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Saturday, October 31, 2009

हेलोवीन...मुखौटा लगा लो मेरे भाई



अगर आप मौजूदा युवा पीढ़ी के मुकाबले दस साल पहले के लोगों से पूछें कि भाई ये हेलोवीन (Halloween) या हालोवीन क्या बला है तो वे लोग ठीक से इसके बारे में जवाब नहीं दे पाएंगे। लेकिन मौजूदा मोबाइल मार्का पीढ़ी (Mobile Generation) को पता है कि यह हेलोवीन क्या बला है। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे तो तमाम अमेरिकी लोग (American People) या तो हेलोवीन मना रहे होंगे या मनाने की तैयारी कर रहे होंगे।

हेलोवीन मनाने वाले तरह-तरह के मुखौटे बाजार से खरीद कर उसे चेहरों पर लगाते हैं और फिर एक दूसरे को डराते नजर आते हैं। अपने भारत देश में जो एक मिथ है कि अगले जन्म में इंसान को भूत, चुड़ै़ल, जिन, कुत्ता, सियार और न जाने क्या-क्या बनकर अपने पापों की कीमत चुकानी पड़ती है, यह मामला भी कुछ वैसा ही है। अमेरिकी भाई लोग इसी जन्म में मुखौटे लगाकर इस करतब को कर डालते हैं। उन्हें इस चीज में इतना मजा आता है कि उन्होंने इसे त्योहार का रूप दे दिया है और अब यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है। 31 अक्टूबर को सारे अमेरिकी (बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष) भूत, शैतान या सियार बने नजर आते हैं।

खबरों के मुताबिक अमेरिका हेलोवीन मार्केट (Halloween Market) में इस बार ओसामा बिन लादेन (Osama Bin Laden ) के मुखौटे की भारी मांग है। कहते हैं कि अमेरिकी इस मुखौटे की मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं। इसके पीछे अमेरिकियों का यह मनोविज्ञान बताया जा रहा है कि जिस खूंखार आतंकवादी को वहां की सरकार जीते जी पकड़ नहीं पाई और अगर उसका मुखौटा लगाकर किसी को डराया जाए तो वे जरूर डरेंगे। क्योंकि 9-11 का जो खौफ अमेरिकियों पर अब तक है वे लादेन का मुखौटा लगाकर उसे दूर भगाना चाहते हैं। बताते हैं कि शुरू में अमेरिकी मुखौटा कंपनियों ने तालिबानी (Taliban) बैतुल्लाह महसूद का मुखौटा बाजार में उतारा और एक सर्वे कराया कि यह प्रोडक्ट कितना कामयाब रहेगा लेकिन अमेरिकियों ने उसे रिजेक्ट कर दिया, तब जाकर उनके मार्केटिंग मैनेजरों ने लादेन के मुखौटे पर ध्यान केंद्रित किया और सर्वे में रिपोर्ट भी पाजिटिव आई।

अपने यहां भी मुखौटे तो खैऱ सदा से रहे हैं और सिर्फ बच्चे ही उनको लगाकर एक-दूसरे को डरा रहे होते हैं और अपने यहां यह सब दशहरा से लेकर दीवाली तक या कभी-कभी होली पर होता है। लेकिन अगर आप किसी गांव में जाएं तो आपको खेतों में जगह-जगह मुखौटे लगे मिल जाएंगे जो पशु-पक्षियों को डराने के लिए लगाए जाते हैं। भारत में पाई जाने वाली छुटभैया से लेकर अक्सफर्ड डिक्शनरी में इसका मतलब बिजूका, धूहा, जूजू, हौव्वा और डरावा लिखा है लेकिन यह सब आपको हेलोवीन का अर्थ खोजने पर नहीं मिलेगा, बल्कि अगर आप स्केयर क्रो का अर्थ खोजेंगे तो यही सब शब्द मिलेंगे। लेकिन कुल मिलाकरर मुखौटा ही इन बिजूकों का बदला हुआ रूप है।

