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Monday, August 16, 2010

ऐसे आंदोलनों का दबना अब मुश्किल

भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी। सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी। आंदोलन कोई नया नहीं था और महीनों से चल रहा था लेकिन पुलिस वालों की नासमझी से 14 अगस्त की शाम को हालात बिगड़े और जिसने इस पूरी बेल्ट को झुलसा दिया। यह सब बातें आप अखबारों में पढ़ चुके होंगे और टीवी पर देख चुके होंगे।

अपनी जमीन के लिए मुआवजे की ज्यादा मांग का आंदोलन कोई नया नहीं है। इस आंदोलन को कभी लालगढ़ में वहां के खेतिहर लोग वामपंथियों के खिलाफ लड़ते हैं तो कभी बिहार के भूमिहीन लोग सामंतों के खिलाफ लड़ते हैं तो हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न इलाकों में वहां के किसान शासन के खिलाफ लड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में यह तेंदुपत्ता माफिया के खिलाफ लड़ा जाता है।

लेकिन मुद्दा हर जगह किसान या खेतिहर मजदूरों की जमीन का ही है, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़ा करना चाहती है या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) के पालन-पोषण का जरिया बनाने के लिए सौदा किया जाता है। कतिपय लोग विकास, रोटी-रोजी का वास्ता देकर इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क सुनने वाला कोई नहीं है कि जिस किसान से उसकी जमीन छीनी जा रही है वह उसके बाद क्या खाएगा और कैसे जिंदा रहेगा। आपके कुछ लाख रुपये कुछ समय के लिए उसका लाइफ स्टाइल तो बदल देंगे लेकिन उसके मुंह में जिंदगी भर निवाला नहीं डाल सकेंगे।

मैं ही क्या आप तमाम लोगों में से बहुतों ने देखा होगा कि इस तरह का पैसा किस तरह किसानों को या उस इलाके की आबादी के हालात को बदल देता है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली के शहरीकृत गांवों और एनसीआर के तमाम गांवों के किसानों को बड़ा मुआवजा मिला और देखते ही देखते उन गांवों में लैंड क्रूजर और पजेरों पहुंच गई। मुखिया और उनके बेटे शहर में आकर बार में बैठने लगे और कुछ ने होटल में कमरा लेकर कॉलगर्ल भी बुला ली। यह सब गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, बहादुरगढ़, लोनी में हुआ। और अगर दिल्ली के गांवों की बात करें तो जौनापुर, जैतपुर, पल्ला, मुनीरका, महरौली के किसानों के साथ भी यही बीता। इन इलाकों के गांवों में आप चले जाएं तो पाएंगे कि दरवाजे पर पजेरो खड़ी है, पूछेंगे कि आपका बिजनेस क्या है तो जवाब मिलेगा कि – हम तो पुराने जमींदार हैं। तगड़ा मुआवजा मिला है, उसी को खर्च कर रहे हैं। या फिर किसी ने ब्लूलाइन बस खरीद ली है और उसको चलवा रहा है।

फरीदाबाद के ग्रेटर फरीदाबाद या नहरपार इलाके में चले जाइए, आपको सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े अपार्टमेंट नजर आएंगे, लेकिन जैसे ही आप इन इलाकों के गांवों में जाएंगे तो घरों के सामने कोई न कोई गाड़ी खड़ी नजर आएगी। पता चलेगा कि घर का मुखिया सुबह से शराब पी रहा है और लड़का अपनी अलग मंडली लगाए हुए हैं। जिन किसान परिवारों का पैसा खत्म हो चुका है वे कब को जमीन पर आ चुके हैं और उस घर का लड़का अब उसकी जमीन पर बने अपार्टमेंट में या तो तीन हजार रुपये वेतन पाने वाला चौकीदार बन चुका है या फिर किसी की गाड़ी की धुलाई करके दो हजार रुपये कमा रहा है।

