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Wednesday, December 31, 2008

2009 मैं तुम्हारा स्वागत क्यों करूं?



एक रस्म हो गई है जब बीते हुए साल को लोग विदा करते हैं और नए साल का स्वागत करते हैं। इसके नाम पर पूरी दुनिया में कई अरब रूपये बहा दिए जाते हैं। आज जो हालात हैं, पूरी दुनिया में बेचैनी है। कुछ देश अपनी दादागीरी दिखा रहे हैं। यह सारा आडंबर और बाजारवाद भी उन्हीं की देन है। इसलिए मैं तो नए साल का स्वागत क्यों करूं? अगर पहले से कुछ मालूम हो कि इस साल कोई बेगुनाह नहीं मारा जाएगा, कोई देश रौंदा नहीं जाएगा, किसी देश पर आतंकवादी हमले नहीं होंगे, कहीं नौकरियों का संकट नहीं होगा, कहीं लोग भूख से नहीं मरेंगे, तब तो नववर्ष का स्वागत करने का कुछ मतलब भी है। हालांकि मैं जानता हूं कि यह परंपरा से हटकर है और लोग बुरा भी मानेंगे लेकिन मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता? इसलिए माफी समेत...


अलविदा 2008, इस साल तुमने बहुत कष्ट दिए। तुम अब जबकि इतिहास का हिस्सा बनने जा रहे हो, बताओ तो सही, तुम इतने निष्ठुर हर इंसान के लिए क्यों साबित हुए। तुम्हें कम से कम मैं तो खुश होकर विदा नहीं करना चाहता। जाओ और दूर हो जाओ मेरी नजरों से। तुमने ऐसा कुछ भी नहीं किया कि तुम्हें उल्लासपूर्वक विदा करूं और तुम्हारे ही साथी २००९ का स्वागत करूं। तुमने जो अनगिनत घाव दिए हैं, क्या उनकी भरपाई तुम्हारा साथी 2009 कर पाएगा। सारे घावों को गिनाकर मैं तुम्हारा समय नहीं खराब करना चाहता क्योंकि चंद घंटे बचे हैं, जब तुम दफा हो जाआगे। फिर भी एक-दो घावों का जिक्र तो किया ही जा सकता है जिनके नतीजों से हमे 2009 में भी शायद दो-चार होना पड़ेगा। क्या तुम भूल गए कि बाजारवाद नामक जिस बुलबुले को तुम्हारे चमचों ने पिछले तीन-चार साल से जो हवा दे रखी थी उसका खोखलापन 2009 में ही तुमने जाहिर कर दिया। कहां तो तुम्हारे सबसे बड़े चमचे अमेरिका ने तुम्हें इतनी बुलंदी पर पहुंचा दिया था कि लगता था कि बस सभी को जमीन पर ही जन्नत के दर्शन होने वाले हैं। लेकिन अब 2009 में भी तुम उम्मीद के तमाम फर्जी पिटारों के साथ आ पहुंचे हो। आखिर कब तुम्हारे चमचे बाजारवाद का नाटक बंद कर धरती पर कदम रखेंगे। कहो न उनसे, लोगों की जरूरते क्या हैं? बनावटी जरूरतें न पैदा करो। लेकिन तुम और तुम्हारे चमचे तो निपट अनाड़ी साबित हुए। कुछ अर्थशास्त्रियों को तुमने इस उम्मीद से नोबल बांटे कि वे तुम्हें इस झटके से उबार लेंगे लेकिन सेमिनार में परचे पढ़ने और साम्राज्यावाद की वकालत से यह आंधी कब रुकनी थी। इसे रोकने के लिए तो तुम्हें जमीन पर आना पड़ता न, पर तुम तो ऊंची उड़ान पर हो।
और, अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल जो तुमने इस साल की या करवाई, कहीं यह मंदी उसी से जुड़ी तो नहीं है? तुम्हारे चमचों ने कई देश रौंद डाले। तुम्हारा एक चमचा स्वयंभू दरोगा बन बैठा है।
कहीं, ऐसा तो नहीं कि कुछ बेगुनाह लोगों की हाय तुमको लग गई है। उनकी लाशों पर पैर रखकर तुम्हारे चमचों ने पेट्रोल के कुंओं पर कब्जा किया। तुमने बताया कि जिन लाशों को तुमने रौंदा है, उनके रहनुमा उन्हीं लोगों पर अत्याचार कर रहे थे। इसलिए उन रहनुमाओं को खत्म करना जरूरी था। लेकिन ये तो बताओ कि एक रहनुमा को मारने के लिए तुमने लाखों के खून बहा दिए। क्या यही तुम्हारा इंसाफ है। और...तुम्हारे चमचों के चमचे इस्राइल ने अभी-अभी क्या किया? गाजा पट्टी के उन 29 बच्चों का कसूर तो बताओ, क्या वे भी हमास के आतंकवादी थे? हमास को तो फलस्तीन की जनता ने चुना था। क्या तुम्हारे चमचे चुनी हुई सरकारों को इसी तरह खत्म करते हैं? हां, तख्ता पलटवाने का तुम्हारा पुराना अनुभव है। गाहे-बगाहे इस्तेमाल करने से तुम कहां मानने वाले। फिर तुम लेबनान से पिटकर क्यों भागे? वहां तुम्हारी दाल नहीं गली।
...अब तो यह हालत है कि पाकिस्तान के जरिए तुम भारत को अपने इशारों पर नचाना चाहते हो। पर, यह देश तुम्हारे चमचे देशों के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। हम आपस में चाहे जितना मनमुटाव और मत-भिन्नता रखें, पर तुम्हारे चमचों को यहां कामयाब नहीं होने देंगे। पूरी तरह से उसे रोकेंगे। देखो, तो जरा तुम्हारे चमचे के चमचे ने आतंकवाद के सौदागरों को किस तरह इस देश में भेजा। हर महीने कहीं न कहीं तुम सब मिलकर ब्लास्ट करा देते हो। कभी कोलकाता को निशान बनाते हो तो कभी मुंबई को। दिल्ली को लहूलुहान करने में तुमने कोई कसर नहीं छोड़ी। देखो, अगर तुम हथियार बेचने के लिए ही यह सब करते हो तो क्यों नहीं कह देते कि जो तुमसे हथियार नहीं खरीदेगा, तुम उस पर हमला करा दोगे या कर दोगे।
देखो, इन सब चीजों का अंत बहुत बुरा होता है। कहीं ऐसा न हो कि तुम एक दिन अपनी गलती मानकर अफसोस करना चाहो तो वह भी न हो सकेगा। क्योंकि तब तक २०१० दस्तक दे चुका होगा और वह अपने हिसाब से फैसला करना चाहे। सोचो, रहम करो। 2009 से कहना, थोड़ा संयम से काम ले। हम दोस्ती के लिए हाजिर हैं, पर साफ नीयत से हाथ तो बढ़ाओ। अब देखें तुम्हारे एक्शन क्या रहते हैं? कुछ भी हो जाए, मैं न तो तुम्हारा स्वागत करने को तैयार हूं और न ही आंडबरपूर्ण उन एजेंडो को तय करना चाहता हूं जो साल की शुरुआत में बहुत सारे लोग शेखी बघारते हुए करते हैं। देखना है, अब तुम क्या करोगे?

Sunday, December 28, 2008

आइए, एक जेहाद जेहादियों के खिलाफ भी करें




मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स, दिल्ली में 27-12-2008 को संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है। इस ब्लॉग के पाठकों और मित्रों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं। उम्मीद है कि मेरा संदेश जहां पहुंचना चाहिए, पहुंचेगा।...यूसुफ किरमानी

इन दिनों तमाम इस्लामिक मुद्दों पर बहस खड़ी हो रही है, लेकिन उतने ही मुखर ढंग से कोई उन बातों और आयतों को समझने-समझाने की कोशिश करता नज़र नहीं आता, जो हमारे मजहब में जिहाद के बारे में लिखी और कही गई हैं।

जिहाद का अर्थ है इस्लाम के लिए आर्थिक और शारीरिक रूप से कुर्बानी देना। जब कोई यह कहता है कि जिहाद का मतलब अन्य मतावलंबियों, इस्लाम के विरोधियों या दुश्मनों की हत्या करना है, तो वह सही नहीं है। दरअसल, इस्लामिक मूल्यों और शिक्षा का प्रचार जिहाद है, न कि हिंसा।

जिहाद हमें यह बताता है कि कोई इंसान कैसे अपनी इच्छाओं को अल्लाह के आदेश के तहत रखे और किसी तानाशाह के भी सामने निडरता से सच बात कहे। जिहाद शब्द दरअसल 'जाहद' से बना है, जिसका अर्थ है कोशिश करना, कड़ी मेहनत करना। इसकी एक मीमांसा यह भी है कि इस्लाम की रक्षा के लिए न सिर्फ अपने परिवार या रिश्तेदारों, बल्कि अपने देश को भी कुर्बान कर देना।

यदि कभी जेहाद में आमने-सामने युद्ध की नौबत भी आ पड़े, तो स्पष्ट निर्देश है कि उसमें भी दुश्मन पक्ष की महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग की हत्या पाप है। इसके अलावा जिहाद में फसलों और घरों को जलाने पर भी पाबंदी है। सामान्य युद्ध और जिहाद के बीच में इस फर्क को कुरान शरीफ में बहुत ही साफ ढंग से व्यक्त किया गया है। अगर कोई खुद ही किसी गिरोह का कमांडर बन जाए और बताए कि वह जिहाद कर रहा है तो इस्लाम के हिसाब से उसे कभी जिहाद नहीं माना जाएगा।

इस्लाम में चार तरह के जिहाद का वर्णन किया गया है। इस पर नजर डालें तो पाएंगे कि जिस जिहाद का प्रचार कुछ लोग अपना मतलब साधने के लिए कर रहे हैं, वह असली जिहाद से कतई मेल नहीं खाता।

जिहाद-ए-अकबर - यानी रोजमर्रा की जिंदगी में खुद को तमाम बुराइयों से बचाना। इस जेहाद को सबसे कठिन माना जाता है। क्योंकि अगर आप इस जिहाद को छेड़ने का प्रण लेते हैं, तो आपको भी वैसा ही बनना और करना पड़ेगा।

जिहाद-बिल-इल्म - यानी ऐसे लोगों को सही रास्ता बताना जो इसके बारे में नहीं जानते। लोगों को ज्ञान देना कि क्या सही है और क्या गलत। लोगों को यह बताना कि वे अपनी रोजाना की जिंदगी को कैसे बिताएं और मुसलमानों और गैर मुसलमानों से किस तरह पेश आएं। इस्लाम ने ज्ञान (इल्म) को और इसे बांटने वाले को बहुत महत्व दिया है। इस तरक कुरान शरीफ के मुताबिक वह व्यक्ति जो लोगों को ज्ञान से अवगत कराता है, दरअसल वह भी एक तरह का जिहाद इस टीचिंग को फैलाने के लिए करता है।

जिहाद-बिल-माल - अपनी दौलत अल्लाह की राह में लुटाना। यह ऐसे लोगों के लिए है, जिनकेपास बहुत दौलत है, मगर दूसरे तरह के जेहाद के लिए समय नहीं है। तो वे अपनी दौलत से उन लोगों की मदद करें जो इस काम में जुटे हुए हैं।

जिहाद-बिल-साफ यानी सशस्त्र जिहाद - इसके तहत मुसलमान एक लीडर चुनकर उसके मातहत दुश्मन के खिलाफ जिहाद छेड़ते हैं। अब सवाल यह है कि दुश्मन कौन है। कहा गया है कि इस्लाम का दुश्मन वह है जो मुस्लिम आबादी पर हमले करे और उनकी संपत्तियों को लूटे। यही वह जिहाद है जिसे लोग तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। इसी जिहाद के इर्दगिर्द सारी बहसें होती हैं। लेकिन जिस जिहाद की आज इस्लाम और मुसलमानों को सबसे सख्त जरूरत है, उसकी बात कोई नहीं करता। इसीलिए अब ऐसे जिहादियों के खिलाफ भी जिहाद जरूरी हो गया है।

कुछ इस्लामिक विद्वान जिहाद को इस्लाम का छठा सिद्धांत बताते हैं। यानी पांच अन्य सिद्धांत -अल्लाह एक है, नमाज, रोजे, जकात और हज के बाद इसका नंबर आता है। इन सिद्धांतों में चार सिद्धांत जब हिंसा, घृणा और वैमनस्य की बात नहीं करते, तो पांचवां सिद्धांत क्योंकर हिंसा को भड़काने वाला माना जाना चाहिए?

(साभारः नवभारत टाइम्स,Delhi)

Saturday, December 27, 2008

इन साजिशों को समझने का वक्त

नीचे वाले मेरे लेख पर आप सभी लोगों की टिप्पणियों के लिए पहले तो धन्यवाद स्वीकार करें। देश में जो माहौल बन रहा है, उनके मद्देनजर आप सभी की टिप्पणियां सटीक हैं। मेरे इस लेख का मकसद कतई या नहीं है कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत युद्ध छेड़ता है तो उसका विरोध किया जाए। महज विरोध के लिए विरोध करना सही नहीं है। सत्ता प्रमुख जो भी फैसला लेंगे, देश की जनता भला उससे अलग हटकर क्यों चलेगी। कुल मुद्दा यह है कि युद्ध से पहले जिस तरह की रणनीति किसी देश को अपनानी चाहिए, क्या मनमोहन सिंह की सरकार अपना रही है। मेरा अपना नजरिया यह है कि मौजूदा सरकार की रणनीति बिल्कुल सही है। पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर भारत पूरी तरह बेनकाब कर चुका है।
करगिल युद्ध के समय भारत से यही गलती हुई थी कि वह पाकिस्तान के खिलाफ माहौल नहीं बना सका था। उस समय पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ सत्ता हथियाने की साजिश रच रहे थे और उन्होंने सत्ता हथियाने के लिए पहले करगिल की चोटियों पर घुसपैठिए भेजकर कब्जा कराया और फिर युद्ध छेड़ दिया। फिर अचानक पाकिस्तान की हुकूमत पर कब्जा कर लिया। उन दिनों को याद करें तो इस साजिश में अमेरिका भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल था। क्योंकि इस युद्ध से सिर्फ चंद दिन पहले मुशर्रफ ने वॉशिंगटन की यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान अमेरिका ने अपने हथियार बेचने का सबसे महंगा सौदा किया था। मुशर्रफ की ताजपोशी में भी अमेरिका ने किसी तरह का अड़ंगा नहीं लगाया था। उन दिनों नवाज शरीफ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे। लेकिन उनके अपने देश में सेना का सबसे बड़ा अधिकारी किस करतूत में जुटा हुआ है, इससे बेखबर थे।

