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Wednesday, September 30, 2009

राहुल तोड़ दो इस सिस्टम को


राहुल गांधी के बारे में आपकी क्या राय है...शायद यही कि वह मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और एक ऐसे खानदान से हैं, जिसके अनुकूल सारी परिस्थितियां हैं। उनकी मॉम देश की सत्ता को नेपथ्य से चला रही हैं। उनके आसपास जो कोटरी है वह राहुल को स्थापित करने में जुटी हुई हैं। पर, जनाब अगर आपकी दिलचस्पी भारतीय राजनीति में जरा भी है तो अपनी राय बदलिए। यह कोई जबर्दस्ती नहीं है लेकिन हां, कल आप अपनी राय जरूर बदलेंगे।

भारतीय राजनीति (Indian Politics) में होने जा रहे इस बदलाव का मैं चश्मदीद गवाह हूं। इन लम्हों के लिए मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं। जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तो स्व. राजेंद्र माथुर सीख देते थे कि अगर भारत में पत्रकारिता करनी है तो भारत-पाकिस्तान बंटवारे से लेकर इंदिरा गांधी शासनकाल तक के घटनाक्रम को गहराई और बारीकी से जानना और समझना जरूरी है।...और आज जबकि भारतीय राजनीति में नेहरू के बाद स्टेट्समैन (Statesman) का खिताब पाने वाले अटलबिहारी वाजपेयी सीन से हट चुके हैं, आडवाणी की विदाई नजदीक है, मनमोहन सिंह की अंतिम पारी चल रही है और ऐसे में देश की दो महत्वपूर्ण पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी के पास एक दूसरे को काउंटर करने को दो ही शस्त्र हैं। कांग्रेस के पास राहुल टाइप राजनीतिक मिसाइल है तो बीजेपी के पास मोदी मार्का एटम बम है। दोनों ही पार्टियां आने वाले वक्त में इन्हीं दो हस्तियों के आसपास अपनी राजनीति को केंद्रित रखेंगी। चाहे आप राजनीति शास्त्र के स्टूडेंट हैं या फिर इस महान देश के लोकतांत्रिक मूल्यों (Democratic Values) में यकीन रखते हैं या साफ-साफ यूं कहें कि आप लेखक-पत्रकार ही क्यों न हों तो इन दो लोगों के मूवमेंट, इनके बयान इनकी कथनी-करनी पर नजर रखनी होगी।

अगर आप इन दो शख्सियतों की सामान्य तुलना करें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे। पहले मोदी की बात। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विकास बीजेपी (BJP) या संघ (RSS) में कई चरणों में हुआ। मैं इस शख्स को तब से जानता हूं जब यह व्यक्ति पंजाब का प्रभारी हुआ करता था और चंडीगढ़ जैसे शहर में एक सामान्य जिंदगी गुजार रहा था। पंजाब में बीजेपी ने जो कुछ सीटें जीती थीं वह इसी आदमी के संगठन क्षमता की देन थी। पंजाब के एक मौजूदा मंत्री मनोरंजन कालिया तो आजतक इस आदमी के गुण गाते हैं। बीजेपी व संघ के गैर शादीशुदा नेताओं के बारे में आमतौर पर जो प्रचार (या कुप्रचार ही मान लेते हैं) चलता है, उसे लेकर मोदी भी अछूते नहीं रहे। मोदी को जब गुजरात का नेतृत्व मिला तो उन्होंने उसे संघ की प्रयोगशाला बनाकर बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं की बोलती बंद कर दी। यह अलग बात है कि बीजेपी को अब उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है और आगे भी चुकानी पड़ेगी। लेकिन मोदी के समर्थक इसे ही उनकी सफलता मानते हैं। गुजरात में हुए नरसंहार (Gujarat Genocide – Gujarat Massacre ) का सबसे बड़ा दाग भी इसी आदमी के माथे पर है। अभी एक दिन पहले जब इस शख्स ने कमांडो के शस्त्रों को लेकर उसकी पूजा (Worship of Weapon) की तो इस व्यक्ति की मनोवृत्ति (Thinking) का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।


दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं जो मोदी के मुकाबले राजनीति में न तो परिपक्व हैं और न ही किसी पार्टी के कैडर (Party Cadre) ने उन्हें खड़ा किया है। यही बात उनके पक्ष में भी जाती हैं। मोदी जब अपने रात-दिन शस्त्रों की पूजा में लगा रहे हैं तो राहुल के दिन-रात दलितों के साथ बीत रहे हैं। शुरुआत में यही कहा गया कि यह सब सस्ती लोकप्रियता पाने का जरिया है लेकिन अब वही टिप्पणीकार अपनी राय बदल रहे हैं। राहुल के इस एक एक्शन ने यूपी की दलित मुख्यमंत्री मायावती की नींद उड़ा दी है जो दलितों को वोट बैंक के रूप में काफी दिनों से ट्रीट कर रही हैं। कांग्रेस का यह अकेला सांसद है जिसने नरेगा के फंड पर बारीक नजर रखी हुई है कि किस गांव में कौन सा राज्य कितना खर्च कर रहा है। इस नेता के पास ताजा आंकड़ा हमेशा उपलब्ध रहता है। मंगलवार (29 सितंबर) की रात दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू JNU) में जो कुछ हुआ, वह खबर शायद अभी आपकी नजरों से नहीं गुजरी होगी। पता नहीं खबरिया चैनल उसे दिखा रहे हैं या नहीं मुझे नहीं मालूम।

क्या हुआ जेएनयू में

मंगलवार की रात राहुल गांधी जेएनयू गए थे स्टूडेंट्स से सीधा संवाद करने लेकिन वहां हंगामा हो गया। इस मीटिंग में सिर्फ जेएनयू के ही स्टूडेंट्स को ही आने की अनुमति थी। किसी भी तरह के मीडिया को यहां आने की मनाही थी। बहरहाल, मीडिया तक छनकर खबरें पहुंच गईं। राहुल जैसे ही वहां बोलने के लिए खड़े हुए कुछ स्टूडेंट्स काले झंडे लेकर वहां नारेबाजी करने लगे। हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगों में गरीब राहुल या उनके पिता राजीव की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन स्टूडेंट्स नारे लगा रहे थे- एक धक्का और दो, 84 के दोषियों को फेंक दो।

राहुल ने इस विरोध से मुंह चुराना या वहां से खिसकना मुनासिब नहीं समझा। वह वहीं डटे रहे। उन्होंने उन स्टूडेंट्स से कहा कि वे उनसे आकर बात करें। जब हंगामा नहीं थमा तो राहुल ने उनसे कहा कि अब मेरे पास दो विकल्प हैं- या तो मैं स्टेज पर खड़ा रहूं या फिर नीचे आकर आपसे बात करूं। इसके बाद राहुल स्टेज से उतरे और सीधे जाकर उन स्टूडेंट्स के बीच में जाकर खड़े हो गए। धीरे-धीरे नारे शांत हो गए।

