत में एक घटना हुई। जिसका बयान अपने आप में आपको एक खास सवाल का जवाब दे देगा। छपरौली गांव में वहां के एक सर्राफ ने खुलकर भाजपा को वोट दिया। अगले दिन रात में कुछ युवक उसके घर पहुंचे। घर पर पथराव किया। भाजपा को वोट देने के लिए गालियां दीं और जाते वक्त घर के बाहर लिखा ...और दो भाजपा को वोट। उस सर्राफ ने जाकर पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि गांव के फलां-फलां जाट युवकों ने यह सब किया और वे कई दिन से उस पर दबाव बना रहे थे कि वो और उसका परिवार भाजपा को वोट न दे। 

हालांकि यह घटना इस मायने में निंदनीय है कि आप किसी मतदाता के साथ इस तरह का सलूक नहीं कर सकते। उसकी मर्जी वो चाहे जिसको वोट दे। ....बहरहाल, अधिकांश अखबारों ने इस खबर को दबा दिया लेकिन कुछ ने इसे छाप भी दिया। उस खबर का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह था कि गांव के जाट युवकों ने कहा कि वे पहले भाजपा के बहकावे में आकर कई गलत हरकतें कर चुके हैं और इस कारण गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचार खत्म हो गया। अब वो ऐसा नहीं होने देंगे और जो भाजपा को वोट देगा, उसका विरोध हर तरह से करेंगे। ...यानी वेस्ट यूपी में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत और उससे पहले चौधरी चरण सिंह के समय में जाट-मुसलमानों का जो गठजोड़ था, उसे भाजपा ने तरह-तरह की साजिश कर तोड़ने का काम किया। जिन्होंने टिकैत के किसान आंदोलन के बारे में पढ़ा होगा, वो जानते होंगे कि उस आंदोलन में वेस्ट यूपी के मुसलमानों की कितनी बड़ी साझेदारी थी। लेकिन आज की तारीख में वेस्ट यूपी का किसान आंदोलन दम तोड़ चुका है। लोकल जाट नेता इसे भांप चुके हैं और वे उसी गठजोड़ को फिर से जिंदा करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। भाजपा इसे किसी भी कीमत पर रोकने को आमादा है।

खैर, आगे बढ़ते हैं...

गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू का ताजा बयान इसी रणनीति का हिस्सा है। रिजिजू ने कहा कि चूंकि हिंदू धर्मातरण नहीं कराते इसलिए उनकी आबादी घट रही है। उनके इस बयान को सच मानने वाले पत्रकार भी हैं। लेकिन रिजिजू ने कभी यह नहीं बताया कि क्या भारत में कोई मुस्लिम संगठन संगठित रूप से धर्मातरण का कोई अभियान चलाता है। क्योंकि उन्हें जरूरत नहीं है। ...जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि उनकी आबादी बढ़ तो रही है लेकिन उनके घरों में भी एक या दो बच्चों का ही चलन है। बड़े शहरों में खुले फर्टिलिटी (प्रजनन) सेंटरों पर आधारित रिपोर्ट बताती है कि हिंदुओं में इनफर्टिलिटी रेट मुसलमानों से कम है। सरल शब्दों में कहें तो तमाम हिंदू पुरुषों में बच्चा पैदा करने की क्षमता मुस्लिमों के मुकाबले थोड़ी सी कम पाई गई है। हालांकि इसके तमाम सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं लेकिन फर्टिलिटी सेंटर चलाने वाले विशेषज्ञ  तो यही कहते हैं कि खान-पान विशेषकर नॉन वेज खाने की वजह से मुस्लिमों में फर्टिलिटी रेट बेहतर है। बहरहाल, मैं खुद इन तथ्यों को विवादास्पद मानता हूं। लेकिन मैंने यह जरूर नोट किया है कि मुस्लिमों में भी अब परिवार छोटे हो रहे हैं। मेरे अधिकांश जानकार मुस्लिम परिवारों में एक या दो ही बच्चे हैं। 


....कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि मुसलमान वोट बैंक हैं। रहेंगे। ...बकौल सरकारी आंकड़ों के उनकी आबादी भी बढ़ रही है।....अब साहेब आप देख लो, इन हालात में क्या करना है।...साजिश कर लो या हाथ मिला लो...हाथ मिलाने में सभी का फायदा है। भारत तो तेजी से तरक्की करेगा ही, आपकी तरक्की भी होती रहेगी, क्योंकि तब आपके पास भी इस वोटबैंक में शेयर होगा। पूरे विश्व में किसी भी मुस्लिम देश के मुकाबले भारत में मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। ऐसे में उसे एक औऱ जिन्ना चुनने या पैदा करने की ओर धकेलने की बजाय उसके साथ मिलजुलकर, उसके बैंक में कुछ शेयर लेकर रहना ज्यादा अक्लमंदी है।...है ना।