बहरहाल, अब पाकिस्तान की लानत-मलामत चारों तरफ से हो रही है। यही भारत की सही कूटनीति है। लेकिन ऐसे माहौल में बाल ठाकरे जैसों का बयान बहुत गैरजिम्मेदाराना है। मुंबई पर हमले के समय जो लोग घरों में दुम दबाकर बैठे रहे और अब भारतीय प्रधानमंत्री को कायर बताना किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उम्र के जिस पड़ाव पर ठाकरे हैं, उनके लिए इससे सख्त भाषा मेरे पास नहीं है। अभी वक्त है भारत सरकार के सभी सही कदमों का समर्थन करने का। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। ऐसे कई देश हैं जो युद्ध लड़लड़कर बूढ़े हो गए लेकिन समस्या को हल नहीं कर पाए। शांति युद्ध से बड़ी चीज है। अगर हम शांतिप्रिय हैं तो यह हमारे कायरता की निशानी नहीं है।

मुंबई हमला एक साजिश थी। लेकिन यह साजिश किसलिए की गई, इसका असल मकसद अब भी सामने नहीं आया है। हमारे जैसे पत्रकार तो बस यही अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस तरह पाकिस्तान के सीमांत प्रांत में पाकिस्तानी सेना और अमेरिकी फौजें तालिबानी आतंकवादियों पर हमले कर रही हैं, शायद वहां से पाकिस्तानी सेना का ध्यान हटाने के लिए यह हमला किया गया है। जिससे युद्ध के हालात बनें और पाकिस्तानी सेना वहां से हटकर भारतीय सीमा पर पहुंच जाए। ऐसे में वहां तालिबान और अल-कायदा का काम आसान हो जाएगा। अगर वाकई ऐसा है तो यह बहुत बड़ी साजिश है। भारतीय खुफिया ऐजेंसियां देर-सवेर इसकी तह तक पहुंचेंगी ही। वैसे आज शनिवार के अखबार (नवभारत टाइम्स दिल्ली) में इस आशय की खबर भी आई है कि तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। लेकिन यह बात कितनी सही है, इसका पता लगाना होगा। अगर युद्ध होता है तो घोर मंदी का शिकार अमेरिका फायदे में रहेगा क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों ही वहां की कंपनियों के हथियार खरीदेंगे और हम लोग वॉर टैक्स चुकाएंगे। तैयार रहिए, कुछ भी हो सकता है।

Friday, December 26, 2008

दो चेहरे - मनमोहन सिंह और बाल ठाकरे


भारत के दो चेहरे इस समय दुनिया में देखे जा रहे हैं। एक तो चेहरा मनमोहन सिंह का है और दूसरा बाल ठाकरे का। मनमोहन सिंह भारत में आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान से युद्ध नहीं चाहते तो बाल ठाकरे का कहना है कि अब हिंदू समुदाय भी आतंकवादी पैदा करें। देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो चाहते हैं कि पाकिस्तान से भारत निर्णायक युद्ध करे। इन्हीं में से •कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कायर बताने तक • से नहीं चूक रहे। यानी अगर मनमोहन सिंह पाकिस्तान को ललकार कर युद्ध छेड़ दें तो वे सबसे बहादुर प्रधानमंत्री शब्द से नवाजे जाएंगे। यानी किसी प्रधानमंत्री की बहादुरी अब उसके युद्ध छेड़ने से आंकी जा रही है। उसने बेशक अर्थशास्त्र की मदद से भारत का चेहरा बदल दिया हो लेकिन अगर वह पाकिस्तान से युद्ध नहीं लड़ सकता तो सारी पढ़ाई-लिखाई बेकार। उस इंसान की शालीन भाषा उसे कहीं का नहीं छोड़ रही है।


हालांकि हाल के दिनों में इस मुद्दे पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। लेकिन यह बहस खत्म नहीं हुई है। इसी बहाने राजनीतिक वाकयुद्ध भी शुरू हो गया है और तमाम पार्टियां देशभक्ति की होड़ में जुट गई हैं। पाकिस्तान से युद्ध का समर्थन करने वाले देशभक्त हैं और विरोध करने वाले...पता नहीं क्या हैं। देश में इस समय चल रही बहस का यही तानाबाना है।
भारत समेत विश्व के तमाम देश इस भयानक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। नौकरियों पर संकट आ गया है और कोई इंडस्ट्री ऐसी नहीं बची जो इसके प्रभाव से अछूती हो लेकिन बाजीगरी देखिए कि इस मुद्दे पर बहस होने की बजाय बहस इस बात पर हो रही है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध हो या नहीं। महंगाई, बेरोजगारी, मंदी, यह सब नेपथ्य में चले गए हैं। लोगों को बताया जा रहा है कि इस समय मुद्दा पाकिस्तान और युद्ध है। रोटी मिले या नहीं, नौकरी जाती है तो जाए, युद्ध जरूरी है। जैसे जानवरों को हांका लगाकर चाहे जिधर ठेल दिया जाता है और वे उसी तरफ भागते हैं तो देश की जनता का भी यही हाल हो गया है। हम लोगों को हांका लगाकर कोई किधर भी ले जाए, हम जाने को आतुर हैं। ले चलो भैया। अपनी जान की बाजी लगाकर करगिल को जिन्होंने बचाया, उनको याद न करके आज अटल (जी) और आडवाणी (जी) को याद किया जा रहा है कि कैसे उन्होंने उस समय युद्ध का आदेश दिया था। शहीदों के ताबूत के पैसे खाने वाले नेताओं को लोग भूल चुके हैं। करगिल की कीमत हमने क्या चुकाई, यह कोई बताता नहीं है। मैं उस वक्त पंजाब में था, भारतीय सैनिकों की लाशें जब उनके गांवों में पहुंचती थीं तो वहां नौयौवना विधवाओं की चीत्कार सुनने वाला कोई नेता मौजूद नहीं होता था।
अभी पिछले चार-पांच साल में पत्रकारों की जो भीड़ मीडिया हाउसों में पहुंची है, वह जोश से लबरेज है। उन्हीं के समकक्ष लोग अन्य इंडस्ट्री में भी हैं। लेकिन दोनों की मनोदशा एक जैसी ही है। यही तबका पाकिस्तान से युद्ध चाहता है। टीवी, अखबार से लेकर बीपीओ सेक्टर तक – हो जाए, भाई साब, बहुत हो गया। टीवी पर एंकर चीख रहे हैं, हम अखबार के दफ्तर में युद्ध का माहौल बना रहे हैं और बीपीओ वाला - आरकुट से लेकर फेसबुक तक में वॉल राइटिंग कर रहा है कि बस पाकिस्तान से दो-दो हाथ जाए। बिना दिमाग लगाए इस तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले साथी आसानी से बोल देते हैं कि युद्ध में क्या बुराई है? लेकिन इसमें क्या अच्छाई है, वह न तो जानते हैं और न बताना ही चाहते हैं। एक सपाट जवाब आता है, आतंकवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। पता नहीं उनके इस यकीन का आधार क्या है लेकिन इस तबके से आप तर्क में नहीं जीत सकते।
चलिए छोडिए इस मुद्दे को। हम भी क्या ले बैठे इसे। बाल ठाकरे की बात करते हैं। पैर कब्र में लटका हुआ है और देश के बहुसंख्यकों को यह शख्स अपने समुदाय में आतंकवादी पैदा करने की सलाह दे रहा है। इसने अपने ही अखबार सामना को दिए गए एक साक्षात्कार में यह बात कही है। मुंबई पर जब आतंकवादी हमला हुआ तो इस शख्स का और इसके पूरे खानदान का कहीं पता नहीं था। (जिसमें इस व्यक्ति का भतीजा राज ठाकरे शामिल है और जो मुंबई से गैर मराठी लोगों को भगाने का आंदोलन चला रहा था) इस हमले में शिवसेना या राज ठाकरे के संगठन का एक भी कार्यकर्ता मारा नहीं गया। यह तक चर्चा नहीं सुनने को मिली कि कोई शिव सैनिक आम लोगों को बचाने के लिए आतंकवादियों के सामने ही आ गया हो।
लेकिन हम लोग आजाद भारत के नागरिक हैं। न तो ठाकरे को जवाब दे सकते हैं और न अंतुले को। हमल लोग तो बस यूं ही सवाल उछाल सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तान से युद्ध लड़ सकते हैं या युद्ध की बात कर सकते हैं। यह युद्ध आजाद भारत की जनता के जेब से लड़ा जाएगा, यह सोचने की फुरसत किसी के पास नहीं है।

Wednesday, December 17, 2008

मेरा जूता है जापानी


यह सच है कि मुझे कविता या गजल लिखनी नहीं आती। हालांकि कॉलेज के दिनों में तथाकथित रूप से इस तरह का कुछ न कुछ लिखता रहा हूं। अभी जब एक इराकी पत्रकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर जूता फेंका तो बरबस ही यह तथाकथित कविता लिख मारी। इस कविता की पहली लाइन स्व. दुष्यंत कुमार की एक सुप्रसिद्ध गजल की एक लाइन – एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो – की नकल है। क्योंकि मेरा मानना है कि बुश जैसा इंसान (?) जिस तरह के सुरक्षा कवच में रहता है वहां तो कोई भी किसी तरह की तबियत लेकर पत्थर नहीं उछाल सकता। पत्थर समेत पकड़ा जाएगा। ऐसी जगहों पर तो बस जूते ही उछाले जा सकते हैं, क्योंकि उन्हें पैरों से निकालने में जरा भी देर नहीं लगती।
मुझे पता नहीं कि वह किसी अमेरिकी कंपनी का जूता था या फिर बगदाद के किसी मोची ने उसका निर्माण किया था लेकिन आज की तारीख में वह जूता इराकी लोगों के संघर्ष और स्वाभिमान को बताने के लिए काफी है। इतिहास में पत्रकार मुंतजर जैदी के जूते की कहानी दर्ज हो चुकी है। अब जरा कुछ क्षण मेरी कविता को भी झेल लें – (शायर लोग रहम करें, कृपया इसमें रदीफ काफिया न तलाशें) -

कब तक चलेगी झूठ की दुकान

-यूसुफ किरमानी


एक जूता तो तबियत से उछालो यारो
ताकतें कोई भी हों उनको तो बस मारो-मारो
बात पहुंचे वहां तक जहां पहुंचनी चाहिए
सच्चाई हर सूरत में सामने आनी चाहिए

तुम चलाओ तोप या बरसाओ गोलियां
हम बे-जबान जरूर बोलेंगे अपनी बोलियां
सब जानते हैं तुम्हारी चालाकी और मक्कारी
जनता जब तुमसे कहेगी बंद करो ये ऐय्यारी

हुक्मरां अंधे हों या फिर बहरे
कहां-किस-किस पर लगाएंगे पहरे
हौसला न तोड़ पाएंगे तुम्हारे पैरोकार
वक्त है, अब बाज भी आओ सरकार

कब तलक चलेगी तुम्हारे झूठ की दुकान
देखना खंडहर बन जाएंगे तुम्हारे ये मकान
उसने तो सिर्फ फेंका है आप पर जूता
क्या होता, गर वह उखाड़ फेंकता आपका खूंटा


नीचे लिखी पोस्ट और बुश पर इराकी पत्रकार द्वारा फेंके गए जूते का विडियो जरूर देखें। उससे मेरी इस कविता का संदर्भ समझने में आसानी रहेगी। धन्यवाद।

Tuesday, December 16, 2008

बुश पर जूते पड़े या फेंके गए ? जो भी हो – यहां देखें विडियो



दुनिया के तमाम देशों में लोग अमेरिका खासकर वहां के मौजूदा राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश से इतनी ज्यादा नफरत करते हैं कि उनका चेहरा तक नहीं देखना चाहते। मैंने भी आपकी तरह वह खबर अखबारों में पढ़ी लेकिन बुश पर इराक में जूते फेंकने का विडियो जब YouTube पर जारी हुआ तो मैंने सोचा कि मेरे पाठक भी उस विडियो को देखें और उन तमाम पहलुओं पर सोचें, जिसकी वजह से अमेरिका आज इतना बदनाम हो गया है। इराक में बुश के साथ जो कुछ भी हुआ, वह बताता है कि लोग इस आदमी के लिए क्या सोचते हैं। जिसकी नीतियों के कारण अमेरिका आर्थिक मंदी के भंवर में फंस गया है और विश्व के कई देश भी उस मंदी का शिकार बन रहे हैं। जिस व्यक्ति ने बुश पर जूते फेंके वह पत्रकार है और उनका नाम मुंतजर अल जैदी है। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा किया लेकिन जैदी का बयान यह बताने के लिए काफी है कि अगर किसी देश की संप्रभुता (sovereignty) पर कोई अन्य देश चोट पहुंचाने की कोशिश करता है तो ऐसी ही घटनाएं होती हैं। जैदी ने अपना गुस्सा जताने और अपनी बात कहने के लिए किसी हथियार का सहारा नहीं लिया है।




खाड़ी देशों के तेल पर कब्जा करने के लिए अमेरिका ने जो कुछ किया, इराक पर थोपी गई अमेरिकी फौज उसी की मिसाल है। यह वही देश है जो भारत में आतंकवादी घटना होने पर पाकिस्तान को धीमे स्वर में धमकाता तो है लेकिन पिछले दरवाजे से मदद भी देता है। क्या वजह है कि हथियार बेचने वाली अमेरिकी कंपनियां तमाम मंदी के बावजूद भारत, पाकिस्तान और अरब देशों को हथियार बेचकर भारी मुनाफा कमा रही हैं।
बहरहाल, आइए देखें कि किन हालात में बुश साहब पर जूता फेंका गया और कैसे उन्होंने बचाव किया। इसके अलावा साथ में अंग्रेजी में एएफपी न्यूज एजेंसी की वह खबर भी है कि किस तरह लोगों ने इस घटना के बाद प्रतिक्रिया जताई।


Arabs hail shoe attack as Bush's farewell gift

AFP

Iraq faced mounting calls on Monday to release the journalist who hurled his shoes at George W. Bush, an action branded shameful by the government but hailed in the Arab world as an ideal parting gift to the unpopular US president.

Colleagues of Muntazer al-Zaidi, who works for independent Iraqi television station Al-Baghdadia, said he "detested America" and had been plotting such an attack for months against the man who ordered the war on his country.

"Throwing the shoes at Bush was the best goodbye kiss ever... it expresses how Iraqis and other Arabs hate Bush," wrote Musa Barhoumeh, editor of Jordan's independent Al-Gahd newspaper.

Hundreds of Iraqis joined anti-US demonstrations to protest at Bush's farewell visit on Sunday to Iraq, which was plunged into a deadly insurgency and near civil war in the aftermath of the 2003 invasion.

The Iraqi government branded Zaidi's actions as "shameful" and demanded an apology from his Cairo-based employer, which in turn called for his immediate release from custody.

Zaidi jumped up as Bush was holding a press conference with Iraqi Prime Minister Nuri al-Maliki on Sunday, shouted "It is the farewell kiss, you dog" and threw two shoes at the US leader.

The shoes missed after Bush ducked and Zaidi was wrestled to the ground by security guards. He is currently being held by the Iraqi authorities, a source in Maliki's office said without elaborating.

Al-Baghdadia issued a statement demanding Zaidi's release "in line with the democracy and freedom of expression that the American authorities promised the Iraqi people."

"Any measures against Muntazer will be considered the acts of a dictatorial regime," it added.