पर, जेएनयू के बुद्धिजीवी टाइप स्टूडेंट्स जो ठानकर आए थे कि राहुल से तमाम मुद्दों पर सवाल पूछना है, वे कहां मानने वाले थे। उन्होंने सवालों की बौछार कर दी। राहुल ने उनका सामना किया। राहुल ने कहा – आप मुझे चुप कराने का इरादा लेकर आए होंगे, हो सकता है आप कामयाब भी हो जाएं लेकिन इससे क्या दुनिया बदल जाएगी, दुनिया बदलेगी हमारे और आपके मिलकर काम करने से। उन्होंने बताया – मैं अभी कई दलित घरों में गया था। मैंने उनसे पूछा कि आपके जीवन में सबसे ज्यादा खुशी का दिन कौन सा था, उन दलितों ने जवाब दिया कि जिस दिन हमारे कर्ज माफ किए गए। राहुल ने कहा – मैं नेता हूं, लोगों से मिलना मेरा फर्ज है। बाकी 99 नेता किसी के घर नहीं जाते। लेकिन उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है। मेरे जाने पर हंगामा किया जा रहा है।

राहुल के पास एक चिरपरिचित सवाल आया जो आपका भी हो सकता है और मेरा भी क्योंकि मैंने अपनी बात वहीं से शुरू की थी। एक स्टूडेंट ने राहुल से कहा कि आप बिना कुछ किए धरे (यानी संघर्ष किए बिना ही) यूथ आइकन (Youth Icon युवाओं की पहचान) बन गए हैं। राहुल का जवाब सुनिए – मैं इसी सिस्टम से आया हूं। मेरे पास दो रास्ते थे, मैं घर बैठ जाता तो आप लोग मुझे कायर कहते। तो मैं इस सिस्टम का हिस्सा बना क्योंकि इस सिस्टम में रहकर ही मुझे इसे खत्म करना होगा। मैं इस सिस्टम (Corrupt System) का उतना ही विरोधी हूं, जितने आप हैं लेकिन मेरी इस बात पर आप लोगों को यकीन शायद नहीं होगा।

...अगर आप राहुल की बातों पर गौर फरमाएं तो पाएंगे कि यह शख्स कांग्रेस संस्कृति (Congress Culture) से थोड़ा हटकर बात कर रहा है। ऐसी उम्मीद है कि जब कभी सत्ता की बागडोर उसे मिलेगी तो वह इस सिस्टम को तोड़ेगा। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन कौन नहीं जानता कि राजीव गांधी ने अल्प समय में भारत के युवाओं के लिए जो कुछ किया, आज उसका असर चारों तरफ दिखाई दे रहा है। मौजूदा पीढ़ी के लिए भी राहुल एक उम्मीद हैं। तमाम राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद वह मोदी के व्यक्तित्व पर भारी पड़ रहे हैं।

Friday, September 25, 2009

मेरे जूते की आवाज सुनो


इराक के पत्रकार मुंतजर अल-जैदी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जब पिछले साल जूता फेंका था तो पूरी दुनिया में इस बात पर बहस हुई कि क्या किसी पत्रकार को इस तरह की हरकत करनी चाहिए। उसके बाद ऐसी ही एक घटना भारत में भी हुई। यह बहस बढ़ती चली गई। बुश पर जूता फेंकने वाले इराकी पत्रकार अभी हाल ही में जेल से छूटे हैं। जेल से छूटने के बाद यह पहला लेख उन्होंने लिखा, जिसे हिंदी में पहली बार किसी ब्लॉग पर प्रकाशित किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस लेख से और नई बहस की शुरुआत होगी...

मैंने बुश पर जूता क्यों फेंका
-मुंतजर अल-जैदी

अनुवाद – यूसुफ किरमानी

मैं कोई हीरो (Hero) नहीं हूं। मैंने निर्दोष इराकियों का कत्ले-आम और उनकी पीड़ा को सामने से देखा है।

आज मैं आजाद हूं लेकिन मेरा देश अब भी युद्ध के आगोश में कैद है। जिस आदमी ने बुश पर जूता फेंका, उसके बारे में तमाम बातें की जा रही हैं और कही जा रही हैं, कोई उसे हीरो बता रहा है तो कोई उसके एक्शन के बारे में बात कर रहा है और इसे एक तरह के विरोध का प्रतीक मान लिया गया है। लेकिन मैं इन सारी बातों का बहुत आसान सा जवाब देना चाहता हूं और बताना चाहता हूं कि आखिर किस वजह से मैं बुश पर जूता फेंकने पर मजबूर हुआ। इसका दर्द काश आप लोग समझ पाते...कि जिसके देश की सार्वभौमिकता को फौजियों के बूटों तले रौंद डाला गया, जिसके देशवासियों को कदम-कदम पर अपमान सहना पड़ा, जिसके निर्दोष देशवासियों का खून बहाया गया।

हाल के वर्षों में दस लाख से ज्यादा लोग इराक में फौजियों की गोली का निशाना बने और अब देश में पांच करोड़ से ज्यादा यतीम-बेसहारा लोग, दस लाख विधवाएं और हजारों ऐसे निरीह जिन्होंने यह दुनिया ही नहीं देखी। लाखों लोग इस देश में और इस देश से बाहर (यानी इराकी) बेघर हो गए।

हमारा देश एक ऐसा देश हुआ करता था जहां अरब वाले भी थे, तुर्की भी थे तो कुर्द, असीरी, साबीन और यज्दी अपनी रोटी-रोजी कमाते थे। जहां बहुसंख्यक शिया लोग सुन्नियों के साथ एक ही लाइन में नमाज पढ़ते थे...जहां मुसलमान ईसाइयों के साथ हजरत ईसा मसीह का जन्मदिन (Birthday of Christ) एक साथ मनाया करते थे। हालांकि हमारे देश पर पिछले दस साल से तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए थे लेकिन हम लोग इसका मुकाबला जैसे-तैसे एक साथ कर रहे थे। अगर हम लोग भूखे भी रहे थे और हर कोई इसमें भी साथ था।

हम इराकी अपने धैर्य और एकता के दौरान हुए हमलों को कभी नहीं भूले। इसी हमले ने तो भाई-भाई को बांट दिया, पड़ोसी को पड़ोसी से दूर कर दिया। हमारे घर मातम वाले टेंटों में बदल गए।

मैं कोई हीरो नहीं हूं। लेकिन मेरा अपना एक विचार है। मेरा एक स्टैंड है। जब मेरे देश की बेइज्जती की गई तो इसे मैंने अपनी बेइज्जती समझा, मैंने अपने बगदाद को शोलों (Baghdad Burning) में घिरा पाया, जहां लाशों पर लाशें बिछाई जा रही थीं। मैं कैसे हजारों पीड़ादायी फोटो को भुला दूं, जो मुझे संघर्ष के लिए आगे धकेल रही थीं। अबू गरीब जेल का स्कैंडल, फालूजा का कत्लेआम, नजफ (Najaf), हदीथा, सद्र सिटी, बसरा, दियाला, मोसूल, ताल अफार और देश का कोना-कोना एक लहुलूहान शक्ल लिए नजर आता था। मैंने अपनी जलती हुई धरती के बीच यात्राएं की, अपनी आंखों से पीड़ितों, यतीमों और जिनका सबकुछ लुट चुका था, उनकी चीखें सुनी। मैंने खुद के होने पर शर्म महसूस की, क्योंकि मेरे पास सत्ता नहीं थी।

रोजाना तमाम त्रासदियों की अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी पूरी करने के बाद जब मैं मलबे में तब्दील हो चुके इराकी मकानों को साफ करता या अपने कपड़े पर लगे खून को साफ करता को गुस्से में अपने दांत किटकिटाता और तब प्रण करता कि मैं इसका बदला लूंगा।...और जब मौका आया तो मैंने देर नहीं लगाई।

मैंने जब अपना जूता फेंकने के लिए निकाला तो मेरी नजर उन खून भरे आंसुओं को देख रही थीं जो अपने ही देश पर कब्जा होने की वजह से लगातार रो रही थीं, मेरी कानों में उन बेबस मांओं की चीखें गूंज रही थीं जिनके बच्चे मार दिए गए थे, मैं उन यतीम-बेसहारों लोगों की आवाज सुन रहा था जो अपने माता-पिता को खो चुके थे, मेरे सामने उन दर्द भरी सिसकारियों की आवाज थी जिनके साथ बलात्कार किया गया था...

