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Thursday, February 12, 2015

मैडम किरन बेदी, बुखारी के फतवे के पीछे कौन था

किरन बेदी को बीजेपी वाले समझा क्यों नहीं रहे...वह अपनी हार से उबरने का नाम नहीं ले रही हैं। अपनी हार के लिए बीजेपी और इसके नेताओं को जिम्मेदार ठहराने के बाद उन्होंने अपनी हार में एक और फैक्टर मुस्लिम वोटों का न मिलना भी जोड़ दिया है और कहा है कि जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के फतवे की वजह से अंतिम समय में दिल्ली के कृष्णानगर इलाके में रहने वाले मुसलमानों का वोट उन्हें नहीं मिला, जिस वजह से उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।




चुनाव से पहले किरन का शुमार देश के तेज-तर्रार पुलिस अधिकारियों में था। जैसे ही बीजेपी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने वाला न्यौता दिया, उनकी छवि पर सबसे पहला हमला यहीं से हुआ। आईपीएस विकास नारायण राय ने जनसत्ता में एक लेख लिखा जिसमें बहुत बारीकी से किरन का विश्लेषण किया गया। राय को मैं काफी दिनों से जानता हूं और वह भारतीय पुलिस सेवा में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उन्होंने लिखा था कि किरन बेदी भारतीय लोगों के बीच में एक जीवित मिसाल बन गई थी लेकिन बीजेपी ने उन्हें अपने लिए इस्तेमाल कर उनकी छवि पर बट्टा लगा दिया है। किरन के बाद भारतीय पुलिस सेवा में आईं तमाम महिलाएं उन्हें अपना आदर्श मानती रही हैं लेकिन अब उन्हें भी धक्का लगा है।...खैर, चुनाव का प्रचार शुरू हो गया। किरन ने जो बयानबाजी की और बीजेपी जिस ऊहापोह की हालत में रही, उस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। यहां मैं किरन के ताजा बयान को लेकर बात करना चाहता हूं।
बुखारी के कथित फतवे या निर्देश को आम आदमी पार्टी ने तो उसी दिन खारिज कर दिया था लेकिन किरन ने कभी इसकी गहराई में जाने की कोशिश की कि बुखारी से वह बयान किसने दिलवाया था। 





यह जांच का विषय रहेगा कि आखिर मतदान की पूर्व संध्या पर बुखारी ने वह बयान क्यों दिया...मुस्लिम राजनीति और बुखारी के तमाम कदम पर मेरी नजर रहती है। जहां तक मुझे समझ में आया है, वह बीजेपी के तरकश का आखिरी तीर था जो बुखारी के जरिए आजमाया गया यानी बीजेपी के कतिपय लोगों ने बुखारी से संपर्क कर उनसे वह कथित फतवा या निर्देश देने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने बिना वक्त गंवाए या सोचे समझे जारी कर दिया।...अब देखिए उसके बाद जो घटनाक्रम हुआ, उस पर नजर डालिए। उधर, जैसे ही बुखारी का बयान जारी हुआ कि मुसलमान आम आदमी पार्टी को वोट दें तो तुरंत ही बीजेपी के रणनीतिकार अरुण जेटली का बयान आ गया कि अब दिल्ली के लोग बीजेपी को वोट डालकर बुखारी को उसका जवाब दें...यानी यह सोची-समझी वोटों के ध्रुवीकरण की साजिश थी जिसे उतनी ही तेजी से आम आदमी पार्टी ने नेस्तोनाबूद कर दिया। इन्हीं बुखारी साहब ने लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस के लिए तथाकथित फतवा जारी किया था जिसे उप पार्टी ने बहुत बेशर्मी से कबूल भी किया था लेकिन नतीजे क्या रहे। लोकसभा चुनाव का विश्लेषण बताता है कि उस वक्त लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ मन बना लिया था, बुखारी के फतवे की वजह से वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हुआ था कि सारे हिंदू वोट उसी कारण बीजेपी को पड़े। लेकिन विश्लेषकों ने कभी तो बीजेपी की प्रचंड जीत का श्रेय आरएसएस को दिया तो कभी बुखारी के फतवे को।