But the government called for the channel to apologise, saying: "This action harms the reputation of Iraqi journalists and journalism in general."

Saddam Hussein's former lawyer Khalil al-Dulaimi said he was forming a team to defend Zaidi and that around 200 lawyers, including Americans, had offered their services for free.

"It was the least thing for an Iraqi to do to Bush, the tyrant criminal who has killed two million people in Iraq and Afghanistan," said Dulaimi.

"Our defence of Zaidi will be based on the fact that the United States is occupying Iraq, and resistance is legitimate by all means, including shoes."

Zaidi's colleagues in Baghdad, where he had worked for three years, said he had long been planning to throw shoes at Bush if ever he got the chance.

"Muntazer detested America. He detested the US soldiers, he detested Bush," said one on condition of anonymity.

Soles of shoes are considered the ultimate insult in Arab culture. After Saddam's statue was toppled in Baghdad in April 2003, many onlookers pelted it with their shoes.

But young Iraqi woman Oum Mina said she didn't consider Zaidi a hero.

"Bush is our enemy. But when you invite your enemy into your home, you don't treat him this way. This could destroy the image of Iraqis."

Protestors in Sadr City, the bastion of radical anti-US cleric Moqtada al-Sadr, however, threw shoes at passing US military vehicles, while in the holy Shiite city of Najaf, the crowds chanted "Down with America."

"All US soldiers who have used their shoes to humiliate Iraqis should be brought to justice, along with their US superiors, including Bush," said Ali Qeisi, head of a Jordan-based Iraqi rights group.

"The flying shoe speaks more for Arab public opinion than all the despots/puppets that Bush meets with during his travels in the Middle East," said Asad Abu Khalil, a popular Lebanese-American blogger and professor at Stanislaus University in California at angryarab.blogspot.com

An Iraqi lawyer said Zaidi risked a miminum of two years in prison if he is prosecuted for insulting a visiting head of state, but could face a 15-year term if he is charged with attempted murder.

"We fear for his safety," said Muzhir al-Khafaji, programming director for the television channel, adding that Zaidi had been arrested before by the Americans and that there were fears that more of its 200 correspondents in Iraq would be detained.

But in Libya, a charity headed by Moamer Kadhafi's daugher Aisha announced it was going to award Zaidi an "order of courage" for his actions.
(Courtesy - AFP news agency)

Monday, December 15, 2008

चंदन का गुलिस्तां


 
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अंग्रेजी का पत्रकार अगर हिंदी में कुछ लिखे तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरे मित्र चंदन शर्मा दिल्ली से छपने वाले अंग्रेजी अखबार Metro Now में विशेष संवाददाता हैं। तमाम विषयों पर उनकी कलम चलती रही है। कविता और गजल वह चुपचाप लिखकर खुद पढ़ लिया करते हैं और घर में रख लिया करते हैं। मेरे आग्रह पर बहुत शरमाते हुए उन्होंने यह रचना भेजी है। आप लोगों के लिए पेश कर रहा हूं।


गुलिस्तां

कहते हैं कभी एक गुलिस्तां था
मेरे आशियां के पीछे
हमें पता भी नहीं चला
पतझड़ कब चुपचाप आ गया
गुलिस्तां की बात छोड़िए
वो ठूंठो पर भी यूं छा गया
गुलिस्तां तो अब कहां
हम तो कोंपलो तक के लिए तरस गए

-चंदन शर्मा

Friday, December 12, 2008

बाजीगरों के खेल से होशियार रहिए


संसद में तमाम बाजीगर फिर एकत्र हो गए हैं और हमारे-आपके जेब से टैक्स का जो पैसा जाता है, वह इन्हें भत्ते के रूप में मिलेगा। जाहिर है एक बार फिर इन सबका मुद्दा आतंकवाद ही होगा। मीडिया के हमले से बौखलाए इन बाजीगरों में इस बार गजब की एकजुटता दिखाई दे रही है। चाहे वह आतंकवाद को काबू करने के लिए किसी केंद्रीय जांच एजेंसी बनाने का मामला हो या फिर एक सुर में किसी को शाबासी देने की बात हो। प्रधानमंत्री ने मुंबई पर हमले के लिए देश से माफी मांग ली है और विपक्ष के नेता व प्रधानमंत्री बनने के हसीन सपने में खोए लालकृष्ण आडवाणी ने सरकार द्वारा इस मुद्दे पर अब तक की गई कोशिशों पर संतोष का भाव भी लगे हाथ जता दिया है। आडवाणी ने केंद्रीय जांच एजेंसी बनाने पर भी सहमति जता दी है। आडवाणी यह कहना भी नहीं भूले कि राजस्थान और दिल्ली में बीजेपी की हार का मतलब यह नहीं है कि हमारे आतंकवाद के मुद्दे को जनता का समर्थन हासिल नहीं है।
तमाम बाजीगर नेता जनता का संदेश बहुत साफ समझ चुके हैं और उनकी इस एकजुटता का सबब जनता का संदेश ही है। यह हकीकत है कि मुंबई का हमला देश को एक कर गया है। इतनी उम्मीद बीजेपी और मुस्लिम कट्टरपंथियों को भी नहीं थी। कश्मीर के बारे में मैं बहुत ज्यादा नहीं बता पाउंगा लेकिन शेष भारत से जो सूचनाएं मिलीं, वह यह थीं कि मुंबई हमले के मद्देनजर मुसलमानों ने इस बार बकरीद का त्यौहार उस उत्साह से नहीं मनाया जिसके लिए इस त्यौहार को जाना जाता है। कुर्बानी का गोश्त खाने से परहेज न करने वाले मेरे तमाम हिंदू दोस्त मेरे फोन का इंतजार करते रहे कि शायद बुलावा आ जाए। उनमें से कुछ से रहा नहीं गया तो शाम होते-होते उन्होंने खुद ही पूछ लिया कि इस बार क्या आप भी मुसलमान हो गए हैं? मैंने इस सवाल का मतलब पूछा तो उनका कहना था कि इस बार तो हद ही हो गई है, कोई पूछ ही नहीं रहा। काफी सदमे में हैं भाई लोग। कुछ ने काली पट्टियां भी बांध रखी हैं। यह हाल अकेले किसी एक शहर या कह लीजिए दिल्ली का नहीं था। लखनऊ, फैजाबाद, वाराणसी, बरेली, मेरठ, पटना, हैदराबाद, बंगलौर, मद्रास सभी जगह यही हाल था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरों ने भी इसकी पुष्टि की।
नेता जिसने चालाकी में पहले ही पीएचडी कर रखी है, उसे पब्लिक का मूड भांपने में देर नहीं लगी। इन बाजीगरों की इतनी बड़ी एकजुटता तब इस तरह नजर नहीं आई थी जब दिल्ली, जयपुर और देश के अन्य हिस्सों में सीरियल बम ब्लास्ट हुए थे और जिसमें काफी बेगुनाह लोग मारे गए थे। आडवाणी ने संसद में दिए गए अपने भाषण में एक वाक्य का इस्तेमाल किया है कि पाकिस्तान आतंक का युद्ध छेड़े हुए है। इससे पहले हुए सीरियल ब्लास्ट में इस तरह के शब्दों का प्रयोग नदारद था। तब सिर्फ एक समुदाय विशेष निशाना था। लेकिन इस बार शब्दावली बदली हुई है। पाकिस्तान निशाना है और भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान से क्या लेना-देना, इसलिए बड़ी होशियारी से रुख उधर मुड़ गया है। देखा जाए तो देश के एक प्रमुख राजनीतिक दल की ओर से यह सुखद संकेत है। लेकिन सवाल यही है कि क्या उनकी नीयत पर शक किया जाए। पाकिस्तान बनने से लेकर आज तक उस देश ने हमेशा भारत को तोड़ने की नाकाम कोशिश की है। बांग्लादेश बनने का भी बदला लेना चाहा है लेकिन बीजेपी या उससे पहले भारतीय जनसंघ की भाषा यहां के समुदाय विशेष के लिए जिस तरह की रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। चुनाव के आसपास तमाम गड़े मुर्दे उखाड़कर इस समुदाय विशेष को विलेन बनाकर पेश कर दिया जाता है इसलिए बीजेपी का मौजूदा सुखद संकेत कितने दिन सुखद रहेगा, कहना जरा मुश्किल है। लेकिन यह पार्टी अगर इसी बहाने खुद को सुधारना चाहती है तो स्वागत है।
मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह खुलासे हो रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है कि आतंकवादियों के हौसले इस कदर बढ़ाने के लिए न सिर्फ मौजूदा यूपीए सरकार बल्कि पिछली बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बराबर की जिम्मेदार है। इस हमले का मास्टरमाइंड लश्कर-ए-तैबा के चीफ मौलाना मसूद अजहर को बताया गया है। यह बात अब पूरी तरह साबित हो चुकी है कि अजहर को छुड़ाने के लिए भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार (अफगानिस्तान) ले जाया गया। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह और तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी उस समझौते के खलनायक हैं जो अजहर को छोड़ने के लिए आतंकवादियों ने भारतीय हुक्मरानों से किए थे।
अब देखिए तब तक ओसामा बिन लादेन नामक तथाकथित जेहादी उस इलाके में नहीं पहुंचा था लेकिन हकीकत यही है कि अल कायदा उसी समय से अस्तित्व में आ चुका था और सारे तालिबानी + पाकिस्तानी आतंकवादी + कुछ अन्य छोटे गुरिल्ला संगठनों की मदद से अपने आप को मजबूत करने में जुटे हुए थे। लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसी तो दूर अमेरिका की सबसे बड़ी जासूस एजेंसी सीआईए और एफबीआई को इसकी भनक तक नहीं लगी। आज अमेरिकी फौज पाकिस्तान और अफगानिस्तान की घाटियों में अल कायदा के आतंकवादियों को तलाशती फिर रही है। लेकिन न लादेन मिला और न अल जवाहिरी।
...लेकिन अमेरिका, भारत और पाकिस्तान के लोग एक ऐसे अघोषित घृणा अभियान में शामिल हो गए जिसका आज तक कोई आदि-अंत नहीं है। इस खेल में शामिल आईएसआई के अफसर जरूर इन तीनों देशों के उन नेताओं और अफसरों पर जरूर हंस रहे होंगे जिन्होंने जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कहने पर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया था। लेकिन बदले में इन तीन देशों को क्या मिला - अमेरिकी दंभ के प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला, भारत की संसद पर हमला और पाकिस्तान में वहां की सबसे लोकप्रिय नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या। इस दौरान जो आम आदमी इन तीनों देशों में मारा गया, उसका कोई हिसाब नहीं है।
कुल निचोड़ यही है कि चाहे वह अमेरिका के बुश हों या फिर भारत के आडवाणी ऐसे तमाम मौकापरस्तों से जनता को बचकर रहने की जरूरत है जिनकी नीयत और नीति में जमीन आसमान का फर्क है।



Tuesday, December 9, 2008

बीजेपी के पास अब भी वक्त है, मत खेलों जज्बातों से


पांच राज्यों के चुनाव नतीजे सभी को पता चल चुके हैं और अगले दो – चार दिनों में सभी जगह विश्लेषण के नाम पर तमाम तरह की चीड़फाड़ की जाएगी। इसलिए बहती गंगा में चलिए हम भी धो लेते हैं। हालांकि चुनाव तो पांच राज्यों में हुए हैं लेकिन मैं अपनी बात दिल्ली पर केंद्रित करना चाहूंगा। क्योंकि दिल्ली में बीजेपी ने प्रचार किया था कि किसी और राज्य में हमारी सरकार लौटे न लौटे लेकिन दिल्ली में हमारी सरकार बनने जा रही है और पूरे देश को दिल्ली की जनता ही एक संदेश दे देगी। इसके बाद मुंबई पर आतंकवादी हमला हुआ और जैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली कहावत सच होती नजर आई। अगले दिन बीजेपी ने अखबारों में बहुत उत्तेजक किस्म के विज्ञापन आतंकवाद के मुद्दे पर जारी किए। जिनकी भाषा आपत्तिजनक थी। चुनाव आयोग तक ने इसका नोटिस लिया था। मीडिया के ही एक बड़े वर्ग ने दिल्ली में कांग्रेस के अंत की कहानी बतौर श्रद्धांजलि लिख डाली। यहां तक कि जिस दिन मतदान हुआ, उसके लिए बताया गया कि वोटों का प्रतिशत बढ़ने का मतलब है कि बीजेपी अब और ज्यादा अंतर से जीत रही है। इस माउथ पब्लिसिटी का नतीजा यह निकला कि 7 दिसंबर
तक कांग्रेस खेमे को यह उम्मीद नहीं थी कि वे जीत रहे हैं।
बहरहाल, दिल्ली तो दिल्ली है। पता नहीं दिल वालों की है या नहीं लेकिन इस दिल्ली ने दिखा दिया कि उसे सही और गलत की पहचान है। दिल्ली की पहले से ही प्रदूषित हवा में हर तरह का जहर घोलने की कोशिश इस चुनाव से पहले हुई। इस वातावरण के लिए कुछ खाद-पानी का इंतजाम आतंकवादियों ने अक्टूबर के महीने में दिल्ली में सीरियल बम ब्लास्ट करके किया। इसके बाद बटला हाउस एनकाउंटर हुआ और जानी-मानी जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी यूनिवर्सिटी को आतंकवादियों का सेंटर और वहां के वीसी मुशीरुल हसन को देशद्रोही घोषित कर दिया गया।
जिस दौरान की बात मैं आपसे कर रहा हूं, आप यकीन करिए कि दिल्ली की फिजा उन दिनों बहुत जहरीली हो गई थी। यह ईद के आसपास की बात है जब दिल्ली में लोग एक-दूसरे को शक की नजर से देखने लगे थे। अब बकरीद आ चुकी है, इस देश के खिलाफ रची गई साजिश मुंबई के बहाने सामने आ चुकी है लेकिन अब हालात बदले हुए हैं। लगता यही है कि हिंदू-मुसलमान साथ चलने को एक बार फिर से तैयार हैं। इस बार इस तरह की पहल को मजबूत करने के लिए दिल्ली के चुनाव नतीजे भी उम्मीद जगाते हैं। अगर दिल्ली में बीजेपी जीत जाती तो आतंकवाद पर बीजेपी के उन उत्तेजक इश्तहारों को भगवा पार्टी और उसके खैरख्वाह खुद सही ठहराने में जुट जाते। लेकिन दिल्ली के लोगों ने बता दिया कि उन्हें इमशोनली ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।
हालांकि दिल्ली में कांग्रेस की इस जीत का यह भी मतलब न लगाया जाए कि कांग्रेस की सारी नीतियां ठीक हैं और जनता ने उस पर मोहर लगा दी है। जनता ने कांग्रेस को भी बता दिया है कि बेशक आप को दिल्ली में हम सरकार बनाने का मौका फिर दे रहे हैं लेकिन आपको इस कहने के लायक नहीं छोड़ेंगे कि आपके वोटों में इजाफा हुआ है। यह संदेश बहुत साफ है लेकिन चूंकि बीजेपी ने दिल्ली के चुनाव को सीधे आतंकवाद से जोड़ दिया था तो हम जैसे लोगों को भी उसी के इर्द-गिर्द बात करनी ही पड़ेगी। बहरहाल, दिल्ली ने बीजेपी टाइप आतंकवाद की परिभाषा को अंगूठा दिखा दिया है और आतंकवाद की वह परिभाषा जो हम-आप जानते हैं उसके खिलाफ अपना फैसला सुनाया है।
बीजेपी के पास अब भी वक्त है। पांच महीने बाद जब लोकसभा चुनाव होंगे और अगर वह आम आदमी के हक में ठोस नीतियों के साथ नहीं आती है तो लोग उसे कम से कम सरकार बनाने का मौका नहीं देने वाले। अगर आडवाणी को भी विजय कुमार मल्होत्रा की तरह सीएम इन वेटिंग जैसा तमगा (यानी पीएम इन वेटिंग)
लगाकर खुश नहीं होना तो इस पार्टी को आतंकवाद की आड़ में जज्बातों से खेलने की लड़ाई बंद करना होगी। देश को बताना होगा कि असली मसला रोटी-रोजी है। लोगों के जज्बात किसी पार्टी को लंबे समय तक वोट नहीं दिला सकते। वोटरों की नई जमात धीरे-धीरे और बढ़ रही है। इस जमात की अपनी परेशानियां और चुनौतियां है, यह जमात इन जज्बाती नारों के बारे में अच्छी तरह वाकिफ है। तमाम राजनीतिक दलों के लिए आने वाला समय काफी मुश्किल भरा है।