जूते फेंकने के बाद जब कुछ लोग मेरे पास आए तो मैंने उनसे कहा, क्या आप जानते हैं कि कितने ही टूटे घरों (Broken Houses) की आवाज था वह जूता। उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई। जब सारे मानवीय मूल्य (Human Values) ध्वस्त हो चुके हों तो ऐसे में हो सकता है कि वह जूता ही सही जवाब था।
मैंने जब उस अपराधी (Criminal) जॉर्ज बुश (George Bush) पर जूता फेंका तो मेरा यह एक्शन दरअसल उसके तमाम झूठों और मक्कारियों को खारिज करने के लिए था, यह मेरे देश पर उसके कब्जे के खिलाफ सही निशाना था, उसने जिस तरह मेरे अपने लोगों को जो बेगुनाह थे, उनका कत्ल कराया, यह जूता उनकी आवाज था। मेरा जूता उसकी उस नीयत के खिलाफ था, जिसकी वजह से हमारे देश की दौलत लूटी गई, हमारे सारे संसाधनों को तहस-नहस कर दिया गया और हमारे बच्चों को दिशाहीन हालत में छोड़ दिया गया।

अगर आप समझते हैं कि बतौर पत्रकार मुझे यह सब नहीं करना चाहिए था और इससे उन लोगों को नीचा देखना पड़ा, जहां मैं काम करता था तो मैं उनसे माफी मांगता हूं। लेकिन मेरा यह विरोध उस नागरिक का विरोध था जो रोजाना अपने देश को उस व्यक्ति की फौजों के बूटों तले मसलते हुए देख रहा था। मेरी प्रोफेशनलिज्म (Professionalism) पर मेरी देशभक्ति (Patriotism) भारी पड़ रही थी।...और अगर देशभक्ति को अपनी आवाज बुलंद करनी है तो प्रोफेशनलिज्म को इसके साथ तालमेल बिठा लेना चाहिए।

मैंने यह काम इसलिए नहीं किया कि मेरा नाम इतिहास में दर्ज हो जाए या इसके बदले मुझे कोई इनाम मिले, मैं सिर्फ और सिर्फ अपने देश का बचाव करना चाहता हूं...मैं इसे तिल-तिल कर मरते नहीं देखना चाहता...मैं इसे फौज के बूटों तले रौंदे जाते हुए नहीं देखना चाहता...नहीं देखना चाहता।

(यह लेख द गार्डियन लंदन से साभार सहित लिया गया है।)
बुश पर जब जूता फेंका गया तो उस वक्त भी एक लेख और एक कविता इस ब्लॉग पर दी गई थी। उसमें जूते फेंकने का लाइव विडियो भी था। लेख, कविता और विडियो के लिए इन दो लिंकों पर जाएं...
http://hindivani.blogspot.com/2008/12/blog-post_16.html
http://hindivani.blogspot.com/2008/12/blog-post_17.html

Sunday, September 20, 2009

आर्थिक मंदी में ईद मुबारक



इस कविता के जरिए मैं आप सभी को तमाम किंतु-परंतु के साथ ईद, नवरात्र और विजय दशमी की मुबारकबाद देना चाहता हूं।


आर्थिक मंदी के इस दौर में
महंगाई और बेरोजगारी के अंधकार में
पेशेवर पत्रकारिता के बाजारवाद में
कुछ रंगे सियारों से संघर्ष के फेर में

मुट्ठी भर आतंकवादियों की हरकतों के बीच में
भगवा ब्रिगेड की विष वमन की पॉलिटिक्स में
मोदी मार्का जिनोसाइड के खेल में
पर, प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग से निजात में

और हां, अमेरिकी कुटिल चालों के जाल में
मासूम फिलिस्तीनी बच्चों की सिसकारी में

और कुल मिलाकर
मैडम सोनिया व मनमोहन की सदारत में
आपको ईद मुबारक हो

Thursday, September 17, 2009

मां की कहानी...कुछ कहना है उनका



मां मुझे भी एक कहानी सुनाओ...पर एनजीओ उदय फाउंडेशन ने कुछ ऐतराज उठाया है। हालांकि उन्होंने यह ऐतराज फोन पर किया है और लिखकर संक्षेप में जो भेजा है उसमें यह नहीं बताया कि दरअसल उन्हें ऐतराज किस बात पर है।

पहले तो उनका पत्र पढ़ें जो उन्होंने लिखा है और नीचे उससे जुड़े लिंक भी देखें...

Dear Sir

It is really shocking that how come a senior journalist like you can write some thing without going through the correct facts. It doest matter that it was published any paper or not . What really matter is hurting a sentiments of grass roots workers like us.

As u asked today to sent you any news item where govt hospital details are being mentioned.

Warm Regards

Rahul Verma
Founder
The Uday Foundation

पहली बात यह बता दूं कि वह लेख उदय फाउंडेशन (Uday Foundation) के खिलाफ नहीं था। उसमें मैंने एक मुद्दा उठाया था कि आखिर क्यों तमाम एनजीओ (NGO) प्राइवेट अस्पतालों में ही अपनी सारी गतिविधियां चलाते हैं। उन्हें सरकारी अस्पताल क्यों नहीं दिखाई पड़ते, जहां आम आदमी सबसे ज्यादा पहुंचता है। कुल मिलाकर यही मुद्दा उस लेख के केंद्र में था। उदय फाउंडेशन ने अस्पतालों में जाकर विभिन्न रोगों से ग्रस्त बच्चों को कहानी सुनाने की शुरुआत की। प्रोग्राम निश्चित रूप से अच्छा है और इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है लेकिन हमारा मुद्दा अब भी वही है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में एनजीओ क्यों नहीं पहुंच रहे हैं। उनकी सरकारी गतिविधियां अपोलो हॉस्पिटल, मैक्स, एस्कार्ट्स फोर्टिस अस्पतालों तक ही क्यों सीमित हैं।

एनजीओ चलाने वालों की अपनी दिक्कतें हो सकती हैं। जैसा कि मुझे कुछ एनजीओ वालों ने ही बताया कि वे अपना कोई भी प्रोजेक्ट शुरू करने से पूर्व सबसे पहले सरकारी एजेंसियों से बात करते हैं लेकिन उनकी कार्रवाई पूरी होने में कभी तीन महीने तो कभी छह महीने भी लग जाते हैं। ऐसे में एनजीओ इतने दिन कैसें रूकें और क्या करें। मुझे भी सही मायने में उनकी यह दिक्कत समझ आती है और सरकारी एजेंसियों का जो हाल है, वह सभी को पता है। लेकिन इस संबंध में मेरा यह कहना है कि ठीक है आप प्राइवेट अस्पतालों में अपनी गतिविधियां चलाएं लेकिन अगर तीन या छह महीने में ही किसी सरकारी अस्पताल या डिस्पेंसरी में जाने के लिए आपके प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलती है तो आप मौका न चूकें। अगर साल भर में आप दस प्राइवेट अस्पतालों में जाते हैं तो कम से कम एक सरकारी अस्पताल में तो तमाम लालफीताशाही ( Red tapism )के बावजूद पहुंचा जा सकता है।



