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Tuesday, December 6, 2011

अध्यात्मिक भारत में मोहर्रम के मायने

Meaning of Muhramme in Spiritual India
इस्लामिक कैलंडर के हिसाब से साल की शुरुआत हो चुकी है। मोहर्रम उसका पहला महीना है। लेकिन न सिर्फ इस्लामिक कैलंडर के हिसाब से बल्कि पूरी दुनिया में जितनी भाषाएं, धर्म, जातियां मौजूद हैं, उनके लिए भी मोहर्रम के कई मायने और मतलब है। पर, अध्यात्मिक भारत के लिए इसका महत्व बहुत खास है। भारत में मुंशी प्रेमचंद ने कर्बला का संग्राम जैसी प्रसिद्ध पुस्तक लिखकर इसे आम हिंदी भाषी लोगों तक पहुंचाया तो भारत के नामवर उर्दू शायर कुंवर मोहिंदर सिंह बेदी ने इसे नए तेवर और अकीदत के साथ पेश किया। अपनी एक रचना में वह लिखते हैं कि कर्बला के मैदान में शहीद होने वाले पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन महज किसी एक कौम की जागीर क्यों रहें, क्यों न उस कुर्बानी को आम बनाया जाए जो इंसानियत के नाम दर्ज है। जिसमें छह महीने के बच्चे से लेकर बड़ों तक बेमिसाल शहादत शामिल है। महात्मा गांधी ने अपनी अहिंसा की अवधारणा का जिक्र करते हुए लिखा है कि उन्हें इस तरफ प्रेरित करने वाली विभूतियों में इमाम हुसैन भी शामिल हैं। पूरी दुनिया में जब हिंसा अपने नए-नए चेहरे रखकर सामने आ रही है तब कर्बला का संदेश और हजारों की फौज के सामने पैगंबर के नवासे के साथ शहीद होने वाले 72 लोगों की कुर्बानी और भी प्रासंगिक हो गई है। 1400 साल पहले इराक में स्थित एक छोटी सी जगह कर्बला में हुए इस संग्राम में ऐसा क्या था जो खासकर अध्यात्मि भारत समेत पूरी दुनिया के लिए जानने का सबब बना हुआ है। उन दिनों जब अरब का विभाजन इस तरह का नहीं हुआ करता था तो यजीद नामक राजा का शासन पूरे अरब जगत पर था। पैगंबर के देहांत के बाद जब इस्लाम में राजनीति की वास्तविक शुरुआत हुई तो जिस मकसद के लिए इस्लाम की स्थापना हुई, वह छिन्न-भिन्न होता नजर आया। पैगंबर ने जिन कुरीतियों के खिलाफ उस वक्त लोगों को जागरूक किया था, उन कुरीतियों को शासक वर्ग ने फिर से अपने संरक्षण में शुरू कर दिया। जिसमें शराबखाने, जुआखाने, सगी बहन से विवाह, लडकियों की भ्रूण हत्या जैसी तमाम बुराइयां फिर से लौटने लगी। इसका सबसे जबर्दस्त विरोध पैगंबर के घराने यानी अहले बैत ने किया, जो और कोई नहीं बल्कि उनके परिवार और खानदान के ही लोग थे। तत्कालीन व्यवस्था में इन्हें अध्यात्मिक या रूहानी ताकत माना जाता था। इनके आह्वान पर जब चौतरफा विरोध शुरू हुआ तो यजीद ने अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए ऐसी अध्यात्मिक ताकतों से बैयत (संधि-समझौता) करने को कहा। उस समय तक कई इमामों को तत्कालीन शासकों ने जहर देकर या हमला कर शहीद कर दिया था। यजीद के दौर में इमाम हुसैन के अहिंसा का संदेश पूरे अरब में गूंज रहा था और इमाम हुसैन की यह हैसियत और रुतबे से यजीद खासा परेशान था। अंत में उसने भी इमाम हुसैन के पास बैयत का संदेश भेजा, जिसे उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने नाना (पैगंबर) की शिक्षा और मकसद के खिलाफ नहीं जा सकते। इमाम हुसैन ने इसके विपरीत यह प्रस्ताव किया कि बेहतर है कि वे उसका देश छोड़कर भारत वर्ष के लिए कूच करना चाहेंगे, जहां वह शांति से अपना जीवन बिताएंगे। इस प्रस्ताव के बाद वह अपने कुनबे के 71 लोगों को लेकर चल पड़े। इस प्रस्वाव ने यजीद की बेचैनी बढ़ा दी, उसने अपने एक गर्वनर को इमाम हुसैन का रास्ता रोकने और युद्ध का आदेश दिया। तब तक इमाम हुसैन का काफिला कर्बला में पहुंच चुका था। वहां उन्हें रोका गया और युद्ध के लिए ललकारा गया। इमाम हुसैन ने फिर दोहराया कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यजीदी फौज ने चारों तरफ से घेरा डाल दिया। सात मोहर्रम को पानी बंद कर दिया गया, रसद की आमद रोक दी गई। भूखे प्यासे लोग कब तक इस तरह रहते। दस मोहर्रम को अंततः फौज ने हमला किया और मजबूरन 72 निहत्थे लोगों को हजारों की फौज से लड़ना पड़ा। इस दौरान इमाम हुसैन का दुश्मन की फौज को संबोधन, अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को संबोधन जैसी तमाम घटनाएं हैं जो विस्तार से व्याख्या मांगती हैं। लेकिन भारत के लिए जो बात मोहर्रम को खास बनाती है कि भारत वर्ष ने, जिसकी सीमाएं तब अफगानिस्तान तक फैली हुई थीं, में तब भी हर धर्म के मनीषियों का स्वागत था। भारत शुरू से ही अध्यात्म और ज्ञान का केंद्र रहा है, यह बात 1400 साल पहले इमाम हुसैन के तमाम संबोधनों और प्रस्तावों से जाहिर है और वह इस देश में सिर्फ इन्हीं खूबियों की वजह से आना चाहते थे। तमाम लोग यह जानकर दंग रह जाएंगे कि भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, रूस, बरमूडा टापू से लेकर चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में मोहर्म के जुलूस पर पाबंदी नहीं है, लेकिन सऊदी अरब के तमाम हिस्सों में आज भी मोहर्रम के जुलूस पर पाबंदी है। कहने को अरब का शासक वर्ग खुद को लोकतांत्रिक देश कहता है लेकिन वहां पर इमाम हुसैन के अनुयायी जुलूस नहीं निकाल सकते। महज भारतीय संविधान या यहां के शासक वर्ग ने ही भारत को महान लोकतांत्रिक या अध्यात्मिक देश नहीं बनाया। ऐसी छोटी-छोटी बातें भी उसे बाकी के मुकाबले अलग कतार में खड़ा करती हैं। उर्दू के मशहूर शायर पंडित ब्रज नारायण चकबस्त, बासवा रेड्डी से लेकर लता मंगेशकर, जयती बावरी, सोनू निगम ने इमाम हुसैन पर तमाम कसीदे और कलाम लिखे-पढ़े हैं। भारत के सूफी संतों की वाणियां अगर इसमें शामिल कर लें तो यह सूची और भी समृद्ध हो जाएगी। भारत में इमाम हुसैन को मनाने वाले हुसैनी पंडित जो हिंदू हैं और पंजाब में रहते हैं, उन पर तैयार की गई बीबीसी की एक रिपोर्ट का अगर जिक्र किया जाए तो अध्यात्मिक भारत में अहिंसा का संदेश देता मोहर्रम किसी एक धर्म विशेष की जायदाद न होकर सभी के लिए खास है। साभारः नवभारत टाइम्स, संपादकीय पेज, 06 दिसंबर 2011 यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट (http://nbt.in)पर भी उपलब्ध है। Courtesy: NavBharat Times, Editorial Page, December 06, 2011 This article also available at NavBharat Times' website http://nbt.in