Saturday, December 6, 2008

ये क्या जगह है दोस्तो


चारों तरफ माहौल जब खराब हो और हवा में तमाम बेचारगी की सदाएं गूंज रही हों तो लंबे-लंबे लेख लिखने का मन नहीं होता। चाहे मुंबई की घटना हो या फिर रोजमर्रा जिंदगी पर असर डालने वाली छोटी-छोटी बातें हों, कहीं से कुछ भी पुरसूकून खबरें नहीं आतीं। मुंबई की घटना ने तमाम लोगों के जेहन पर इस तरह असर डाला है कि सारे आलम में बेचैनी फैली हुई है। कुछ ऐसे ही लम्हों में गजल या कविता याद आती है। जिसकी संवेदनाएं कहीं गहरा असर डालती हैं। इसलिए इस बार अपनी बात ज्यादा कुछ न कहकर मैं आप लोगों के लिए के. के. बहल उर्फ केवल फरीदाबादी की एक संजीदा गजल पेश कर रहा हूं। शायद पसंद आए –

ठहरने का यह मकाम नहीं

भरे जहान में कोई शादकाम नहीं चले चलो
कि ठहरने का यह मकाम नहीं
यह दुनिया रैन बसेरा है हम मुसाफिर हैं
किसी बसेरे में होता सदा कयाम नहीं
किसी भी रंग में हम को भली नहीं लगती
तुम्हारी याद में गुजरी हुई जो शाम नहीं
तेरे फसाने का और मेरी इस कहानी का
नहीं है कोई भी उनवां कोई भी नाम नहीं
यह वक्त दारा ओ सरमद के कत्ल का है गवाह
नकीबे जुल्म थे ये दीन के पैयाम नहीं
भरी बहार है साकी है मय है मुतरिब है
मगर यह क्या कि किसी हाथ में भी जाम नहीं
बदलते वक्त ने पहुंचा दिया कहां केवल
सदाए हक भी रही अब सदाए आम नहीं

- केवल फरीदाबादी

अर्थ –
शादकाम – भरपूर, कयाम – ठहराव, फसाना- आपबीती, उनवां – शीर्षक, दारा – शाहजहां का सबसे बड़ा उत्तराधिकारी पुत्र जिसे औरंगजेब ने हराकर मार डाला था। सरमद उसका पीर फकीर दोस्त था। सरमद – नंगा, पीर फकीर, मस्तमलंग, औरंगजेब ने उसका सिर जामा मस्जिद की सीढियों पर कलम करवा दिया था। नकीबे जुल्म – अत्याचार दर्शाने वाले, पयाम- पैगाम, सदाए हक- सच की आवाज, सदाए आम – सार्वजनिक, सरे आम

Thursday, December 4, 2008

शर्म मगर उनको नहीं आती

आज तक इस पर कोई शोध नहीं हुआ कि दरअसल नेता नामक प्राणी की खाल कितनी मोटी होती है। अगर यह शोध कहीं हुआ हो तो मुझे जरूर बताएं - एक करोड़ का नकद इनाम मिलेगा। अब देखिए देश भर में इस मोटी खाल वाले के खिलाफ माहौल बन चुका है लेकिन किसी नेता को शर्म नहीं आ रही। कमबख्त सारे के सारे पार्टी लाइन भूलकर एक हो गए हैं और गजब का भाईचारा दिख रहा है। क्या भगवा, क्या कामरेड, क्या लोहियावादी और क्या दलितवादी एक जैसी कमेस्ट्री एक जैसा सुर।
एक और खबर ने नेताओं की कलई खोल दी है और सारे के सारे पत्रकारों से नाराज हो गए हैं। वह खबर यह है कि एनएसजी के 1700 जवान वीआईपी ड्यूटी में 24 घंटे लगे हुए हैं। इन पर हमारे-आपकी जेब से जो पैसा टैक्स के रूप में जाता है, उसमें से 250 करोड़ रुपये इनकी सुरक्षा पर खर्च किए जा रहे हैं। इसमें अकेले प्रधानमंत्री या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही नहीं बल्कि लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी, मुरली मनोहर जोशी, एच.डी. देवगौड़ा, अमर सिंह जैसे नेता शामिल हैं। इसमें किसी कम्युनिस्ट नेता का नाम नहीं है। इसके अलावा बड़े नेताओं को पुलिस जो सिक्युरिटी कवर देती है , वह अलग है। एनएसजी के इन 1700 जवानों को इस बात की ट्रेनिंग दी गई थी कि वे देश की सुरक्षा में लगेंगे। लेकिन इन्हें मोटी खाल वालों की सुरक्षा में जुटना पड़ रहा है।
लेकिन अखबारों के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ज्यादा ही आक्रामक तरीके से जब इन नेताओं की जवाबदेही तय करनी चाही है और इन सभी को पब्लिक के सामने नंगा किया है तो खद्दरधारियों की जमात बिलबिला उठी है।
विरोधी की शुरुआत भगवा पार्टी बीजेपी की तरफ से हुई। इसके नेता मुख्तार अब्बास नकवी से कहलवाया गया कि मुंबई या दिल्ली में लिपिस्टिक लगाकर जो महिलाएं मोमबत्तियां जलाकर आतंकवाद का विरोध करने की बजाय नेताओं का विरोध कर रही हैं, दरअसल उसका कोई मतलब नहीं है। क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ नेता ही ऐसी बातों का विरोध कर सकते हैं। इन महिलाओं को तो घर बैठना चाहिए। जाहिर है इसका विरोध होना ही था। लेकिन इसी पार्टी के एक और जिम्मेदार नेता अरुण जेटली का बयान या तो मीडिया ने नोटिस में नहीं लिया या फिर जानबूझकर नजरन्दाज किया, वह यह था कि पेज थ्री की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार और सनसनी तलाशने वाले टीवी जर्नलिस्टों से क्या अब नेताओं को पूछना पड़ेगा कि वे क्या बयान दें। जेटली ने यह भी कहा कि इस मामले में फोकस आतंकवाद पर रखा जाना चाहिए था लेकिन मीडिया ने जानबूझकर उसका रुख नेताओं की तरफ कर दिया है। यह देश के लिए घातक है।
इसके बाद मुंबई में एक और आतंकवाद विरोधी रैली निकली और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जबान भी फिसल पड़ी। उन्होंने वही सब कहने की कोशिश की जो अरुण जेटली ने कहा था। केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री की जो जबान फिसली, वह भी कैमरे में कैद है।
कांग्रेस के किसी नेता का बयान इस तरह का तो नहीं आया लेकिन वहां कुछ और ही खेल चल रहा है। वहां पहले माहौल बनाया गया। प्रधानमंत्री ने सख्त भाषण दे डाला लेकिन महाराष्ट्र के सीएम और केंद्रीय गृह मंत्री पर कोई असर नहीं। फिर माहौल बनाया गया कि इस सारे मामले को जिस तरह हैंडल किया गया, उससे सोनिया गांधी जी काफी आहत हैं। लो जी, अगले ही दिन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल का इस्तीफा। फिर महाराष्ट्र के गृह मंत्री का इस्तीफा और उसके बाद वहां के सीएम की कुर्सी भला क्यों न हिलती।
अब देखिए मुंबई में जिनकी शहादत हुई, वह मुद्दा तेजी से छूटता जा रहा है। जांच और पाकिस्तान से युद्ध और डराने-धमकाने का मामला मीडिया में उछल रहा है लेकिन जानते हैं, तमाम राजनीतिक दलों की सांस दरअसल उखड़ी हुई है। अगले पांच महीने में जो चुनाव है, उसके मद्देनजर ये लोग चाहते हैं कि मीडिया का ध्यान नेताओं के इमेज की पोल खोलने की बजाय आंतकवाद पर केंद्रित हो।

जानते हैं कि देश की दो प्रमुख पार्टियां किस तरह इस मुद्दे को कैश करना चाहती है?

कांग्रेस
इस पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिम मतदाता अब मायावती और मुलायम सिंह यादव से चोट खाने के बाद उसकी तरफ लौट सकते हैं। क्योंकि तमाम ब्लास्ट और हमलों के बीच कांग्रेस ने अपने ऊपर यह आरोप आसानी से लगने दिया कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण की दिशा में काम कर रही है। कांग्रेस पार्टी में एक और खेमा है जो पाकिस्तान से युद्ध चाहता है जिससे अगले चुनाव में बहुसंख्यकों के भावनात्मक वोट उसे मिल जाएं। बहरहाल, इस पर अभी मनन चल रहा है।

बीजेपी
यह पार्टी सिर्फ और सिर्फ सारा फोकस आतंकवाद पर चाहती है और वह भी उस तरह से, जैसे वह चाहे। वैसा नहीं जैसा मीडिया चाहता है। यानी बीजेपी शासनकाल के दौरान विमान अपहरण कर उसे कंधार ले जाने और बदले में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पाकिस्तानी आतंकवादियों को रिहा करने की चर्चा बीजेपी नहीं चाहती। इधर, जब से नेताओं की इमेज की असली तस्वीर मीडिया ने बतानी शुरू की है, तब से उसकी परेशानी और बढ़ गई है।
कुल मिलाकर देश के सामने बड़ी विकट स्थिति है। देश पर आतंकवादी शिकंजा कसते जा रहे हैं और मोटी खाल वाले नेता इस स्थिति को कैश करने की जुगत में लगे हैं। आखिर ये किस गली हम जा रहे हैं...मैं पूछता हूं आप सब से...

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Monday, December 1, 2008

लता मंगेशकर तो 300 बार रोईं, आप कितनी बार ?

मुंबई पर हमले और निर्दोष लोगों के मारे जाने पर उन तीन दिनों में आवाज की मलिका लता मंगेशकर तीन सौ बार रोईं और उनको यह आघात उनकी आत्मा पर लगा। लता जी ने यह बात कहने के साथ ही यह भी कहा कि मुंबई को बचाने में शहीद हुए पुलिस वालों और एनएसजी कमांडो को वह शत-शत नमन करती हैं। पर, जिन लोगों ने उस घटना में मारे गए कुछ पुलिस वालों को शहीद मानने से इनकार कर दिया है और उनके खिलाफ यहां-वहां निंदा अभियान चला रखा है, उनसे मेरा सवाल है कि वह कितनी बार रोए?
छी, लानत है उन सब पर जो मुंबई में एंटी टेररिस्ट स्क्वाड के चीफ हेमंत करकरे और अन्य पुलिस अफसरों की शहादत पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ लोग तो इतने उत्तेजित हैं कि खुले आम यहां-वहां लिख रहे हैं कि इन लोगों की हत्या हुई है, इन्हें शहीद नहीं कहा जा सकता। जैसे शहादत का सर्टिफिकेट बांटने का काम भारत सरकार ने इन लोगों को ही दे दिया है। बतौर एटीएस चीफ हेमंत करकरे की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाली बीजेपी के विवादित नेता और गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी एक करोड़ रुपये लेकर हेमंत की विधवा को देने गए थे, शुक्र है उन्होंने इसे ठुकरा दिया। वरना उसके बाद तो बीजेपी वाले हेमंत को शहीदे आजम मान लेते। लेकिन फिलहाल वह उन्हें शहीद मान रहे हैं जो समझिए कि इस देश पर बड़ा उपकार है।

पर, उन सिरफिरों को आप क्या कहेंगे जो इन शहादतों और खासकर हेमंत की शहादत को नरकगामी बता रहे हैं। मुझे तो लगता है कि ऐसे लोगों की आत्मा मर चुकी है और वे अपने सोचने-समझने की शक्ति खो चुके हैं। सवाल भी कितने बेतुके उठाए जा रहे हैं कि आखिर उन लोगों को अस्पताल जाने की क्या जरूरत थी? कुछ ने लिखा है कि इतने बड़े अफसर को तो आपरेशन का संचालन करना चाहिए था न कि वहां जाना चाहिए था। हेमंत करकरे की टीम में अरुण जाधव नामक सिपाही था और अब वह बयान दे रहा है कि वह जिंदा लाश बनकर उस वाहन में घूमता रहा, जिसे लेकर आतंकवादी भागे थे। हैरानी है कि वह सिपाही बच गया और उसने एक बार भी आतंकवादियों को जवाब देने की कोशिश नहीं की।
जरा कल्पना कीजिए, मुंबई शहर में अचानक आतंकवादी आ धमकते हैं। चारों तरफ अफरातफरी, पुलिस के वायरलेस सेट पर मैसेज गूंज रहे हैं और इन क्षणों में भी कई पुलिस अफसर जान जोखिम में डालकर घरों से बाहर निकलते हैं तो इसका मतलब क्या है? क्या शहादत के लिए कोई और प्रमाण चाहिए? ऐसे हमलों और क्षणों में बड़े-बड़े कमांडरों की बुद्धि भी जवाब दे जाती है। ब्लॉग पर या टीवी पर बैठकर बातें छांटना अलग बात है और आतंकवादियों के बीच में जाकर गोली खाना और बात है।
क्या आप किसी की शहादत को सिर्फ आधार पर झुठलाना चाहते हैं कि वे पुलिस अफसर माले गांव ब्लास्ट की जांच से जुड़े थे और जिन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सिंह समेत कई लोगों को इन आरोपों में गिरफ्तार किया है। हालांकि ये तमाम लोग अभी दोषी करार नहीं दिए गए हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि कोर्ट और पुलिस उनके अनुसार चले। जब इन बाबाओं या तथाकथित राष्ट्रभक्तों (?) की गिरफ्तारियां हो रही थीं तो भी इन पुलिस अफसरों के खिलाफ निंदा अभियान चल रहा था। अब जब ये लोग शहीद हो चुके हैं तो कमबख्त लोग उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं।
बहरहाल, मैं मुंबई की घटना में शहीद तमाम पुलिस कर्मियों और एनएसजी कमांडो को नमन करता हूं और इस शहादत पर सवाल उठाने वालों को लानत भेजता हूं।

...और वो राज ठाकरे
आखिरकार मुंबई के स्वयंभू ठेकेदार राज ठाकरे ने अपनी चुप्पी तोड़ दी है। उसने बयान दिया है कि ऐसी घटनाएं इसलिए हो रही हैं कि मुंबई में बाहर के लोग आ जाते हैं। उन पर कोई निगरानी नहीं है। उसने महाराष्ट्र के सीएम से मांग की है कि बाहर से आने वाले लोगों पर निगरानी रखी जाए। अब आप ही बताइए कि राज की भाषा क्या कहती है? अगर कोई इस भाषा की अभी निंदा करने लगे कि भाई बाहरी आदमी से आपका क्या आशय है तो उसे फौरन देशद्रोही करार दे दिया जाएगा। बहरहाल, अब आप खुद ही राज ठाकरे नामक व्यक्ति के बारे में जो शब्द बोलना चाहें, बोलिए। हम बीच में कहीं नहीं है। ध्यान रहे कि जिस तरह देश के बाकी हिस्सों में बांग्लादेशी घुसपैठिए समस्या बने हुए हैं, उसी तरह मुंबई में कुछ हिंदी भाषी प्रदेश के लोगों को भी समस्या माना जाता है।

शहीदों को नमन करते हुए सीमा सचदेव की यह कविता जरूर पढ़ें। यहां नीचे लिखे लिंक पर बस क्लिक कर दें। सीधे वहीं पहुंचेंगे। मेरी आवाज़: न जाने क्यों......?

