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Saturday, March 31, 2012

सब कुछ होते हुए भी नाखुश हैं वो....

छत्तीसगढ़ की आवाज....

सुधीर तंबोली "आज़ाद"अखिल भारतीय पत्रकार एवं संपादक एशोसिएशन के छत्तीसगढ़ के प्रदेश महासचिव हैं। उन्होंने हिंदीवाणी ब्लॉग पर लिखने की इच्छा जताई है। उन्होंने एक लेख प्रेषित भी किया है, जिसे बिना किसी संपादन के यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस मौके पर मैं हिंदीवाणी के सभी पाठकों, मित्रों व शुभचिंतकों को आमंत्रित करता हूं कि अगर वे इस पर कुछ लिखना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। मुझे अपना लेख ईमेल करें। - यूसुफ किरमानी

सब कुछ होते हुए भी नाखुश हैं वो....
                                                             -सुधीर तंबोली "आज़ाद"

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने शिक्षा कर्मियों के तीनो वर्गो को क्रमंश वर्ग 3 का 2000 , वर्ग 2 का  3000 , वर्ग 1 का  4000 रुपये की मासिक सौगात दी। जानकार ख़ुशी हुई कि डॉ. साहब ने सभी का ख्याल रखते हुए ये निर्णय लिया।

इस सूचना को पाकर मैंने अपने शिक्षाकर्मी मित्रो को फ़ोन कर के बधाई दी उन्होंने धन्यवाद तो दिया और आगे कहा की जो और अपेक्षाए थी सरकार उनमे खरी नही उतरी झुनझुना थमा दिया बस.!

तब से मेरा दिमाग आम इन्सान पर आकर ठिठक गया जैसे की मैं अभी खुद अभी बेरोजगार हूं, आजीविका पे शंशय बरकरार है। महीने के 2000 कहां से आएंगे, तय नहीं है और सरकारी नौकरी पे काबिज लोगो के लिए  2000 रुपये  अतरिक्त भी मात्र  झुनझुना है। सरकारी नौकरी सरकारी लाभ हर तरह की सरकारी सुविधाय प्राप्त होने के बाद भी नाखुश मेरे शिक्षाकर्मी मित्र और उसमे भी साहब लोग ये कहते है की हम भविष्य तैयार करते है हमारी हर मांग को सरकार को एक बार में स्वीकार कर लेना चाहिए।

और दूसरी तरफ हर सुविधा से महोताज़ गरीब जो रोज़ रोटी की चिंता में घर से निकलता है एक समय का खाना भी मिल पाएगा की नहीं, सोचता है तबियत गर बिगड़ जाये तो दवा ले आये तो तो भूखे  पेट सोने की मज़बूरी हो जाती है ऐसे में किसी दिन कल ही तरह बाज़ार बंद और रोज़ी रोटी कमाने का साधन भी नदारद। अनिश्चय भविष्य कोई पूछ परख नहीं और जिनके पास ये समस्या नहीं है वो और अपने सुविधाओ में बढ़ोतरी के लिए आन्दोलन धरना प्रदर्शन कर रहे है। सब कुछ होने और मिलने के बाद भी नाखुश...

क्या वो उन लोगो के बारे में एक बार भी सोचते है की खुले आसमान के नीचे कमाने खाने वाले., मेहनत के बल पर रोज़ी पकाने वाले कैसे अपना घर-परिवार चलाते होंगे.?

और वो गरीब तो अपने हक के लिए आंदोलन / धरना प्रदर्शन का रास्ता भी अख्तियार नहीं कर सकते, क्योंकि ये काम स्वार्थ की राजनीती करने वाले नेताओ ने ले रखा है गरीबो के हक के लिए वो आवाज़ बुलंद करते है पर जब और कोई मुद्दा नज़र नही आता तब।

गरीब अपनी रोज़ी--रोटी छोड़कर आंदोलन करने भी नहीं बैठ सकता क्योंकि वो बैठ जाएगा तो उसके परिवार को कौन खिलायेगा..

कौन कब समझेगा आमआदमी की तकलीफ को जो वो बयान भी नहीं कर सकता,
अपने दर्द को, अपनी जरूरतों को,
मशगूल है अपने रोज़ी की चिंता में जी रहा है अनिश्चित आने वाले समय की राह ताकते...


