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Sunday, November 30, 2008

मुंबई हमले के लिए अमेरिका जिम्मेदार ?

सुनने में यह जुमला थोड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह जुमला मेरा नहीं है बल्कि अमेरिका में सबसे लोकप्रिय और भारतीय मूल के अध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा का है। दीपक चोपड़ा ने कल सीएनएन न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में यह बात कही है। उस इंटरव्यू का विडियो मैं इस ब्लॉग के पाठकों के लिए पेश कर रहा हूं। निवेदन यही है कि पूरा इंटरव्यू कृपया ध्यान से सुनें।
अंग्रेजी में इस इंटरव्यू का मुख्य सार यह है कि जब से अमेरिका ने इराक सहित तमाम मुस्लिम देशों के खिलाफ आतंकवाद के नाम पर हमला बोला है तबसे इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। अमेरिका आतंकवाद को दो तरह से फलने फूलने दे रहा है – एक तो वह अप्रत्यक्ष रूप से तमाम आतंकवादी संगठनों की फंडिंग करता है। यह पैसा अमेरिकी डॉलर से पेट्रो डॉलर बनता है और पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब, इराक, फिलिस्तीन समेत कई देशों में पहुंचता है। दूसरे वह आतंकवाद फैलने से रोकने की आड़ में तमाम मुस्लिम देशों को जिस तरह युद्ध में धकेल दे रहा है, उससे भी आतंकवादियों की फसल तैयार हो रही है। दीपक चोपड़ा का कहना है कि पूरी दुनिया में मुसलमान कुल आबादी का 25 फीसदी हैं, जिस तरह अमेरिका के नेतृत्व में उनको अलग-थलग करने की कार्रवाई चल रही है, उससे आतंकवाद और बढ़ेगा, कम नहीं होगा। दीपक चोपड़ा पाकिस्तान और कश्मीर पर भी बोले हैं, वह आप खुद ही सुनकर जान लें तो बेहतर है। मैं उसे यहां लिखना नहीं चाहता।
दीपक चोपड़ा की इन बातों से आप सहमत हों या न हों लेकिन मैं इतना बता दूं कि अमेरिकी मानस में यह सोच घर करती जा रही है। हाल ही में जब बाराक ओबामा जब अपने प्रचार में जुटे थे तो उन्हें कई कड़वी सच्चाइयों का सामना करना पड़ा था। जिसमें सबसे खास यह था कि अमेरिकी चाहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का जो हौवा अमेरिका यानी जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने खड़ा किया है और जिसकी वजह से आज पूरी दक्षिण पूर्व एशिया में अशांति फैली है, वह नीति वापस ली जानी चाहिए। मुस्लिम देशों के खिलाफ जो घृणा का माहौल फैलाया जा रहा है, वह फौरन बंद किया जाना चाहिए।
अमेरिका की एक प्रतिष्ठा पत्रिका काउंटर पंच में जाने-माने लेखक और राजनीतिक विश्लेषक तारिक अली का एक लेख मुंबई में किए गए हमले पर प्रकाशित हुआ है। उस लेख को मैं यहां आप लोगों के लिए अंग्रेजी में पेश कर रहा हूं। इस लेख में कही गई बातें भी अध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा से मिलती हैं। तारिक अली ने यह भी लिखा है कि गुजरात में मोदी की सरकार ने जो कुछ भी किया, उससे भी आतंकवाद की फसल पैदा हो रही है। तमाम दंगों में जो मुस्लिम परिवार प्रभावित हुए हैं, उनके घरों के बच्चे भी आतंकवाद के रास्ते पर कदम रख चुके हैं। तारिक अली की हाल ही में आई पुस्तक द ड्यूल पाकिस्तान काफी चर्चित हो रही है। जिसमें कहा गया है कि अमेरिका का अंधा समर्थन कर पाकिस्तान को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। वहां आतंकवाद की जड़े भारत के मुकाबले कई गुना गहरी हैं और एक दिन वह पाकिस्तान नामक देश को खत्म कर देंगी।
तारिक अली का मुंबई के संदर्भ वाला पूरा लेख तो आप नीचे की पोस्ट में खैर अंग्रेजी में पढ़ ही लेंगे लेकिन यहां मुझे इस्राइल और फिलिस्तीन में चल रहे संघर्ष की याद आती है। फिलिस्तीन में आज हर बच्चा इस्राइल के खिलाफ बंदूक उठाने को तैयार रहता है। यही वजह है कि वहां के चर्चित आतंकवादी संगठन हमास जो कई देशों में प्रतिबंधित है, की सरकार बन गई। यानी वहां के लोगों ने उन्हें चुना। कुल मिलाकर आतंकवाद के कई पहलू हैं और इस समस्या को समग्र रूप से और बहुत संजीदा तरीके से देखना होगा।
पेश है दीपक चोपड़ा का विडियो और तारिक अली का अंग्रेजी में लेख ठीक नीचे वाली पोस्ट में -