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Sunday, November 30, 2008

मुंबई हमले के लिए अमेरिका जिम्मेदार ?

सुनने में यह जुमला थोड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह जुमला मेरा नहीं है बल्कि अमेरिका में सबसे लोकप्रिय और भारतीय मूल के अध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा का है। दीपक चोपड़ा ने कल सीएनएन न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में यह बात कही है। उस इंटरव्यू का विडियो मैं इस ब्लॉग के पाठकों के लिए पेश कर रहा हूं। निवेदन यही है कि पूरा इंटरव्यू कृपया ध्यान से सुनें।
अंग्रेजी में इस इंटरव्यू का मुख्य सार यह है कि जब से अमेरिका ने इराक सहित तमाम मुस्लिम देशों के खिलाफ आतंकवाद के नाम पर हमला बोला है तबसे इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। अमेरिका आतंकवाद को दो तरह से फलने फूलने दे रहा है – एक तो वह अप्रत्यक्ष रूप से तमाम आतंकवादी संगठनों की फंडिंग करता है। यह पैसा अमेरिकी डॉलर से पेट्रो डॉलर बनता है और पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब, इराक, फिलिस्तीन समेत कई देशों में पहुंचता है। दूसरे वह आतंकवाद फैलने से रोकने की आड़ में तमाम मुस्लिम देशों को जिस तरह युद्ध में धकेल दे रहा है, उससे भी आतंकवादियों की फसल तैयार हो रही है। दीपक चोपड़ा का कहना है कि पूरी दुनिया में मुसलमान कुल आबादी का 25 फीसदी हैं, जिस तरह अमेरिका के नेतृत्व में उनको अलग-थलग करने की कार्रवाई चल रही है, उससे आतंकवाद और बढ़ेगा, कम नहीं होगा। दीपक चोपड़ा पाकिस्तान और कश्मीर पर भी बोले हैं, वह आप खुद ही सुनकर जान लें तो बेहतर है। मैं उसे यहां लिखना नहीं चाहता।
दीपक चोपड़ा की इन बातों से आप सहमत हों या न हों लेकिन मैं इतना बता दूं कि अमेरिकी मानस में यह सोच घर करती जा रही है। हाल ही में जब बाराक ओबामा जब अपने प्रचार में जुटे थे तो उन्हें कई कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ा था। जिसमें सबसे खास यह था कि अमेरिकी चाहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का जो हौवा अमेरिका यानी जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने खड़ा किया है और जिसकी वजह से आज पूरी दक्षिण पूर्व एशिया में अशांति फैली है, वह नीति वापस ली जानी चाहिए। मुस्लिम देशों के खिलाफ जो घृणा का माहौल फैलाया जा रहा है, वह फौरन बंद किया जाना चाहिए।
अमेरिका की एक प्रतिष्ठा पत्रिका काउंटर पंच में जाने-माने लेखक और राजनीतिक विश्लेषक तारिक अली का एक लेख मुंबई में किए गए हमले पर प्रकाशित हुआ है। उस लेख को मैं यहां आप लोगों के लिए अंग्रेजी में पेश कर रहा हूं। इस लेख में कही गई बातें भी अध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा से मिलती हैं। तारिक अली ने यह भी लिखा है कि गुजरात में मोदी की सरकार ने जो कुछ भी किया, उससे भी आतंकवाद की फसल पैदा हो रही है। तमाम दंगों में जो मुस्लिम परिवार प्रभावित हुए हैं, उनके घरों के बच्चे भी आतंकवाद के रास्ते पर कदम रख चुके हैं। तारिक अली की हाल ही में आई पुस्तक द ड्यूल पाकिस्तान काफी चर्चित हो रही है। जिसमें कहा गया है कि अमेरिका का अंधा समर्थन कर पाकिस्तान को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। वहां आतंकवाद की जड़े भारत के मुकाबले कई गुना गहरी हैं और एक दिन वह पाकिस्तान नामक देश को खत्म कर देंगी।
तारिक अली का मुंबई के संदर्भ वाला पूरा लेख तो आप नीचे की पोस्ट में खैर अंग्रेजी में पढ़ ही लेंगे लेकिन यहां मुझे इस्राइल और फिलिस्तीन में चल रहे संघर्ष की याद आती है। फिलिस्तीन में आज हर बच्चा इस्राइल के खिलाफ बंदूक उठाने को तैयार रहता है। यही वजह है कि वहां के चर्चित आतंकवादी संगठन हमास जो कई देशों में प्रतिबंधित है, की सरकार बन गई। यानी वहां के लोगों ने उन्हें चुना। कुल मिलाकर आतंकवाद के कई पहलू हैं और इस समस्या को समग्र रूप से और बहुत संजीदा तरीके से देखना होगा।
पेश है दीपक चोपड़ा का विडियो और तारिक अली का अंग्रेजी में लेख ठीक नीचे वाली पोस्ट में -



Transcript

Chopra: What we have seen in Mumbai has been brewing for a long time, and the war on terrorism and the attack on Iraq compounded the situation. What we call "collateral damage" and going after the wrong people actually turns moderates into extremists, and that inflammation then gets organized and appears as this disaster in Bombay. Now the worst thing that could happen is there's a backlash on the Muslims from the fundamental Hindus in India, which then will perpetuate the problem. Inflammation will create more inflammation.

CNN: Let me jump in on that because you're presuming something very important, which is that it's Muslims who have carried out these attacks and, in some cases, with Washington in their sights.

Chopra: Ultimately the message is always toward Washington because it's also the perception that Washington, in their way, directly or indirectly funds both sides of the war on terror. They fund our side, then our petrol dollars going to Saudi Arabia through Pakistan and ultimately these terrorist groups, which are very organized. You know Jonathan, it takes a lot of money to do this. It takes a lot of organization to do this. Where's the money coming from, you know? The money is coming from the vested interests. I'm not talking about conspiracy theories, but what happens is, our policies, our foreign policies, actually perpetuate this problem. Because, you know, 25% of the world's population is Muslim and they're the fastest growing segment of the population of the world. The more we alienate the Muslim population, the more the moderates are likely to become extremists.


अगर इस विडियो को देखने या सुनने में दिक्कत हो तो इस लिंक पर जाएं -

http://video.google.com/videoplay?docid=-7260048132372687964&hl=en

'If You Go After the Wrong People, You Convert Moderates into Extremists' http://www.alternet.org/audits/108974/mumbai_attacks


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India's Leaders Need to Look Closer to Home

The Assault on Mumbai
By TARIQ ALI


The terrorist assault on Mumbai’s five-star hotels was well planned, but did not require a great deal of logistic intelligence: all the targets were soft. The aim was to create mayhem by shining the spotlight on India and its problems and in that the terrorists were successful. The identity of the black-hooded group remains a mystery.
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The Deccan Mujahedeen, which claimed the outrage in an e-mail press release, is certainly a new name probably chosen for this single act. But speculation is rife. A senior Indian naval officer has claimed that the attackers (who arrived in a ship, the M V Alpha) were linked to Somali pirates, implying that this was a revenge attack for the Indian Navy’s successful if bloody action against pirates in the Arabian Gulf that led to heavy casualties some weeks ago.

The Indian Prime Minister, Manmohan Singh, has insisted that the terrorists were based outside the country. The Indian media has echoed this line of argument with Pakistan (via the Lashkar-e-Taiba) and al-Qaeda listed as the usual suspects.

But this is a meditated edifice of official India’s political imagination. Its function is to deny that the terrorists could be a homegrown variety, a product of the radicalization of young Indian Muslims who have finally given up on the indigenous political system. To accept this view would imply that the country’s political physicians need to heal themselves.

Al Qaeda, as the CIA recently made clear, is a group on the decline. It has never come close to repeating anything vaguely resembling the hits of 9/11.

Its principal leader Osama bin Laden may well be dead (he certainly did not make his trademark video intervention in this year’s Presidential election in the United States) and his deputy has fallen back on threats and bravado.

What of Pakistan? The country’s military is heavily involved in actions on its Northwest frontier where the spillage from the Afghan war has destabilized the region. The politicians currently in power are making repeated overtures to India. The Lashkar-e-Taiba, not usually shy of claiming its hits, has strongly denied any involvement with the Mumbai attacks.

Why should it be such a surprise if the perpetrators are themselves Indian Muslims? Its hardly a secret that there has been much anger within the poorest sections of the Muslim community against the systematic discrimination and acts of violence carried out against them of which the 2002 anti-Muslim pogrom in shining Gujarat was only the most blatant and the most investigated episode, supported by the Chief Minister of the State and the local state apparatuses.

Add to this the continuing sore of Kashmir which has for decades been treated as a colony by Indian troops with random arrests, torture and rape of Kashmiris an everyday occurrence. Conditions have been much worse than in Tibet, but have aroused little sympathy in the West where the defense of human rights is heavily instrumentalised.

Indian intelligence outfits are well aware of all this and they should not encourage the fantasies of their political leaders. Its best to come out and accept that there are severe problems inside the country. A billion Indians: 80 percent Hindus and 14 percent Muslims. A very large minority that cannot be ethnically cleansed without provoking a wider conflict.

None of this justifies terrorism, but it should, at the very least, force India’s rulers to direct their gaze on their own country and the conditions that prevail. Economic disparities are profound. The absurd notion that the trickle-down effects of global capitalism would solve most problems can now be seen for what it always was: a fig leaf to conceal new modes of exploitation. (Courtesy: The Counter Punch)

Tariq Ali’s latest book, ‘The Duel: Pakistan on the Flight Path of American Power’ is published by Scribner.


Some other books of this Writer -

Saturday, November 29, 2008

पाकिस्तान पर हमले से कौन रोकता है ?

मुंबई पर हुए सबसे बड़े हमले के बारे में ब्लॉग की दुनिया और मीडिया में बहुत कुछ इन 55 घंटों में लिखा गया। कुछ लोगों ने अखबारों में वह विज्ञापन भी देखा होगा जो मुंबई की इस घटना को भुनाने के लिए बीजेपी ने छपवाया है जिससे कुछ राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में उसका लाभ लिया जा सके। सांप्रदायिकता फैलाने वाले उस विज्ञापन की एनडीटीवी शुक्रवार को ही काफी लानत-मलामत कर चुका है। यहां हम उसकी चर्चा अब और नहीं करेंगे। मुंबई की घटना को लेकर लोगों का आक्रोश स्वाभाविक है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश के एक-एक आदमी की दुआएं सुरक्षा एजेंसियों के साथ थीं लेकिन सबसे दुखद यह रहा कि इसके बावजूद तमाम लोग अपना मानसिक संतुलन खो बैठे। कोई राजनीतिक दल या उसका नेता अगर मानसिक संतुलन ऐसे मुद्दों पर खोता है तो उसका इतना नोटिस नहीं लिया जाता लेकिन अगर पढ़ा-लिखा आम आदमी ब्लॉग्स पर उल्टी – सीधी टिप्पणी करेगा तो उसकी मानसिक स्थिति के बारे में सोचना तो पड़ेगा ही। मुंबई की घटना को लेकर इस ब्लॉग पर और अन्य ब्लॉगों पर की गई टिप्पणियां बताती हैं कि फिजा में कितना जहर घोला जा चुका है।
इसी ब्लॉग पर नीचे वाली पोस्ट में एक टिप्पणीकार ने तो बाकायदा लिख ही दिया कि मुसलमान का नाम आते ही इस ब्लॉग यानी हिंदी वाणी की भाषा सेक्युलर हो जाती है। एक साहब ने लिखा है कि मेरी सोच को लेकर उनको मुझ पर तरस आता है। ब्लॉगर धीरू सिंह ने लिखा है कि अब आर-पार की कार्रवाई लड़ाई होनी चाहिए। कुश जी ने लिखा है कि आतंकवादी को किसने इस रास्ते पर धकेला, यह भाषा मुलम्मा चढ़ी हुई है। कुश जी तो खैर टिप्पणी देने में काफी आगे निकल गए। हमेशा की तरह डॉ. अमर ज्योति ने बहुत गंभीर टिप्पणी दी है कि यह नए विकल्पों को तलाशने का समय है औऱ यह सब कुछ दिन तो चलेगा ही। राज भाटिया जी ने बहुत आहत भरी टिप्पणी दी और शहीदों को श्रद्धांजलि दी। राज जी के विचारों के साथ यह ब्लॉग शुरू से ही सहमत है।
फिजा में जहर घोलने वाली टिप्पणियों को कोई भी ब्लॉगर जब चाहे डिलीट कर सकता है और यह काम मैं भी कर सकता था। लेकिन मैंने ऐसा किया नहीं, क्योंकि मेरा विश्वास अब भी भारतीय लोकतंत्र में बना हुआ है और लोकतंत्र का यह तकाजा है कि सभी की बात सभी तक पहुंचनी चाहिए।
इस ब्लॉग पर मेरे लेख कोई भी फुरसत में पढ़कर निचोड़ निकाल सकता है कि दरअसल मेरी विचारधारा क्या है और किसी भी मुद्दे पर मेरा नजरिया किस तरह का रहता है। तमाम लोगों की नजरों का तारा बनने के लिए मैं यह तो कर नहीं सकता कि किसी समुदाय विशेष को गरियाने लगूं और सभी की वाहवाही लूट लूं। आखिर किसी मुसलमान लेखक या पत्रकार से यह अपेक्षा क्यों की जाती है कि वह अपने समुदाय के लोगों को कोसेगा और अपनी छवि किसी मुख्तार अब्बास नकवी टाइप नेता की बना लेगा। मुझे इस देश का रफीक जकारिया नहीं बनना है जो पत्रकार होने के नाते जॉर्ज डब्ल्यू बुश की नीतियों और इराक में बुश के हर एक्शन का समर्थन करे। मैं किसी भी राजनीतिक पार्टी का अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सदस्य भी नहीं हूं। बात अगर विचारधारा की ही करनी है तो भगत सिंह और मुंशी प्रेमचंद के आगे मैं खुद को सोच पाने में असमर्थ पाता हूं। खैर अब तो शहीदे आजम भगत सिंह की विचारधारा को भी फैशन की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तो हाल ही में उन्हें अपनी विचारधारा का आदमी बता डाला था।
आज मैं फिर यही बात कह रहा हूं कि आतंकवाद से भी बड़ी लड़ाई भारत नामक देश को एकजुट रखने की है। यह काम अकेले न तो हिंदू कर सकता है, न मुसलमान, न सिख और न ईसाई। यह सभी को मिलकर करना है। अगर हम एकजुट रहते हैं तो कोई बाहरी ताकत हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकती। याद कीजिए पंजाब में जब खालिस्तान आंदोलन चला था और पूरी सिख कौम को बदनाम करने की साजिश रची गई तो उसका नतीजा क्या निकला। लेकिन भारत एकजुट रहा और खालिस्तान आंदोलन अब इतिहास में दफन हो चुका है। उस आंदोलन को किन देशों का समर्थन था, कहां से पैसा आ रहा था, किसी से छिपा नहीं है।
अगर कुछ लोग यह चाहते हैं कि मैं यह विचार यहां व्यक्त करूं कि चूंकि पाकिस्तान का हाथ इस घटना में है इसलिए भारत को फौरन पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए। तो मैं कहना चाहता हूं कि – हां मैं इस तरह की कार्रवाई से सहमत हूं। पर क्या इससे समस्या का निदान हो सकेगा? भारत सरकार को कार्रवाई करने से भारत का कोई मुसलमान नहीं रोक रहा है लेकिन जिस तरह अमेरिका आए दिन पाकिस्तान के सीमांत प्रांत में मिसाइल गिराता है, बम फोड़ता है, वह ओसाम बिन लादेन को पकड पाया? किसी भी समस्या का नतीजा युद्ध से नहीं निकलता है। संवाद से कारगर चीज कोई नहीं है। इसलिए संवाद किया जाना चाहिए, समस्या के कारणों की गहराई में जाने की जरूरत है। भारत तो जब चाहे पाकिस्तान को मसल सकता है लेकिन शायद इतने भर से इस समस्या का हल नहीं निकलेगा। इसलिए मित्रो एकजुट रहिए औऱ समझदार बनिए। जो लोग हमारे लिए मुंबई में या सीमा पर कहीं भी शहीद होते हैं, उनको सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी।