Tuesday, March 13, 2012

आप मानते रहिए मुसलमानों को वोट बैंक

नवभारत टाइम्स में मेरा यह लेख आज (13 मार्च 2012) को प्रकाशित हो चुका है। इस ब्लॉग के नियमित पाठकों के लिए उसे यहां भी पेश किया जा रहा है। लेकिन यहां मैं एक विडियो दे रहा हूं जो मुस्लिम वोटरों से बातचीत के बाद विशेष रिपोर्ट के तौर पर आईबीएन लाइव पर करीब एक महीने पहले दी गई थी। अगर कांग्रेस पार्टी के पॉलिसीमेकर्स ने इसे देखा होता तो शायद वे खुद को सुधार सकते थे....


पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। इनमें से यूपी के चुनाव नतीजों पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है और उसके केंद्र में हैं मुस्लिम वोटर (Muslim Voter)। मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को देखते हुए चुनाव अभियान से बहुत पहले और प्रचार के दौरान सभी पार्टियों का फोकस मुस्लिम वोटर ही था। 
मुस्लिम वोटों को बांटने के लिए रातोंरात कई मुस्लिम पार्टियां खड़ी कर दी गईं। माहौल ऐसा बनाया गया अगर मुसलमान कांग्रेस, बीएसपी, समाजवादी पार्टी (एसपी) को वोट न देना चाहें तो उसके पास मुस्लिम पार्टियों का विकल्प मौजूद है। हर पार्टी का एक ही अजेंडा था कि या तो मुस्लिम वोट उसकी पार्टी को मिले या फिर वह इतना बंट जाए कि किसी को उसका फायदा न मिले। लेकिन इसके साथ ही तमाम राजनीतिक दल मुस्लिम वोटरों से एक हास्यास्पद अपील भी कर रहे थे कि वे किसी पार्टी का वोट बैंक न बनें। 

इसके बरक्स बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती यूपी के हर जिले में कुछ खानकाहों के सज्जदानशीनों को लेकर दलित-मुस्लिम सम्मेलन कर रही थीं तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह किसी तरह से आजम खान की मान-मनोव्वल कर उन्हें पार्टी में ला चुके थे।...और दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस व बीजेपी, वे भी पीछे नहीं थीं। 30 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में आरएसएस ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बैनर तले एक सम्मलेन आयोजित किया। इसमें पूर्व संघ प्रमुख के. सी. सुदर्शन के अलावा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) के उपाध्यक्ष व प्रमुख शिया धर्म गुरु मौलाना कल्बे सादिक ने हिस्सा लिया था। सम्मेलन के बाद दोनों ने एक बयान जारी किया कि मुसलमान किसी पार्टी का वोट बैंक बनने की बजाय साफ सुथरी छवि वाले प्रत्याशियों को वोट दें। कांग्रेस के भी कई दरबारी सक्रिय थे जो कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी के बटला हाउस एनकाउंटर पर रोने से लेकर मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण की टॉफी बांट रहे थे। 

...लेकिन अगर कोई चुप था तो वह यूपी का मुस्लिम वोटर था। वह सुदर्शन और कल्बे सादिक के बयान के पीछे छिपी हुई इबारत को आसानी से पढ़ पा रहा था। उसे कांग्रेसी दरबारियों के राग-अलाप की भी समझ थी। वह एक बार फिर खुद को वोट बैंक कहलवाने को तो तैयार था लेकिन धोखा खाने को नहीं। यूपी के नतीजे आए तो उसने इस बार वहां की विधानसभा में पिछले चुनाव (2007) के मुकाबले 69 मुस्लिमों को भेज दिया। 2007 में यह तादाद 56 थी। इस बार इसमें समाजवादी पार्टी का शेयर 43, बीएसपी का 16, कांग्रेस 4, पीस पार्टी 3, कौमी एकता दल 2 व इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल का 1 विधायक है। यूपी में कुल आबादी के मुकाबले मुस्लिम आबादी 18.50 फीसदी है और इस बार यूपी विधानसभा की 403 सीटों में उसका शेयर 17.12 फीसदी है। यानी आबादी के लिहाज से यह शेयर काफी करीब है। 