Transcript

Chopra: What we have seen in Mumbai has been brewing for a long time, and the war on terrorism and the attack on Iraq compounded the situation. What we call "collateral damage" and going after the wrong people actually turns moderates into extremists, and that inflammation then gets organized and appears as this disaster in Bombay. Now the worst thing that could happen is there's a backlash on the Muslims from the fundamental Hindus in India, which then will perpetuate the problem. Inflammation will create more inflammation.

CNN: Let me jump in on that because you're presuming something very important, which is that it's Muslims who have carried out these attacks and, in some cases, with Washington in their sights.

Chopra: Ultimately the message is always toward Washington because it's also the perception that Washington, in their way, directly or indirectly funds both sides of the war on terror. They fund our side, then our petrol dollars going to Saudi Arabia through Pakistan and ultimately these terrorist groups, which are very organized. You know Jonathan, it takes a lot of money to do this. It takes a lot of organization to do this. Where's the money coming from, you know? The money is coming from the vested interests. I'm not talking about conspiracy theories, but what happens is, our policies, our foreign policies, actually perpetuate this problem. Because, you know, 25% of the world's population is Muslim and they're the fastest growing segment of the population of the world. The more we alienate the Muslim population, the more the moderates are likely to become extremists.


अगर इस विडियो को देखने या सुनने में दिक्कत हो तो इस लिंक पर जाएं -

http://video.google.com/videoplay?docid=-7260048132372687964&hl=en

'If You Go After the Wrong People, You Convert Moderates into Extremists' http://www.alternet.org/audits/108974/mumbai_attacks


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13 comments:

varun jaiswal said...

युसुफ जी आप मुसलमानो ने वैचारिक तौर पर दुनिया से खुद को अलग-थलग किया है,हो सकता है कि अमेरिका ऐसा कर रहा हो पर राष्ट्रवाद और इस्लाम एक राह पर पर तभी चलेंगे जब आप क़ुरान के इतर भी जाने की हिम्मत जुटा पाएँगे | मुसलमान भी इंसान होता है उसे एक मध्यकालीन विचारधारा मे क्यों क़ैद करते हो |

नयनसुख said...

"गुजरात में मोदी की सरकार ने जो कुछ भी किया, उससे भी आतंकवाद की फसल पैदा हो रही है"

यदि आप उसने वो किया इसलिये इसने हथियार उठाये की थ्योरी लगाते हैं तो इतनी सारी आतंकवादी घटनाओं के बाद हिन्दुओं को अपने हाथों में हथियार उठा लेने चाहिये थे.
आप गलत है श्री यूसुफ किरमानी,

और आप अमेरिका को अफगानिस्तान पर हमले का दोषी बताते हैं तो बताईये कि अमेरिका ने हमला क्यों बोला? क्या वह 9/11 का वार सहकर चुपचाप बैठ जाता और बार बार हमले सहता रहता?

माफ कीजिये वहां भारतीय राष्ट्रीय(?) कांग्रेस जैसी पार्टी और मनमोहन, सोनिया, पाटिल जैसे गैर जिम्मेदार व्यक्ति सत्ता में नहीं है.