Thursday, October 13, 2011

हमारी-आपकी जिंदगी में ब्लैकबेरी

क्या आपके पास ब्लैकबेरी (Blackberry) है, मेरे पास तो नहीं है। मैं इस मोबाइल फोन का विरोधी नहीं हूं। दरअसल पिछले तीन दिन से इसकी सेवाएं भारत सहित दुनिया के 6 करोड़ लोगों को नहीं मिल रही हैं। यह भारत के अखबारों की पहले पन्ने की खबर बन गई है। दुनिया के किसी और अखबार ने इस खबर को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी। भारत में यह फोन आम आदमी इस्तेमाल नहीं करता। यह भारत के कॉरपोरेट जगत यानी बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारी, नौकरशाह, खद्दरधारी नेता, अमीर घरों के बच्चे, अमीर बनने की इच्छा रखने वाले और उनकी अपनी नजर में ठीकठाक वेतन पाने वाले प्रोफेशनल्स का यह चहेता फोन है। भारत में एक कहावत मशहूर है कि अगर आपका जूता अच्छी तरह चमक रहा है तो उससे आपकी हैसियत का अंदाजा लगाया जाता है। यानी वह जमात जो खुद को प्रभावशाली बताती है, आपको अपनी जमात में शामिल करने को तैयार है। अब उस जूते की जगह ब्लैकबेरी ने ले ली है।
मैं ब्लैकबेरी खरीद सकता हूं और उसकी सेवा का दाम भी चुका सकता हूं। लेकिन मुझे उसे ठीक तरह इस्तेमाल करना नहीं आता है। जब मैं मीटिंगों में जाता हूं तो वहां लोग अपने हाथ में ब्लैकबेरी निकालकर बैठे होते हैं और उसमें न जाने क्या कर रहे होते हैं। मेरे पास नोकिया (Nokia) का मामूली फोन है। इस बार बहुत हिम्मत जुटाकर टच वाला फोन (Touch Phone) लिया है लेकिन चलाने में थोड़ी असुविधा अब भी है। पर वह आसान है, इसलिए दिक्कत बढ़ी नहीं। वे लोग मेरे नोकिया फोन को बड़े अचरज से देखते हैं और मुझे बहुत पिछड़ा हुआ और पुरानी सोच का मान लेते हैं। खैर, इससे क्या फर्क पड़ता है। ब्लैकबेरी के ब्लैकआउट होने की खबर में यह भी पढ़ने को मिला कि कैसे टाटा (TATA Steel) कंपनी के एक बड़े अधिकारी इसलिए चिंतित दिखे कि वह अपनी कंपनी की कॉरपोरेट मीटिंग का सामना कैसे कर पाएंगे, जब उनका ब्लैकबेरी काम नहीं कर रहा है। क्योंकि वह ब्लैकबेरी पर फौरन ही सारी सूचना अपने सहयोगियों से मांग लेते हैं। इस सदी के महानायक बॉलिवुड (Bollywood) स्टार अमिताभ बच्चन भी परेशान हैं। उन्होंने ट्वीट (Tweet) करके बताया कि वह ब्लैकबेरी न चलने से कितने परेशान हैं। हालांकि उनका लड़का अभिषेक बच्चन आइडिया मोबाइल (Idea Mobile) सेवा का विज्ञापन करता है और उसी को सबसे अच्छी सेवा बताता है। अब शायद अमिताभ भी ब्लैकबेरी छोड़ आइडिया पर आ जाएं। पता नहीं, तब वह यह बात ट्वीट करेंगे या नहीं। हो सकता है अपने ब्लॉग पर लिखें। ब्लैकबेरी को भारत पसंद है। अमेरिका में जब उसकी इकोनॉमी ((American Economy)) का बैंड बज रहा है तो भारत में ब्लैकबेरी का मार्केट शेयर तेजी से बढ़ रहा है। साइबर मीडिया रिसर्च (Cyber Media Research) के मुताबिक भारत में 2010 में स्मार्टफोन (Smart Phone) मार्केट में ब्लैकबेरी का मार्केट शेयर यानी आधार 13 पर्सेट है जो 2009 के मुकाबले 8 पर्सेट ज्यादा है। पिछले चार साल में ब्लैकबेरी ने भारत में 7.7 लाख हैंडसेट बेचे हैं।
अब इनके मुकाबले भारत में जो कंपनियां इसी तरह की सेवा देने का दावा करती हैं, जैसे एयरटेल (Airtel) और वोडाफोन (Vodaphone), उनका नेटवर्क करीब-करीब रोजाना भारत के किसी न किसी इलाके में बैठा रहता है, कोई खबर नहीं बना पाते। बेचारे। हालांकि मैं एयरटेल का ग्राहक हूं लेकिन इस कंपनी की चिरकुटई से बेहत तंग हूं। इनके बिल में हेराफेरी आम बात है। लेकिन चूंकि भारत में इसका मार्केट शेयर सबसे ज्यादा है तो मेरा इसका ग्राहक बने रहना जरूरी है क्योंकि आम लोगों के पास एयरटेल के ही नंबर हैं। मुझे एक बड़े कंपनी के अधिकारी बता रहे थे कि एयरटेल का मालिक भी ब्लैकबेरी ही इस्तेमाल करता है और वह पूरी-पूरी मीटिंग ब्लैकबेरी के दम पर निपटाता है। हालांकि शायद आप लोगों को याद हो कि दो साल पहले भारत सरकार ने एक आदेश जारी कर सेना, इंटेलीजेंस एजेंसीज और टॉप रैंक के ब्यूरोक्रेट्स को कहा था कि वे ब्लैकबेरी का इस्तेमाल न करें। क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को खतरा है। गृह मंत्रालय ने ब्लैकबेरी की सेवा देने वाली कंपनी रिसर्च इन मोशन के अफसरों को कई बार मीटिंग के लिए तलब किया लेकिन उन्होंने अंगूठा दिखाया और नहीं आए। बाद में पता नहीं क्या हुआ कि मामला सुलझ गया। वैसे अभी इससे जुड़े किसी स्कैम के बारे में नहीं सुना गया है। मैं आपको यह सलाह देने से रहा कि आप भी हैसियतवाला बनने के लिए ब्लैकबेरी खरीद लें लेकिन कितना अच्छा हो कि सारी मोबाइल सेवाएं महीने में कम से कम एक हफ्ता बंद रहें तो दिमाग और कान को कुछ फायदा जरूर मिलेगा। पर, यह सुझाव कोई मानेगा नहीं। हम लोगों को जिस तरह अंग्रेज चाय पीने का आदी बनाकर गए हैं वैसे ही मल्टीनैशनल कंपनियों ने इसका आदी बना दिया है। बचकर कहां जाएंगे। एवरेस्ट की चोटी पर भी मोबाइल टॉवर लगाने का प्लान शायद कोई कंपनी बना रही हो।