उस लेख में उदय फाउंडेशन की नीयत (Objectives) और गतिविधियों में किसी प्रकार का संदेह नहीं किया गया था। अगर आप उनकी वेबसाइट पर जाएं तो पाएंगे कि यह एनजीओ काफी कुछ कर रहा है और वाकई सोसाइटी (Society) को उसकी सख्त जरूरत भी है। चाहे वह रेयर ब्लड (Rare Blood Group) मुहैया कराना हो या फिर तमाम अजीबोगरीब रोगों से ग्रस्त बच्चों को इलाज मुहैया करना हो, उदय फाउंडेशन ने इस क्षेत्र में काफी कुछ किया है। अगर उस वेबसाइट में राहुल वर्मा, जो इस एनजीओ को चला रहे हैं, उनकी और उनके बच्चे की कहानी पढ़ेंगे तो प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे।

लेकिन यहीं पर कुछ रुककर मैं कुछ और कहना चाहूंगा।

उदय फाउंडेशन ने पिछले दिनों एक गंभीर मुद्दा उठाया था कि पिछले दिनों अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स AIIMS) में किस तरह कुछ समय के अंतराल में काफी बच्चों की मौत हो गई थी। इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहस (National Debate) भी हुई। हालांकि मैं न तो एम्स से जुड़ा हूं और न ही उसकी वकालत करना चाहता हूं। लेकिन मेरा यह कहना है कि सरकारी अस्पताल में इस तरह के मुद्दे तो मिल ही जाते हैं लेकिन प्राइवेट अस्पतालों की लूटखसोट के खिलाफ कौन सा एनजीओ खड़ा होता है। पिछले दिन अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया ने प्राइवेट अस्पतालों की लूटखसोट के खिलाफ बाकायदा सीरिज चलाकर खबरें छापीं लेकिन किसी एनजीओ ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश नहीं की। एम्स देश का जाना-मान संस्थान है। देशभर से लोग यहां इलाज कराने आते हैं और यहां पर उन्हें काफी विश्वास है। एम्स ने यह प्रतिष्ठा एक दिन में विज्ञापनों और अखबारों में चमत्कारिक सर्जरी की पॉजिटिव खबरें छपवाकर नहीं हासिल की है। देश में और खासकर राजधानी दिल्ली में प्राइवेट अस्पतालों को यह रुतबा पाने के लिए अभी मीलों यह सफर तय करना है।

मेरा मकसद क्या है...

इस सारी बहस के पीछे मेरा मकसद यह है कि चैरिटी वाली संस्थाओं और प्राइवेट संस्थाओं को जनता के प्रति जवाबदेह (Accountability) बनाना। यह बहुत जरूरी है। अगर आप ने कॉरपोरेट सेक्टर (Corporate Sector) से या पब्लिक से डोनेशन लिया है या फिर सरकार से सस्ती जमीन लेकर गरीबों के इलाज के नाम पर फाइव स्टार अस्पताल खड़ा कर दिया है तो आपको पब्लिक के प्रति जवाबदेह तो होना ही पड़ेगा।

मैं तो अपने सभी ब्लॉगर साथियों और इसके पाठकों से अपील करता हूं कि अगर उन्हें भी इस तरह की जवाबदेही में कहीं कोई कमी नजर आती है तो वे इन विषयों पर कलम चलाएं। दिल्ली में तमाम एनजीओ और अस्पातालों के बारे में लिखना आसाना है। जरूरत है कि दूरदराज के इलाकों में जो संस्थाएं इस तरह का काम कर रही हैं, उन पर भी लिखा जाए। अगर कोई एनजीओ वाकई लोगों के जीवन में कुछ सार्थक बदलाव ला सका है तो वह बात भी सामने आनी चाहिए।

इस लेख का संदर्भ समझने के लिए मेरा यह लेख भी पढ़ें...

http://hindivani.blogspot.com/2009/09/blog-post_06.html


अपने ईमेल में राहुल वर्मा द्वारा भेजे गए कुछ लिंक....

Please go through following news item on IANS

http://www.sindhtoday.net/news/1/44354.htm

also you can learn read more news about the same on our website

http://www.udayfoundationindia.org/news-room.php


Please also do read who i am, who is uday the name behind Uday Foundation at following link

http://www.udayfoundationindia.org/about-us.php

Saturday, September 12, 2009

क्या होगा इन कविताओं से

उन्हें मैं करीब एक दशक से जानता हूं। आजतक मिला नहीं लेकिन यूपी के एक बड़े नामी और ईमानदार आईएएस अफसर हरदेव सिंह से जब उनकी तारीफ सुनी तो जेहन में यह बात कहीं महफूज रही कि इस शख्स से एक बार मिलना चाहिए। उनका नाम है प्रो. शैलेश जैदी। वह पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदी के विभागाध्यक्ष भी रहे। हरदेव सिंह ने भी यही बताया था कि शैलेश साहब हिंदी के वाकई बड़े विद्वान हैं। मेरी मुलाकात उनसे अब तक नहीं हुई। अभी जब दिलीप मंडल ने इशरतजहां पर नीचे वाली कविता इस ब्लॉग हिंदी वाणी के लिए लिखी तो प्रतिक्रिया में उन्हीं प्रो. शैलेश जैदी ने एक कविता भेजी है। जिसे मैं इस ब्लॉग के पाठकों और मित्रों के लिए पेश कर रहा हूं -

क्या होगा इन कविताओं से

कितने हैं दिलीप मन्डल जैसे लोग ?
और क्या होता है इन कविताओं से ?
आंसू भी तो नहीं पोंछ पातीं ये एक माँ के।
अप्रत्यक्ष चोटें व्यंग्य तो कहला सकती हैं,
पर गर्म लोहे के लिए हथौडा नहीं बन सकतीं ।
इसलिए कि गर्म लोहा अब है भी कहाँ
अब तो हम ठंडे लोहे की तरह जीते हैं
और गर्म सांसें उगलते हैं।
हरिजन गाथा की बात और थी
वह किसी इशरत जहाँ पर लिखी गयी कविता नहीं थी,
इशरतों के तो पहले भी
गुजरात में भस्म तैयार किये गये
और इस भस्म को शरीर पर मलकर
जीते गये चुनाव्।
कितने दिलीप मंडलों ने लिखी थीं
उस समय कविताएं ?
खैर ! कल की बात जाने दीजिए
कविता अच्छी है ।
किसे दूं मैं इस कविता की बधाई ?
इशरत जहाँ को ?
उनकी माँ को ?
दिलीप मंडल को ?
या खुद को ?
इसलिए, कि इस कविता से सब ख़ुश हुए।
बस इतनी ही है किसी कविता की नियति।

-शैलेश ज़ैदी


इसी बहाने


प्रो. शैलेश जैदी की एक और ताजतरीन गजल पेश कर रहा हूं जिसे मैने सीधे उनके ब्लॉग युगविमर्श से उठाया है। मुझे यह गजल बहुत पसंद है और मौजूदा दौर में बहुत प्रासंगिक है। आइए पढ़ते हैं-