इन दीपक चौपड़ाओं को जाने दीजिये, इनकी दुकानदारी लच्छेदार बातों से चलती ही रहती है, आप खुद बताईये कि आपको कैसा लग रहा है अपने देश पर हमले का यह घाव सहने के बाद?

INDIA NEWS said...

कन्‍धार के माफीनामा, और राजीनामा का है अंजाम मुम्‍बई का कोहराम ।
भून दिया होता कन्‍धार में तो मुम्‍बई न आ पाते जालिम ।
हमने ही छोड़े थे ये खुंख्‍‍वार उस दिन, आज मुम्‍बई में कहर ढाने के लिये ।।
इतिहास में दो शर्मनाक घटनायें हैं, पहली पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री मुफ्ती मोहमद सईद के मंत्री कार्यकाल के दौरान उनकी बेटी डॉं रूबिया सईद की रिहाई के लिये आतंकवादीयों के सामने घुटने टेक कर खतरनाक आतंकवादीयों को रिहा करना, जिसके बाद एच.एम.टी. के जनरल मैनेजर खेड़ा की हत्‍या कर दी गयी । और दूसरी कन्‍धार विमान अपहरण काण्‍ड में आतंकवादीयों के सामने घुटने टेक कर रिरियाना और अति खुख्‍वार आतंकवादीयों को रिहा कर देना । उसी का अंजाम सामने है । तमाशा यह कि जिन्‍होंने इतिहास में शर्मनाक कृत्‍य किये वे ही आज बहादुरी का दावा कर रहे हैं, अफसोस ऐसे शर्मसार इतिहास रचने वाले नेताओं की राजनीति पर । थू है उनके कुल और खानदान पर ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आप फ़िर से गलत है यूसुफ किरमानी!
अगर तारिक अली की और आपकी बात मान ली जाए तो फ़िर गुजरात में मोदी की सरकार से पहले न तो बामियान के बुद्ध को उडाया गया, न ९/११ में ढाई हज़ार निहत्थे नागरिक मरे और न ही 1947 में पाक इस्लाम के नाम पर भारत के लाखों नागरिकों को गाज़र-मूली की तरह काटा और बेघर किया गया, न ही कश्मीर के पंडितों को उन्हीं के घरों में ज़िंदा जलाया गया और न ही गुरु तेग बहादुर के बन्दों को आरी से काटा गया .

सच दिख नहीं पा रहा हो इतने नासमझ तो आप भी नहीं हैं और न ही हम हैं फ़िर भी, "...दिल के खुश रखने को गालिब ये ख़याल अच्छा है" अलबत्ता सनद रहे कि अफवाहें फैलाने वाले लोग देश के बहुत बड़े दुश्मन हैं.

मुझे लगता था कि आप जैसे पढ़े लिखे व्यक्ति का दृष्टिकोण तो तालेबानी धर्म-भक्तों से भिन्न होगा मगर मैं भूल गया था कि पाकिस्तान बनाने वाले सभी लोग मदरसों में नहीं वरन विलायत में पढ़े हुए थे.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

ऐ खुदा इन नासमझो को कौन समझाए . ताज मुंबई पर हमला १९४७ तक के गडे मुर्दे उखेड़ रहा है ,गुजरात दंगे दिख रहे है गोधरा नहीं दिखा , हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है . अगर गलत को गलत कहना सीख ले हम तो दूर हो जायेंगे सारे गम

पंगेबाज said...

उल्लू का पठ्ठा है ये अगर यही रौशन खयाल रहे इन रौशन लाल जी के , और भारत के नागरिक इनसे इत्तिफ़ाक रखने लगे तो ये इस जमी पर तो मिलेगे नही

Yusuf Kirmani said...