Thursday, March 10, 2011

पाकिस्तान में धर्म का अपहरण

एशिया में अगर किसी मुल्क के लोगों की धार्मिक आजादी (religious freedom)जबर्दस्त खतरे में पड़ गई है तो वह पाकिस्तान है। वहां के ब्लासफेमी कानून की आलोचना करने पर एक और राजनेता की जान ले ली गई। इस बार तालिबानी कट्टरपंथियों ने वहां के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या कर दी, जबकि इसी मुद्दे पर पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। सलमान की हत्या के बाद पाकिस्तानी पत्रकार बीना सरवर ने एनबीटी के साथ एक बातचीत में कहा था कि कट्टरपंथी इस कानून के खिलाफ उठ रही हर आवाज को दबाना चाहते हैं। इस कानून को लेकर जो बहस बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद उठी थी, वह अब नए सिरे से शुरू हो गई है। मसलन, क्या वाकई कुरान में ऐसा कोई आदेश है कि मुहम्मद की निंदा करने वाले को मृत्युदंड दिया जाए?

सूर-ए-अजाब
कुरानशरीफ में ब्लासफेमी (blasphemy)को लेकर आई कुरान शरीफ की आयत सूर-ए-अजाब में कहा जा रहा है - ऐ मुहम्मद, जिसने अल्लाह और उसके संदेशवाहक की निंदा की, अल्लाह उसको इसी दुनिया में और बाद में भी सजा देगा। उसने उनकी बर्बादी के पूरे इंतजाम कर दिए हैं। अगर किसी ने कुरान का अध्ययन किया है तो उसे बखूबी मालूम होगा कि कुरान की जितनी भी आयतें हैं, उनके संदेश बहुत स्पष्ट हैं। कहीं कोई बीच का रास्ता नहीं अपनाया गया है। कुरान में इस बात का जिक्र है कि लोगों ने न सिर्फ अल्लाह के रसूल यानी पैगंबर (prophet) हजरत मुहम्मद साहब की निंदा की बल्कि जब उन्होंने इस्लाम (Islam) का संदेश फैलाना शुरू किया तो उनका मजाक भी उड़ाया। लेकिन कुरान की किसी आयत में या हदीस में इस बात का जिक्रनहीं मिलता कि अल्लाह ने पैगंबर की निंदा के लिए कत्ल का आदेश दिया।