तरस आता है...बीजेपी की रणनीति औऱ बुखारी की चालाकी पर...बुखारी साहब को कई मौकों पर मुस्लिम वोटर यह बता चुके हैं कि हम आपके फतवे या निर्देश के हिसाब से वोट नहीं डाल करते, हालात को समझते हुए वोट डाला करते हैं। हालांकि कई समाजशास्त्रियों औऱ राजनीतिक दलों को यह मुगालता है कि मुस्लिम वोट बैंक का इस्तेमाल होता है। आप लोग इसे इस रूप में क्यों नहीं लेते कि भारतीय मुसलमान अन्य मजहब वालों की ही तरह जागरूक और सजग हैं और अपने वोट का इस्तेमाल किसी एक पार्टी या नेता के लिए ही करते हैं। वह जानते हैं कि तात्कालिक परिस्थितियों में क्या बेहतर है...दिल्ली के चुनाव ने यह फिर से साबित किया है कि राजनीति का ककहरा उन्हें भी आता है। जिस दिन मतदान हो रहा था, मैं दिल्ली के कई मुस्लिम बहुत इलाकों में उनका वोटिंग पैटर्न समझने के लिए घूमा था और यह पूछकर, जानकर और देखकर हैरान था कि कहीं-कहीं 90 फीसदी मुस्लिम वोट आम आदमी पार्टी को जा रहे थे। ये सारे के सारे वोट कांग्रेस के परंपरागत वोट थे। अगले दिन इसकी औऱ विस्तृत जानकारी के लिए मैंने मौलाना अतहर हुसैन देहलवी साहब से बात की, जिनका संपर्क मुसलमानों के बीच काफी बड़ा है, उनका कहना था कि मुसलमान भी बाकी दिल्ली वालों की तरह ही वोट कर रहा है, इसमें हैरान होने की कोई बात ही नहीं है।...





मुझे उम्मीद थी कि दिल्ली के चुनाव नतीजों के बाद मुसलमानों को वोट बैंक या किसी इमाम के निर्देशों पर चलने वाले मतदाता का भ्रम लोगों के दिलो दिमाग से दूर हो गया होगा लेकिन किरन बेदी के बयान से जाहिर हो रहा है कि मुसलमानों को लेकर उन्होंने भी एक मुगालता पाला हुआ है। उम्मीद है कि दिल्ली चुनाव से सबक लेते हुए सारे राजनीतिक दल मुसलमानों के वोटों को इस नजरिए से देखने की कोशिश छोड़ देंगे और तमाम मौलवी और इमाम खुद को इस कौम का ठेकेदार बताकर बर्ताव करना छोड़े देंगे।  






Sunday, February 8, 2015

सलमान रश्दी का कूड़ा और भालचंद्र निमाड़े



सलमान ऱश्दी की बौखलाहट समझ में आती है। तमाम तरह का कूड़ा लिखने के बाद भारत में जब उन्हें पहचान

नहीं मिली तो वह मराठी लेखक भालचंद्र निमाड़े को गाली देने पर उतर आए। निमाड़े को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद रश्दी बौखला गए। किसी भी लेखक को दूसरे लेखक के काम का आकलन करने का अधिकार है।

निमाड़े का आकलन है कि सलमान ऱश्दी और वी. एस. नॉयपाल जैसे लेखकों ने पश्चिमी देशों का प्रचार किया और उनका लेखन उस स्तर का नहीं है...इसमें क्या गलत है लेकिन इसके बदले अगर दूसरा लेखक पलटकर गाली देने लगे तो आप इसे क्या कहेंगे।...मैं साहित्यकार नहीं हूं लेकिन साहित्य की समझ जरूर रखता हूं। सलमान रश्दी या भारत में चेतन भगत सरीखे लेखक अंग्रेजी में जो चीजें परोस रहे हैं, उससे कहीं बेहतर भालचंद्र निमाड़े का लेखन है।...भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में रश्दी औऱ चेतन भगत जैसा कूड़ा करकट लिखने वालों से कहीं बेहतर उपन्यासकार मौजूद हैं। ...और तो और अरुंधति राय का लेखन रश्दी या चेतन भगत के स्तर से बहुत ऊंचा और बड़ा है। रश्दी औऱ नॉयपाल ने अपने लेखन में वह सब बेचा जो पश्चिमी देशों को गरीब देशों के बारे में जानना और सुनना पसंद है। दोनों ने एक धर्म के खिलाफ लिखने को अपने लेखन का आधार बनाया, पश्चिमी देशों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। पश्चिमी देशों के कतिपय विश्लेषकों ने इस सारे मुद्दे को इस्लाम बनाम ईसाइयत के नारे से जोड़ा है यानी इस्लाम के विरोध में लिखने वाले लेखकों को देखने का नजरिया पश्चिमी देशों और वहां की सरकार का अलग तरह से है। मुझे एतराज इस पर नहीं है कि रश्दी औऱ नॉयपाल इस्लाम के खिलाफ लिखते हैं,...वो खूब लिखें....जी भरकर लिखें लेकिन भारत को और एशिया महाद्वीप के तमाम देशों को अपने चश्मे से देखने का नजरिया बदलें।