मैं चाहता तो इन तथ्यों को तमाम आंकड़ों औऱ नामों की चाशनी के साथ पेश करके बड़े ही गंभीर किस्म की रिपोर्ट बना सकता था लेकिन मैं यहां किसी नई रिसर्च रिपोर्ट को पेश करने नहीं आया हूं। यह हकीकत मेरे सामने की है इसलिए बयान कर रहा हूं। मुझे इन तमाम गांवों में जाने का मौका मिलता रहता है और हर बार कुछ नई जानकारी किसी न किसी परिवार के बारे में मिलती रहती है। यह ऐसे गांव हैं जहां टीवी भी उपलब्ध है और अखबार भी।

इन्हीं गांवों का किसान जब उसी अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

बहरहाल, इन बातों और तर्कों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, यह ब्लॉग मेरे नियंत्रण में है तो इन विचारों को यहां जगह भी मिल गई है, चाहे आप उसे पढ़ें या न पढ़ें। वरना ऐसी सोच रखने वाले अब हाशिए पर जा चुके हैं। शहरों में रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें बड़े-बड़े मॉल्स में विकास नजर आता है, वे ऐसी तमाम बातों को खारिज करते रहे हैं और आगे भी करेंगे लेकिन वे ऐसे छोटे-छोटे आंदोलनों को अपने तर्कों से रोक नहीं पाएंगे। बेशक, उनका हिमायती, दलाल या पेड जर्नलिजम करने वाला मीडिया भी उनका साथ दे लेकिन वे समाज में आ रही चेतना को रोक नहीं पाएंगे। वह किसी न किसी रूप में फूटकर सामने आएगी। यह डरे हुए लोग लोगों को और डराना चाहते हैं। लेकिन इधर आंदोलनों का रुख बता रहा है कि इन डरे हुए लोगों के तर्क अब पब्लिक में खारिज होने लगे हैं।

अंत में एक अपील

यह लेख लिखने की सबसे बड़ी वजह वह संदेश है, जो मुझे पत्रकार और अंग्रेजी की मशहूर लेखिका अनी जैदी ( recent book - Known Turf) की ओर से मिला। उन्होंने शीतल रामजी बर्डे नामक बालिक की ओर से एक अपील इंटरनेट पर जारी की है जो दिल को हिला देती है। इस लड़की के पिता किसान थे और अब आत्महत्या कर चुके हैं। अब यह परिवार कागज के लिफाफे बनाकर अपना पेट पालता है। इस लड़की ने देशभर के लोगों से अपील की है कि वे उसे हर महीने एक पुरानी मैगजीन उसके पते पर भेजें, जिसका वह इस्तेमाल लिफाफा बनाने में कर सके। इससे उसकी मदद तो होगी ही और पर्यावरण की भी मदद होगी। प्लास्टिक की थैलियों का प्रचलन रुक सकेगा। आप नीचे उस बच्ची की अपील पढ़ें और जो कर सकते हैं करें।

From Annie Zaidi, Mumbai
One old magazine = somebody's freedom of livelihood
"I was barely nine when my dear father committed suicide. My mother has worked really hard to send my brother, sister & me to school. She is still working hard to make our two ends meet... all she wants is ONE OLD MAGAZINE from you all, so she can make paper envelopes to earn & save environment... dear uncles & aunties, please-please do send us one old magazine every month to support us, so that we can go to better schools and live our lives with dignity and less suffering. My mother and other widow mothers like her will not hesitate to work hard to earn for us while saving the environment for the nation...I will be waiting with great expectations dear uncles & aunties for ONE OLD MAGAZINE from each one of you every month...If each one of you send one, it will become so many for my mother and other widow mothers to work hard to earn some amount every month...
A very BIG THANK YOU from my brother, sister, my mother and me...
SHEETAL RAMJI BARDE"
our address:
support 4 suicide farmers families, House No: 200 Opp: Dr. Harne's Hospital, Dhantoli Chowk Wardha: 442001


अगर मौका हो तो इस लिंक (South Asia Report) पर इसे भी पढ़ें....