Friday, November 28, 2008

शुक्रिया मुंबई...और आप सभी के जज्बातों का

मुंबई ने फिर साबित किया है कि वह जीवट का शहर है। उसे गिरकर संभलना आता है। उस पर जब-जब हमले हुए हैं, वह घायल हुई लेकिन फिर अपने पैरों पर खड़ी हो गई। 1993 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के बाद मुंबई ने यह कर दिखाया और अब जब बुधवार देर रात को उस पर सबसे बड़ा हमला हुआ तब वह एक बार फिर पूरे हौसले के साथ खड़ी है। मुट्ठी भर आतंकवादी जिस नीयत से आए थे, उन्हें उसमें रत्तीभर कामयाबी नहीं मिली। उनका इरादा था कि बुधवार के इस हमले के बाद प्रतिक्रिया होगी और मुंबई में बड़े पैमाने पर खून खराबा शुरू हो जाएगा लेकिन उनके ख्वाब अधूरे रहे। मुंबई के लोग एकजुट नजर आए और उन्होंने पुलिस को अपना आपरेशन चलाने में पूरी मदद की। हालांकि मुंबई पुलिस ने इस कार्रवाई में अपने 14 अफसर खो दिए हैं लेकिन मुंबई को जिस तरह उन लोगों ने जान पर खेलकर बचाया है, वह काबिलेतारीफ है।
इस घटना को महज एक आतंकवादी घटना बताकर भुला देना ठीक नहीं होगा। अब जरूरत आ पड़ी है कि सभी समुदायों के लोग इस पर गंभीरता से विचार करें और ऐसी साजिश रचने वालों को बेनकाब करें। ऐसे लोग किसी एक खास धर्म या जाति में नहीं हैं। इनकी जड़ें चारों तरफ फैली हुई हैं। मुंबई पर इतने बड़े हमले की साजिश किसी क्षणिक आवेश में की गई घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे सोची-समझी और लंबी साजिश है। शुरुआती जांच से ही यह बात सामने आने लगी है कि जो आतंकवादी इस हमले में शामिल थे, उनके तार पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। बेशक पाकिस्तान में लोकतंत्र आ चुका है लेकिन वहां की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई अब भी भारत विरोधी रवैया अपनाए हुए हैं। वहां के हुक्मरां आसिफ अली जरदारी का यह कहना कि अब समय आ गया है कि भारत-पाकिस्तान मिलकर आतंकवाद से मुकाबला करें, उनकी बेबसी को झलकाता है। क्योंकि वह भी आतंकवाद की वजह से अपनी पत्नी बेनजीर भुट्टो को खो चुके हैं। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई पाकिस्तान पर एक बदनुमा दाग की तरह हैं, जब तक कमान इन दोनों ऐजेंसियों के पास रहेगी, तब तक वहां कठपुतली सरकारों के अलावा आप और कुछ की उम्मीद नहीं कर सकते।
बहरहाल, यह समय नहीं है कि इस घटना के बहाने हम भारत के नेताओं को भी कोसें। लेकिन गुरुवार को जो राजनीतिक घटनाक्रम रहा, उससे यही लग रहा है कि बीजेपी इस मामले को हद तक उछालेगी और समुदाय विशेष पर निशाना साधने का उसका जो तरीका है वह उस पर काबू नहीं रख पाएगी। बीजेपी लंबे समय से धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए काम कर रही है, इसलिए यकीन नहीं है कि उसके नेता अपनी जबान पर कंट्रोल रख पाएंगे, वह भी तब जह अगले कुछ महीनों में केंद्र की सरकार का फैसला होना है और उस दौड़ में उसे आगे बताया जा रहा है। हालांकि मशहूर फिल्म निर्देशक महेश भट्ट ने तो गुरुवार को एक इंटरव्यू में बहुत साफ लफ्जों में कह दिया कि पार्टी कोई भी हो लेकिन पब्लिक का भरोसा अब नेताओं पर से उठ चुका है। यानी पब्लिक को ही अब अपने अच्छे-बुरे के बारे में सोचना होगा कि हमे क्या चाहिए? हमे आगे जाना है या फिर तरक्की के सारे रास्ते बंदकर अपने ही घर में कैद हो जाना है। अगर कोई समुदाय यह सोचता है कि बेकसूर लोगों को जब एनकाउंटरों में मारा जाएगा और फर्जी मुकदमा चलाया जाएगा तो ऐसी ही घटनाएं होंगी, उसकी यह सोच एक व्यवस्थित समाज की सोच से मेल नहीं खाती। अच्छे और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण ऐसी सोच से नहीं हो सकता। सोचिए अगर मुंबई में लाखों लोग इतने बड़े आतंकवादी हमले के बाद बेरोजगार हो जाएं तो वह आतंकवाद से भी घातक चीज होगी। उसमें सिर्फ अकेले हिंदू या अकेले मुसलमान ही शिकार नहीं होंगे। यह उसी तरह है कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का असर हर देश पर पड़ रहा है, आर्थिक मंदी ने इस मामले में किसी देश को रियायत नहीं दी कि वह विकसित देश है या विकासशील गरीब मुल्क। इसलिए सोचिए कि यह सब बंद हो। ऐसे फिदायीन हमले किसी एक के लिए बल्कि सभी के लिए भारी पड़ते हैं।

सभी ब्लॉगर्स का भी धन्यवाद

मुंबई में घटी इतनी बड़ी घटना पर तमाम ब्लॉगर्स ने जिस तरह संतुलित प्रतिक्रिया दी, वह भी कम काबिलेतारीफ नहीं है। मेरे इस ब्लॉग नीचे वाले लेख पर आई प्रतिक्रियाओं और ईमेल से कम से कम यही बात साबित होती है। जो ब्लॉगर्स पत्रकार हैं, उनकी प्रतिक्रिया के तो कई आयाम होते हैं लेकिन ऐसे ब्लॉगर्स जो गैर पत्रकार हैं, उनकी संतुलित प्रतिक्रिया वाकई बहुत राहत पहुंचाने वाली है। इसी ब्लॉग पर आई प्रतिक्रियाओं में से शिक्षण कार्य में लगे लोग, वास्तुकला विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं बड़ी ही स्वाभाविक हैं। मैं ऐसे तमाम लोगों का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने अमन का पैगाम दिया है। चंद सिरफिरे लोगों की बातों पर हम सब को ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

(यह पोस्ट लिखे जाने तक मुंबई में आतंकवादियों के खिलाफ सभी सुरक्षा एजेंसियों का संयुक्त आपरेशन जारी था। नरीमन हाउस में एनएसजी और आतंकवादियों में आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो चुकी थी,उम्मीद है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा।)



हालात को बयां करते कुछ चित्र
(http://ibnlive.com )

-आतंकवादी का चेहरा...किसने धकेला इनको इस राह पर


हमले के दौरान प्रसिद्ध ताज होटल के एक हिस्से में आग लग गई, शायद किसी आतंकवादी ने ग्रेनेड फेंका था




एनएसजी द्वारा मुक्त कराई गई विदेशी महिला खुशी के आंसू बहाती हुई


-पोजिशन संभाले हुए सुरक्षाकर्मी

इसमें चार तस्वीरे हैं। सबसे ऊपर मुंबई पुलिस का वाहन जिसे आतंकवादियों ने छीना और फिर कोलाबा में सरेआम गोलियां बरसाईं। घायल को ले जाता उसका साथी। ताज के बाहर मुंबई पुलिस का जमावड़ा। यह नक्शा बताता है कि मुंबई को कहां-कहां निशाना बनाया गया।

Thursday, November 27, 2008

स्सा..ले..नमक हराम...देशद्रोही...आतंकवादी

दिन बुधवार, रात 10.35...क्रिकेट मैच खत्म हो चुका है...भारत फिर किसी देश को हरा चुका है...टीवी पर फ्लैश – मुंबई पर आतंकवादी हमला... ...लीजिए भारत फिर हार गया...अपने ही लोग हैं...अपनों को ही निशाना बना रहे हैं।
एक जगह नहीं...कई – कई जगह गोलियां बरस रही हैं...ग्रेनेड फेंके जा रहे हैं...टीवी पर सब कुछ लाइव है...न्यूज चैनल वालों के लिए एक रिएलिटी शो से भी बड़ा आयोजन...ऐसा मौका फिर कब मिलेगा...पब्लिक से मदद मांगी जा रही है...आप हमें फोन पर हालात की जानकारी दीजिए...आप ही विडियो बना लें या फोटो खींच लें...हम आपके नाम से दिखाएंगे...पब्लिक में लाइव होने का क्रेज पैदा करने की कोशिश...सिटिजन जर्नलिस्ट के नाम पर ही सही...पब्लिक जितनी क्रेजी होती जाएगी...शो उतना ही कामयाब होगा और टीआरपी आसमान पर। अरे...अरे... ...विषय पर रहिए...भटक क्यों रहे हैं? चंदन को चिंता है...इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है। इराक बनाने की साजिश। सुरेश को...पूरी इकनॉमी खतरे में नजर आ रही है। राकेश को यह सब मुसलमानों की साजिश लग रही है...स्साले पाकिस्तान से मिले हुए हैं...नमकहरामी कर रहे हैं...। अरविंद आहत है...नहीं बे...चुनाव नजदीक है...यह सब बीज बोया जा रहा है...देखता नहीं आडवाणी ने फौरन पीएम से मांग रख दी न...मोहन तो और भी दूर की ले आया...यह सब असल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए है। पुलिस वाले भी मिले रहते हैं...स्साले सिक्युरिटी टाइट क्यों नहीं करते। अभी कई जगह बम फटे हैं...तब भी होश नहीं आया। हरामजादे मेटल डिटेक्टर ऐसे लगाए रखते हैं कि सारे आतंकवादी इसी के जरिए पकड़े जाएंगे? रहमान क्या बोले...निंदा तो करनी ही पड़ेगी...खुद को राष्ट्रवादी साबित करना होगा...सच्चा भारतीय मुसलमान बताना या दिखना पड़ेगा...नहीं तो अप्रत्यक्ष ही सही कटाक्ष तो सहने ही होंगे। बटला हाऊस एनकाउंटर के किंतु-परंतु पर चुप्पी साधनी होगी। ज्यादा बोले तो देशद्रोही...भाई साहब, मैं तो कहता हूं सारे मुल्ले एक जैसे ही होते हैं...चाहे कितना भी पढ़ लें। रहेंगे पाकिस्तानी...फौरन धर्म के ठेकेदार बन जाएंगे...