इस चुनाव में तमाम तथाकथित मुस्लिम पार्टियों को मुसलमानों ने बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया है। मुसलमान वोटर को बेशक कोई भी पार्टी वोट बैंक मानती रहे लेकिन उसने इस बार फिर साबित किया है कि अगर वह वाकई वोट बैंक होते तो उन्हें मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को वोट देना चाहिए था। लेकिन सिर्फ यूपी का ही नहीं इस देश का मुसलमान बार-बार इन पार्टियों को तो छोड़िए, मुस्लिम राजनीति करने वाली सबसे पुरानी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग तक को बार-बार रिजेक्ट करता रहा है, वरना वह आज भारतीय मुसलमानों की बहुत बड़ी पार्टी होती। यूपी चुनाव से पहले जिस तरह रातोंरात कई नए मुस्लिम राजनीतिक दल बने या पैसा देकर बनाए गए, उन्हें इन नतीजों से जरूर सदमा लगा होगा। मुस्लिम वोटर ने इस कदम को न तो पसंद किया और न ही इसके हक में फैसला सुनाया। हालांकि यूपी के नतीजों पर बहुत ही कम नोटिस की गई एक टिप्पणी एक टीवी चैनल पर सुनाई दी कि मुसलमानों ने यह प्रोटेक्शन वोट (Protection Vote) दिया है। 

ऐसी टिप्पणी करने वाले भूल गए कि जब तमाम राजनीतिक दल ओबीसी और अन्य फैक्टर देखकर ही टिकट बांटते हैं तो फिर मुसलमानों को आप वोट बैंक न बनने या किसी एक पार्टी का साथ न देने की पैरोकारी क्यों करते हैं। अगर कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी की ओबीसी पॉलिटिक्स (OBC Politics) फेल करने के लिए इंपोर्टेड नेता ला सकती है तो फिर मुसलान वोटर अगर अपनी बेहतरी के लिए मुस्लिम के बजाय हिंदू नेतृत्व वाली पार्टी का दामन थामते हैं तो इसमें बुराई कैसी। 

हालांकि मुलायम-मुसलमान गठजोड़ का पिछला अनुभव कोई अच्छा नहीं रहा है। पिछली बार सत्ता मिलने पर मुलायम मुसलमान को उर्दू अनुवादक तो बना रहे थे लेकिन पीएसी और यूपी पुलिस की भर्तियों में उसे कोई शेयर नहीं दिया जा रहा था। बाकी सरकारी नौकरियां भी किसी और के लिए थीं। तब से हालात और बदले हैं। इस बार मुलायम की ऐसी कोई चालाकी नहीं चलने वाली है। देश और यूपी में युवा वोटर अगर बढे़ हैं तो उनकी तादाद मुसलमानों में भी बढ़ी है। कम से कम मुलायम उसे दोबारा उर्दू अनुवादक बनने का झांसा तो नहीं देंगे खासकर तब जब 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान एक बार फिर अपनी भूमिका निभाने को तैयार बैठा है।

 बेशक आप उसे वोट बैंक कहते रहें लेकिन वह तमाम पॉलिटिक्स के पीछे छिपी इबारत पढ़ना सीख चुका है। मायावती के लिए भी मुस्लिम वोटर ने गुंजाइश रख छोड़ी है, जहां-जहां से मायावती ने ठीकठाक मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए थे, वहां मुस्लिम वोटर ने उसे एसपी के मुकाबले तरजीह दी है। दलित-मुस्लिम गठजोड़ भविष्य में या 2014 में ही नए रूप में आ सकता है, बशर्ते की उसके लिए दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद छोड़कर कुछ कुर्बानी देने को तैयार रहें।
Courtesy : NavBharat Times, March 13, 2012
edited article is also available at this newspaper's website http://nbt.in   


Saturday, March 3, 2012

अरब देशों में आजादी की भूख...जाग चुकी हैः अब्बास खिदर

इराकी मूल के जर्मन लेखक अब्बास खिदर (Iraqi born German Writer Abbas Khider) का भारतीय युवक जैसा दिखना एक तरफ मुसीबत बना तो दूसरी तरफ उसने उन्हें एक पहचान भी दी। डैर फाल्शे इन्डैर (गलत भारतीय) नॉवेल ने उन्हें भारत के करीब ला दिया है। इराक में सद्दाम हुसैन (Saddam Hussain) के शासनकाल में युवा आंदोलनकारियों का नेतृत्व करने की वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया था। सद्दाम ने उनकी हत्या करानी चाही तो उन्होंने सन् 2000 में इराक छोड़ दिया। तमाम अरब, अफ्रीकी मुल्कों से होते हुए स्वीडन जाने की कोशिश में उन्हें जर्मनी की पुलिस ने बॉडर्र पर गिरफ्तार कर लिया। वहां उन्होंने शरण ले ली और वहां पैदा हुआ जर्मन साहित्य को समृद्ध करने वाला एक लेखक। ढेरों अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजे जा चुके अब्बास खिदर ने भारत आने पर सबसे पहला इंटरव्यू मुझे नवभारत टाइम्स के लिए दिया, उनका यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 3 मार्च, 2012 को छपा है। अखबार में आपको इस इंटरव्यू के संपादित अंश मिलेंगे लेकिन यहां आपको उसके असंपादित अंश पढ़ने को मिलेंगे।