Saturday, August 14, 2010

किसने उठाया भगत सिंह की शहादत का फायदा...जरा याद करो कुर्बानी


जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सेंटर ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के चेयरपर्सन प्रोफेसर चमनलाल ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जीवन और विचारों को प्रस्तुत करने में अहम भूमिका निभाई है। वह भारत की आजादी में क्रांतिकारी आंदोलन की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं और उसे व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव से जोड़कर देखते हैं। प्रो. चमनलाल से बातचीत

जब भी स्वाधीनता आंदोलन की बात होती है, इसके नेताओं के रूप में गांधी, नेहरू और पटेल को ज्यादा याद किया जाता है। भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति श्रद्धा के बावजूद उन्हें पूरा श्रेय नहीं दिया जाता। ऐसा क्यों?

गांधी, नेहरू आदि नेताओं का जो भी योगदान रहा हो, लेकिन भगत सिंह के आंदोलन और बाद में उनके शहीद होने से ही आजादी को लेकर लोगों में जागृति फैली। इसका फायदा कांग्रेस और मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों ने उठा लिया। कुछ दक्षिणपंथी संगठन भी अपने आप को आजादी के आंदोलन में शामिल बताने लगे हैं। वे खुद को पटेल से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं।

लेकिन कुछ इतिहासकार भगत सिंह के संघर्ष को असफल करार देते हैं। वे कहते हैं कि भारत के सामाजिक- आर्थिक हालात उनके पक्ष में नहीं थे...

यह सच है कि भगत सिंह ने जब आंदोलन छेड़ा था, उस वक्त भारत के राजनीतिक हालात उनके पक्ष में नहीं थे। लेकिन आजादी की लड़ाई में वह सबसे कामयाब शख्सियतों में से एक हैं। उन्होंने जो कुछ भी किया, उसके पीछे तर्क था, सोच थी। भगत सिंह का लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं था, व्यवस्था परिवर्तन था। दूसरी तरफ नेहरू, जिन्ना जैसी शख्सियतों का मकसद सत्ता प्राप्ति ही था, जो बाद में साबित भी हुआ।

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की धारा गदर आंदोलन से निकली है। आप उसे किस रूप में देखते हैं?

1913 में अमेरिका में गदर पार्टी बनी, जिसने कई भाषाओं में गदर नाम से अपना अखबार भी निकाला। फिर 1915 में इस पार्टी ने ही भारत में सशस्त्र आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में शामिल युवकों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। इन्हीं में थे- युवा शहीद करतार सिंह सराभा, जिनसे भगत सिंह बहुत प्रभावित थे। सराभा ही भगत सिंह के आदर्श थे। इस आंदोलन में दक्षिण भारत तक के लोग शामिल थे। सच कहा जाए तो 1857 और 20 वीं शताब्दी में छेड़े गए क्रांतिकारी आंदोलन दरअसल परिवर्तन के आंदोलन थे और परिवर्तन के आंदोलन कभी खत्म नहीं होने वाले हंै। ये आज भी भारत में किसी न किसी रूप में जारी हंै। परिवर्तन के आंदोलन की कई धाराएं रही हैं, किसी पर वामपंथी प्रभाव रहा, किसी पर दक्षिणपंथी प्रभाव तो किसी पर धार्मिक प्रभाव। लेकिन धार्मिक आधार पर छेड़े गए आंदोलनों का क्रांतिकारी आंदोलन से दूर-दूर का रिश्ता भी नहीं था।

यानी गदर आंदोलन के प्रभाव में ही भगत सिंह के भीतर एक विश्वदृष्टि विकसित हुई और उन्होंने अपने संघर्ष को एक बड़े और दीर्घकालीन मकसद से जोड़ा...