उपसंहार...
इस देश के खिलाफ साजिशों का अंत नहीं हो रहा है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार देर रात हुआ आतंकवादी हमला इसी साजिश का हिस्सा है। इस बार जिस तरह से हमले किए गए हैं, वह दरअसल एक तरह की गुरिल्ला वॉर जैसे लग रहे हैं। यानी आतंकवादियों ने जान की परवाह न कर तमाम ठिकानों पर हमले किए, बम फेंके और गोलियां चलाईं। इस सारी घटना का सबसे अफसोसनाक पहलू यह है कि इस आतंकवादी हमले में महाराष्ट्र के एंटी टेररिस्ट स्कवैड के चीफ हेमंत करकरे भी मारे गए। हेमंत मालेगांव बम ब्लास्ट की जांच कर रहे थे, जिन्होंने लेफ्टिनेंट पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा, स्वामी अवधेशानंद और अन्य लोगों की गिरफ्तारियां की थीं। जब मैं यह पोस्ट लिखने बैठा थ, उसी समय आईबीएन लाइव पर इसका फ्लैश आया था।
पता नहीं गुरुवार को क्या होगा। मुंबई से रात में ही एक रिश्तेदार का फोन आया। उनकी आवाज नहीं निकल रही थी, ज्यादातर लोगों को अब क्रिया की प्रतिक्रिया यानी दंगों का डर सता रहा है। उनका कहना था कि जुलाई में मुंबई में जब लोकल ट्रेनों को निशाना बनाया गया था, उस वक्त तक हालात इतने बदतर नहीं थे, जितने आज हैं। ऊपर मैंने जिन बातों को बयान किया है...दरअसल, देश के किसी भी हिस्से में बम ब्लास्ट या इस तरह की आतंकवादी घटना के बाद होने वाली प्रतिक्रियाएं हैं जो आपको आपके आसपास ही मिल जाती हैं। यह उसी का चित्रण है। इसे आप लोग किस रूप में या क्या नाम देते हैं...मैं नहीं जानता। क्योंकि न यह लेख है और न ही कोई कविता। क्या इसे समय का दस्तावेज कहा जाए?
मुंबई की आतंकवादी घटना से जुड़े फोटो। ये सभी फोटो http://ibnlive.com से साभार सहित लिए गए हैं।


एटीएस चीफ हेमंत करकरे


कोलाबा में मारा गया आम आदमी


गोली से घायल जख्मी युवक अपनी चोट दिखाता हुआ


कोलाबा में एक और लाश मिली...आम इंसान की


मुंबई में हमले के फौरन बाद होटल ताज की ओर बढ़ती मुंबई पुलिस

Sunday, November 23, 2008

हमारा धर्म है झूठ बोलना


कोई नेता जब सत्ता हासिल करने के लिए पहला कदम बढ़ाता है तो उसकी शुरुआत झूठ से होती है। हर बार चुनाव में यही सब होता है और देश चुपचाप यह सब होते हुए देखता है। चुनाव आयोग एक सीमा तक अपनी जिम्मेदारी निभाकर चुप हो जाता है। यहां पर हम बात उन प्रत्याशियों की कर रहे हैं जो दलितों की मसीहा पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से टिकट हासिल कर चुनाव मैदान में उतरे हैं। बात देश की राजधानी दिल्ली की ही हो रही है।
दिल्ली के महरौली विधानसभा क्षेत्र से कोई वेद प्रकाश हैं जिनके पास 201 करोड़ की संपत्ति है। यह बात उन्होंने चुनाव आयोग में जमा कराए गए हलफनामे में कही है। दूसरे नंबर पर बीएसपी के ही छतरपुर (दिल्ली) विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी कंवर सिंह तंवर हैं जिनके पास 157 करोड़ की संपत्ति है। इसके अलावा दिल्ली में कम से कम उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके पास एक करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है। चुनाव आयोग के पास जमा यह सब दस्तावेजों में दर्ज है। यह सभी 153 प्रत्याशी बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी के ही हैं। सिर्फ पांच प्रत्याशी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी संपत्ति शून्य (जीरो) दिखाई है।
लेकिन इनमें से जिन वेद प्रकाश का जिक्र यहां किया गया है, दरअसल वह उनकी एक ही संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा है। यानी संपत्ति इससे कहीं ज्यादा है। यही हाल दूसरे नंबर के कंवर सिंह का है। यह सभी लोग प्रॉपर्टी के धंधे से जुड़े हुए हैं। संसद या विधानसभा में कैसे लोग चुनकर भेजे जाएं, इस पर काफी कुछ लिखा और पढ़ा जा चुका है। लेकिन यह सब चुनाव तक ही सीमित रहता है औऱ भूलने की आदत की गुलाम भारतीय मानस सब कुछ बिसरा देता है और फिर पूरे पांच साल हम लोग रोना रोते हैं कि हमारा एमपी या एमएलए यह नहीं कर रहा और वह नहीं कर रहा।
यहां हम कांग्रेस की बात नहीं करेंगे, क्योंकि जिस पार्टी ने भ्रष्ट संस्कृति को फैलाने में कोई कसर नहीं रखी, उसकी बात क्या की जाए। हां, हम उन दोनों पार्टियों बीजेपी और बीएसपी की बात जरूर करेंगे जो केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने की तरफ तेजी से बढ़ रही हैं।
बीजेपी के दिग्गज प्रमोद महाजन की हत्या के बाद इस पार्टी के रणनीतिकर अब अरुण जेटली हैं। वह आडवाणी से भी बड़े रणनीतिकार माने जाते हैं, वकील हैं। अभी जब बीजेपी दिल्ली के टिकट बांट रही थी तो एक ओ. पी. शर्मा उर्फ ओमी नामक व्यक्ति को विश्वासनगर विधानसभा क्षेत्र से टिकट मिला। इनकी खासियत यह है कि यह साहब जेटली के पीए हैं और दिल्ली और एनसीआर में इनके ४० से ज्यादा शोरूम हैं। इनके टिकट पर बीजेपी में विद्रोह हो गया। विद्रोहियों ने एक श्वेत पत्र जारी कर सारी कहानी बीजेपी आलाकमान तक पहुंचाई। जिसमें साफ-साफ लिखा गया कि किसी भी राज्य में चुनाव जब होता है तो उस चुनाव के बाद ओमी का एक शोरूम एनसीआर या दिल्ली में खुल जाता है। यहां एनसीआर से मतलब है दिल्ली के आसपास के शहर जिसमें गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद शामिल हैं। बहरहाल, विद्रोहियों की एक नहीं सुनी गई और ओमी को टिकट दे दी गई।
इस लघु कथा के बाद क्या यह सवाल बाकी रह जाता है कि ऐसे लोग जब विधानसभा या लोकसभा में पहुंचेंगे तो किन नीतियों को लागू करेंगे और किस ऐजेंडे पर काम करेंगे। जिस पार्टी ने राजीव गांधी को भ्रष्ट साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिसने सोनिया गांधी के स्विस बैंक खाते का आरोप लगाया। यह उस पार्टी का हाल है जो राजनीति में ईमानदारी, शुचिता और समरसता की बात करती है। अभी आडवाणी ने देश के दिग्गज उद्योगपतियों की एक बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने यह जाना कि देश के आर्थिक हालात क्या हैं। मतलब कि जब तक उद्योगपति नहीं बताएगा कि देश के आर्थिक हालात क्या हैं, एक राष्ट्रीय पार्टी को समझ में नहीं आएगा। यानी हम उद्योगपतियों के चश्मे से देश की हालत जानना चाहते हैं। जरा इसका औऱ बारीक विश्लेषण करें। छह महीने बाद लोकसभा चुनाव होंगे, उद्योगपतियों को भी यह बात पता है। संदेश क्या है- मतलब तुम हमारा चश्मा पहनो और हम तुम्हारा चश्मा पहने। देश की तरक्की तेजी से होगी। अब बताइए इसमें भारत का आम मतदाता कहां आता है। उसने तो सारी ताकत किसी आडवाणी, किसी सोनिया गांधी, किसी मुलायम सिंह या मायावती को दे दी है, वे अपना-अपना चश्मा लगाकर उद्योगपतियों से चाहे जितनी बार चश्मा बदलें। इन्हीं तमाम नामों में से किसी एक की पार्टी को सत्ता में आना है।
इसीलिए झूठ से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले कभी देश या यहां के आम आदमी के बारे में नहीं सोच सकते। इन लोगों ने बड़ी चालाकी से तमाम तरह की चीजों में हम लोगों को उलझा दिया है औऱ हम लोग मरने-मारने पर उतारू हैं। पता नहीं कब लोग इन चालाकियों को समझेंगे।

हिंदी वाणी – यूसुफ किरमानी

Thursday, November 20, 2008

नेता का बेटा नेता बने, इसमें समस्या है


-स्वतंत्र जैन
ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस में तूफान आया हुआ है। आरोप है कि पार्टी में टिकट बेचे गए हैं। आरोप पार्टी की ही एक महासचिव ने लगाया है। इस पूरे विवाद पर गौर करें तो इसमे दो छोर साफ नजर आते हैं। एक तरफ आधुनिकता है तो दूसरी तरफ परंपरावादी। एक तरफ भारतीय पॉलटिक्स के ओल्ड गार्ड हैं तो दूसरी तरफ युवा नेता। जमे जमाए और खुर्राट नेता जहां यह कह रहे हैं कि 'जब डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और वकील का बेटा वकील बन सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं हो सकता, तो राहुल गांधी जैसे युवा नेता कह रहे हैं पॉलटिक्स में एंट्री कैसे हो इसका भी एक तरीका होना चाहिए।

नेता का बेटा नेता बने इसमें किसी को क्या बुराई हो सकती है, आखिर जार्ज बुश सीनियर के पुत्र जार्ज बुश जूनियर भी तो आठ साल तक लोकतंत्र के मक्का माने जाने वाले अमेरिका के प्रेसीडेंट रहे। पर इस स्टेटमेंट में जो बात झलकती उससे वंशवाद की बू आती है, कि नेतागीरी पर पहला हक नेता के बेटे का है। यह वही वंशवाद की बीमारी है जिसका आरोप कभी कांग्रेस पर लगा करता था और जो अब महामारी बनकर लगभग हर पार्टी को अपनी चपेट में ले चुकी है।

नेता का बेटा नेतागीरी पर अपना हक समझे यह अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है और इसके कारण हमारी राजनीतिक प्रणाली, सामाजिक प्रणाली, हमारी शासन प्रणाली और हमारे संविधान में ही निहित हैं।

सबसे पहले राजनीतिक प्रणाली की बात करते हैं। आज के भारत में नेता बनने की राह सामान्यता किसी आंदोलन या चमत्कारिक नेतृत्व और बौद्धिक क्षमता से होकर नहीं गुजरती। कोई शैक्षिक योग्यता, कोई डिग्री भी आवश्यक नहीं है। इसके लिए सामान्यता जो रास्ता अपनाया जाता है वो कुछ इस प्रकार है - किसी पार्टी में कार्यकर्ता बन जिले अथवा राज्य स्तर पर कोई पद प्राप्त करना। चुनाव के समय पार्टी से टिकट पाने का प्रयास करना। जीत जाने पर लोकसभा, विधानसभा या राज्यसभा का सदस्य बनकर जोड़तोड़, जुगाड़ से मलाईवाला मंत्रालय हथिया कर सत्ता सुख भोगते हुए जनता की सेवा करना।

इस पूरी प्रक्रिया में जो चीजें सबसे महत्वूपर्ण है वह है -पार्टी में पद, प्रभाव और टिकट की भूमिका। ये सभी चीजें किसी कार्यकर्ता को तभी नसीब होती हैं जब उसे किसी नेता का वरद्हस्त प्राप्त हो। अन्यथा वह जीवनभर कार्यकर्ता ही बना रह जाता है, चुनाव लडऩे का मौका भी उसे कभी नहीं मिलता। यहीं पर राजनीति अन्य प्रोफशनों से अलग हो जाती है। नेता पुत्र या रिश्तेदार के होते हुए किसी कार्यकर्ता को नेता आर्शीवाद मिल जाए, भारतीय राजनीति में यह बेहद टेढ़ी खीर साबित हो चुका है। भारत के सारे राजनीतिक दल इसके गवाह हैं। राहुल गांधी ने भी माना है कि राजनीति में एंट्री का कोई प्रोसीजर न होने के कारण कनेक्शन बड़ी भूमिका निभाते हैं।

इस बात को कुछ विस्तार से इस प्रकार समझा जा सकता है। नेताओं की तरह कोई डॉक्टर या वकील अपने को बेटे न तो आवश्यक डिग्री दिला सकता है और न ही प्रोफेशनल प्रभाव और सम्मान। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को खुद ही प्रयास करना होता है।

दूसरा है इनके काम के स्वरूप में अंतर। नेता अपनी जिम्मेदारी निभाने के क्रम में सार्वजनिक संसाधनों का नियंत्रण और वितरण करता है जबकि वकील, डॉक्टर या व्यापारी अपने संसाधनों पर निर्भर होते हैं। नेताओं के निर्णय सार्वजनिक हित को, देश के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं, जबकि वकील या व्यापारी के निर्णय उनको खुद ही बनाते अथवा बिगाड़ते हैं। वे सफल होते हैं तो सरकार उनसे ज्यादा टैक्स लेती है और असफल होते हैं तो सरकार उन्हें उनके हाल पर छोड़ देती है। नेताओं के हाथ में जहां पूरे लोकतंत्र की बागडोर होती है पर वकील, डॉक्टर या व्यापारी की भूमिका सामान्यता वोटर से ज्यादा नहीं होती।

और इनमें सबसे बड़ा अंतर यह है कि नेता कर्म एक सेवा कर्म है कोई व्यवसाय या प्रोफेशन नहीं। इसीलिए नेता अपने वोटरों, अपने चुनाव क्षेत्र, अपनी पार्टी, अपने मंत्रालय, अपने देश के प्रतिनिधि होते हैं। सार्वजनिक हित, देश हित उनकी जिम्मेदारी होती है। जबकि वकील, डॉक्टर या फिर व्यापारी सिर्फ अपने और अधिक से अधिक अपने व्यवसाय या कंपनी के प्रतिनिधि होते हैं और उनका हित ही उनकी जिम्मेदारी होती है। नेता जनता के लिए और जनता द्वारा चुने जाते हैं इसलिए उन्हें अगर जनता से अधिक सम्मान मिलता है तो उनसे सार्वजनिक मर्यादाओं, कानूनों और अपेक्षाओं पर खरा उतरने की अधिक उम्मीद भी की जाती है।

इसीलिए वकील का बेटा वकील बने इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि यहां कोई सार्वजनिक हित दांव पर नहीं है। पर नेता का बेटा नेता बने तो यही बात नहीं कही जा सकती है। सवाल उस सोच का है जिसके अंतर्गत नेता का बेटा नेतागीरी पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, जो वकील या डॉक्टर का बेटा कभी नहीं समझता।

'नेता का बेटा नेता बने इस सोच का स्वभाविक विस्तार होगा कि किसान का बेटा किसान और मजदूर का बेटा मजदूर रहे। इस तरह यह विचार परिवर्तन के खिलाफ है और चूंकि जनता के चुनाव के दायरे को काफी हद तक नेतापुत्र तक ही सीमित करता है इसलिए अलोकतांत्रिक भी। फिर यह सोच जन्मगत अधिकार की बात करती है, जो कि एक तरह से जातिवाद का सिद्धांत: समर्थन है, इसलिए असंवैधानिक भी। क्या भारत के राजनेता पुत्रमोह में संविधान और लोकतंत्र सब कुछ ताक पर रख देना चाहते हैं ? ये नेता स्वयं क्यों कुछ नहीं बदलना चाहते, क्या सब कुछ ओबामा ही बदल देगा।