अब जबकि इराक से अमेरिकी फौजों (US Army) की वापसी हो चुकी है। आप इराक में हुई तबाही के लिए किसको जिम्मेदार मानते हैं

मैं झूठ नहीं बोलना चाहता और न ही चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहता हूं। हकीकत यह है कि इराक में तबाही के लिए अमेरिका, सद्दाम हुसैन और वहां की पब्लिक बराबर की जिम्मेदार है। इराक में 60 फीसदी शिया, 20 फीसदी सुन्नी और 20 फीसदी अन्य लोग हैं। खुद को इंसान न मानकर और अलग-अलग तबकों में बांटकर देखने से वहां के लोग कमजोर हो गए। इराक में अमेरिका का निजी हित था। वहां पर अमेरिका और सद्दाम दोनों ही लोकतंत्र लाने की बात कर रहे थे जो एक फरेब था। यही वजह है कि इराक में न सिर्फ अमेरिका हारा बल्कि वहां सद्दाम और वहां के लोग भी हारे। लोग अमेरिकी हस्तक्षेप का सही ढंग से विरोध नहीं कर सके।

अमेरिका को किसने मौका दिया। आखिर इसकी कुछ वजह तो होगी
 आप इराक का मैप गौर से देखें। उसके चारों तरफ जो हुकुमतें अलग-अलग देशों में हैं, वे सब के सब तानाशाह हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिका ने सिर्फ इराक में प्रजातंत्र लाने के नाम पर वहां हस्तक्षेप किया और बर्बादी मचाई। उसकी यह कार्रवाई कुछ ऐसी ही हुई कि जैसे किसी मयखाने से कुछ लोगों को उठाकर इमाम बनाने की कोशिश की जाए। यह एक असंभावित विचार था, जिसकी नाकामी भी तय थी। क्योंकि अमेरिका का असली मकसद इराक के संसाधनों पर कब्जा करना था न कि वहां प्रजातंत्र लाना था। बाद की घटनाओं ने इसे साबित भी किया।
 
 
अमेरिका को लेकर सिर्फ इराकी लोगों की ही नहीं बल्कि आम मुसलमानों की भी सोच बदल रही है, इसकी वजह आप क्या मानते हैं
         यह दुर्भाग्यपूर्ण है। अमेरिका को इस बारे में खुद ही विचार करना चाहिए। यह वक्त का कितना बड़ा मजाक है कि विश्व के सबसे विकसित देशों (Developed Countries) के बारे में इराक के आम आदमी के दिल पर ऐसी नफरत की ऐसी लकीर बन चुकी है जो मिटाए से नहीं मिटने वाली। उनके साथ धोखा हुआ है और उन्हें कम से कम अमेरिका से कोई उम्मीद नहीं है। आगे बढ़ने की तमन्ना और एहसास ही इराकियों को अपने दम पर खड़ा कर सकता है।

अरब अपराइजिंग (Arab Uprising) या तमाम अरब मुल्कों में वहां की तानाशाह हुकूमतों के बदलाव को लेकर जो आंदोलन चल रहा है, आप उसे किस नजरिए से देखते हैं

         बदलाव और विकास कभी बाहर से नहीं आता। ऐसी चीजें हमेशा इंसान के अंदर से आती हैं। इस बदलाव की बुनियाद प्यार और क्रांति हो सकते हैं न कि जंग। अब अरब के तमाम देशों में आजादी की असली भूख जाग चुकी है। हमें नतीजे के लिए कुछ इंतजार करना होगा लेकिन यह होकर रहेगा, कोई उसे रोक नहीं सकता। यह आजादी एक्सपोर्ट या इंपोर्ट की हुई नहीं होगी।   