भगत सिंह के साथ जुड़ी घटनाओं की गहराई में जाएं तो इस बारे में काफी कुछ पता चलता है। सबसे पहले लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए सांडर्स को मारने का प्लान बना। असेंबली में बम फेंकने का प्लान भी जनसामान्य के जनतांत्रिक अधिकारों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बनाया गया। भगत सिंह ने अपने मुद्दे को पूरी दुनिया के सामने इसके जरिए रखा। वह जानते थे कि उनके किसी भी एक्शन की सजा मौत है। उन्होंने लिखा भी है कि उनकी शहादत के बाद भारत में आजादी के लिए लोग और भी उतावले हो उठेंगे। वह अपने मकसद में कामयाब रहे। अदालत में दिए गए उनके बयान भारत के लिए उनकी दूरदृष्टि का नायाब नमूना हंै। वह सिर्फ भारत की आजादी नहीं चाहते थे बल्कि देश का संचालन सामाजिक आधार पर करना चाहते थे। उन्होंने रूसी क्रांति को सामने रखकर भारत के बारे में सोचा था।

आम जनता महसूस कर रही है कि उसे अब भी वास्तविक आजादी नहीं मिल सकी है। रोज-रोज सिस्टम की नई विसंगतियां सामने आ रही हैं। कहीं स्वाधीनता की लड़ाई में ही कोई बुनियादी गड़बड़ी तो नहीं थी?

हां, बुनियादी गड़बड़ी कांग्रेस की सोच में थी। उसने अंग्रेजों के जाने के बाद देश के निर्माण की जो परिकल्पना की, वह गलत थी। जिस पार्टी में गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद, जैसी महत्वपूर्ण शख्सियतें थीं, उसे उस वक्त देश के चंद धनी वर्ग कंट्रोल कर रहे थे। नेहरू की सोच समाजवादी थी लेकिन वह एक बार भी इस बात का विरोध नहीं कर सके कि गांधी जी क्यों उस समय देश के एक सबसे बड़े औद्योगिक घराने के मेहमान बनते थे। इस धनिक वर्ग की सोच यह थी कि अंग्रेजों के जाते ही सत्ता पर उसका अप्रत्यक्ष कब्जा होगा और देश के आर्थिक व राजनीतिक हालात का फायदा दरअसल वही उठाएगा। ऐसा हुआ भी और नतीजा हमारे सामने है।

साभारः नवभारत टाइम्स, 14 अगस्त 2010

Courtesy: Nav Bharat Times, 14 August 2010

Saturday, August 7, 2010

क्या भारत में एक और गदर (1857) मुमकिन है

महमूद फारुकी तब चर्चा में आए थे जब विलियम डेल रेम्पेल की किताब द लास्ट मुगल आई थी। लेकिन इस वक्त यह शख्स दो खास वजहों से चर्चा में है, एक तो उनकी फिल्म फिल्म पीपली लाइव आने वाली है दूसरा उनकी किताब बीसीज्ड वायसेज फ्रॉम दिल्ली 1857 पेंग्विन से छपकर बाजार में आ चुकी है। 1857 की क्रांति में दिल्ली के बाशिंदों की भूमिका और उनकी तकलीफों को बयान करने वाली यह किताब कई मायने में अद्भभुद है। महमूद फारूकी ने मुझसे इस किताब को लेकर बातचीत की है...यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 7 अगस्त 2010 को प्रकाशित हो चुका है। इसे वहां से साभार सहित लिया जा रहा है...

इसे महज इतिहास की किताब कहें या दस्तावेज

इसे दस्तावेज कहना ही ठीक होगा। यह ऐसा दस्तावेज है जो लोगों की अपनी जबान में था। मैंने उसे एक जगह कलमबंद करके पेश कर दिया है। लेकिन अगर उसे जिल्द के अंदर इतिहास की एक किताब मानते हैं तो हमें कोई ऐतराज नहीं है।