जमाने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था

ज़माने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था ।
ये बात और है सर-ता-क़दम तबाह भी था॥

ख़मोशियों से मैं बढ़ता रहा सुए-मंज़िल ,
सियासतों का जहां जब के सद्दे-राह भी था॥

बयान कर न सका मैं सितम अज़ीज़ों के,
के ऐसा करने में अन्देशए-गुनाह भी था ॥

जो ख़ुद को करता था मेरे फ़िदाइयों में शुमार,
मेरे ख़िलाफ़ वही शख़्स कल गवाह भी था ॥

ख़ुलूस उस का बज़ाहिर बहोत ही दिलकश था,
बरत के देखा तो क़ल्बो-जिगर सियाह भी था॥

गुज़र रही थी फ़क़ीरी में ज़िन्दगी उस की,
ख़बर किसे थी सुख़न का वो बादशाह भी था ॥

उसी की सिम्त किया क़िब्ला रास्त खुसरो ने,
जो कज-कुलाह भी था और दीं-पनाह भी था॥*
******************
* अमीर खुसरो के गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने एक दिन कुछ हिन्दुओं को यमुना में नहाते देख कर सहज भाव से कहा - हर क़ौमे-रास्त राहे, दीने व क़िब्लागाहे। अर्थात प्रत्येक क़ौम का अपना सन्मार्ग होता है, धर्म होता है और पूज्य स्थल भी। हज़रत अमीर ख़ुसरो पास में ही खड़े थे, उन्हों ने अप्ने गुरु की ओर सकेत कर के तत्काल इस शेर को दूसरा चरण कह कर पूरा कर दिया - मन क़िब्ला रास्त करदम बर सिम्ते-कज-कुलाहे अर्थात मै अपना पूज्य स्थल तिर्छी टोपी वाले की ओर सीधा करता हूं।मुसलमानों में क़िब्ला [काबे] की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ी जाती है और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तिरछी टोपी [कजकुलाह] लगाते थे। इस शेर में यही सकेत है।

...................

प्रोफेसर साहब से संपर्क और संवाद करें

प्रोफेसर एवं पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष
तथा डीन, फैकल्टी आफ आर्ट्स
मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ,
Mob. 9412273068

http://yugvimarsh.blogspot.com/

Thursday, September 10, 2009

माफी तो मांगनी चाहिए



-दिलीप मंडल

इशरत जहां केस के कवरेज के लिए नहीं
तो अपनी भाषा के लिए,
अपनी अनीति के लिए।

मुकदमे का फैसला होने तक
अभियुक्त लिखा जाता है अपराधी नहीं
हम सब जानते हैं
पत्रकारिता के स्कूलों यही तो पढ़ते हैं।
लेकिन हममें उतना धैर्य कहां
मुठभेड़ में मरने वालो को
आंतकवादी कहने में देर कहां लगाते हैं हम?
मुठभेड़ कई बार फर्जी होती है,
पुलिस जानती है
कोर्ट बताती है,
हम भी जानते हैं,
लेकिन हमारे पास उतना वक्त कहां
हमें न्यूज ब्रेक करनी होती है
सनसनीखेज हेडलाइन लगानी होती है
वक्त कहां कि सच और झूठ का इंतजार करें।

फर्जी और असली की
मीमांसा करने की न हममें इच्छा होती है
और न ही उतनी मोहलत और न जरूरत।
इसलिए हम हर मुठभेड़ को
असली मानते हैं
फर्जी साबित होने तक।

हम इशरत की मां से
माफी नहीं मांग सकते
मजिस्ट्रेट की जांच में
ये साबित होने के बाद भी कि वो मुठभेड़ फर्जी थी।
हम इससे कोई सबक नहीं सीखेंगे
अगली मुठभेड़ को भी
हम असली मुठभेड़ ही मानेंगे
मरने वालों को आतंकवादी ही कहेंगे
क्योंकि पुलिस ऐसा कहती है।
मरने वालों के परिवार वालों की बात
सुनने का धैर्य हममें कहां,
पुलिस को नाराज करके
क्राइम रिपोर्टिंग चलती है भला?
सोर्स बनाने और बचाने की
पत्रकारीय मजबूरी के आगे
कामयाबी की सीढी़ पर तेज भागने के लिए
पद पाने और बचाने के लिए
और कुछ नहीं तो मजे के लिए
नीति और नैतिकता की बलि चढ़ाएंगे।

अगली इशरत जहां
हमारे ब्रेकिंग न्यूज में आतंकवादी ही कहलाएगी
सच सामने आने तक
जो कभी कभार जमीन फाड़कर
सामने आ जाता है
हमें शर्मिंदा करने
उसे आतंकवादी बनना ही होगा।
हम शर्मिंदा हैं
पर हम माफी नहीं मांग सकते
आखिर हम एक लोकतांत्रिक देश की मीडिया हैं।

-दिलीप मंडल जाने-माने पत्रकार हैं और लंबे समय तक कई टीवी न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं। इस समय वह देश के एक प्रमुख मीडिया हाउस में संपादक हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

Wednesday, September 9, 2009

आतंकवादी की मां


ब्रेकिंग न्यूज...वह आतंकवादी की मां है, उसकी लड़की लश्कर-ए-तैबा से जुड़ी हुई थी। उसका भाई भी लश्कर से ही जुड़ा मालूम होता है। इन लोगों ने लश्कर का एक स्लीपर सेल बना रखा था। इनके इरादे खतरनाक थे। ये लोग भारत को छिन्न-भिन्न कर देना चाहते थे। यह लोग आतंकवाद को कुचलने वाले मसीहा नरेंद्र मोदी की हत्या करने निकले थे लेकिन इससे पहले गुजरात पुलिस ने इनका काम तमाम कर दिया।

कुछ इस तरह की खबरें काफी अर्से बाद हमें मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। अर्से बाद पता चलता है कि सरकारी एजेंसियों ने मीडिया का किस तरह इस्तेमाल किया था। आम लोग जब कहते हैं कि मीडिया निष्पक्ष नहीं है तो हमारे जैसे लोग जो इस पेशे का हिस्सा हैं, उन्हें तिलमिलाहट होती है। लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं चुराना चाहिए। अगर आज मीडिया की जवाबदेही (Accountability of Media ) पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो यह ठीक हैं और इसका सामना किया जाना चाहिए। मीडिया की जो नई पीढ़ी इस पेशे में एक शेप ले रही है और आने वाले वक्त में काफी बड़ी जमात आने वाली है, उन्हें शायद ऐसे सवालों का जवाब कुछ ज्यादा देना पड़ेगा।

गुजरात में हुए फर्जी एनकाउंटर (Fake Encounter) की खबरें आज हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। विश्व भर में तमाम फोरमों पर, अखबारों में और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इन सवालों को उठा कर सवाल पूछे जा रहे हैं। इशरतजहां और कुछ अन्य युवकों का गुजरात में 2004 में किया गया एनकाउंटर इस समय बहस के केंद्र में है। इस एनकाउंटर को अंजाम देने वाले पुलिस अफसर डी. जी. बंजारा पहले से ही जेल में हैं और उन्हें एक फर्जी एनकाउंटर (सोहराबुद्दीन केस) में दो साल की सजा सुनाई जा चुकी है। वर्ष 2004 का ऐसा समय था जब गुजरात में फर्जी एनकाउंटरों की बाढ़ लग गई थी और बंजारा नामक इस अधिकारी को गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी तरक्की पर तरक्की देते जा रहे थे। लेकिन उन एनकाउंटरों की खबरें छापने वाले अखबार और टीवी न्यूज चैनल आज कहां खड़े हैं। मीडिया ने इन खबरों की सत्यता जांचे बिना खूब हवा दी और इसने समाज के ताने-बाने पर भी जबर्दस्त असर डाला।