लेखन इसलिए न किया जाए कि वह पश्चिमी देशों की नीतियों और नजरिए से मेल खाता हो। लेखन इस नजरिए
से न किया जाए कि आप भारतीय लोगों के सरोकार को महत्व न देकर साम्राज्यवादी ताकतों के सरोकारों को
महत्व दें। दुनिया सिर्फ इंग्लैंड और अमेरिका में ही नहीं बसती, अलबत्ता वहां से अंग्रेजी साहित्य में लिखने पर मोटी रकम पुरस्कार के रूप में देने का इंतजाम जरूर है।

साम्राज्यवाद या उसके कुछ पैरोकार देश पुरस्कार और पैसे की आड़ में नॉयपाल या रश्दी से जिस तरह का लेखन करा रहे हैं वही काम भारत में चेतन भगत यहां के कॉरपोरेट के लिए कर रहे हैं। चेतन भगत भी अब खुद को साहित्यकार मानने लगे हैं और भारत की तमाम तरह की समस्याओं पर उलूल जुलूल ढंग से अपने विचार पेश करते रहते हैं। उनकी कुछ नॉवेल पर फिल्में बन गईं और वह रातोरात विख्यात हो गए लेकिन जब-जब वह भारत की समस्या पर कोई लेख लिखते हैं तो उनके अंदर का छिपा हुआ उपभोक्तावाद का पैरोकारी करने वाला लेखक बाहर आ जाता है। गंभीर अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वाले युवा तो अब चेतन भगत सरीखों को रिजेक्ट भी करने लगे हैं।

रश्दी, नॉयपाल, चेतन भगत सरीखे लेखक उस भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिस भारत का प्रतिनिधित्व मुंशी प्रेमचंद या निमाड़े करते हैं। इन्हें भारत तो क्या ठीक से किसी एशियाई देश के गांव का सतही ज्ञान तक नहीं है। जिसके बारे में वह लिख सके। नॉयपाल अपनी एक किताब में एक एशियाई देश के गांव का जिक्र करते हुए वहां के लोगों के गंदे कपड़े, साफ सुथरा न रहने पर भाषण देते हुए नजर आते हैं। नॉयपाल अपनी एक किताब में एक देश के लोगों द्वारा वहां की क्रांति में हिस्सा लेने का मजाक उड़ाते हुए नजर आते हैं। जन आंदोलन रश्दी, नॉयपाल और चेतन भगत के लेखन का हिस्सा नहीं हैं, वे क्यों होते हैं, क्यों होने चाहिए, इसके पक्ष में ये लोग खड़े होते हुए नजर नहीं आते। पर्यावरण को लेकर अगर एशियाई महाद्वीप के किसी देश के गांव का कोई आदमी चिंतिति है तो यह इनके लेखन का हिस्सा नहीं है। हां, ये इसलिए लेखन करते हैं कि साम्राज्यवादी ताकतों को अगर कोई देश उनकी हां में हां मिलाता हुआ नजर नहीं आता तो वह उसका मजाक उड़ाने के लिए किताब लिख देते हैं और अगले ही साल मोटी रकम का कोई बड़ा पुरस्कार झटक लेते हैं।