आपने इसमें क्या बताया है

यह 1857 में दिल्ली के आम लोगों की दास्तान है। अंग्रेजों ने शहर का जब घेराब कर लिया तो उस वक्त दिल्ली के बाशिंदों पर क्या गुजरी। यह किताब दरअसल यही बताती है। इतिहास में 1857 की क्रांति को अलग-अलग नजरिए से पेश करने की कोशिश की जाती रही है। उस वक्त के इतिहास को जिन लोगों ने कलमबंद किया, उनके अपने-अपने हीरो इस क्रांति को बयान करते नजर आते हैं लेकिन जिस दिल्ली में अंग्रेजों ने सबसे बड़ा कत्लोगारत किया, उसका जिक्र कम है। इस किताब में दिल्ली के लोगों की रोजमर्रा जिंदगी पर क्या बीती, उन्हें किस तरह दरबदर होना पड़ा है, यह घटनाओं सहित बताया गया है। यह भारत की पहली ऐसी क्रांति थी जिसमें आम लोगों शामिल थे। लोगों में एक विश्वास था कि वे अंग्रेजों को उखाड़ फेकेंगे। ऐसा हुआ भी लेकिन इस क्रांति का श्रेय आम लोगों को नहीं मिला। यह क्रांति अपने वजूद, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा को कायम रखने के लिए थी। कांग्रेस, महात्मा गांधी व आजादी के अन्य हीरो बाद में पिक्चर में आए। लेकिन बाद के इतिहास को जितना बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया, उतना 1857 के इतिहास को नहीं।

इसे कलमबंद करने का विचार कैसे आय़ा

द लास्ट मुगल पर काम करते वक्त दरअसल विलियम डेलरेम्पेल और मैंने वह दस्तावेज देखे थे। 1857 में दिल्ली के लोगों ने उस वक्त की हुकूमत के अफसरों और शहजादों को खत और शिकायतें लिखी थीं कि अंग्रेजों के कब्जे के दौरान उन पर क्या गुजर रही है। किसी में इस बात का जिक्र था कि अंग्रेजी फौज का सिपाही उसकी बीवी को लेकर भाग गया है, किसी ने लिखा है कि उसे 20 दिन से पान तक खाने को नहीं मिला और वह एकतरह से नजरबंद होकर रह गया। किसी को एक महीने तक दाल खाने को नहीं मिली। उन खतूत को देखने के दौरान ही यह ख्याल आया कि क्यों न दिल्ली के बाशिंदों पर जो गुजरी है, उसे एक किताब की शक्ल में सामने आय़ा। पेंग्विन वालों को भी यह आइडिया पसंद आया और उन्होंने काम करने की सहमति दे दी।

तो यह सारे दस्तावेज जो खतों की शक्ल में हैं, कैसे बचे रह गए

दरअसल, अंग्रेज बहादुर शाह जफर को अंग्रेजी हुकूमत का गद्दार साबित करने के लिए सुबूत जुटा रहे थे। उन्होंने ही इन सारे खतों को इकट्ठा किया था और एक जगह सुरक्षित रख दिया। बाद में यह राष्ट्रीय अभिलेखागार (नैशनल आरकाइव्ज) की संपत्ति बन गए। यह सारे खत या तो पर्शियन (फारसी) या फिर शिकस्ता उर्दू में हैं।



इन सारे दस्तावेजों की कोई बहुत खास बात

देखिए जब अंग्रेजों ने इस शहर पर कब्जा किया तो उन्होंने सबसे पहले यहां के लोकल लोगों को शहर से बाहर जाने को मजबूर कर दिया। इसके बाद जब लोकल लोगों को आने की इजाजत मिली तो सबसे पहले हिंदुओं को शहर में घुसने दिया गया और उसके बाद मुसलमानों को। शहर की जामा मस्जिद मुसलमानों को 1862 में वापस सौंपी गई और इससे पहले अंग्रेजों और इसके अफसरों ने इसकी बेहुरमती में कोई कसर नहीं छोड़ी। मस्जिद के अंदर अंग्रेज फौजों ने अपने घोड़े बांधे और बूट पहनकर चले। वह पांच साल का वक्त दिल्ली के लिए बहुत बुरा बीता। इस किताब से यह भी पता चलता है कि बहादुर शाह जफर ने दिल्ली के लोगों की मदद से किस तरह अंग्रेज फौजों का अंतिम समय तक मुकाबला किया। दिल्ली के हर मजहब के लोगों ने किस तरह जफर की मदद की।