Sunday, November 16, 2008

जिंदा होता हुआ एक मशीनी शहर

मशीनी शहर फरीदाबाद वैसे तो किसी परिचय का मोहताज नहीं है लेकिन जो लोग पहली बार इसके बारे में पढ़ेंगे उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह हरियाणा राज्य का तेजी से विकसित होता हुआ शहर है। यह दिल्ली से सटा हुआ है और यहां सिर्फ कल-कारखाने हैं। यह शहर दरअसल खुद में मिनी इंडिया है, जहां देश के कोने-कोने से आए लोग पुरसूकुन जिंदगी गुजारते हैं। नफरत की जो आंधियां बाकी शहरों में चलती हैं, वह यहां से कोसों दूर है। मेरी तमाम यादें इस शहर से जुड़ी हुई हैं। लंबे अर्से से इस शहर की साहित्यिक गतिविधियों की चर्चा कहीं सुनाई देती थी। हाल ही में जब मुझे कथाकार हरेराम समीप उर्फ नीमा का फोन आया कि अदबी संगम को फिर से जिंदा किया जा रहा है तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अदबी संगम वह संस्था रही है जिसके जरिए मैंने साहित्य को नजदीक से जाना। आज से लगभग 15-20 साल पहले फरीदाबाद में साहित्यिक गतिविधियां चरम पर थीं। शायरों में खामोश सरहदी, अंजुम जैदी, हीरानंद सोज, डॉ. जावेद वशिष्ठ, ओम प्रकाश लागर, ओमकृष्ण राहत, के. के. बहल उर्फ केवल फरीदाबादी, उर्दू कहानी लेखकों में बड़ा नाम सतीश बत्रा, पंजाबी में तारा सिंह कोमल, सुभेग सदर, हिंदी में ज्योति संग और दीगर लोगों ने इस मुहिम को अंजाम तक पहुंचा दिया था। (हो सकता है कुछ नाम मुझसे छूट गए हों, इसकी मैं माफी चाहता हूं) इसी के चलते हरियाणा उर्दू अकादमी का दफ्तर फरीदाबाद में खुला और फिर राजनीति का शिकार होकर पंचकूला चला गया। बाद में खामोश सरहदी, लागर, सतीश बत्रा, तारा सिंह कोमल की मौत और कुछ लोगों के इस शहर से चले जाने की वजह से सारी गतिविधियों पर लगाम लग गई।
हरेराम समीप ने बताया था कि न सिर्फ अदबी संगम को फिर से जिंदा किया जा रहा है बल्कि सभी साहित्यिक संस्थाओं को इसमें बुलाया गया है और तीन किताबों का विमोचन भी किया जा रहा है। ये थीं अंजुम जैदी, केवल फरीदाबादी और सुभेग सदर की किताबें। बहरहाल, अदबी संगम का यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा और इस मशीनी शहर में उम्मीद की नई रोशनी छोड़ गया है। इसके फौरन बाद कुछ अन्य साहित्यिक संस्थाओं ने भी फरीदाबाद में इस तरह का कार्यक्रम करने की घोषणा कर डाली है जो यकीनन एक अच्छा संकेत है।
इनमें केवल फरीदाबाद वह छिपा हुआ नाम है जिसकी रहनुमाई में फरीदाबाद की साहित्यिक गतिविधियां चलती रहीं। वह एक कंपनी में उच्च पद पर थे, इसलिए पैसे से जेब खाली वाली साहित्यिक संस्थाओं के वही सबसे बड़े पालनहार थे। अब वह रिटायर हैं लेकिन इस मोर्चे पर उनकी वही अप्रोच है। उनकी किताब बोलते लम्हे जो अब भी मैं पढ़ रहा हूं, दरअसल जिंदगी का दस्तावेज है। भारत-पाकिस्तान के नापाक बंटवारे के बाद जो रिफ्यूजी उजड़कर भारत में आए, उनमें से एक बड़ी तादाद फरीदाबाद में बसती है। उनकी शायरी में इसका दर्द जाने-अनजाने झलकता है। यहां मैं उनकी कुछ गजल पेश करूंगा और आगे भी जब मौका मिलेगा तो इस ब्लॉग पर आपको उनकी अन्य गजलों और नज्मों से रूबरू कराउंगा।
अंजुम जैदी ने कर्बला में एक तानाशाह के खिलाफ इमाम हुसैन (पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे) की जंग को जिस अंदाज में कलमबंद किया है, वह दरअसल उर्दू साहित्यिक के उच्च मानदंड स्थापित करने वाली किताबों में से है। जहां तक मुझे याद है यह उनकी तीसरी किताब है लेकिन उनकी हर किताब एक से बढ़कर एक साबित हुई है। तीसरी किताब कर्बला - मोहसिने इंसानियत दरअसल मुसद्दस की शक्ल में है। इस ब्लॉग पर शीघ्र ही उनकी अन्य रचनाओं को सामने लाने की मेरी कोशिश रहेगी। हालांकि सुभेग सदर की किताब पर भी मैं कुछ लिखना चाहता था लेकिन दफ्तर की भागमभाग में मुझे न उनकी किताब मिली और न ही मैं उसको प्राप्त कर सका। लेकिन सुभेग सदर से भी रूबरू का मौका हम लोगों को मिलेगा।

इन तीनों हस्तियों के बारे में मैने यहां बहुत संक्षेप में लिखा है। क्योंकि ब्लॉग पर लंबी बात लोग पढ़ने को तैयार नहीं होते इसलिए इसे यहीं पर खत्म करके उन दोनों शायरों के कुछ अशार आपकी खिदमत में पेश करता हूं।

अंजुम जैदी

इंतजार का सूरज
सूरज न हो तो वक्त का एहसास ही न हो
सूरज न हो तो लब पे कभी प्यास ही न हो
सूरज न हो तो फूलों में ये बास ही न हो
सूरज न हो तो सुबह की फिर आस ही न हो
सूरज न हो तो गरदिशे शामो सहर न हो
सूरज न हो तो जीस्त किसी की बसर न हो।
सूरज न हो तो तीरगी ही तीरगी रहे
सूरज न हो तो जुल्मते शब ही बनी रहे
तारों में ज़ौ न चांद में ताबंदगी रहे
मंजर कोई न आंखों में फिर रोशनी रहे
दुनिया में कुछ सुझाई न दे रात के सिवा
हाथ आए कुछ न चादरे जुल्मात के सिवा।
जादा कोई न फिर कोई मंजिल नसीब हो
तूफान में किसी को न साहिल नसीब हो
राहत सुकून चैन न दिल को नसीब हो
जद्दो जेहद का कोई न हासिल नसीब हो
फरियादो अलमदद की सदा गूंजती रहे
कानों में सायं-सायं हवा गूंजती रहे।

...

सब कुछ है मगर दीन का चर्चा ही नहीं है
रौशन हों दिये लाख उजाला ही नहीं है

...
हमारी जिंदगी है रहबरे मंजिल निशां बनकर
हमें जीना नहीं आता ग़ोबारे कारवां बनकर
हमी ने जहल की तारीकियों में रहबरी की है
जेहादे इल्म की तहरीक के रूहे रवां बनकर
अलम इंसानियत का लेकर हर साहिल से गुजरे हैं
कभी तूफान की सूरत कभी मौजे रवां बनकर
चमनजारों से गुजरे दर्से तंजीमे चमन देते
बयाबानों में पहुंचे हैं तो हुस्ने गुलिस्तां बनकर

के . के. बहल उर्फ केवल फरीदाबादी
(बहल साहब की यह गजल मुझे बेहद पसंद है)

कौन रोकेगा ज़माने को सितम ढाने से
बाज़ आए नहीं ज़ालिम कभी समझाने से
रंग तो एक ही होता है लहू का यारो
चाहे काबा से बहे या किसी बुतखाने से
करबला का यह सबक आज के कातिल सीखें
जुर्म तो जुर्म है मिटता नहीं पछताने से
दर्दो गम रंजो अलम लुत्फो मुहब्बत क्या है
बात यह पूछ ले हमदम किसी दीवाने से
कोई दीवाना हुआ या कोई दिल टूटा है
फिर जो आई सदा नज्द के वीराने से
कुर्बे मुर्शिद से मुझे रब्ते खुदा हासिल है
मैं पलट आया हूं मस्जिद से सनमखाने से
दोस्त भी सुनते नहीं दिल पे जो गुजरी केवल
हाले दिल कौन कहे फिर किसी बेगाने से

कुछ और शेर देखिए

सब के दिल में अगर खुदा होता
खून बंदों का क्यों बहा होता
...
यह तो इक काफिरों की बस्ती थी
किसने पहली अजान दी होगी

...
रहम की तहजीब से रौशन रहे हैं ये मकां
किस को होगा बैर ईसा की सनागाहों के साथ
...
अजनबी चेहरे थे कोई आशना चेहरा न था
ऐसा लगता था कि कोई शहर में मेरा न था

अदबी संगम के कार्यक्रम में मौजूद बाएं से शायर केवल फरीदाबादी और अंजुम जैदी


हिंदी वाणी – यूसुफ किरमानी

Thursday, November 13, 2008

जिंदगी की दास्तां कैसे लिखें



इधर कई दिनों से लिखने की बजाय मैं पढ़ रहा था। खासकर गजलें और कविताएं। यहीं आपके तमाम ब्लॉगों पर। मैं मानता हूं कि तमाम बड़े-बड़े लेख वह काम नहीं कर पाते जो किसी शायर या कवि की चार लाइनें कर देती हैं। समसामयिक विषयों पर कलम चलाने वाले कृपया मेरी इस बात से नाराज न हों। क्योंकि इससे उनकी लेखनी का महत्व कम नहीं हो जाता। लेकिन यकीन मानिए की गजल या कविता से आप सीधे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। आपको लगता है कि यह शायर की यह बात आपकी गजल को कहीं छू गई।
गजल और कविता के ब्लॉगों की सर्फिंग के दौरान एक बात जो मैंने खासतौर से महसूस की कि शायरों की एक बड़ी जमात मौजूदा दौर के हालात पर बेबाकी से अपनी कलम चला रही लेकिन उसकी तुलना में हिंदी में यह काम जरा कम ही हो रहा है। मैं यहां हास्य के नाम पर मंच पर फूहड़ कविताई करने वालों की बात नहीं कर रहा जो दिहाड़ी के हिसाब से किसी भी विषय पर कुछ भी लिख मारते हैं।
उम्मीद है कि इससे अगली पोस्ट में मैं दो ऐसे शायरों से आपका परिचय कराऊं जो बेहद खामोशी से अपने रचना संसार में लगे हुए हैं। हाल ही में इनकी दो पुस्तकों का विमोचन भी हुआ, जिसके बहाने मुझे इनके बारे में और जानने का मौका मिला। लेकिन आज यहां जिन लोगों की गजल और कवितो को मैं आपके लिए पेश करना चाहता हूं, उन्हें पढ़ने के बाद आप कहेंगे कि ऐसे शायरों और कवियों तक सभी को पहुंचना चाहिए।
जिन शायरों या कवियों को मैंने ब्लॉगों पर पढ़ा है, हो सकता है कि उनमें से बहुतों की रचनाएं आपकी नजर से गुजरी हुई हों। लेकिन यहां मैं उनको दोबारा से इसलिए पेश करना चाहता हूं कि वे लोग जो उन शायरों या कवियों के ब्लॉगों पर नहीं गए हैं, वे वहां जाएं। मेरा खासकर निवेदन उन साथियों से है जो भारत से बाहर रह रहे हैं और उनमें अपने वतन के लिए कुछ जज्बात बाकी हैं।
जिनसे आजकल मैं बहुत ज्यादा प्रभावित हूं, उनका नाम है – डॉ. अमर ज्योति। इससे ज्यादा मैं उनके बारे में और नहीं जानते। उनके ब्लॉग तक पहुंचा भी अपने ही ब्लॉग के जरिए और जब उनकी रचनाएं पढ़ीं तो लगा कि बस पढ़ते ही जाएं...



डॉ. अमर ज्योति की कलम से

दास्तां कैसे लिखें

धूल को चंदन, ज़मीं को आसमाँ कैसे लिखें?
मरघटों में ज़िंदगी की दास्तां कैसे लिखें?


खेत में बचपन से खुरपी फावड़े से खेलती,
उँगलियों से खू़न छलके तो हिना कैसे लिखें?


हर गली से आ रही हो जब धमाकों की सदा,
बाँसुरी कैसे लिखें; शहनाइयां कैसे लिखें?

कुछ मेहरबानों के हाथों कल ये बस्ती जल गई;
इस धुएँ को घर के चूल्हे का धुआँ कैसे लिखें?

रहज़नों से तेरी हमदर्दी का चरचा आम है;
मीर जाफर! तुझको मीर-ऐ-कारवाँ कैसे लिखें?



मीडिया को तो कहानी चाहिए
राम जी से लौ लगानी चाहिए;
और फिर बस्ती जलानी चाहिए।

उसकी हमदर्दी के झांसे में न आ;
मीडिया को तो कहानी चाहिए।

तू अधर की प्यास चुम्बन से बुझा;
मेरे खेतों को तो पानी चाहिए।

काफिला भटका है रेगिस्तान में;
उनको दरिया की रवानी चाहिए।

लंपटों के दूत हैं सारे कहार,
अब तो डोली ख़ुद उठानी चाहिए।

कैसा सन्नाटा है जिंदान की तन्हाई में

टूटते सपनों की ताबीर से बातें करिये,
जिंदगी भर उसी तसवीर से बातें करिये।
कैसा सन्नाटा है ज़िन्दान की तनहाई में,
तौक़ से, पाँव की ज़न्जीर से बातें करिये।


सर उठाने लगे हिटलर के नवासों के गिरोह,
अब कलम से नहीं, शमशीर से बातें करिये।


दिल के बहलाने को तिनकों से उलझते रहिये,
बात करनी है तो शहतीर से बातें करिये।


पाँव के छाले मुक़द्दर को सदा देते हैं;
हौसला कहता है तदबीर से बातें करिये।

नीरज गोस्वामी की कलम से

खौफ का खंजर

ख़ौफ़ का ख़ंज़र जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आजकल इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ

साथियो ! गर चाहते हैं आप ख़ुश रहना सदा
लीजिए फिर हाथ में जो काम है छूटा हुआ

दीन की , ईमान की बातें न समझाओ उसे
रोटियों में यारो ! जिसका ध्यान है अटका हुआ

फूल ही बिकता हैं यारो हाट में बाजार में
क्या कभी तुमने सुना है ख़ार का सौदा हुआ

झूठ सीना तान कर चलता हुआ मिलता है अब
हाँ, यहाँ सच दिख रहा है काँपता-डरता हुआ

अपनी बद-हाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िये
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ

तजरिबों से जो मिला हमने लिखा ‘नीरज’ वही
आप की बातें कहाँ हैं, आप को धोखा हुआ


लेकिन नीरज की इस गजल को उनके ब्लॉग पर टिप्पणीकार अल्तमश ने कुछ सुधार कर पेश किया है, जिसे आप भी पढ़ें। अल्तमश आपके इस ब्लॉग पर भी विभिन्न विषयों पर टिप्पणी कर चुके हैं। पेश है अल्तमश की कलम से नीरज गोस्वामी की सुधरी हुई गजल-

खौफ का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आजका इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ।
चाहते हैं आप खुश रहना अगर, तो लीजिये,
हाथ में वो काम जो मुद्दत से है छूटा हुआ।
दीनो-ईमाँ की नसीहत उस से है करना फुजूल,
जिसका दिल दो वक़्त की रोटी में है अटका हुआ।
फूल की खुशबू ही तय करती है उसकी कीमतें,
क्या कभी तुमने सुना है, खार का सौदा हुआ।
झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब,
सच तो बेचारा है दुबका, कांपता डरता हुआ।
तजरबों से जो मिला हमने लिखा नीरज वही,
हम-ज़बां हैं आप मेरे, ये बहुत अच्छा हुआ।


बाकी शायरों व कवियों के बारे में जल्द ही।