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Friday, February 27, 2009

बिछने लगी है मुस्लिम वोटों के लिए बिसात



मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स में 25 फरवरी 2009 को संपादकीय पेज पर प्रथम लेख के रूप में प्रकाशित है। सामयिक होने के कारण इस ब्लॉग के पाठकों के लिए भी प्रस्तुत कर रहा हूं। इस पर आई टिप्पणियों को आप नवभारत टाइम्स की आनलाइन साइट के इस लिंक पर पढ़ सकते हैं - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4184206.cms


पार्टियां मुसलमानों से मुख्यधारा की पार्टियों को वोट देने की मांग तो करती हैं, लेकिन खुद उतनी तादाद में उन्हें टिकट नहीं देतीं, जितना उन्हें देना चाहिए
लोकसभा चुनावों के नजदीक आते ही सियासत के खिलाड़ी अपने-अपने मोहरे लेकर तैयार हो गए हैं। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में वोटों के लिए बिसात बिछाई जा रही है। इसमें भी सबसे ज्यादा जोर मुस्लिम वोटों के लिए है। कहीं कोई पार्टी उलेमाओं का सम्मेलन बुला रही है तो कहीं से कोई उलेमा एक्सप्रेस को दिल्ली तक पहुंचाकर अपना मकसद हासिल कर रहा है।
यूपी में 19 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं जो लोकसभा की 35 और विधानसभा की 115 सीटों को प्रभावित करते हैं। यह एक विडंबना है कि सभी पार्टियां समय-समय पर मुसलमानों से मुख्यधारा की पार्टियों को वोट देने की मांग तो करती हैं, लेकिन ऐसी सभी पार्टियां उतनी तादाद में उन्हें टिकट नहीं देतीं, जितना उन्हें देना चाहिए। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 417 प्रत्याशी खड़े किए, जिसमें से सिर्फ 33 मुसलमान प्रत्याशी थे। इसमें से सिर्फ 10 जीते। बीएसपी ने 435 उम्मीदवारों में 50 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे, जिसमें 4 जीते। समाजवादी पार्टी ने 237 प्रत्याशियों में से 38 मुसलमानों को टिकट दिया, जिसमें से 7 जीते। सीपीएम ने 70 में से 10 मुस्लिमों को खड़ा किया जिसमें से 5 जीते। इन आंकड़ों की गहराई में जाने पर यही पता चलता है कि सीपीएम को छोड़कर शेष दलों ने मुस्लिम बहुल इलाकों से ही मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा किया। हालांकि खुद को सेक्युलर कहने वाली ये सारी पार्टियां चाहतीं तो गैर मुस्लिम इलाकों से भी मुस्लिम कैंडिडेट को खड़ा कर उनकी हिस्सेदारी बढ़ा सकती थीं। ऐसा सिर्फ 2004 को ही लोकसभा या किसी एक विधानसभा चुनाव में ही नहीं हुआ, हर छोटे-बड़े चुनाव में मुस्लिम वोटरों के मद्देनजर इसी तरह से कैंडिडेट तय किए जाते हैं।
बीएसपी सुप्रीमो मायावती की सोशल इंजीनियरिंग के करिश्मे को थोड़ी देर भूलकर अगर यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों पर गौर करें तो पाएंगे कि जहां-जहां मायावती के मुस्लिम कैंडिडेट बीजेपी को हराने में सक्षम थे, वहां मुसलमानों ने बीएसपी के पक्ष में वोट डाला। इसी तरह जहां-जहां समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम को टिकट दिया और अगर वह बीजेपी को हराने में सक्षम था, तो उसे भी मुसलमानों का वोट मिला। पिछले चुनाव में यह भी देखा गया कि मुस्लिम बहुल इलाके से अगर बीएसपी या समाजवादी पार्टी ने अगर किसी गैर मुस्लिम को टिकट दिया तो उसे भी मुस्लिम मतदाताओं ने सहज तरीके से वोट दिया। लेकिन दूसरे इलाकों में मुस्लिम प्रत्याशियों को अन्य समुदायों के वोट इस रूप में नहीं मिले।
मुसलमानों के वोटों को कैश करने की एक और कोशिश यूपी में पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के रूप में हुई थी। जिसके तहत योजना थी कि मुस्लिम बहुल इलाके वाली सीटों पर पीडीएफ अपने कम से 145 प्रत्याशी खड़ा करे, लेकिन पीडीएफ को अपने मकसद से भटकता देख इसके नेता मौलाना कल्बे जव्वाद ने इसे भंग कर दिया। लेकिन इस संगठन के बनने से यह संकेत जरूर गया कि मुसलमान राजनीति में बराबर की हिस्सेदारी चाहते हैं और वह सिर्फ समाजवादी पार्टी और उसके सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के पिछलग्गू बनकर नहीं रहना चाहते।
यूपी में मुस्लिम वोट पूरी तरह ट्रांसफरेबल है, यानी कोई भी पार्टी जो बीजेपी को हराने का दम-खम रखती हो, वह इन वोटों को अपने हक में ले जा सकती है। यूपी में 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने कुछ हद तक मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में ट्रांसफर कराया था। समाजवादी पार्टी ने उसी चुनाव से सबक लेते हुए बाद में तमाम मुस्लिम नेताओं को अपने पाले में करने की कोशिश तेज कर दी थी। आजमगढ़ से जिस उलेमा एक्सप्रेस को दिल्ली भेजा गया, उसकी तारीफ इसलिए तो की गई कि काफी अनुशासित ढंग से मुसलमान अपनी बात कहने दिल्ली तक पहुंचे, लेकिन सचाई यह है कि इसके जरिए समाजवादी पार्टी ने बीएसपी की मुस्लिम राजनीति को जवाब देने की कोशिश की है। पिछले कुछ महीने से मायावती लगातार कद्दावर मौलवियों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही हैं। लखनऊ में ही मायावती ने कई मुस्लिम सम्मेलन कर डाले हैं।
इस मामले में कांग्रेस की रणनीति कुछ अलग है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चेयरमैन राबे हसन नदवी के संकेत पर कांग्रेस ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद अदीब को राज्यसभा में लाने के लिए एसपी को तैयार ·किया और दोनों की सहमति से अदीब इस वक्त राज्यसभा में हैं। दरअसल नदवी और अदीब जैसे लोग कांग्रेस और एसपी के चुनावी गठबंधन के प्रबल पैरोकार हैं। इसलिए बीएसपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिए चाहे कितने ही दांव-पेच चलाएं, देखना यह है कि इस बार वे कितने मुसलमान कैंडिडेट खड़े करते हैं और कितने संसद में पहुंचते हैं।
बहरहाल, यूपी में विभिन्न पार्टियों की मुस्लिम राजनीति में इतना घालमेल है कि उससे लगता है कि देश में पूरी मुस्लिम राजनीति सिर्फ यूपी के मुसलमानों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है और किस पार्टी को वोट देना है और किसे नहीं देना है, यह सब यूपी के मुस्लिम मतदाता ही तय करते हैं। हालांकि दक्षिण भारत के मुस्लिम मतदाता तो यूपी के मुसलमानों के पैटर्न पर ही मतदान करते हैं, लेकिन केरल जैसे राज्य में उसकी पसंद की सूची में सीपीएम भी है जिसकी कई बार उस राज्य में सरकार बन चुकी है। यूपी के मुकाबले दक्षिण भारत में मुसलमान दूसरी पार्टियों से ज्यादा टिकट पाते हैं लेकिन देश की मुस्लिम राजनीति में जितनी मुखर आवाज उत्तर भारत के मुस्लिम नेताओं की होती है, उतनी दक्षिण भारत में नहीं। हालांकि प्रमुखत: मुसलमानों के समर्थन से चलने वाली इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग आज तक उत्तर भारत में अपनी जड़ें नहीं जमा सकी, सिर्फ दक्षिण भारत में ही वह दो-तीन सीटें जीतकर किसी तरह अपना वजूद बचा लेती है।