बुराई का बदला
क्या मुसलमान पूरी दुनिया की कोर्स बुक्स में शामिल उस मशहूर घटना को भूल गए हैं? अरब की एक महिला मुहम्मद साहब से नफरत करती थी और वह जब उसके दरवाजे से निकलते तो उन पर कूड़ा फेंक देती थी। एक दिन जब मुहम्मद पर कूड़ा नहीं फेंका गया तो उन्हें हैरानी हुई और उन्होंने सीधे उस महिला के मकान पर दस्तक दी। वह बीमार थी। रसूल ने उसका हाल पूछा और उसके शीघ्र अच्छे होने के लिए अल्लाह से दुआ की। अगले दिन वह महिला मुहम्मद साहब का इंतजार कर रही थी और उनके वहां पहुंचने पर उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया। ऐसी सैकड़ों मिसालें हदीस में मौजूद हैं लेकिन ईशनिंदा करने वाले को कत्ल करने की मिसाल इसमें कहीं नहीं है।

ऊपर मैंने जिस आयत का जिक्र किया है , वह कुरान की मशहूर आयतों में से एक है। धर्मग्रंथ की मीमांसा ( तफसीर ) लिखने वाला दुनिया का बड़े से बड़ा विद्वान ( आलिम ) इस आयत की व्याख्या इस तरह नहीं करेगा कि इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष , किसी भी रूप में ईशनिंदा करने वालों के कत्ल की इजाजत दी गई है। अल्लाह ने अगर उनके लिए सजा - ए - मौत मुकर्रर की होती तो उसका जिक्त्र करने से अल्लाह या मुहम्मद को भला कौन रोक सकता था ?

एक आयत में और तमाम हदीसों में इस बात का जिक्त्र मिलता है कि उस समय इस्लाम और मुहम्मद के विरोधी सिर्फ इसलिए बैठकों का आयोजन करते थे , कि उनमें इनका मजाक उड़ाया जा सके। वे आपस में कहते थे - ' रा - इना ' ( यानी कृपया इसे दोहराएं ) । फिर वे रसूल के खिलाफ किसी जुमले को दोहराकर अपने मुंह से तरह - तरह की आवाजें निकाला करते थे। ऐसे लोगों के बारे में भी कुरान की यह आयत नहीं उतरी कि इन्हें कत्ल कर दिया जाए। आयत यह उतरी कि - हे ईमान रखने वालो , रा - इना बार - बार मत कहो , बल्कि इसकी जगह कहो ' उनजुरना ' । उन्हें ध्यानपूर्वक सुनो ताकि तुम्हें पैगंबर से हर बात को बार - बार दोहराने को न कहना पड़े। ( कुरान 2: 104) अरबी डिक्शनरी में ' रा - इना ' और ' उनजुरना ' के मायने एक ही हैं लेकिन ' रा - इना ' नेगेटिव है और ' उनजुरना ' पॉजिटिव।

एक और आयत ( कुरान 57-58) ईशनिंदा करने वालों के लिए उतरी , जिसका अर्थ है - ऐ ईमान रखने वालों , मक्का के उन लोगों को तुम अपना दोस्त मत बनाओ जो इस किताब ( कुरान ) पर यकीन नहीं रखते , जो तुम्हारे धर्म का सम्मान नहीं करते और मजाक उड़ाते हैं। अगर तुम वाकई ईमान रखते हो तो अल्लाह से डरो। जब तुम्हें नमाज के लिए बुलाया जाता है तो उनके ऐतराज पर ध्यान मत दो। उन लोगों का समूह ऐसा इसलिए कर रहा है क्योंकि वह सच नहीं जानता है।

कुरान की एक और आयत से यह बात और साफ हो जाएगी - जिस बंदे को अल्लाह ने जिंदगी दी है , उसकी जान मत लो। क्योंकि तुम्हारे पास उसकी जान लेने का अधिकार नहीं है। क्या तुम्हें यह अधिकार दिया गया है ? समझदार बनो। ( कुरान 6:151) । यह आयत भी देखिए - अगर कोई एक जिंदगी बचाता है तो यह सभी लोगों की जान बचाने के बराबर है। ( कुरान 5:32) ।

बद्र की जंग
अगर किसी ने इस्लाम के इतिहास का अध्ययन किया है तो उसने बद्र की जंग के बारे में जरूर पढ़ा होगा। इस जंग में मुहम्मद के अनुयायियों को यहूदियों और ईसाइयों पर पहली बार जीत हासिल हुई थी। इस जंग में मुहम्मद साहब की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हजरत अली को पैगंबर ने आदेश दिया कि वह इस बात का खास ख्याल रखें कि पराजय स्वीकार करने वालों को अपनी धार्मिक आजादी हासिल हो , उन पर किसी तरह का जुल्म न किया जाए। हार मानने वालों पर जजिया टैक्स लगाया गया लेकिन किसी भी हदीस या इतिहास की किताब में जिक्त्र नहीं मिलता कि मुहम्मद साहब या हजरत अली ने उनके कत्ल का आदेश दिया हो। हैरानी तो यह है कि पाकिस्तान के बड़े मौलाना - मौलवी इस मुद्दे पर चुप हैं। मस्जिद में नमाज पढ़ते लोगों और मुहर्रम के जुलूसों पर हमला करने वालों को ये मौलवी अपनी चुप्पी के जरिये आखिर किस जन्नत में भेजना चाहते हैं?