Tuesday, February 7, 2017

भारत...क्या तुम इसी लायक हो

 अमेरिका (#US) में इन दिनों जो कुछ भी घट रहा है, उसके बाद यह कहना और मानना ही पड़ेगा कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतांतिक देश कहलाने का हक उसे ही है। उसके मुकाबले हमारे भारत के लोकतंत्र (#Democracy) का जनाजा रोज निकल रहा है और उसका गुब्बारा अब फटने की कगार पर है।

पांच राज्यों में चुनाव प्रचार चल रहा है। चुनाव आयोग को रोजाना ठेंगा दिखाते हुए हर पार्टी का नेता बयान देता है। आयोग नोटिस देकर चुप हो जाता है। क्योंकि खद्दरधारियों ने उसे नोटिस देने से आगे कुछ और करने से रोक रखा है। प्रधानमंत्री से लेकर यूपी के सीएम अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल, मायावती, कांग्रेस के राहुल गांधी, डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर समेत किसी भी नेता पर ऊंगली रखिए, कोई ऐसा नहीं होगा, जिसने आचार संहिता न तोड़ी हो। इस सिलसिले में सूचना प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद का ताजा बयान सबसे निंदनीय है। इस शख्स ने अभी दो दिन पहले कहा कि चुनाव के बाद हम तीन तलाक (#TripleTalaq) के खिलाफ कानून बनाएंगे।

प्रसाद के इस बयान के पीछे मकसद साफ है। ये मुसलमानों को सीधी धमकी है। अगर तुमने हमे वोट नहीं दिया तो देख लेंगे। जनाब, आप ढाई साल से सरकार चला रहे हैं, आपको किसने रोका था कानून बनाने से। केंद्र की सत्ता संभालते पहले दिन यही कानून पास कर देते। चुनाव के बीच में आपकी इस धमकी का मतलब क्या है।...हैरानी है कि चुनाव आयोग ने रविशंकर प्रसाद की बात का नोटिस तक नहीं लिया, जबकि एक तरह से यह बयान एक साजिश के तहत दिया गया। इसी तरह बीजेपी और उसके फ्रंटल संगठन बजरंग दल, विहिप वगैरह राम मंदिर का मुद्दा छेड़ते हैं और तब बीजेपी के नेता बयान देते हैं कि अगर यूपी में जीते तो अबकी बार....बनेगा। ...जरा सोचिए एक तरफ प्रधानमंत्री विकास की दुहाई दे रहे हैं और दूसरी तरफ उनके अपने नेता बेहियाई कर रहे हैं। चुनाव आय़ोग नोटिस थमाकर चुप हो गया।

चुनाव आयोग (#ElectionCommissionofIndia) को छोड़िए...आम जनता तक रोजाना बेवकूफ बनती है लेकिन वो इतनी आरामतलब हो चुकी है कि उसे अब आंदोलन के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता। अच्छे दिनों की कल्पना में जी रहे भारतीयों पर नोटबंदी (#Demonetization) की शक्ल में इतना बड़ा हथौड़ा पड़ा लेकिन बेचारा चुपचाप लाइन में खड़ा रहा। विपक्षी नेता दो-चार बयान देकर या तो विदेश चले गए या फिर दुबक गए।

नोटबंदी एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर बड़ा जन आंदोलन खड़ा हो सकता था। लेकिन भारतीय समाज में वो नेतृत्व क्षमता गायब हो गई। जेएनयू (जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली) में चला स्टूडेंट्स का आंदोलन उम्मीद की एक किरण था लेकिन उसे आगे ले जाने या अन्य मुद्दों में उसका विस्तार करने की कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। लापता स्टूडेंट नजीब के मामले में इस पहल को आगे बढ़ाया जा सकता था लेकिन वो कोशिश भी छोड़ दी गई। नजीब का मामला अकेले जेएनयू का मामला नहीं है, सामाजिक सरोकार का मामला है लेकिन तमाम दलों का राजनीतिक नेतृत्व दुम दबाए बैठा है।