इन अमेरिकियों को मानना पड़ेगा कि इनके परदादा हमारे यहां खेतों में टहलने के दौरान यह कॉसेप्ट लेकर गए होंगे और अपने देश में इसकी आड़ में रोजगार के इतने अवसर पैदा कर दिए कि वह हेलोवीन ड्रिवेन मार्केट हो गया है। यहां किसी भारतीय समाज विज्ञानी या पत्रकार की नजर खेतों में खड़े इन मुखौटों पर पता क्यों नहीं पड़ी, वरना चांस यहां भी बन सकता था। लेकिन हम लोग चूंकि अमेरिकियों की जूठन खाने के आदी हैं तो छोटे-मोटे लेवल का हेलोवीन ड्रिवेन मार्केट यहां भी खड़ा कर देंगे।

बहरहाल, वह तो भला हो बीजेपी का, जब इस पार्टी के किसी नेता ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का मुखौटा कहा तो भारत में भी मुखौटों का पहली बार सम्मान होना शुरू हुआ और देखते ही देखते बाजार तरह-तरह के मुखौटों या बिजूके से पटने लगा। अब यह तो पता नहीं कि फिलवक्त बीजेपी का नया मुखौटा या बिजूका कौन है लेकिन बीजेपी की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले बताते हैं कि निकट भविष्य में यह सेहरा नरेंद्र मोदी के सिर बांधा जा सकता है यानी उन्हें बीजेपी के नए मुखौटे के रूप में पेश किया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मुखौटों पर अभी बात नहीं करना चाहता।

अपने देश में भी बाकायदा मुखौटा ड्रिवेन मार्केट (यानी मुखौटा आधारित बाजार Halloween Driven Market) है। भारतीय चाहे अमेरिका से प्रेरणा लें या बीजेपी के मुखौटे से लेकिन उन्होंने इसे अपनी संस्कृति में बाकायदा ढालना शुरू कर दिया है। हर साल भारतीय मुखौटा बाजार तरक्की पर है। अब मुझे यह तो ठीक से नहीं पता कि भारतीय मुखौटा बाजार का सबसे बड़ा ब्रैंड (Big Brand) कौन है लेकिन अंदाजा है कि शायद भारतीय कंपनियां मोदी या मुख्तार अब्बास नकवी टाइप लोगों को ही अपना ब्रैंड एंबेसडर बनाना चाहेंगी। हालांकि इसमें अपने बॉलिवुड के शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, सैफ अली खान, इमरान खान या आने वाला कोई और खान फिट रहता लेकिन उनकी रुचि हेलोवीन में ज्यादा न होने के कारण भारतीय कंपनियां उन्हें मौका देना नहीं चाहतीं। हालांकि अमिताभ बच्चन से अगर बात करते तो वे शायद खुद या अमर सिंह को आगे करके इस काम को आसान कर देते लेकिन भारतीय कंपनियों के ब्रैंड स्टैंडर्ड शायद बहुत टफ मालूम पड़ते हैं।

एक खबर के मुताबिक दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में हेलोवीन क्लब बने हुए हैं जिनमें मोटी फीस भरकर कोई इनकी मेंबरशिप ले सकता है। बताया जाता है कि उस क्लब की हेलोवीन पार्टी में जाकर आप कुछ भी कर सकते हैं। यानी अगर गलती से आपका पड़ोसी उस पार्टी में मिल जाए और आप उसे पसंद नहीं करते तो आप उसे भूत, शैतान या आपकी पत्नी उसे चुड़ैल या डाइन (Witch) बनकर डरा सकती हैं। सोचिए कितना मजा आता होगा जब इस बहाने आप अपनी खुन्नस निकाल रहे होते हैं।

तो चलिए अपन लोग भी हेलोवीन जैसा कुछ मना डालते हैं...