किसी भी घटना के तमाम पहलू होते हैं। भारत से दूर किसी भी मुल्क में रह रहे व्यक्ति को उस घटना पर अपना नजरिया रखने का पूरा अधिकार है। यहां मैंने अपने ब्लॉग पर अध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा और तारिक अली के लेख को इस मकसद के साथ पेश किया है कि ये भी एक नजरिया है और लोग उसे भी जानें। जो लोग पाकिस्तान पर सीधा हमला करने की सलाह दे रहे हैं, बिना यह जाने कि यह छोटा सा मजाक परमाणु युद्ध की तरफ धकेल देगा, बचकानेपन के अलावा और कुछ नहीं है। जिन लोगों ने ३० नवंबर का नवभारत टाइम्स (दिल्ली) पढ़ा होगा, उसमें उस अखबार के संपादक मधुसूदन आनंद का लेख जरूर पढ़ा होगा। आनंद जी ने उसमें सही ही लिखा है कि यह वक्त पाकिस्तान मुर्दाबाद का नहीं बल्कि हिंदुस्तान जिंदाबाद का है। आम भारतीय का गुस्सा अपनी जगह सही है लेकिन पाकिस्तान जिस रास्ते पर चल रहा है, उसे खुद ही खत्म हो जाना है। यह बात तो खुद लेखक तारिक अली ने अपनी नई किताब द ड्यूल पाकिस्तान में कही है। मध्ययुगीन सभ्यता में जीने वालों की परिणति यही होती है। जहां तक गुजरात के दंगों को याद करने की बात है, अगर हम भारत में उसकी चर्चा करना छोड़ भी दें तो पूरी दुनिया में आतंकवाद की चर्चा के साथ ही वहां का भी नाम लिया जाता है औऱ आगे भी लिया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र की तमाम रिपोर्टों में आज भी उसका उल्लेख होता है। यह समय वाकई गंभीर चिंतन का समय है। पूरा देश एक खौफनाक मंजर से गुजरा है लेकिन किसी को भी अपना होश नहीं खोना चाहिए। आतंकवादी और उनके पैरोकार यही तो चाहते हैं कि इसकी इतनी तीब्र प्रतिक्रिया हो कि आम हिंदुस्तानी अपना आपा खो दे।
पंगेबाज जी, आप अच्छे ब्लॉगर हैं। ब्लॉग पर शालीनता से पेश आने में कुछ भी नहीं जाएगा। अगर आप किसी से सहमत नहीं हैं तो भी क्या उसे गालियां देने लगेंगे। कृपया ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें। आपके हिसाब से तो मुझे ऐसी तमाम टिप्पणियों को यहां से हटा देना चाहिए जिनसे मैं सहमत नहीं हूं या मैं उनको गरियाने लगूं।

common man said...

yusuf ji aap bhi usi dushprachar ke hisse bante jaa rahe hain, ek documentary main bhi dekhi thi jisme yah kaha gaya tha ki world tower par hamla america ne hi karaya, to phir aap yah bhi maan len ki maalegaon me hamla musalmaon ne hi karaya, maanenge aap

Major said...

यूसुफ़ साहब आप जैसी सख्शियत ही हम जैसे नवयुवकों को आगे बदने का मार्गदर्शन देती है. यूसुफ़ साहब जानना चाहूँगा आप कौन से अखवार मैं है चूंकि मुझे लिखने का शौक है. किंतु प्रकाशित अभी तक नही करा पाया . इसी कारन अपना हिन्दी चिट्ठा बना लिया

ई-स्वामी said...

कश्मीर का मुद्दा छोड कर बाकी दीपक चोपडा सही कह रहे हैं.
अमरीका में रहते हुए उन्होंने अमरीका की फ़ेल्ड पॉलिसीज़ पर तंज़ किया है. क्या कश्मीर की स्वतंत्रता के नाम पर भारत का एक और टुकडा कर देने के मंसूबों को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

ई-स्वामी said...

उपरोक्त कथन में टाईपो है .. *क्या चाहते हैं ये?* कश्मीर की स्वतंत्रता के नाम पर भारत का एक और टुकडा कर देने के मंसूबों को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

Sanjeev said...

आपका आलेख हालांकि किसी और के नज़रिये को बयां करने का दावा करता है लेकिन दोस्त यह तो बता दो कश्मीर घाटी के ढाई लाख हिंदू किस मोदी या बुश की साज़िश के चलते घाटी से निकाले गये थे?

अपनीवाणी said...

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