होना यह चाहिए था कि जेएनयू (#JNU) और देश की अन्य विश्वविद्यालयों से समान विचारधारा वाले स्टूडेंट्स सामने आते और नोटबंदी, नजीब व अन्य मुद्दों पर जनता को आंदोलन के लिए प्रेरित करते। लेकिन दोनों से भयानक चूक हो चुकी है। इन स्टूडेंट्स को एक मंच पर लाने और धार देने की जिम्मेदारी वामपंथी दलों की थी। लेकिन उनके नेता भी कुछ और नहीं कर सके।

यह तय है कि अब विश्वविद्यालयों के स्टूडेंट्स को जोड़े बिना आप कोई बड़ा सशक्त आंदोलन नहीं खड़ा कर सकते। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के बाद जो कैडर आधारित राजनीतिक दल हैं, उनके कैडर में बिखराव है। कांग्रेसी कैडर शुरू से हरामखोर रहा है, वो अपने नेताओं तक के लिए नहीं खड़ा होता, जनता के मुद्दों के लिए खड़े होने की बात तो जाने ही दीजिए। कांग्रेस में अब जुझारु नेताओं का अकाल पड़ चुका है। वामपंथी कैडर सशक्त था लेकिन उसकी लीडरशिप तमाम रोगों का शिकार हो चुकी है। वो लोग कैसे दोबारा खड़े होंगे और कैडर में हवा भरेंगे, समझ से परे हैं। केरल और त्रिपुरा में हर पांच साल बाद सरकार बनाकर आप उदाहरणों में शामिल तो हो सकते हैं लेकिन देश में आंदोलन नहीं खड़ा कर सकते। जनता दल यूनाइटेड, लालू पार्टी (आरजेडी) समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस या इन जैसे और बहुत सारे दल आकंठ भ्रष्टाचार (#Corruption), अवसरवाद, कुनबापरस्ती में डूबे हैं, उनसे किसी आंदोलन की उम्मीद बेकार है।

जयप्रकाश नारायण ने अपने संपूर्ण क्रांति आंदोलन में जिस तरह यूनिवर्सिटीज के स्टूडेंट्स को अपने साथ जोड़ा था, उसी तर्ज पर कुछ करने की पहल स्टूडेंट्स लीडर को करनी पड़ेगी। जेपी अगर आंदोलन न छेड़ते तो उस वक्त ताकतवर इंदिरा गांधी को हटा पाना मुश्किल था। हालांकि इंदिरा के खिलाफ जनमत करने में न्यायपालिका की भी बहुत बड़ी भूमिका थी, जिसने तत्कालीन प्रधानमंती के चुनाव को रद्द करने का साहस दिखाया था।

...क्या मौजूदा न्यायपालिका (#IndianJudiciary) से हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं। वक्त इसका जवाब देगा। कोयला घोटाला, स्पेक्ट्रम घोटाला या भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका ने कुछ हिम्मत जरूर दिखाई लेकिन सत्ता के केंद्र में बैठे लोग इससे बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। करप्शन से भी बड़ा अपराध उन नेताओं ने गुजरात में किया जहां से जनता को हिंदू-मुसलमान में बांटने, दंगा कराने का खतरनाक खेल शुरू हुआ। यह लोगों को अब समझ में आ रहा है कि गुजरात के दंगे दरअसल एक लंबी राजनीतिक साजिश का हिस्सा थे। 

गुजरात दंगों (#GujaratRiots) में छुटभैये नेताओं को सजा हुई लेकिन इन दंगों के मास्टरमाइंड अदालत की पहुंच से आज भी बाहर हैं। वहां हुए अनगिनत फर्जी एनकाउंटरों के साजिशकर्ता आजतक बेनकाब नहीं हुए।

ये तो खैर बड़े मामले हैं लेकिन सत्ता केंद्रित लोगों से जुड़े बहुत छोटे-छोटे मामले हाल ही में अदालतों में पहुंचे लेकिन याचिकाएं खारिज हो गईं,  क्योंकि उनमें अदालत को कुछ ठोस नजर नहीं आया। अदालत कभी किसी मामूली मुद्दों को बहुत ठोस मान लेती है तो कभी किसी ठोस मुद्दे को मामूली बताकर खारिज कर देती है। भारत में न्यायपालिका के इम्तेहान का दौर भी शुरू हो चुका है।