भारत में चेतन भगत से बेहतर कई लोग अंग्रेजी में साहित्य लिख रहे हैं लेकिन चूंकि वे कॉरपोरेट घरानों के
मनमाफिक नहीं हैं तो उनकी कोई जगह नहीं बन पाई है। माफ कीजिएगा निमाड़े या प्रेमचंद का साहित्य जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में जगह पाने या चर्चा पाने के लिए नहीं लिखा जाता। वहां राजदीप सरदेसाई पर बात होती है
जो एक तरफ तो अपनी जाति-बिरादरी को कहीं सम्मान पाने पर खुश हो जाते हैं और ट्वीट करते हैं तो दूसरी
तरफ मोदी के विरोध में लिखने वाला जैसी छवि बनाकर खुद को भुनाना भी चाहते हैं। इतना अंतरविरोध अगर
आपकी छवि में होगा तो वह रश्दी, नॉयपाल या चेतन भगत ही क्यों न हों, निमाड़े को उनकी आलोचना का पूरा
अधिकार है। और हां... रश्दी, नॉयपाल किसी भी धर्म के खिलाफ कुछ भी लिखें लेकिन बड़े लेखक का टैग लगवाने के बाद निमाड़े को गाली देने का अधिकार नहीं रखते हैं।

Friday, February 6, 2015

मोदी जीतें या फिर केजरीवाल...देश जरूर पूछेगा सवाल


बिना किसी भूमिका के कुछ वजहों से दिल्ली के चुनावी दंगल में अरविंद केजरीवाल की जीत क्यों हो, इसको बताना जरूरी लग रहा है...औऱ इनमें से किसी एक की जीत होने पर सवाल तो पूछे ही जाते रहेंगे...यह किसी टीवी चैनल की अदालत नहीं है जहां सब कुछ मैनेज कराकर सवाल पूछे जाते है...जनता की अदालत का सामना बार-बार करना पड़ेगा...


-दिल्ली के चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल किसने बनाया...आपने इसे क्यों नहीं इसे एक छोटे से राज्य का सामान्य सा विधानसभा चुनाव मानकर क्यों नहीं लड़ा। देश के प्रधानमंत्री की इज्जत एक मामूली से विधानसभा चुनाव में दांव पर लगाने की जरूर क्या थी, किरन बेदी की इज्जत पूरे देश में एक तेजतर्रार महिला आईपीएस की रही है लेकिन अफसोस की इस चुनाव ने इस इमेज को तार-तार कर दिया...और यह सब उस महान रणनीतिकार के कारण हुआ जिसे चारों केसरिया रंग देखने की आदत पड़ गई है...


-बीजेपी और इसके ब्ल्यू आइड ब्वॉय नरेंद्र मोदी को पिछले लोकसभा चुनाव में पूरे देश ने भारी बहुमत से जिताकर लोकसभा में भेजा। पिछले 8 महीनों से यह देश इस बात का इंतजार कर रहा है कि सरकार कुछ ठोस पहल करेगी लेकिन बदले में पब्लिक को उलूल जुलूल किस्म की बातों में उलझाया जा रहा है। जिनका पब्लिक की मूल जरूरतों से कोई वादा नहीं है। मोदी के नसीब से 8 बार पेट्रोल-डीजल के दाम घटे हैं लेकिन महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। उस पर से मोदी के सिपहसालार अमित शाह हम लोगों से पूछते हैं कि आपकी जेब में पैसे बच रहे हैं या नहीं...कितना क्रूर मजाक है...


-मित्रो, क्या चुनाव जुमलेबाजी से लड़े जाते हैं। चुनाव लड़ना एक गंभीर किस्म की प्रक्रिया है, लेकिन सारी पार्टियों ने उसे उठाकर ताक पर रख दिया है। बीजेपी चूंकि सत्ता में है, इसलिए इस पर उसकी जवाबदेही ज्यादा है। अगर आपने लोकसभा चुनाव के दौरान 15 लाख रुपये खाते में भेजने की बात जुमलेबाजी में कही थी तो दिल्ली के चुनाव में आपने वह जुमलेबाजी क्यों जारी रखी...इस देश में कब तक झूठ बोलकर, लोगों के जज्बातों से खेलकर चुनाव लड़े जाते रहेंगे...