साभारः नवभारत टाइम्स, मार्च 10, 2011
courtesy: Nav Bharat Times March 10, 2011
also available at http://nbt.in

Tuesday, January 25, 2011

उत्सव शर्मा...हर शहर से निकल कर आएंगे

उत्सव शर्मा का यह दूसरा हमला है ऐसे लोगों पर, जिन पर आरोप है कि उन्होंने बेटियों को मरने पर मजबूर किया या फिर उन्हें मार दिया। मैं यहां उत्सव के समर्थन में खड़ा हूं। मैं जानता हूं कि ऐसा कह कर मैं भारतीय संविधान और यहां की अदालतों की तौहीन कर रहा हूं लेकिन अगर अब उत्सव के लिए लोग न उठ खड़े हुए तो आगे स्थितियां और भयावह होने वाली हैं। अभी बिनायक सेन को अदालत द्वारा सजा सुनाने के बाद भारतीय मीडिया और यहां के तथाकथित बुद्धिजीवियों की जो सांप-छछूंदर वाली स्थिति रही है, उसे देखते हुए बहुत जल्द बड़ी तादाद में उत्सव और बिनायक पैदा होंगे। इस समर्थन को इस नजरिए से न देखा जाए कि मेरे जैसे लोग हिंसा को अब कारगर हथियार मानने लगे हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। यह हिंसा नहीं, उन असंख्य भारतीय के जज्बातों का समर्थन है जो इन दिनों तमाम वजहों से बहुत आहत महसूस कर रहा है।

इधर आप लोग इस तरह की खबरें भी पढ़ रहे होंगे कि काफी संख्या में पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक अपराध की तरफ मुड़ रहे हैं। ऐसे युवक जब खद्दरधारी नेताओं और उनसे जुड़े बेईमान अफसरों को जनता के पैसे को लूटते हुए देखते हैं तो इस व्यवस्था से उनका मोह भंग होने लगता है। वे सोचते हैं कि जब यह लोग शॉर्टकट मनी बना सकते हैं तो हम ही क्यों पीछे रहें। यहां पर उत्सव शर्मा को ऐसे युवकों की कतार में नहीं खड़ा किया जा रहा है। दोनों में महीन सा फर्क है – वह है व्यवस्था के प्रति विद्रोह।

आरुषि तलवार के पिता डॉ. राजेश तलवार ने मंगलवार को गाजियाबाद की एक अदालत में अर्जी लगाई कि उनकी बेटी की हत्या की जांच फिर से कराई जाए। यानी फिर से वही लकीर पीटने की कहानी और कई साल तक फैसले के इंतजार में केस को उलझाने की कोशिश। आरुषि और डॉ. तलवार के नौकर हेमराज की हत्या के फौरन बाद नोएडा पुलिस ने डॉ. राजेश तलवार को बतौर मुलजिम गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन अचानक नोएडा पुलिस खलनायक साबित हो गई। केस सीबीआई को सौंपा गया। अब सीबीआई की चार्जशीट कह रही है कि नोएडा पुलिस के जांच की दशा सही थी। डॉ. तलवार पर शक पैदा होता है।

अदालत का जो भी फैसला आए या फिर जांच एजेंसियां कुछ भी कहें समाज ने इस केस में डॉ. राजेश तलवार के प्रति जो धारणा बना ली है उसे अदालत और जांच एजेंसियां बदल नहीं सकतीं। उत्सव शर्मा जैसे लोगों का गुस्सा इन धारणाओं की वजह से ही भड़का है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों के प्रति पैदा होती नफरत का भी नतीजा है।

उत्सव शर्मा (Utsav Sharma) ने हरियाणा के पूर्व डीजी पुलिस एस. पी. एस. राठौर पर हमला कर इसी तरह अपने गुस्से का इजहार किया था। राठौर को अदालत सजा सुना चुकी है। यह बूढ़ा शख्स एक किशोरवय की लड़की के यौन उत्पीड़न का दोषी है। उस लड़की के पिता ने जब पुलिस में एफआईआर करानी चाही तो राठौर ने पुलिस की वर्दी के जोर उसके पूरे घर को बर्बाद कर दिया। लड़की को चंडीगढ़ के स्कूल ने राठौर के दबाव पर स्कूल से निकाल दिया। लड़की ने खुदकुशी कर ली। भाई पर इतने मुकदमे पुलिस ने दर्ज किए कि उसे जेल जाना पड़ा। पिता को बेइज्जत होना पड़ा।

उस डीजी को हरियाणा में मेडल पर मेडल मिलते रहे। नेता अपनी सभाओं में उसका गुणगान करते रहे और पंचकूला का एक परिवार इंसाफ के लिए भटकता रहा। हालांकि उसे कोर्ट से ही इंसाफ मिला लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राठौर ससम्मान नौकरी से रिटायर हो चुका था। पैसे और रसूख के दम पर अदालत की सजा महज एक रस्म अदायगी बनकर रह गई। ऐसे में उत्सव शर्मा जैसे लोगों को अगर खून नहीं खौलेगा तो क्या होगा। उसने जो कुछ किया वह ठीक ही था। उसे आप चाहे ताजा घटना के बाद सनकी या पागल करार दे दें तो भी राठौर या डॉ. तलवार जैसे लोगों के प्रति पैदा हो रही नफरतों को रोका नहीं जा सकेगा।

अब ऐसा ही कुछ भ्रष्टाचार के मामलों में भी होने वाला है। नेताओं को सुनने तो खैर अब भी लोग नहीं पहुंच रहे हैं लेकिन यह बहुत जल्द होगा कि लोग इनकी सरेआम बेइज्जती भी करेंगे। भारत में असंख्य उत्सव शर्मा गांव से लेकर शहर के हर चौराहे पर ऐसे नेताओं का इंतजार करते नजर आएंगे। करप्शन के मामलों को लेकर भारतीय जनमानस की धारणा कुछ ऐसी ही बनती जा रही है। बेशक खादी वाले या उनके जैसे अन्य इस पब्लिक को कभी तो लाल चौक पर तिरंगे फहराने की आड़ में उसका ध्यान ऐसे मुद्दों से मोड़ने की कोशिश में जुटे रहें लेकिन लोगों की सोच में बदलाव साफ नजर आ रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो या फिर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, तमाम खद्दरधारियों, भगवाधारियों और जाति आधारित राजनीति करने वालों का आपसी गठबंधन साफ नजर आता है। चोर-चोर मौसेरे भाई। इन से उत्सव शर्मा एक नायक बनकर आया है। जरूरत है हर शहर में ऐसे उत्सव शर्मा को आगे लाने की। भारत के लिए अभी जो सबसे लड़ाई है वह यहां के भ्रष्ट हो चुकी व्यवस्था को बदलने की है, लोगों को इंसाफ दिलाने की है। लाल चौक तो हमारा अपना है, वहां हमें झंडा फहराने से कौन रोकेगा। लेकिन मुद्दों से भटकाने वालों को सबक सिखाने की जरूरत जरूर है।