आपकी किताब का नाम गलत हिंदुस्तानी (डैर फाल्शे इन्डेर) क्यों रखा गया
  -जब मैंने अपनी मूल जर्मन पुस्तक का नाम डैर फाल्शे इन्डेर दिया था तो यह अहसास नहीं था कि इन शब्दों का अर्थ कुछ अलग भी निकलेगा या इसका मतलब कुछ अलग भी हो सकता है। यानी जो मैंने सोचा था वह कुछ अलग था और मतलब कुछ और निकला। दरअसल, इराक में जेल से मेरी रिहाई से लेकर लीबिया, सूडान, मिश्र और फिर जर्मनी पहुंचने के दौरान मैंने जो मुसीबतें झेली हैं, उसका ब्योरा इसमें है। मैं जहां भी जाता लोग मुझे भारतीय जैसी शक्ल वाला कहकर चिढ़ाते। मुझे हर जगह यह साबित करना पड़ता था कि मैं असली नहीं बल्कि नकली भारतीय हूं और मूल रूप से इराकी हूं। लोगों द्वारा इस तरह मुझे चिढ़ाया जाना मेरे जेहन में बैठता चला गया। किताब का नाम मैंने रखना चाहा था नकली हिंदुस्तानी लेकिन अनुवादक महोदय ने उसे गलत हिंदुस्तानी लिख मारा। वह गलती अब मशहूर हो गई। मैंने उसे स्वीकार कर लिया।

आप मूल रूप से शिया (Shia-Shiite Muslim) मुसलमान हैं। कर्बला (Karbala), इमाम हुसैन (Imam Hussain), इनके नाना पैगंबर मोहम्मद (Prophet Mohammad) साहब का शिया (Shiites) बहुत आदर करते हैं। आप का इन महान हस्तियों के बारे में क्या विचार है
ये सारे किरदार मेरे लिए और मेरे जैसे मानवीय मूल्यों से सरोकार रखने वाले लोगों के लिए एक हीरो और रोल मॉडल की तरह ही हैं। मैं भी उनका बहुत आदर और सम्मान करता हूं। उनके बलिदान और योगदान सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। लेकिन मैं साफ कर दूं कि मैं कोई धार्मिक शख्स नहीं हूं। मैं सबसे पहले खुद को इंसान मानता हूं। इंसान सारे धर्मों से ऊपर है। मानवता मेरा धर्म है और बिना बॉर्डर वाली दुनिया मेरा घर है।

  

 फारसी, अंग्रेजी बोलने, लिखने के बावजूद जर्मन भाषा में आपने क्यों लिखना शुरू किया

-इराक में अपना वतन छोड़ने के बाद जर्मनी में जब शरण मिली तो वहां खुद को बचाकर और जिंदा रहना ही मेरा मकसद नहीं था। मुझे अपनी पहचान करानी थी जिसमें जर्मन भाषा ही मेरी मदद कर सकती थी। मेरे जर्मन प्रवास का सबसे सुखद पड़ाव वह था जिस दिन जर्मनी के विख्यात भाषाविद ने मेरी पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जर्मनी के मूल लेखक भी इतनी सुंदर जर्मन नहीं लिख सकते।


भारत में पहली बार आने पर कैसा महसूस कर रहे हैं
       अब तो मुझे भी खुद पर शक हो रहा है कि कहीं न कहीं से मैं भारतीय ही हूं। दरअसल मैं एक इराकी पिता और एक जिप्सी मां की संतान हूं। आप जानते हैं कि जिप्सियों का कोई देश या घर नहीं होता। हो सकता है मेरी मां की जड़ें भारत से हों। अब तो भारत का हर कोना मुझे अपना लगता है। रंगकर्मी और लेखक ज्योति संग ने मेरे लिए जो साहित्यिक गोष्ठी रखवाई, उससे इतना उत्साह मिला कि मुझे भारत का मुरीद कर दिया।


यहां के यूथ के बारे में आपकी क्या राय है
मैं तो अभिभूत हूं उन्हें देखकर। एनसीआर एक शहर में मेरी किताब पर बहस हुई और सवाल पूछे गए, वहां सबसे ज्यादा तादाद युवा लोगों की थी। उन्होंने अंत तक मुझे बहुत ही धैर्य से सुना और सवाल पर सवाल पूछे। यहां के यूथ के सवालों की क्वॉलिटी ने मुझे भारतीय युवकों के बारे में अलग राय बनाने को मजबूर किया। आप जर्मनी के किसी शहर को तो छोड़िए बर्लिन जैसी जगह में इतने यूथ नहीं जमा हो सकते जितना मुझे फरीदाबाद की पीपल्सपॉर्लियामेंट में सुनने को पहुंचे। भारतीय यूथ अब भी साहित्य, कला, रंगकर्म से जुड़ा है, यह मेरे एक सुखद एहसास है।

Courtesy : NavBharat Times, March 3, 2012