तो किस तरह के धार्मिक आघात लग रहे थे

उस वक्त दीन धर्म के तहत बहुत ऐसी चीजें आती थीं जिन्हें आज हम धर्म का हिस्सा नहीं समझते। ऐसे खत भी मिले हैं जिसमें लोगों ने शिकायत की है कि जिस हकीम के पास वे इलाज के लिए जाते थे, उसे नुस्खा नहीं लिखने दिया जाता था। अंग्रेज डरते थे कि क्या पता इसके जरिए उर्दू में कोई संदेश शहर में फ्लैश कर दिया जाए। उस वक्त साहित्य की स्थिति तो बहुत अच्छी थी लेकिन अंग्रेजी पढ़ने के लिए माहौल बनने लगा था और इसे अंग्रेजों की तरफ से काफी बढ़ावा भी मिल रहा था।

1857 की क्रांति और मौजूदा दौर कहीं आपस में जुड़ते हैं

यह दुखद है कि देश के पहले बड़े जनआंदोलन को कोर्स की किताबों में चंद पेज का चैप्टर बना दिया गया। भारत के लोगों ने जगह-जगह जिस आत्मविश्वास से अंग्रेजों का मुकाबला किया, वैसा आत्मविश्वास फिर किसी आंदोलन में नहीं दिखा। यह ऐसा आंदोलन था जिसे लोगों ने अपने देश को बचाने, अपने स्वाभिमान को बचाने, अपनी सेकुलर तहजीब को बचाने के लिए छेड़ा था। भारत के लोगों से आज जिस तरह छिपे रूप में और विभिन्न शक्लों में उसकी आजादी छीनी जा रही है, मानवता का गला घोंटा जा रहा है, धर्म के नाम पर राजनीति की जा रही है, लोगों को लड़ाया जा रहा है, दरअसल आज जरूरत 1857 के उसी नफरत वाले विद्रोह की है। लेकिन उस विद्रोह को अंग्रेजों से ज्यादा भारत में राज करने वाली हुकूमतों ने कहीं गहराई में दफना दिया है। लोगों में अब वह आत्मविश्वास बाकी नहीं बचा है जो उन्होंने 1857 में दिखाया था।

आपकी फिल्म पीपली लाइव आने से पहले चर्चा में है और उसके गाने भी लोगों की जबान पर हैं, क्या आपके विचारों की उसमें कहीं झलक मिलेगी

इस फिल्म को मैंने अपनी पत्नी अनुषा रिजवी के साथ डायरेक्ट किया है। बस इतना कह सकता हूं कि फिल्म आने दीजिए और फिर बताइएगा कि आजकल के हालात पर हम लोग कितनी सटीक टिप्पणी कर पाए हैं। यह फैसला भारत की जनता और मीडिय़ा पर छोड़ता हूं।

Courtesy: Nav Bharat Times, 7th August 2010

नोट – पीपली लाइव (Peepli Live)फिल्म का यह गाना खासा पॉपुलर हो चुका है। आप उसकी एक झलक यहां देख सकते हैं। यह फिल्म इसी महीने रिलीज होने वाली है।

Friday, August 6, 2010

भजन और अजान को मधुर और विनम्र होना चाहिए

अजान की आवाज आपने कभी न कभी जरूर सुनी होगी। इसमें एक तरह का निमंत्रण होता है नमाजियों के लिए कि आइए आप भी शामिल हो जाएं ईश्वरीय इबादत में। अजान का उद्घोष आपका रुख ईश्वर की ओर मोडऩे के लिए होता है।

पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने अपने समय में हजरत बिलाल को खास तौर पर अजान देने का निर्देश दिया था। हजरत बिलाल का उस समय अरब समाज में जो स्टेटस था, वह बाकी लोगों के मुकाबले बहुत निम्न स्तरीय था। वह ब्लैक थे और एक यहूदी के यहां गुलाम थे। उन्हें पैगंबर मोहम्मद साहब ने ही आजाद कराया था। उन्होंने अजान के लिए हजरत बिलाल का चयन बहुत सोच समझकर किया था। इस्लाम की तारीख में पैगंबर के इस फैसले को इतिहासकारों ने सामाजिक क्रांति का नाम दिया है।