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Thursday, January 20, 2011

पाकिस्तान में कट्टरपंथी पुराने अजेंडे पर ही चल रहे हैं

पाकिस्तान में चंद दिन पहले वहां के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या कर दी गई। वह पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून (ब्लासफेमी) के गलत इस्तेमाल व इसमें से सजा-ए-मौत की धारा को खत्म किए जाने के प्रमुख पैरोकार थे। बीना सरवर पाकिस्तान की जानी-मानी पत्रकार और डॉक्युमेंटरी फिल्ममेकर हैं। वह इस समय वहां के प्रमुख समचारपत्र जंग ग्रुप में संपादक – स्पेशल प्रोजेक्ट्स (अमन की आशा) हैं। उन्होंने ब्राउन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी आफ लंदन के अलावा हॉरवर्ड यूनिवर्सिटी से भी पढ़ाई की है। बीना सरवर से पाकिस्तान के मौजूदा हालत पर मैंने बातचीत की है...यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्मस अखबार में 20 जनवरी,2011 को प्रकाशित हुआ है और उसकी वेबसाइट पर आनलाइन भी उपलब्ध है...

पाकिस्तान में उदारवादी नेता व पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या को आप राजनीतिक या कट्टरपंथियों की करतूत मानती हैं?
दोनों ही। जिस व्यक्ति ने उनकी हत्या की है, वह दिखता तो कट्टरपंथी है लेकिन दरअसल इस हत्या का मतलब और मकसद कुछ और भी है। हत्यारे मलिक मुमताज कादरी की ड्यूटी एलीट फोर्स में सिर्फ पंजाब के गवर्नर की सुरक्षा के लिए लगाई गई। हालांकि इससे पहले उसे स्पेशल ब्रांच से इसलिए हटाया गया था कि वह सुरक्षा के लिए खतरा था और उसके विचार उग्रपंथी थे। एक गवर्नर को जिसे पहले से ही जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं उसकी सुरक्षा में ऐसे शख्स को लगाया गया। वीआईपी गार्ड ड्यूटी के कुछ नियम होते हैं, आखिर बाकी गार्ड उस वक्त क्यों मूक दर्शक बने रहे जब कादरी उन पर फायरिंग कर रहा था। गिरफ्तारी के बाद कादरी ने खुद ही अपने इकबालिया बयान में कहा कि उसने अपने साथियों से इस बारे में बता दिया था और उनसे उस पर गोली न चलाने को कहा था। क्योंकि वह खुद ही सरेंडर कर देगा। इससे साफ है कि इस हत्या में कई ताकतवर शक्तियां शामिल थीं जिन्होंने इस अंदाज में इस घटना को अंजाम दिलाया।

पाकिस्तान की एक और मुखर नेता व मंत्री शेरी रहमान पर भी तो इसी तरह का खतरा है?
हां, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की नेता शेरी रहमान भी इसी तरह के खतरों का सामना कर रही हैं। मौजूदा हालात इस तरह बनाने की कोशिश की जा रही है कि अगर किसी ने ईशनिंदा (ब्लासफेमी) की है तो उसका कसूर साबित होने से पहले ही उसे सजा दे दी जाए। पिछले कुछ दशकों में इसके नाम पर 30 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। हम लोगों का कहना है कि अगर कोई ईशनिंदा का दोषी भी है तो किसी शख्स को उसकी जान लेने का हक तो नहीं है। ऐसे मामलों में कानून का पालन तो होना ही चाहिए।

क्या हम कह सकते हैं कि पाकिस्तान में उदारवादी लोगों की आजादी का कट्टरपंथियों ने अपहरण कर लिया है?
वे लोग पाकिस्तान में पिछले कई साल से यह सब कर रहे हैं। ऐसे लोग यही सब भारत में भी करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें वहां हिंदू तालिबान या भगवा ब्रिगेड कहा जा रहा है। जिन्होंने एम. एफ हुसैन को धमकियां दीं और अरूंधति राय पर हमला किया। दोनों देशों में अंतर सिर्फ इतना है कि भारत एक बड़ा मुल्क है और वहां लोकतंत्र हमेशा से मजबूत रहा है। (सिवाय इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी का दौर छोड़ कर)। भारत में एक अच्छाई और भी रही कि इसने कभी भी भगवा ब्रिगेड की सोच को आगे नहीं बढ़ने दिया। हालांकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां की घटनाएं कोई भी याद दिला सकता है लेकिन समूचे भारत ने कभी भी उन नीतियों को आमराय से स्वीकार नहीं किया। जबकि इसके उलट पाकिस्तान में ऐसी कट्टरपंथी ताकतों को एक रणनीतिक एसेट के रूप में माना गया। अफगानिस्तान में ऐसी ताकतों के साथ हुई लड़ाई में अमेरिका, सऊदी अरब व अन्य देशों के लिए पाकिस्तान एक फ्रंटलाइन स्टेट बना रहा। अब पाकिस्तान को उन नीतियों के बदले सीधे भुगतना पड़ रहा है।

पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। वहां बाकी धर्मों या समुदायों के लोग बहुत मामूली तादाद में है। क्या आपको लगता है कि इसके बावजूद किसी मुस्लिम देश को ईशनिंदा कानून जैसे किसी सहारे की जरूरत है?
किसी भी देश को इस तरह के कानून की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान पैनल कोड में इस कानून को एक मिलिट्री तानाशाह ने शामिल किया था। इससे पहले जो कानून था, धारा 295 ए वह बहुत हल्का था। उसे अंग्रेजों ने बनाया था। भारत में वह अब भी लागू है। इसके तहत अगर आप किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं तो मामूली सजाएं तय की गई हैं। जब मिलिट्री तानाशाह जनरल जिया उलहक ने पाकिस्तान पर कब्जा जमाया तो उन्होंने पाकिस्तान पैनल कोड में धारा 295बी व 295सी और जोड़ दी। जिसके तहत व्यवस्था दी गई कि पैगंबर मोहम्मद साहब की निंदा करने पर उम्रकैद की सजा भी हो सकती है। लेकिन 1992 में इसमें बदलाव करते हुए 295 सी के तहत व्यवस्था दी गई कि अगर कोई पैगंबर की निंदा करता है तो उसे उम्रकैद की जगह सजा-ए-मौत मिलेगी। पाकिस्तान के नैशनल कमिशन फॉर जस्टिस एंड पीस (एनसीजेपी) की एक स्टडी के मुताबिक धारा 295सी के तहत 1986 से अब तक 1058 लोगों को इसमें दंडित किया जा चुका है। इसमें 51 फीसदी लोग मुसलमान हैं।

बेनजीर भुट्टो का कत्ल भी कट्टरपंथियों ने किया था। क्या आपको लगता है कि उनके बाद जिन भी लोगों ने पाकिस्तान की हुकूमत संभाली, वह ऐसी ताकतों पर लगाम नहीं लगा सके?
पाकिस्तान में उग्रपंथी ताकतों के उभार का लंबा इतिहास है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि जिस देश का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है तो वहां ऐसा होना स्वाभाविक ही था। हालांकि पाकिस्तान जब बन गया तो इसके संस्थापकों ने बहुत साफ लफ्जों में कहा था कि इस देश में रहने वाले गैर मुस्लिमों को पूरी आजादी है और वे अपने मंदिरों, चर्चों और गुरुद्वारों में जाने को स्वतंत्र हैं क्योंकि किसी देश का किसी धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। दोनों अलग चीजें हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो ने जब खुद को राजनीतिक रूप से कमजोर पाया तो उन्होंने धार्मिक समूहों की मदद ली। उन्होंने पाकिस्तान में शराब पीने, जुआ-सट्टा पर रोक लगा दी और जुमे (शुक्रवार) को अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश घोषित करने के अलावा और भी कई कदम उठाए। यह चीजें बढ़ती ही गईं। बाद में अफगानिस्तान में अमेरिकी खेल शुरू हुआ तो उन्होंने अमेरिकी अजेंडा को इसके साथ शामिल कर इन चीजों को और आगे बढ़ा दिया। अफगानिस्तान में उस वक्त सोवियत संघ की मदद से कम्युनिस्ट हुकूमत थी। अमेरिका, सऊदी अरब, पाकिस्तान और इनके मित्र देशों ने मिलकर अफगानिस्तान के साथ युद्ध में धर्म को शामिल कर इसे जेहाद का नाम दे डाला। अगर याद हो तो अफगानिस्तान में नजीबउल्लाह की हुकूमत खत्म होने और सोवियत सैनिकों की वापसी के साथ तालिबान ने ही वहां की हुकूमत संभाली और बाद में अलकायदा पैदा हो गया। बेनजीर और सलमान तासीर की हत्याएं साफ बताती हैं कि पाकिस्तान में अभी भी ऐसी ताकते हैं जो पुराने अजेंडे को ही आगे बढ़ाना चाहती हैं।

मुझे लाल मस्जिद की घटना के बाद ही लगने लगा था कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी ताकतें किस तेजी से मजबूत हो रही हैं। यहां तक जनरल परवेज मुशर्रफ ने जब इन पर लगाम लगानी चाही तो उन पर भी हमला हुआ?
मुशर्रफ और उससे पहले के हुक्मरानों ने तो लाल मस्जिद जैसे हालात बनाने और तमाम गैरकानूनी चीजें होने दीं। इस्लामाबाद में सुरक्षा बलों की नाक के नीचे वहां बंदूक व गोला-बारूद पहुंचाए गए। मस्जिद के आगे जो बिल्डिंग बनाई गई वह सरकारी जमीन थी। उनके पास वहां बिजली, टेलीफोन, गैस और हर चीज मुहैया थी। उन लोगों ने लाल मस्जिद की महिला विंग को बच्चों की लायब्रेरी पर कब्जा करने भेजा। जिनके पहनावे उन्हें पसंद नहीं थे, उन महिलाओं को तंग किया गया। पाकिस्तानी हुकूमत तभी नींद से जागी जब पानी सिर से गुजर गया। ऐसा तभी होता है जब आप लोगों को कानून तोड़ने की इजाजत देते हैं। कुछ क्षण बाद वे लोग आपके भी काबू से बाहर हो जाते हैं।

क्या यह घटनाएं हमें यह नहीं बताती कि अगर कोई देश धर्म के नाम पर बना हो तो देर-सवेर वह ऐसी ताकतों द्वारा ही अस्थिर कर दिया जाता है, आपकी टिप्पणी?
मैं सिर्फ इतना कहूंगी कि राजनीति से धर्म को दूर किया जाना चाहिए। बाकी बातें तो आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं।

क्या हम कह सकते हैं कि पाकिस्तान धीरे-धीरे गृह युद्द की ओर बढ़ रहा है?
गृह युद्ध तो नहीं लेकिन तमाम तरह की अफरातफरी तो बहरहाल है ही। लेकिन जिस तरह लोग मस्जिद में होने वाली तकरीर से हिंसा भड़काने या घृणा फैलाने वाली बातों के खिलाफ विरोध दर्ज करा रहे हैं, उससे एक उम्मीद भी बढ़ी है। मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) ने भी अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे इस तरह के किसी भी प्रचार पर नजर रखें। इससे लोगों को ताकत मिलेगी।