आज के अखबारों और न्यूज चैनलों पर नजर डालें तो सब के सब गुजरात पुलिस को विलेन बनाते नजर आएंगे। सारे के सारे अखबारों में अगर संपादकीय पर नजर डालें तो वे मोदी और गुजरात पुलिस को कटघरे में खड़े करते नजर आएंगे। इनमें से कोई यह लिखने या कहने को तैयार नहीं है कि जब उसने इस फर्जी एनकाउंटर को ब्रेकिंग न्यूज बताकर पूरे देश को झकझोर दिया था और देश में हर मुसलमान पर आतंकवादी होने का शक जताया जा रहा था तब उसने गलती की थी और अब उसे माफी मांगनी चाहिए। हद तो यह है कि इशरतजहां के मामले में केंद्रीय गृहमंत्रालय (MHA) तक ने कोर्ट में शपथपत्र दिया कि एनकाउंटर में मारे गए युवक-युवतियों के संबंध लश्कर-ए-तैबा से थे।

आतंकवादी की मां होने पर जो बयान इशरतजहां की मां शमीमा कौसर ने दिया है, वह बताता है कि कैसे ऐसी घटनाएं हमारे सामाजिक ढांचे को झकझोर देती हैं। शमीमा कौसर ने कहा कि जब उनकी बेटी को आतंकवादी बताकर मार डाला गया तो मुंबई के ठाणे इलाके में जहां वह रहती हैं, वह उनका सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) कर दिया गया। उनके अन्य बेटे-बेटी जो स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे थे, उनका नाम वहां से काट दिया गया और वे आगे पढ़ाई नहीं कर सके। वे जहां जाते लोग उनके बारे में यही कहते थे कि देखो आतंकवादी की मां जा रही है, देखो आतंकवादी की बहन जा रही है, देखो आतंकवादी का भाई जा रहा है। किसी एक कंपनी में इशरतजहां की बहन को रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिली हुई है लेकिन वहां भी उसे अपनी पहचान छिपानी पड़ी। अहमदाबाद हाई कोर्ट ने जिस जज एस. पी. तमांग से इसकी जांच कराई, उसकी जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह परिवार सामने आने की हिम्मत जुटा सका।


यह कोई एक केस नहीं है। गोधरा दंगों (Godhara Riot) के दौरान नरौदा पाटिया में जो कुछ हुआ, उस पर फिल्म बन चुकी है। गुलबर्गा सोसायटी में सांसद एहसान जाफरी के परिवार और अन्य लोगों को जिस तरह जिंदा जला दिया गया, उसकी कहानी हर कोई जानता है। कुछ गवाहों को गुजरात सरकार द्वारा रिश्वत की पेशकश का मामला स्टिंग आपरेशन से सामना आ चुका है। लेकिन मीडिया की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह इन केसों के खिलाफ उठकर खड़ा हो। अहमदाबाद में टाइम्स आफ इंडिया (The Times of India) के पत्रकारों ने जब थोड़ी सी हिम्मत दिखाकर मोदी के खिलाफ लिखा तो लोकतंत्र की पक्षधर वहां की बीजेपी सरकार ने टाइम्स आफ इंडिया के उन पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज करा दिया।

ये सारी घटनाएं हमें 1984 की याद दिलाते हैं। जहां इस देश में खालिस्तान आंदोलन (Khalistan Separatist Agitation ) चरम पर था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की जा चुकी थी। उस समय इसी तरह हर सिख को आतंकवादी समझा जा रहा था। मैं ऐसी तमाम घटनाओं का गवाह हूं। हरियाणा होकर दिल्ली आने वाली पंजाब रोडवेज की बसों को रोक लिया जाता था और हरियाणा पुलिस सिखों की पगड़ियां उतरवाकर यह देखती थी कि कहीं उनमें हथियार तो नहीं ले जाए जा रहे हैं। इन हरकतों का नतीजा क्या निकला...पंजाब में उस समय हिंदू-सिखों के बीच खाई बढ़ती चली गई। सारे सामाजिक ढांचे (Social Setup) पर करारी चोट पड़ी, जो सिख देशभक्त थे, उन्हें मजबूर किया गया कि वे आतंकवादियों के हमदर्द बनें या उन्हें अपने घरों में पनाह दें। पंजाब में जो कुछ हुआ, वह कांग्रेस की देन थी और वह आज तक माफी मांग रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस दिन देश की बागडोर संभाली, उसी दिन उन्होंने सबसे पहले सिखों से माफी मांगी।

सिख एक मेहनतकश कौम है और उसने दिखा दिया कि वे आतंकवादी नहीं हैं। विदेशों से जब खालिस्तान आंदोलन को मदद मिलना बंद हो गई तो यह किस्सा भी अपनेआप खत्म हो गया। जो लोग समझते हैं कि किसी के. पी. एस. गिल नामक पुलिस अफसर ने पंजाब में आतंकवाद खत्म किया, यह उनकी भूल है। जिन्होंने पंजाब को नजदीक से देखा है, वे इस बात को समझ सकते हैं।
इशरतजहां की मां और उसकी बहन मुशरतजहां ने भी यही कहा कि हम भारतीय हैं। हमें इस देश से उतना ही प्यार है जितना बीजेपी वालों को है। फिर भी हमें शक से देखा जाना, अफसोस की बात है।


आतंकवाद एक ऐसी समस्या के रूप में सामने आया है जिसने विशेषकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर रखा है। जिस पाकिस्तान पर भारत में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया जाता है (जो सबूतों के आधार पर ठीक भी है), वह खुद आज सबसे बड़ा आतंकवाद का शिकार है। वहां की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या को ज्यादा दिन अभी नहीं बीते हैं। हम लोगों को और खासकर मीडिया को आतंकवाद को किसी मजहब या जाति से जोड़ना छोड़कर इसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष को देखना होगा। इसमें उन कोनों को तलाशना होगा कि आखिर क्यों अमेरिका पहले ओसामा बिन लादेन (Osama bin laden) को पालता है, क्यों इंदिरा गांधी ने जनरैल सिंह भिंडरावाले को खड़ा किया, क्यों बजरंग दल ने दारा सिंह को उड़ीसा में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ विष वमन करने भेजा, क्यों गांधी जी की हत्या में अभी तक नाथूराम गोडसे की आड़ में किसी संगठन विशेष का नाम लिया जाता है, क्यों राजीव गांधी ने पहले लिट्टे की मदद की...क्यों प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यूएन के सामने कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के लिए राजी हुए...ये सुलगते सवाल हैं। इतिहास में यह सब दर्ज है। गहन छानबीन से आतंकवाद की जड़ों तक पहुंचा जा सकता है।