Sunday, October 25, 2009

बाल ठाकरे, मुंबई भारत नहीं है

बाल ठाकरे आज उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उनसे सहानुभूति के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इन भाई साहब ने अपने अवसान की बेला पर जिन शब्दों में मराठी मानुष (Marathi People) को अपने अखबार सामाना में गरियाया है, उसे एक बूढ़े इंसान के प्रलाप (Old Man's Agony) के अलावा और क्या कहा जा सकता है। शिवसेना को अपने जीवन के 44 साल देने वाले इस इंसान को अब याद आया है कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। महाराष्ट्र में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना को 44 सीटें मिली हैं और उसके सहयोगी दल बीजेपी की लुटिया डूब गई है। खैर बीजेपी तो बाकी दो राज्यों हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में भी बुरी तरह हार गई है।
बाल ठाकरे ने फरमाया है कि मराठी लोग जिस तरह हर छोटी-छोटी समस्या का समाधान कराने शिवसेना के पास आते थे क्या वे वोट देते वक्त उन बातों को भूल गए। उन्होंने अपने भतीजे राज ठाकरे को भी गद्दार बताया है। बाल ठाकरे का प्रलाप बहुत लंबा-चौड़ा है और उसे यहां दोहराने से कोई फायदा नहीं है लेकिन शिव सेना प्रमुख के प्रलाप के बाद हम और आप इस बात पर तो गौर करना ही चाहेंगे कि इस आदमी या इस आदमी के पार्टी की यह हालत क्यों बनी।
शिवसेना का गठन नफरत, भाषा की कट्टरता और एक दूसरे को बांटने की मुस्लिम लीगी टाइप अवधारणा पर हुआ था। बाल ठाकरे नामक शख्स मुंबई में बड़ी महात्वाकांक्षा वाला एक मामूली पत्रकार हुआ था। जिसने हिटलर (Hitler) से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना की जीवनियों को बड़े ध्यान से पढ़ा था और कुछ-कुछ वैसा ही करने की चाहत मन में थी। आधुनिक इतिहास में अंध राष्ट्रवाद और अंध धर्मवाद को हवा देने वाले हिटलर और जिन्ना को बाल ठाकरे ने अपने जीवन में अपना लिया। एक ने पाकिस्तान का निर्माण धर्म के नाम पर करा दिया और एक ने हजारों निर्दोषों का कत्लेआम कराया। दुनिया ने नाजीवाद का नाम पहली बार सुना। आज उसी जर्मनी के लोग हिटलर से कितनी नफरत करते हैं इसका अंदाजा हम लोग भारत में बैठकर नहीं लगा सकते।
मुंबई अंग्रेजों के वक्त से ही भारत की वाणिज्यिक राजधानी (Commercial Capital) रहा है और यूपी और बिहार के लाखों गरीब लोग रोजगार की तलाश में मुंबई का रुख करते थे। इनमें से तमाम लोगों ने मेहनत के दम पर अपनी जड़े वहां जमा लीं। हालांकि कुछ लोग जुर्म की दुनिया में तो कुछ बॉलिवुड की दुनिया में भी गए यानी कुल मिलाकर मुंबई के हर तरह के विकास में यूपी, बिहार के अलावा तमाम उत्तर भारतीयों का योगदान रहा।
मुद्दे की तलाश में भटक रहे बाल ठाकरे ने इसी को भुनाया। चार पेज वाले सामना अखबार का रजिस्ट्रेशन कराकर उन्होंने जहर उगलना शुरू कर दिया। मानव स्वभाव है...