साभारः नवभारत टाइम्स 25 फरवरी 2009

ब्लॉगिंग पर खतरा...चर्चा जारी है

ब्लॉगिंग पर मंडरा रहे खतरे को लेकर तमाम लोगों ने यहां और अन्य जगहों पर अपनी चिंता जाहिर की है। लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो चाहता है कि अगर अनाप-शनाप ब्लॉगिंग पर अदालत या उसकी आड़ में सरकार किसी तरह का नियंत्रण करती है तो उसमें बुराई नहीं है। इन लोगों का यह भी कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि आप किसी के खिलाफ कुछ भी लिख दें या आरोप लगा दें या प्रोपेगंडा करें।
लेकिन इस मुद्दे के अलावा और तमाम बातें और मुद्दे हैं, जिन पर इसी के साथ-साथ आगे बढ़ना जरूरी है। फिर भी अगर कोई इस चर्चा को जारी रखना चाहता है तो वह अपनी टिप्पणी अथवा लेख के जरिए इस ब्लॉग पर जारी रख सकता है। तब तक हम लोग कुछ और मुद्दों की तरफ बढ़ते हैं लेकिन यह मुद्दा अभी बरकरार है।...

Thursday, February 26, 2009

तेरा क्या होगा ब्लॉगर्स !