अजान में जो बात पढ़ी जाती है, उसका मतलब है इबादत के लिए बुलाना। इसमें इस बात को भी दोहराया जाता है कि और कोई ईश्वर नहीं है। अरब में जब इस्लाम फैला और अजान की शुरुआत हुई, उन दिनों लाउडस्पीकर नहीं थे। सुरीली आवाज में अजान का प्रचलन सिर्फ इसलिए शुरू हुआ कि लोगों तक यह सूचना सुखद ढंग से पहुंचे कि नमाज का वक्त हो चुका है।

जब लाउडस्पीकर - माइक का आविष्कार हो गया तो लोगों तक यह संदेश पहुंचाने में सुविधा हो गई। लेकिन अजान देने के उस तरीके पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जो पैगंबर के समय में प्रचलित था। किताबों में मिलता है कि विभिन्न देशों में अलग-अलग समय में अनेक लोग सिर्फ अजान की अपनी सुरीली आवाज के लिए प्रसिद्ध और सम्मानित हुए थे। आज भी यह रुतबा एकाध लोगों को ही हासिल है। उनकी आवाज सुन कर लोग खुद खिंचे चले आते हैं।

लेकिन कई बार अजान इतनी कर्कश आवाज में सुनाई देती है कि वह सुनने वाले को मुग्ध करने और प्रेरित करने की जगह किसी असुखद शोर जैसा प्रभाव डालता है। अजान देने के लिए जिस प्रतिभा और प्रयास की दरकार होती है, उसके प्रति हम तनिक गंभीर नहीं दिखाई देते।

गुरुद्वारों में रागी गुरुवाणी पढ़ते समय आवाज को अद्भुत ढंग से संतुलित करते हैं। इसके लिए वे रोजाना घंटों रियाज करते हैं। वैसी ही कोशिश अजान को लेकर भी होनी चाहिए। अजान ऐसी हो कि लगे कि आपके कानों में कोई रस घोल रहा हो।

ईसाईयों में कैरल गायन के दौरान ऐसा ही होता है। कैरल में वे लोग ईसा मसीह की वंदना करते हैं। हर चर्च अपनी कैरल टीम तैयार करता है। लेकिन हर किसी को कैरल गाने का अधिकार नहीं मिलता। टीम के लोगों को इसकी तैयारी के लिए खासी मेहनत करनी पड़ती है।


ईश्वर की वंदना के लिए हिंदू धर्म में भजन-कीर्तन का प्रचलन है। आजकल तो भगवती जागरण का खासा क्रेज है। लेकिन वहां भी भजन गायन के लिए किसी अभ्यास या प्रशिक्षण की जरूरत को महत्व नहीं दिया जाता। यही वजह है कि अक्सर भक्त जन ऐसे आयोजनों पर फिल्मी धुनों की पैरोडी बना कर भजन गाते नजर आते हैं। कई बार वह कर्कश शोर बन कर रह जाता है।

अब रमजान जल्द शुरू होने वाले हैं। जिन मस्जिदों से तेज आवाज में अजान नहीं सुनाई देती, वहां से भी रमजान के दिनों में तेज अजान सुनाई देती है, सुबह और शाम के वक्त की अजान की टोन में फर्क आ जाता है। वह हमेेशा सुरीली हो एक जैसी हो। न तो अजान देने वाले को कोई हड़बड़ी हो और न ही उस अजान को सुनने वाले को कोई असुविधा हो।

ईश्वर की वंदना में कर्कश स्वरों की कोई जरूरत नहीं होती। अजान या भजन में आवाज की जरूरत तो दूसरों को प्रेरित करने के लिए पड़ती है। यदि उसमें मधुरता और विनम्रता न हो तो वह इबादत का हिस्सा नहीं बन सकती।

(नवभारत टाइम्स 6 अगस्त से साभार)