वह ऐसी चीजों को सबसे पहले पढ़ता या देखता है जो नकारात्मक होती हैं। बाल ठाकरे और सामना ने मराठियों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह उत्तर भारतीयों के खिलाफ खड़े हो जाएं। मुंबई से इसकी शुरुआत हुई। गली-मुहल्लों के तमाम असामाजिक तत्व शिवसेना के सदस्य बन गए। हाल के वर्षो में शिवसेना मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में किस कदर मजबूत हो गई थी कि बिना बाल ठाकरे की मर्जी के कोई फिल्म खास तारीख पर रिलीज ही नहीं होती थी। अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकार को भी उनके दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी थी कि उनकी फिल्म आने वाली है। कुछ फिल्मों में तो बाल ठाकरे परिवार का पैसा तक लगा हुआ है। फिल्मी मोर्चे पर ठाकरे परिवार उद्धव की पत्नी के जरिए सक्रिय रहता था। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे को जब बाल ठाकरे ने वैसी हैसियत नहीं दी तो उन्होंने बाल ठाकरे की घटिया राजनीति की डोर को पकड़कर उन्हें उसी भाषा में जवाब दे दिया और वह अब मराठी अस्मिता की नई पहचान बन गए हैं।
बाल ठाकरे हों या राज ठाकरे- ऐसे लोगों का राजनीति में फलना-फूलना बहुत खतरनाक है। आज इसलिए खुश नहीं हो सकते कि बाल ठाकरे का राजनीतिक अंत हो चुका है। क्योंकि राज ठाकरे उसी तरह की राजनीति को लेकर फिर हाजिर है। लेकिन इतना तय है कि नफरत की नींव पर खड़ी की गई बुनियाद स्थायी नहीं होती। मराठी ही नहीं देश के असंख्य लोग इस बात को धीरे-धीरे समझ रहे हैं। धर्म (Religion), भाषा (Language), जाति (Cast) और काले-गोरे (Blacks - Whites) की बुनियाद पर टिका समाज कभी न कभी लड़खड़ता है। पाकिस्तान का हाल हमारे सामने है जो अब अपना वजूद बचाने की लड़ाई अपने ही लोगों से लड़ रहा है। बाल ठाकरे की हम लोग चर्चा कर चुके हैं। शुद्ध जातिवाद की राजनीति के दम पर अपना कद बढ़ाने वाले मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव को आखिरकार जमीन देखनी पड़ी। मायावती ने दलितों के साथ हुए भेदभाव को इमोशनल ब्लैकमेलिंग के दम पर भुनाया है। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद अगर वह यूपी में दलितों को उनका हक न दिला पाईं तो यह एक प्रयोग की हार तो होगी ही साथ ही दलित आंदोलन को भी धक्का लगेगा। यानी मायावती के राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड का नतीजा आएगा, पर जरा देर से।
शिवसेना की सहयोगी पार्टी बीजेपी का हाल शिवसेना जैसा होता ही नजर आ रहा है। नफरत को हवा देने वाली इस पार्टी को भी लोग अब समझ गए हैं। जिस पार्टी का एक जिम्मेदार पदाधिकारी मुख्तार अब्बास नकवी यह कहे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) के कारण बीजेपी चुनाव हारी, उस पार्टी की हताशा का अंदाजा आप लगा सकते हैं। आपको याद होगा कि अभी जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे और हमारे प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी ने ताज न मिलने पर कुछ ऐसा ही बयान दिया था। आडवाणी चूंकि एक जिम्मेदार नेता हैं तो केंद्रीय चुनाव आयोग ने फौरन अपने दफ्तर में ढेरों ईवीएम मंगाकर बीजेपी समेत सभी राजनीतिक दलों को बुलाकर पूछा कि वे खुद आकर जांच करें और बताएं कि इसमें गड़बड़ी की संभावना या आशंका कहां है। बीजेपी और तमाम राजनीतिक दल वहां पहुंचे, कई दिन तक उनके दिग्गज टेक्नोक्रेट से लेकर ब्यूरोक्रेट और अंत में चालाक, धूर्त और मक्कार खादी पहनने वाले नेता भी उन मशीनों की टेस्टिंग करते रहे लेकिन कोई कुछ बता नहीं बताया।
...यही होता है जब हम लोग अपनी गलतियों के लिए झूठे आधारों की तलाश करते हैं।