Sunday, September 6, 2009

मां, मुझे भी एक कहानी सुनाओ

क्या आप किसी ऐसे सरकारी अस्पताल को जानते हैं जहां दाखिल बीमार बच्चे को कोई कहानी सुनाने आता हो। आपका जवाब शायद नहीं में होगा। इसका मुझे यकीन है। क्योंकि कहानी सुनाने वाले सिर्फ महंगे या यूं कहें कि फाइव स्टार टाइप अस्पतालों (Five star hospitals) में जाते हैं। अपने देश यह चलन अभी हाल ही में शुरू हुआ है, विदेशों में पहले से है। बीमार बच्चों को अस्पताल में जाकर कहानी इसलिए सुनाई जाती है कि वे उस मानसिक स्थिति से उबर सकें जिसके वे शिकार हैं और उनके इर्द-गिर्द फैले अस्पताल के बोझिल वातावरण में वह थोड़ा सुकून महसूस कर सकें।

बचपन में मां, दादी, नानी के जिम्मे यह काम होता था या फिर उनके जिम्मे जो बच्चों को पालती थीं जिन्हें धाय मां कहा गया है और मौजूदा वक्त में उन्हें आया कहा जाने लगा है। मौजूदा वक्त की आयाएं पता नहीं बच्चों को कहानी सुनाती हैं या नहीं लेकिन तमाम मांओं, दादियों और नानियों को यह जिम्मेदारी पूरी करते हम लोगों ने देखा है। लेकिन दौर न्यूक्लियर परिवारों (Nuclear families ) का है तो ऐसे में किसी के पास कहानी सुनाने की फुरसत नहीं है। आईटी युग (IT era) में जब कदम-कदम पर हर कोई प्रोफेशनलिज्म की दुहाई देता नजर आता है तो कहानी सुनाना भी एक बिजनेस बन गया है। विदेशों में तो प्रोफेशनल कहानी सुनाने वालों (Professional storyteller) की सेवाएं भी ली जाती हैं। हो सकता है कि यहां भी कुछ एनजीओ वाले इसमें संभावनाएं देख रहे हों।

बहरहाल, एनजीओ उदय फाउंडेशन (NGO Uday Foundation) चलाने वालों ने विदेश की ही तर्ज पर दिल्ली में जिस अस्पताल को सबसे पहले चुना वह था – एस्कॉर्ट्स फोर्टिस अस्पताल। इस अस्पताल में शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के एक हाई प्रोफाइल डीसीपी हरगोविंदर सिंह धालीवाल बीमार बच्चों को कहानी सुनाने पहुंचे। वह थोड़ा लेट थे, बच्चों ने उनसे पूछा, आप लेट क्यों आए, उन्होंने कहा भारत जैसे मुल्क में पुलिस हमेशा लेट आती है। (शायद अनजाने में या जानबूझकर वह सच बोल गए)। जिस अखबार में इस एक्सक्लूसिव खबर को छापा गया है, उसमें डीसीपी की महानता का भी उल्लेख था। बताया गया है कि कैसे इस महान डीसीपी ने पिछले दिनों बाइकर्स गैंग के सरगना को एक एनकाउंटर में ढेर कर दिया।

अब मुद्दे पर आते हैं। मैं या आप इस बात के खिलाफ नहीं होंगें कि अमीरों के लिए बने अस्पताल में दाखिल अमीर बच्चों को कहानी सुनने का हक नहीं है या यह कि एनजीओ कोई अच्छा काम नहीं कर रही। यह बहुत अच्छी कोशिश है, इससे कोई इनकार नहीं करेगा। एक तरफ तो ऐसे फाइव स्टार अस्पताल हैं और दूसरी तरफ देश और यहां तक दिल्ली के ही असंख्य अस्पताल है जहां बच्चों को कहानी सुनाना तो दूर दवाई तक नसीब नहीं है। मुझे देश के कई शहरों में रहने का मौका मिला है और इस दौरान तमाम सरकारी अस्पतालों और फाइव स्टार टाइप अस्पतालों में जाने का मौका मिला है, आप विश्वास नहीं करेंगे कि स्थितियां कितनी भयावह हैं। ज्यादा दूर नहीं, आप दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स AIIMS) चले जाइए जो किसी भी मायने में किसी फाइव स्टार से बेहतर अस्पताल है, वहां मरीजों को पूरी दवाएं नहीं मिल पातीं। बिहार के सीतामढ़ी से आए मांझी परिवार के जिस नवजात बच्चे के हार्ट का आपरेशन कर उसे वापस उसके सीने में फिट करने का जो कमाल यहां के डॉक्टरों ने दिखाया, उस बच्चे को एडॉप्ट करने और आगे उसके इलाज के लिए दिल्ली का एक भी एनजीओ नहीं आया। इसकी जानकारी जब सुलभ इंटरनैशनल (Sulabh International) के मालिक बिंदेश्वर पाठक को हुई तो उनके निर्देश पर उनकी संस्था ने इस बच्चे को एडॉप्ट किया। बिंदेश्वर पाठक का संबंध बिहार से है और हो सकता है कि शायद इस वजह से भी उनका दिल पसीजा हो लेकिन बहरहाल, उनकी संस्था ने अच्छा काम किया। लेकिन अगर बिंदेश्वर पाठक का हाथ उस बच्चे के लिए न बढ़ा होता तो... बच्चों को कहानी सुनाने के लिए पुलिस अफसर को लाने वाले उदय फाउंडेशन के लोगों ने ऐसा नहीं है कि बिहार के उस बच्चे की खबर अखबारों में न पढ़ी हो।


बच्चों को कहानी सुनाते दिल्ली पुलिस के डीसीपी हरगोविंदर सिंह धालीवाल


हो सकता है कि एनजीओ उदय फाउंडेशन चलाने वालों की नीयत साफ हो लेकिन कहीं न कहीं लगता है कि तमाम सोशलाइट (Socialite) लोग एनजीओ का जो धंधा चला रहे हैं उसके पीछे मकसद महज समाजसेवा (Social Work) का नहीं है। एक तो यह लोग चाहते हैं कि इनके काम को लोग सराहें, दूसरा सरकार इनको इनाम और सम्मान देती रहे। विदेशों से इन्हें जो आर्थिक मदद मिलती है, उसके बारे में तो इनकी बैलेंसशीट ही बता सकती है। दिल्ली में ऐसे ही एक सज्जन बच्चों को उनका बचपन लौटाने के लिए उन्हें चाय की दुकानों से, घरों से, विभिन्न उद्योग-धंधों में से मुक्त कराने का अभियान छेड़े हुए हैं। सरकारी कानून के मुताबिक बच्चों से काम लेना और कराना अपराध भी है। कानून की नजर में ये सज्जन बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन जिन गरीब बच्चों को यह सज्जन मुक्त कराते हैं वे गरीब परिवारों से हैं और अपने परिवार की रोटी का इंतजाम करने के लिए इन्हें यहां-वहां काम करना पड़ता है। उनकी संस्था को विदेशों से मोटा फंड मिलता है लेकिन मुक्त कराए गए बच्चों को वह कितना देते हैं या उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था करते हैं, कोई आज तक नहीं जान पाया है। हां, मीडिया में उनकी पर्सनैलिटी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली खबरें जरूर दिखाई देती हैं। उनके दफ्तर में जाइए तो आपको वहां पूरा कॉरपोरेट कल्चर मिलेगा और कई विदेशी बालाएं भी वहां बैठी नजर आएंगी। जिनके सामने भारत की गरीबी को बयान करती तस्वीरों का ढेर लगा होगा।

तमाम एनजीओ की आलोचना करना मेरा मकसद नहीं है। कुछ लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन फिर भी एनजीओ चलाने वालों को कहीं न कहीं आत्मविश्लेषण करना ही होगा कि क्यों हमारे-आप जैसे लोग इनके बारे में ऐसी धारणा बनाए हुए हैं।

Tuesday, September 1, 2009

भगवान आप किसके साथ हैं


भगवान जी बहुत मुश्किल में हैं कि आखिर वह एक कॉरपोरेट घराने (corporate house) की आपसी लड़ाई में किसका साथ दें। मुकेश अंबानी को आशीर्वाद दें या फिर छोटे अनिल अंबानी को तथास्तु बोलें। भगवान इतनी मुश्किल में कभी नहीं पड़े। भगवान करें भी तो क्या करें...