-ब्लैकमनी तो कभी वापस नहीं आएगी लेकिन देश के कुछ नवधनकुबेर (जो सिर्फ एक राज्य में फैले अपने बिजनेस की वजह से रईस बने थे) अब जरूर फोर्ब्स की रईसों की लिस्ट में आ गए हैं। जल्द ही अखबारों के लिए फोर्ब्स की वह लिस्ट जारी होने वाली है, जिसे आप अखबारों में पढ़ पाएंगे और टीवी पर देख पाएंगे कि सत्ता का वरदहस्त ब्लैकमनी को बढ़ाता है, घटाता नहीं है और न ही वह लोककल्याण के लिए होती है।


-बीजेपी के सत्ता में आने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नींव दरकने लगी है। बोलने औऱ लिखने की आजादी पर लगातार हमले हो रहे हैं। अगर कोई पत्रकार, लेखक या आम आदमी विभिन्न मंचों पर सरकार के खिलाफ बोलता है तो उसकी निंदा करने की बजाय उसे पुलिस का डर दिखाया जाता है या उसे नौकरी से निकलवा दिया जाता है। फेसबुक पर अपने विरोध की टिप्पणियों को भी ये पार्टी औऱ इसके नेता हजम नहीं कर पा रहे हैं। पूरे चुनाव के कोलाहल में कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हुईं जिन पर आपकी और हमारी नजर नहीं पड़ी। मणिपुर में हाल ही में एक युवक को फेसबुक पर मोदी विरोध में टिप्पणी के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। कई जगहों पर इस तरह की टिप्पणी करने वालों को बाकायदा चेतावनी दी गई। तमाम एनजीओ पर शिकंजा कसा जा रहा है। जिन एनजीओ ने गुजरात में हुए जनसंहार का विरोध किया या वहां अल्पसंख्यकों के बीच में काम किया, उनसे बदला उतारा जा रहा है। यह अभी शुरुआत भर है...अभी लंबा समय बाकी है...


-माना कि भारत को अमेरिका परस्त नहीं होना चाहिए लेकिन वहां का राष्ट्रपति यहां आकर और अब वहां जाकर आपको धार्मिक भेदभाव त्यागने का जो संदेश दे रहा है, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। माना कि भारत के तमाम पत्रकार औऱ अन्य बुद्धिजीवी मोदी विरोधी हैं लेकिन बराक ओबामा को आने अपना मित्र बताया है, वह भी एक भाषण में 21 बार तो कम से कम मित्रता के नाते उस साम्राज्यवादी दोस्त की बात मान जाइए...इस देश को नाथूराम गोडसे के भक्तों के हवाले मत कीजिए। स्पष्ट कहिए कि आप नाथूराम गोडसे के भक्तों के प्रधानमंत्री नहीं हैं...बस इतनी सी बात कहने में क्या जाता है...


-क्या उलूल जुलूस किस्म के नारों से देश चलाया जा सकता है...बीजेपी के सांसद और उससे जुड़े संगठन के तमाम नेता बता रहे हैं कि आप 4 बच्चे पैदा करो तो कभी 10 पैदा करने की सलाह दी जाती है...जिन लोगों ने गैर मजहब में शादियां की हैं, उनकी घर वापसी कराई जा रही है। क्या केंद्र सरकार किसी एक मजहब या संप्रदाय का नेतृत्व करती है...क्या उसे करना चाहिए...फिर इनमें और कांग्रेस में क्या फर्क रह जाएगा...कांग्रेस भी यही कर रही थी और अब बीजेपी भी यही कर रही है...जनता ने अपना कीमती वोट विकास के लिए दिया था न कि विनाश के लिए...




-अगर आपने आज के अखबार देखे हैं, किसी भी भाषा के...नहीं देखें हैं तो सभी के ईपेपर मौजूद हैं देख लीजिए। हर पेपर के पहले पेज पर पूरे पेज का बीजेपी का विज्ञापन है। एतराज इस पर नहीं है कि यह विज्ञापन क्यों है...एतराज यह है कि कोई भी पाठक या जागरूक नागरिक यह सवाल नहीं उठा रहा है कि अखबारों और टीवी के इन विज्ञापनों पर आखिर 4-5 करोड़ खर्च करने के लिए बीजेपी के पास कहां से आए...आप कहेंगे कि इतनी बड़ी पार्टी है, आपका यह सवाल बचकाना है...जाहिर है कि बीजेपी को चंदा मिलता है और बाकी पार्टियों से चंदा पाने के मामले में उसकी स्थिति अच्छी है लेकिन फिर क्या बीजेपी और इसके प्रधानसेवक और प्रधानसेनापति को मक्खी-मच्छर जैसी पार्टियों की चंदा वसूली के बारे में पूछने का अधिकार है...