Friday, October 16, 2009

पर्यावरण की चिंता के साथ दीपावली मुबारक

इस दिवाली पर ब्लॉग एक्शन डे वालों ने इस दिन को पता नहीं जानबूझकर या अनजाने में पर्यावरण (Enviornment) से जोड़ दिया है। यानी इन दो दिनों में हम लोग पर्यावरण को लेकर संकल्प लें। यह संदेश इतने जोर-शोर से पहुंचाना है कि इस सिलसिले में दुनिया के तमाम देशों की जो बैठक हो रही है, उसमें ब्लॉगर्स (Bloggers) का भी एक प्रेशर ग्रुप (Pressure Group) मौजूद रहे। आप मेरे ब्लॉग की दाईं तरफ ऊपर की ओर जो चीज देख रहे हैं वही ब्लॉग एक्शन डे (Blog Action Day) का निशान और लिंक है। मैं और मेरे जैसे तमाम लोग इस महती कार्य में शामिल हैं लेकिन मैंने जानबूझकर भाषा के रूप में हिंदी का चयन किया, हालांकि वहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला है।

बहरहाल, यह तो हुई उनकी कहानी लेकिन इस दिवाली पर मैं महसूस कर रहा हूं कि लोग काफी जागरुक हो गए हैं या कहिए महंगाई और मंदी (Recession) का भी असर है कि तीन दिन पहले पटाखे फोड़ने के नाम पर होने वाला शोरशराबा इस बार नहीं के बराबर है। लेकिन हम लोगों का यह त्योहार रोशनी, संपन्नता का है तो बिना पटाखे फोड़े बिना मनाने की सलाह मैं नहीं देने वाला। यह तमाम पूंजीवादी देशों (Capitalist Countries) का रोना-पीटना है जो पर्यावरण रक्षा के नाम पर गरीब देशों को यह न करो-वह न करो कि जबरन सलाह देते रहते हैं। अब यह लगभग साबित हो चुका है कि दुनिया के तमाम देश और खासकर विकसित (पूंजीवादी भी कह सकते हैं) देश जानलेवा गैसों के उत्सर्जन (यानी पैदा करने में) में सबसे आगे हैं लेकिन वे अपने लिए न तो कोई नियम बना रहे हैं और न ही किसी बात का पालन कर रहे हैं। इन सब की अगुआई अमेरिका (US) कर रहा है।

इसलिए दीपावली की हार्दिक बधाई देते हुए तमाम सरोकारों को मद्देनजर रखते हुए ही हम लोगों को यह त्यौहार मनाना है।

एक खास सूचना यह भी है कि आपके इस ब्लॉग हिंदी वाणी को एक साल पूरा हो गया है और जो लोग हमारे कारवां में देश-विदेश से जुड़े हैं, मैं उनका तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। आशा है कि स्नेह बना रहेगा। हालांकि एक साल पूरा होने पर मैं तमाम लफ्फाजी भरी बातें यहां लिख सकता था लेकिन यह कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि इसके लिए आपका समय नष्ट किया जाए। सो दीपावली की पावन बेला और इस ब्लॉग के एक साल पूरा करने पर हार्दिक मुबारकबाद पेश करता हूं। आइए एक दीया जलाएं...हम सभी में फैले अंधकार को दूर भगाने के लिए....

Sunday, October 11, 2009

अशांति फैलाओ और नोबल पुरस्कार पाओ


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को नोबल पुरस्कार की खबर कुछ भारतीय अखबारों के लिए लीड थी तो दूसरी तरफ कुछ अमेरिकी अखबारों में यह छप रहा था कि क्या यह आदमी नोबल पुरस्कार का हकदार है। राष्ट्रपति की कुर्सी संभाले इस आदमी को चंद महीने ही हुए हैं और किस आधार पर इसे नोबल पुरस्कार वालों ने शांति का मसीहा मान लिया। हालांकि कुछ भारतीय अखबारों ने सवाल उठाया कि क्या महात्मा गांधी इस पुरस्कार के हकदार नहीं थे जिन्होंने अहिंसा के बल पर अपने आंदोलन को कामयाब बनाया। लेकिन गांधी जी को इस पुरस्कार के देने में एक नियम आड़े आ गया...कि नोबल पुरस्कार कमिटी सिर्फ उन्हीं लोगों को इसके लिए चुनती है जो जिंदा हैं। यानी जो मर चुके हैं उनके कार्यों का मूल्यांकन संभव नहीं है। यह अजीबोगरीब नियम हैं और दुनिया में जितने भी पुरस्कार दिए जाते हैं उनमें इस तरह के नियम नहीं आड़े आते। लेकिन हम लोग क्या कर सकते हैं...पूंजीवादी देश अपनी शर्तों पर कर्ज देते हैं और अपनी ही शर्तों पर पुरस्कार भी देते हैं। नोबल के लिए यह जरूरी है कि आपका जुड़ाव अमेरिका या यूरोप की किसी यूनिवर्सिटी या संस्था से जरूर हो नहीं तो आपके काम को मान्याता नहीं मिलेगी। वह चाहे फिर अर्मत्य सेन या वी. एस. नॉयपाल ही क्यों न हों।

अमेरिकन मीडिया ने ओबामा को नोबल दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कुछ आंकड़े पेश किए, जिन्हें बहुत संक्षेप में मैं आपके सामने रख रहा हूं।

इराक पर जब से अमेरिकी फौज का कब्जा हुआ, वहां अब तक (यानी कल शनिवार 10 अक्टूबर तक) 1,339,771 इराकी नागरिक मारे जा चुके हैं। यह आंकड़ा अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन का है।

अभी तक इराक में जो अमेरिकी सैनिक मारे गए, उनकी तादाद पेंटागन के मुताबिक 4,667 है।

इराक में अब तक फौज को रखने और वहां लड़ने पर अमेरिका अब तक 689,794,745,678 डॉलर खर्च कर चुका है।