क्या आप ऐसी मानती हैं कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी ताकतों की वजह से ही भारत के साथ उसके रिश्ते नहीं सुधर रहे हैं?
देखिए, उनका कहना है कि ताली तो दोनों हाथों से बजती है। हां, पाकिस्तान में ऐसे लोग हैं जो भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखे जाने के खिलाफ हैं लेकिन ऐसे ही लोग तो भारत में भी हैं। अगर आप पाकिस्तान के उन लोगों की बातें सुनेंगे तो वे भारत को हर तरह की समस्या के लिए जिम्मेदार बताएंगे। अगर आप भारत में ऐसे लोगों की बातें सुनते होंगे तो लगता होगा कि पाकिस्तान ही सारी समस्या की जड़ है। हकीकत यह है कि ऐसे लोग दोनों ही मुल्कों में एक-दूसरे पर आरोप लगाकर आम लोगों की जिंदगी को दूभर बना रहे हैं। दोनों ही देशों में जबकि कुछ समस्याएं एक जैसी हैं – हेल्थ, शिक्षा,बेरोजगारी आदि। क्या हम लोगों को इतनी समझ आएगी कि हम साथ मिलकर इन समस्याओं से लड़े। लेकिन दोनों तरफ किसकी नाक ऊंची रहे, का मसला है। कोई भी इसमें खुद को कमजोर नहीं देखना चाहता है।

साभारः नवभारत टाइम्स, 20 जनवरी 2011
Courtesy: Nav Bharat Times, Jan.20, 2011

Saturday, January 8, 2011

तेरा जाना

रुपया-पैसा, बड़ा कारोबार होने के बावजूद वह मौत से हार गए। मौत को वह चुनौती नहीं दे सके। हालांकि उन्होंने समय-समय पर न जाने कितनों को चुनौती दी और हर लड़ाई को जीतते रहे लेकिन मौत से हुई इस लड़ाई में उन्हें पराजित होना पड़ा। 3 जनवरी की दोपहर जब मैं जीटी रोड पर ड्राइव कर रहा था और मेरा मोबाइल एसएमएस झेलते-झेलते शायद गुस्से में गरम हो चुका था, तभी एक जानी-पहचानी आवाज ने ध्यान सड़क से कहीं और भटका दिया। उन्हीं की मौत की खबर थी।

हतप्रभ...कहां पुष्टि हो, क्या किया जाए। एक मित्र को रिंग किया तो उन्होंने पुष्टि की। तमाम यादें,मुलाकातें एक-एक कर याद आने लगीं। उनका सिगरेट के हर कश के साथ कुछ कहने का बेलौस अंदाज, फिर फैसला लेने का ऐलान होंठ काटकर ऐसे बयान करना मानों इसे बदल पाना मुश्किल होगा।...कुछ गलत फैसले, कुछ सही फैसले...

पता नहीं उनकी नेतृत्व करने की क्षमता से मैं इस कदर क्यों प्रभावित था कि मित्र लोग इसे चाटुकारिता तक मानते रहे। हालांकि उनसे मुझे निजी लाभ या अन्य किसी तरह का लाभ कभी नहीं मिला। लेकिन जिस तरह कंपनी की बैठकों में वह मेरी ईमानदारी का प्रचार करते तो मुझे लगता कि इतना बड़ा पूंजीपति होने के बावजूद मुझ जैसे मामूली आदमी का बखान कर रहा है तो यह जरूर लीक से जरा हटकर है।

...और वह वाकई था। वह एक जाति विशेष से संबंधित होने के बावजूद जिस तरह की सेक्युलर बातें करते और गेरुआवस्त्र धारियों की धज्जियां उड़ाया करते, मुझे वह कई बार चौंकाता था। तमाम सेक्युलर मित्रों को यह भी उसका बिजनेस करने का अंदाज लगता। वह कहते, वह यह सब तुम्हारे जैसे बेवकूफ राष्ट्रभक्तों को प्रभावित करने के लिए करता है। यह भी एक तरह की कॉरपोरेट चाल है प्यारे। उसका बिजनेस तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से आगे बढ़ रहा है। तब भी मैं यही सोचता कि मेरे जैसे मामूली आदमी को यह शख्स प्रभावित करके क्या हासिल करेगा।

...पर उनसे प्रभावित लोगों की बड़ी जमात मैं उस दिन अपनी आंखों से देखकर आय़ा। उनकी उठावनी में वह तमाम चेहरे थे जो बड़े नाम नहीं थे लेकिन उस पूंजीपति की उठावनी में वह मायूस चेहरे लिए हुए जरूर दिखे। ऐसे लोग उनकी किसी न किसी खूबी को बताते नजर आए। फिर मुझे वह सारी बातें...मुलाकातें एक-एक याद आने लगीं। उन्हीं के द्वारा सिगरेट के छोड़े गए धुएं में मैं उनका विचारों में खोया चेहरा देखता रहा।...

आप इसे कुछ भी मानें
शायद आपने इसे शुरु से लेकर अंत तक पढ़ा होगा। मैं खुद को साहित्यकार होने का मुगालता नहीं पाले हुए हूं। आप पता नहीं इसे किस श्रेणी में रखना चाहेंगे...कहानी, लेख, आपबीती, श्रद्धांजलि...जो भी कहना चाहें। एक बिजनेस ग्रुप का संचालन करने वाले शख्स का हाल ही में निधन हुआ है। मैं कहीं न कहीं उनसे जुड़ाव महसूस करता था। इसलिए उन्हीं को याद करते हुए कुछ लिख डाला। इधर काफी अर्से से तमाम उलझनों में घिरा रहने की वजह से अपने इस ब्लॉग पर कुछ लिख भी नहीं पाया था। अब इसी बहाने से फिर शुरुआत की है।