हमारे बुजुर्ग कहते आए हैं और अंग्रेजों के जमाने में इस पर अमल भी करते थे कि – जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो...लेकिन जब भारत में प्रिंट मीडिया मौत के कगार खड़ा है और टीवी न्यूज चैनल सत्ता के दरबार में अर्दली बन चुके हैं तब यह खुदकुशी कौन करना चाहेगा। यानी बात वहीं की वहीं है कि जब समस्त लोकतांत्रिक शक्तियां गूंगी-बहरी या मजबूर हो चुकी हैं तो ऐसे में जनता बेचारी बनकर रह गई है। लेकिन इसकी जिम्मेदार भी वही है क्योंकि उसे सही आंदोलन का चुनाव करना नहीं आता। वो आरामतलब हो चुकी है। उसे बिना कुछ किए सबकुछ चाहिए। नोटबंदी के खिलाफ आंदोलन इस देश को नई दिशा दे सकता था लेकिन इसमें सहभागिता करने वाले सारे स्टेकहोल्डर चूक गए हैं।

जिस अमेरिका को हम लोग पानी पीकर पूंजीवादी देश कहकर गरियाते बड़े हुए, वहां की जनता ने दिखा दिया कि आंदोलन कैसे होते हैं और कैसे सत्ता का प्रतिकार किया जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप (#Trump) ने अभी अपने मनमाने आदेश (#MuslimBan) जारी करने की शुरुआत भर की थी लेकिन अमेरिकी जनता सड़कों पर आ खड़ी हुई। वहां की अदालतें भी जनता के साथ खड़ी हो गईं। वहां के मानवाधिकार संगठन जनता के साथ खड़े हो गए। भोग-विलास में लिप्त माने जाने वाले पश्चिमी देशों में ट्रंप के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गए। लंदन में दस हजार लोगों का ट्रंप के विरोध में जुटना बहुत बड़ी बात है। फ्रांस में बार-बार आतंकी हमलों के विरोध में इतने लोग नहीं जुटे, जितने पेरिस में ट्रंप के विरोध में जुटे। बर्लिन भी इसका गवाह बना। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ अगर उस पूरे देश की अदालत ही खिलाफ हो जाए तो सोचिए कि इस इंसान के फैसले को कोई भी मान्यता देने को तैयार नहीं है।

समाजशास्त्रियों के लिए यह अध्ययन का मुद्दा है कि ट्रंप ने 7 मुस्लिम देशों के नागरिकों और वहां के रिफ्यूजियों के अमेरिका आने पर पाबंदी लगाई लेकिन आंदोलन में सहभागिता अमेरिका के मूल बाशिंदों ने भी की। आखिर वो ऐसी कौन सी वजहें हैं जिसने वहां के मूल बाशिंदों को 7 मुस्लिम देशों के समर्थन को मजबूर किया...

अमेरिका की आधी से ज्यादा आबादी दूसरे देश के लोगों की है। ब्लैक लोग जो वहां के मूल बाशिंदे हैं, उन्हें सफेद लोगों ने वहां दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है। वही ब्लैक लोग इस आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं, उनका साथ एशियाई लोग दे रहे हैं। लेकिन यह भी नहीं कि सारे सफेद लोग ट्रंप के समर्थन में हैं। उनके कई सारे संगठन ट्रंप के विरोध में हैं। फेसबुक (#Facbook), गूगल (#Google), माइक्रोसाफ्ट (#Microsoft), एपल (#Apple) जैसी कंपनियों को चलाने वाले या तो एशियाई हैं या फिर ऐसे रिफ्यूजी जिनके मां-बाप वहां जाकर बस गए हैं। ये सारे लोग ट्रंप की नीति के खिलाफ उतर पड़े हैं।


मुझे तो लगता है कि पहले बुश ने आतंकवाद रोकने के नाम पर अमेरिकी जनता को परेशानी में डाला और अब यह राष्ट्रपति आया है जो फिर से आतंकवाद रोकने की आड़ में हमें फिर से परेशानी में डालने जा रहा है। शायद अमेरिकियों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि तथाकथित आतंकवाद रोकने के नाम पर यह शख्स ऐसे मुस्लिम देशों के लोगों के प्रवेश पर रोक लगा देगा, जिनका आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है। ईरान ने आज तक कभी भी अमेरिका की चींटी भी नहीं मारी। इराकी बेचारे खुद अमेरिकी फौज के बूटों तले रौंदे जा चुके हैं। वहां के तेल के कुओं पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा है। अमेरिका की हथियार और तेल लॉबी जॉर्ज डब्ल्यू बुश के वक्त से ही सत्ता के मजे ले रही है। तेल में से और तेल निकालने के लिए और इस्राइलों हितों की रक्षा के लिए ट्रंप ने यह घिनौना खेल खेला है। इसलिए इसका विरोध वहां जरूरी माना गया। 

(This Article first appeared in NBT newspaper online)
@copyright Yusuf Kirmani
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amairichaəmairikə