अफगानिस्तान में फौज को रखने और वहां लड़ने पर अमेरिका अब तक 228,759,193,154 डॉलर खर्च कर चुका है।

जॉर्ज डब्ल्यू बुश के समय में ही अमेरिकी लोग बुश के खिलाफ हो गए थे और उनका मानना था कि बुश की इराक व अफगानिस्तान नीति गलत है। बुश ने जिस तरह तमाम देशों में अमेरिकी विस्तारवादी नीति के छेड़छाड़ की, उसकी वजह से अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ और आने वाले समय में पूरी दुनिया में अमेरिकियों के आने-जाने पर ऐसे हमलों की आशंका बढ़ गई। ओसामा बिन लादेन को बुश के समय में ही अफगानिस्तान के खिलाफ खड़ा किया गया और वह उल्टा उसी के गले की फांस बन गया।

ओबामा से एक उम्मीद थी कि वह कुछ करेंगे। उन्होंने अपने लफ्फाजी भरे भाषणों में इसकी झलक भी दिखाई। फौरन ही इराक से अमेरिकी फौज की वापसी की घोषणा कर दी गई लेकिन बाद में यह समय सीमा बढ़ा दी गई। फिर उनका भाषण आया कि इराक में अमेरिकी कंपनियों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। यह भाषण और संकेत कापी चौंकाने वाला था। अमेरिका में जिस तरह लोग बुश के खिलाफ हो गए थे वही हालात ओबमा के लिए पैदा हो रहे हैं। अमेरिका में जिन परिवारों के लोग फौज में है, उनके बीच कराए गए एक सर्वे से पता चलता है कि वे लोग अमेरिकी फौज की इराक से तुरंत वापसी चाहते हैं। लेकिन मुट्ठी भर अमेरिकी कंपनियों के हितों की अनदेखी कर अमेरिकी फौज भला जल्दी कैसे वापस आएगी।

अमेरिकी के जाने-माने स्तंभकार पॉल क्रेग रॉबर्टस, सिंडी शीहन, थॉमस डिलोरेंजो, जॉन फीफर, डेविड माइकल ग्रीन ने अपने कॉलमों में जमकर इस बात की धज्जियां उड़ाई हैं कि ओबामा की नीतियां इस देश को गर्त में ले जा रही हैं। एक तरफ अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ ओबामा के फैसले उसे और बढ़ा रहे हैं। शनिवार को अमेरिकी संस्था फेमिली रिसर्च काउंसिल ने भी ओबामा के तमाम भाषणों और नीतियों की निंदा की है। फाउंडेशन के अध्यक्ष टोनी पर्किंस का कहना है कि ओबामा को जो नीतियां बनानी चाहिए थीं, उसके बजाय वह अन्य चीजों में उलझे हैं।

Tuesday, October 6, 2009

प्यार करें या न करें


प्यार करें या न करें (टु लव आर नॉट टु लव )...विलियम शेक्सपियर ने जब इस लाइन का इस्तेमाल अपने एक उपन्यास में किया था तो उन्हें भी शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि कई सौ साल बाद दुनिया में इस पर बहस शुरू हो जाएगी। प्यार की नई परिभाषाएं गढ़ी जाएंगी और साइबर लव व कैंपस लव जैसे शब्दों का इस्तेमाल हम लोग करने लगेंगे। अगर आप गूगल में ही अंग्रेजी के इस मुहावरे को तलाशने लगें तो चौकें बिना नहीं रहेंगे कि भाई लोगों ने इस मुहावरे पर कितनी सारी सामग्री को गूगलमय कर दिया है। पर यह सब अंग्रेजी में है। हिंदी में तो सारे ही कामदेव के अवतार हैं और उन्होंने एक कामशास्त्र क्या गढ़ लिया है...उसी को अल्टीमेट रामबाण औषधि मानने लगे हैं।