अनिल अंबानी इस समय देश के सबसे पूजनीय स्थलों पुरी, सिद्धि विनायक मंदिर और गुजरात के कुछ मंदिरों की शरण में हैं। वह इस समय लगभग हर पहुंचे हुए मंदिर की घंटी बजा रहे हैं। इस यात्रा में वह अकेले नहीं हैं, उनके साथ उनकी मां कोकिला बेन और बहन व बहनोई भी साथ हैं। बड़े भाई मुकेश अंबानी के साथ चल रही उनकी कॉरपोरेट वॉर (corporate war) में वह भगवान जी से समर्थन मांग रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही है और अनिल चाहते हैं कि कोर्ट उनके हक में फैसला सुनाए। सगे भाई का अहित हो। इतिहास (history) में मैंने और आप सब ने पढ़ा है कि किस तरह मुगल पीरियड में गद्दी हथियाने के लिए भाई ने भाई का कत्ल करा दिया या बेटे ने बाप को जेल में डाल दिया। ठीक ऐसा ही कुछ अब देखने को मिल रहा है जिसमें सिर्फ दो भाइयों की ही लड़ाई नहीं बल्कि भारत सरकार भी लंबी-लंबी सांसे ले रही है।

मुकेश की कंपनी गुजरात के बेसिन से जिस गैस का उत्पादन करने वाली है, उसकी सबसे बड़ी खरीदार भारत सरकार की कंपनी एनटीपीसी है। आरोप है कि एनटीपीसी को मुकेश मंहगे दाम पर गैस बेचने जा रहे हैं। अनिल ने अपने पावर प्लांट के लिए गैस मांगी थी लेकिन उन्हें गैस देने में आनाकानी की गई। अनिल ने अपने पावर प्लांट इसी उम्मीद में लगाए थे कि भाई से गैस ले लेंगे। लेकिन संपत्ति बंटवारे की लड़ाई में जो कड़वाहट हुई थी तो मुकेश भला अनिल को सस्ती गैस कैसे देते। अनिल ने मीडिया में बड़े भाई की कंपनी के खिलाफ लगातार विज्ञापन अभियान छेड़ा और उनकी कंपनी को सबसे बड़ा चोर बताया। भारत के कॉरपोरेट इतिहास (corporate history) में इतना बड़ा घृणित प्रचार अभियान आज तक मैंने अपने होशोहवास में नहीं देखा और पुराने पत्रकार भी यही बताते हैं कि उन्हें भी इस तरह की कोई घटना याद नहीं आती।

दोनों भाइयों की इस लड़ाई में मैं किसी को पाकसाफ या किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहता। लेकिन जिस तरह इस कॉरपोरेट वॉर में पूरी राजनीति और मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग किसी न किसी भाई के साथ खड़ा नजर आ रहा है वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यह खतरा हालांकि बहुत पहले से है लेकिन अब वह और भी स्पष्ट तरीके से सामने आया है। इन दोनों भाइयों के पिताश्री धीरूभाई अंबानी ने स्व. राजीव गांधी से संपर्कों के बल पर रिलायंस नाम का बिजनेस अंपायर (business empire) खड़ा कर दिया। पिता जी नहीं रहे। उसके बाद राजनीति में पैठ बनाने के तरीके बदल गए। पिता की मौत के फौरन बाद अनिल अंबानी ने आजादी चाही। अपनी बॉलिवुड बैकग्राउंड की धर्मपत्नी टीना मुनीम की बदौलत अमिताभ तक पहुंच बनाई और वहां से अमर सिंह और फिर सीधे मुलायम सिंह यादव। समाजवादी पार्टी में कई ऐसे होनहार थे जिन्हें राज्यसभा में भेजा जा सकता था लेकिन राम मनोहर लोहिया के कथित विरासत वाली इस पार्टी ने खरबपति अनिल अंबानी को राज्यसभा में भेजा। फिर तो उन्होंने दुनिया मुट्ठी में कर ली। यह सब हमने आपने अपनी आंखों के सामने होते हुए देखा।

इस दौरान मुकेश ने क्या किया। वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ फाइव स्टार होटल के टैरेस पर ब्रेकफास्ट लेते रहे। सत्ता के गलियारे में संदेश जाना ही थी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और मुकेश के संबंध किसी से छिपे नहीं।
जो कॉरपोरेट वॉर कभी धीरूभाई अंबानी और नुसली वाडिया (बांबे डाइंग के मालिक) के बीच लड़ी गई थी आज वह दो भाइयों के बीच लड़ी जा रही है। ऐसा लगता है कि जैसे दोनों भाइयों ने पूरे भारत को अपने पास गिरवी रख लिया है। हालात ये हैं कि अगर आप किसी राजनीतिक पार्टी में हैं तो आपको एक भाई के साथ खड़ा होना पड़ेगा, मीडिया में हैं तो किसी एक भाई के लिए साफ्ट कार्नर रखना पड़ेगा। और तो और आजकल योग से लेकर भोग तक पर प्रवचन करने वाले भी किसी न किसी भाई के साथ हैं। पंजाब के जालंधर शहर में एक बहुत बड़े बाबा अपने कार्यक्रम में किसी एक भाई के हेलिकॉप्टर से पहुंचते हैं। देश के सबसे ईमानदार नौकरशाह अपनी रिश्तेदारी में जाने के लिए किसी एक भाई का हवाई जहाज मांग लेते हैं। अगर आप स्टॉक मार्केट के दलाल (broker) या राजनीति के दलाल (political broker) हैं तो भी आपको किसी एक भाई के साथ जाना पड़ेगा। आप बॉलिवुड में हैं और फाइनैंस चाहिए तो किसी एक भाई के पास जाना पड़ेगा और वह भाई बदले में आप से अपने बाप, या मां या किसी अन्य रिश्तेदार को महान बताने वाली पिक्चर बनाने को कहेगा, जिसमें उस समय के नामी स्टार काम करेंगे। यह सब क्या है।

न्यायपालिका को लेकर मेरे या इस देश में सभी नागरिक के हाथ बंधे हैं कि वह अदालत के किसी फैसले पर टिप्पणी नहीं कर सकता और न ही किसी जज के खिलाफ कुछ बोल सकता है। जजों के हाल पर इसलिए मैं भी कुछ नहीं कहना चाहता।

...इसीलिए मैंने ऊपर अपनी बात भगवान के जरिए कही कि हो न हो भगवान भी आजकल जरूर पसोपेश में होंगे। उन्हें किसी न किसी भाई के साथ तो खड़ा होना पड़ेगा। अच्छा आप बताइए आप किस भाई के साथ हैं...