सवाल तो केजरीवाल से भी होंगे...
-अगर केजरीवाल जीते तो उनकी नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी बढ़ेगी और उसी तरह से उनसे तीखे सवाल पूछे जाएंगे...



-क्या आप दिल्ली की जनता पर कुछ तरह के टैक्स लादकर बिजली औऱ पानी की खैरात बांटेंगे...अगर ऐसा हुआ तो यह बहुत बड़ा छल होगा...फिर आप भी उसी जुमलेबाज नेताओं में आ जाएंगे जिसके लिए दिल्ली का चुनाव इतिहास में अमर रहेगा...


-आपकी पार्टी के लोग हमेशा से शक के दायरे में रहे हैं औऱ रहेंगे कि उनका संबंध किसी न किसी रूप में आरएसएस से रहा है, और सरकार बनने के बाद अगर वे केंद्र सरकार से मदद लेने के नाम पर आरएसएस से अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं तो यह बहुत बड़ा धोखा होगा...क्योंकि अगर आपके कुछ नेता उस संगठन से जुड़े हैं तो साफ बताएं...अतीत में वी. के. सिंह, शाजिया इल्मी और किरन बेदी यह हरकत कर चुके हैं...कवि कुमार विश्वास इस मुद्दे पर अभी भी शक के दायरे में हैं...



-याद रखिए, अगर आप जीते तो जनता ने यह वोट आप को परिवर्तन की राजनीति के लिए है यानी बीजेपी पर अंकुश लगाने के लिए दिया है। सरकार बनने के बाद आपको मोदी और बीजेपी की जनविरोधी नीतियों की गंभीरता से कदम-कदम पर आलोचना करनी होगी। फिर दिल्ली का हित ...नहीं दिखाई देना चाहिए। यकीनन यह चुनाव मोदी और बीजेपी के कामकाज पर एक जनमत संग्रह ही बन गया है, आपको इसे स्वीकार करना पड़ेगा...


-सरकार बनने के बाद आपकी पार्टी को भी बहुत ज्यादा चंदा मिलने लगेगा, तब आपने कितने पारदर्शी रहते हैं, यह देखना होगा, लेकिन आप वादा कीजिए कि एक-एक पाई का हिसाब देंगे। क्या कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करेंगे कि सभी पार्टियों को मिलने वाले चंदे को सुप्रीम कोर्ट के जजों का पैनल निगरानी करे...इसमे कौन सा नुकसान होगा। सब कुछ शीशे की तरह साफ रहेगा। कृपया इसे जरूर करें...



...मिलते हैं 10 फरवरी के नतीजे आने के बाद, नई परिस्थिति...नए सवाल लेकर...जय भारत।






Monday, February 2, 2015

अरे, वो बदनसीब इंसान...


...गोया कि आप नसीब से प्रधान सेवक बने हैं यानी आपके भाग्य में लिखा था कि आप एक दिन प्रधान सेवक बनेंगे जरूर ।...तो उस कर्म का क्या होगा जो जिसके लिए किसी भाग्य की जरूरत नहीं पड़ती। जिसका ज्ञान अब स्कूलों में पढ़ाने की बात आपके एक राज्य का प्रधान चौकीदार कर रहा है। कह रहा है गीता दर्शन पढ़वाउंगा स्कूलों में। वो गीता दर्शन जिसमें भाग्य नहीं कर्म की बात कही गई है।

...सचमुच बहुत कमजर्फ और नामूकल इंसान है वो अदना सा मामूली आदमी जो बदनसीबी के साथ आया है। बदनसीबी उसके साथ-साथ चल रही है और प्रधानसेवक और उसकी सेना ऐसे बदनसीबों से घबराई हुई है। न उगलते बन रहा है और निगलते बन रहा है। सचमुच ये बदनसीब लोग बहुत हठधर्मी होते हैं...नतीजा बेशक सिफर रहे लेकिन नानी याद दिला देते हैं।

...देखो-देखो उस शख्स ने फेसबुक पर क्या चुटकी ली है, लिखता है 10 साल बाद एक बदनसीब देश का प्रधान सेवक। कुछ इस तरह कहेगा कि ...मैं इस बदनसीब देश का प्रधान सेवक गैर सेकुलर संविधान की शपथ लेकर कहता हूं कि वाकई इस देश के लोग बदनसीब थे जिनका मैं प्रधान सेवक रहा। ये लोग इस काबिल थे ही नहीं कि एक नसीब वाले को बतौर प्रधान सेवक झेल सकें।