...आप बहके और चौंके नहीं...कि आखिर मैं यह क्या विषय लेकर बैठ गया...जहां राजनीति पर बहस होती हो,जहां सामाजिक सरोकारों पर बहस होती हो, वहां यह क्या विषय आ गया। पर मित्रों, इस विषय पर भी बात करना बहुत जरूरी है। हुआ यह है कि पाकिस्तान की सबसे प्रतिष्ठित लाहौर यूनिवर्सिटी (Lahore University) में एक छात्रा ने यूनिवर्सिटी के आंतरिक ईमेल सिस्टम (इन्ट्रानेट) के जरिए सभी स्टूडेंट्स, प्रोफेसरों व अन्य स्टाफ को एक ईमेल भेजा, जिसका विषय यही था कि लव आर नॉट टु लव (To Love or not To Love) । उसने लिखा है कि वह यह सुन-सुन कर तंग आ चुकी है कि लाहौर यूनिवर्सिटी की छात्राओं को बाहर सोसायटी में महिलाएं अच्छी नजर से नहीं देखती और यही नहीं, उनमें से तमाम महिलाएं यहां की छात्राओं को पवित्र नहीं मानतीं यानी उनकी वर्जिनटी (Virginity) नष्ट हो चुकी है। उस छात्रा का कहना है कि जब उसने इस बात पर गौर किया तो पाया कि उन महिलाओं की बात में दम जरूर है। उसने यूनिवर्सिटी कैंपस में चुपचाप फोटो भी खींचे कि जिससे वह अपनी बात को पुष्ट कर सके। इसके बाद उस छात्रा ने उस ईमेल को अपने ब्लॉग पर भी डाल दिया और वहां इस पर बहस जारी है। ज्यादातर पुरुषवादी सोच के छात्रों ने उस छात्रा को काफी खरी-खोटी सुनाई है और उसके ईमेल को एटम बम करार दिया। एक छात्र ने कहा कि अब जब उस छात्रा की पढ़ाई पूरी होने में छह महीने बाकी रह गए हैं तो उसने यह विषय क्यों उठाया, वह पिछले चार साल से यहां क्या कर रही थी। ...यानी जितने मुंह उतनी बातें।

अब अपने यहां का रुख करते हैं। किस यूनिवर्सिटी की बात करें। दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू, बीएचयू या फिर एएमयू। संयोग से मुझे इन सभी यूनिवर्सिटियों के कैंपस में जाने का मौका मिला। अगर हम लोग भारत के संदर्भ में उस छात्रा के ईमेल को कसौटी पर रख कर देखें तो उसकी बातें बहुत ही दकियानूसी लगेंगी। लेकिन अगर आप गहराई से विचार कर देखें तो इस मामले में गरीब देश यानी तीसरी दुनिया के देश धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ रहे हैं जहां आज अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देश हैं। वहां कम उम्र में लड़कियों का गर्भवती होना एक सामाजिक समस्या बन गया है और वहां परिवार नामक ढांचा बिखर गया है। बच्चों के रंग मनोविज्ञान पर किताब लिखनी वाली अमेरिकन लेखिका ब्रिटनी जॉनसन (Brittany Johnson) इन स्थितियों के लिए वहां की नेस्टी महिलाओं (Nasty Women) को इसके लिए जिम्मेदार मानती हैं। ऐसी महिलाएं जो लंपट किस्म की हैं और परिवार बनाने की तरफ उनका ध्यान नहीं रहता है। यह आदत उनमें शुरू से ही पड़ जाती है। उनका कहना है कि प्यार तो एक पवित्र चीज है लेकिन अब जिस तरह उसकी परिणिति शारीरिक संबंधों (Physical Relations) में होने लगी है...वह खतरनाक है।

हमारे देश की यूनिवर्सिटियों में भी खुलापन (Openness) है और मेरे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जहां दोनों तरफ से सच्चा प्यार होने के बाद शादी भी हुई लेकिन अब इधर तेजी से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं जब छात्राओं के साथ छल हुआ है। पुलिस का निचोड़ यह है कि ऐसी घटनाओं को ज्यादातर जान-पहचान वाले ही जन्म देते हैं। अभी ताजा-ताजा दिल्ली में कई ऐसी घटनाएं घटीं जो दहलाने वाली है। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही एक छात्रा जब एक महीने बाद लौटी तो उसने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी कि उसके सहपाठी ने एक महीने तक विभिन्न शहरों में उससे रेप किया और उसे हंसने पर मजबूर करते हुए उसकी न्यूड फोटो और विडियो बनाई। पुलिस अफसरों का कहना है कि छात्रा के आरोप की जांच होगी। लेकिन कम से कम आपके गले छात्रा का आरोप नहीं उतरा होगा। पुलिस के कुछ अफसर दबी जबान से कहते हैं कि माता-पिता शुरू से इन बातों पर ध्यान नहीं देते और खुलेपन के नाम पर आजादी दे देते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं कि आप परिवार का तालिबानीकरण कर दें लेकिन किसी न किसी मुकाम पर कुछ चीजें तो दुरुस्त करने की जरूरत है ही।

हमारी शिक्षा व्यवस्था के पैरोकारों ने शुरू में स्कूल के लेवल से ही सेक्स एजुकेशन (Sex Education) देने की बात को काफी हवा दी और उतना ही उसका मुखर विरोध भी हुआ। इन दोनों के बीच में यह प्रश्न अनुतरित ही रहा कि क्या हमारे स्कूली स्टूडेंट्स को सेक्स एजुकेशन की जरूरत है। लेकिन न तो किसी समाजशास्त्री ने इस पर आगे बढ़कर अध्ययन की जरूरत बताई और न हमारे नेताओं ने इस पर रिसर्च कराने की बात कही। चलिए मान लेते हैं कि इसमें रिस्क है, पर हम लोग यह तो कर ही सकते थे कि स्कूल लेवल से मॉरल एजुकेशन (Moral Education) जैसी कोई चीज शुरू करते। तमाम ईसाई मिशनरी के स्कूलों में इसे पिछले कुछ सालों में शुरू किया गया है लेकिन सरकारी स्कूलों में तो जब स्पोर्ट्स के लिए टीचर नहीं होते तो भला मॉरल एजुकेशन के लिए कहां से टीचर रखे जाएंगे। यह मान लीजिए कि अपने देश के भी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में लाहौर यूनिवर्सिटी के मुकाबले माहौल कम खराब नहीं है। अभी दिल्ली के ही कॉलेजों और जेएनयू में छात्र को नंगा करके उसकी रैंगिंग (Ragging) करने की घटनाएं तो यही बताती हैं कि यह सब एक सड़ी हुई मानसिकता की देन है। इसे महज खुलेपन के नाम पर नजरंदाज करने की भूल नहीं करनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में विचारों के खुलेपन की कुछ सीमा तो तय ही करनी होगी।

इस लेख के नीचे वह खबर है जिसमें लाहौर यूनिवर्सिटी में चल रही उस बहस का जिक्र है। उस खबर को पढ़ने से आपको इस लेख का संदर्भ समझने में आसानी रहेगी।


The love lives of students at a premier educational institute in Pakistan have become the subject of a heated debate.
The campus of the elitist Lahore University of Management Sciences, which has been divided between conservative, retro-revisionists, ultra-modern, party-hopping and next-generation liberals, was witness to the debate when a woman student sent a mass email on the university's mailing system.
The unnamed student, thought to be a conservative, sent out the email saying she was fed up with on-campus indecency. The mail titled To love or not to love, has been described as a social suicide bomb by Asif Akhtar, a recipient of the mail.

The student claimed some senior students have to seek physical consolation from the members of opposite sex many times in a day on campus and in public sight. To back her claims, she provided specific examples and collected photographic evidence.

Akhtar quoted the student's email in his blog. Standing at the main entrance, a girl stands on tip of her toes and kisses a boy good bye; lying in the lawn in front of the library, a boy rolls over the girl lying down beside him and remains in this posture; sitting in the academic block, a boy constantly rubs a girls leg.....

After furnishing this evidence, the student points out that because of such behaviour, aunties spread rumours that doubt the chastity of girls studying in LUMS.

Advocating a religious, cultured and social environment at the campus, the student asked the university administration to draw out rules that outline an inter-gender code of conduct on campus.

The email has elicit strong responses on the campus. One male student responded with a I have sinned mail.

I shave twice a week and my 'painchas' (trousers) hang obstinately below my heels. I have a penchant for ties that resemble the Christian cross and my satanic dress code is causing me to stray far, far away from the straight path. During the holy month (of Ramzan), instead of attending Quranic recitals in the mosque, I was listening to the demonic sounds of Pink Floyd, the student wrote further in his email.
He blamed deviant professors for this transition, whose theories made his moral-compass go awry.

Sheikh Umer Zaheer Tajwar, another recipient of the mail, wrote in lumsdailystudent.com, Larki, you had four years to bring it up; why now? You have courageously tolerated this fiesta, why are you pulling the plug on it when you have six months left?