प्रधानसेवक का सीधा संवाद...आप से

...मित्रो, मुझे एक नसीब वाली पार्टी ने इस दंगल में उलझा दिया है। समझ नहीं आ रहा कि इस दंगल को मैं कैसे फतह करूं। इस बदनसीब देश में है कोई जो मेरी मदद को आए। मेरे प्रधान सेनापति ने जब विकास की वेदी पर उसे कुर्बानी के लिए भेजा तो उसकी मंशा साफ थी। वो तो यही चाहता था कि हारे तो विकास की वेदी पर...जीते तो नसीब वाले की वजह से। पर, मुझे क्या पता था कि बदनसीब देश वाले चालाकी से मुझे इस दंगल में उलझा देंगे। कोसता हूं उस घड़ी को जब मैंने प्रधान सेनापति की सारी बातें मान ली थीं।

...मेरे एक-एक शब्द पर लोग ध्यान दे रहे हैं। मफलरमैन और मैडम कुछ भी कहकर निकल जाएं, उनको कोई कुछ नहीं कहता। अब देखिए जब मैंने कहा कि पेट्रोल औऱ डीजल के दाम प्रधानसेवक के आने के बाद कम हुए तो इसमें मैंने गलत क्या कहा...सोचिए...सोचिए...आखिर मैंने कुछ तो आप लोगों का फायदा कराया। अगर मैं यह फायदा भी न देता तो आप लोग क्या कर लेते लेकिन इस मुद्दे पर ...नी...नी... जी की पूरी सहमति के बाद ही फैसला लिया गया और अब हर महीने आप लोगों की जेब में 1500 रुपये बच रहे हैं या नहीं। यह उन्हीं ...नी...नी...जी की कृपा है, मैं तो निमित्त मात्र हूं।


...मुझे पता है देर सवेर यह मफलरवाला और तथाकथित बुद्धिजीवी मुझे क्रोनी कैप्टलिजम के नाम पर घेरेंगे। कमबख्त पता नहीं कहां से यह शख्स इस शब्द को तलाशकर लाया है कि उसी को गाए जा रहा है। पहले जब वो भले आदमी प्रधानसेवक थे, तब भी इसने इस शब्द का इस्तेमाल किया था और पूरे देश ने मान लिया था कि वाकई भ्रष्ट लोग ही सरकार चला रहे हैं और अब यह शख्स पब्लिक के दिमाग में यह बैठाने में जुटा है कि यह सरकार भी ...नी...नी...जी के कब्जे में है।


...वह शख्स कहता है कि सरकार ढाई लोग चला रहे हैं। चलो मान लेते हैं...यह भी एक तो मैं हुआ, एक मेरा मुंह लगा प्रधान सेनापति हुआ लेकिन भाई आधे में कौन है...यह अंदाजा मैं नहीं लगा पा रहा हूं। मैं साफ किए देता हूं कि इसमें वह यूपी वाला भैया नहीं है, उसको मैंने ठीक से चुप करा दिया है, एक वो साड़ी वाली महिला, उसको तो उसके विभाग के फैसलों का पता नहीं होता....और उन बुढ्ढों को तो मैं पहले ही चुप करा चुका हूं तो आखिर आधे में कौन लोग हैं...कहीं ये ...नी....नी...जी की तरफ तो इशारा नहीं है...


....मैं इसका पता लगाता हूं, तब तक आप लोग धैर्य बनाए रखें और प्रधान सेवक के संवाद को आप तक पहुंचाने के लिए मेरे इस चाटुकार पत्रकार को भी झेलते रहें।


(पाठको...यह संवाद उन पाठकों के लिए है जो राजनीतिक घटनाक्रम से पूरी तरह वाकिफ हैं। जिन्हें इसका संदर्भ नहीं समझ आया हो, वो टीवी देखने की बजाय अखबार पढ़ा करें और सारी राजनीति को लेकर जागरूक बनें। देश में एक वैचारिक संकट लाया जा चुका है। मीडिया जब अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है तो ऐसे ही मंचों पर अब बातचीत कुछ इसी अंदाज में हुआ करेगी...शर्त इतनी है कि आप लोग जागरूक रहें। ओछी भावनाओं में बहने का वक्त नहीं है...जय भारत )