ब्लॉगिंग और ब्लॉगर्स पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के संदर्भ में मेरा जो लेख यहां आप लोगों ने पढ़ा और अपनी चिंता से अवगत कराया, वह यह बताने के लिए काफी है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को आम ब्लॉगर्स (वे नहीं जो किसी समुदाय या धर्म अथवा विचारधारा के खिलाफ घृणा अभियान चलाते हैं) ने काफी गंभीरता से लिया है। फिर भी कुछ लोग हैं जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को अच्छा बता रहे हैं और हमारे और आप जैसे लोगों को पाठ पढ़ा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को सही भावना से लिया जाना चाहिए। चलिए पहले तो यह तय हो जाए कि सही क्या है और जो लोग सच के साथ होने का दम भरते हैं वे खुद कितना सच बोलते हैं।
सोचिए जरा...अगर आप किसी संचार माध्यम अथवा ब्लॉग पर कुछ लिख-पढ़ रहे हैं तो इतना तो आपको भी पता होगा कि लिखते वक्त लिखने वाले की कुछ जिम्मेदारी बनती है, वरना अगर बंदर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया जाएगा तो वह पहले अपने ही गर्दन पर चला लेगा। कुछ लोगों ने दबी जबान से यह कहने की कोशिश की है कि अगर किसी ब्लॉग के जरिए कोई किसी संगठन अथवा दल के खिलाफ घृणा अभियान चलाता है तो उसके सामने पुलिस की शरण में जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता है। अब आप लोग ही यह बताएं कि कैसे यह तय होगा कि शिवसेना वाले मामले में केरल के जिस ब्लॉगर अजीथ डी के खिलाफ मुंबई पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया और मामला अदालत तक गया, वह शिवसेना के खिलाफ निंदा अभियान चला रहा था या फिर शिवसेना की नीतियों के खिलाफ अपनी बात कह रहा था।

मुझे जो समझ में आया और जो मुझे लगता है, वह यह कि सिर्फ अजीथ डी ने ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में ब्लॉगर्स ने शिवसेना की नीतियों की आलोचना की थी। अगर एक आजाद देश में हमसे आलोचना का यह हक छीना जा रहा है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे नारों का क्या होगा।
जो लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में उसकी पैरोकारी कर रहे हैं, फिर वे लोग केंद्र सरकार के निर्देश पर क्यों हायतौबा मचाते हैं जब सरकार मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक दोनों) में तमाम तरह के कटेंट (लेख से लेकर फोटो तक) को नियंत्रित करना चाहती है। इस हिसाब से तो मीडिया पर हल्की ही सही सेंसरशिप लागू की जानी चाहिए।
देश की न्यायपालिका निष्पक्ष है, इसमें कोई दो राय नहीं है। कम से कम आम आदमी इतनी तो उम्मीद कर ही सकता है कि सुप्रीम कोर्ट अभिव्यक्ति की आजादी का किसी भी रूप में हनन होने नहीं देगा। हां, अगर कोर्ट आम आदमी से उसकी जवाबदेही और जिम्मेदारी की उम्मीद करता है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। अलबत्ता कोर्ट कम से कम ऐसे मामलों में तो हस्तक्षेप जरूर करे कि अगर किसी ब्लॉगर्स को कोई संगठन या दल धमकी देता है या किसी अन्य नुकसान की कोशिश करता है। केरल के अजीथ डी ने यही तो चाहा था।
फिर पहल क्या हो ?
कई साथियों ने इस मुद्दे पर पहल की बात कही है। मुझे लगता है कि इस पर पहल बहुत सोच-समझ और विचार के बाद की जानी चाहिए। पहले तो हमें तमाम कानूनी पहलुओं का अध्ययन करना होगा औऱ इसे किस मंच पर किस तरह चुनौती दी जा सकती है, इस पर भी सोचना होगा। यह भी हो सकता है कि इस संबंध में देशभर के हिंदी-अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉगर्स साझा मंच बनाकर भारत के चीफ जस्टिस तक अपनी अपील भेजें। बहरहाल, यह काम किसी अकेले यूसुफ किरमानी या हिंदीवाणी जैसे ब्लॉग के बूते की बात नहीं है। इस पर सभी को मिलकर चलना होगा। तमाम ब्लॉगर साथियों में अगर कोई वकील हो और उसकी कानूनी समझ अच्छी हो तो इस पर विस्तृत विचार किया जाना चाहिए। लोकसभा चुनाव भी निकट हैं, इसे हम चुनावी मुद्दा बना सकते हैं और कम से कम तमाम पार्टियों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। यह मुद्दा इसलिए भी बन सकता है कि देश के कई नेता ब्लॉगगीरी में उतर आए हैं और कुछ ने तो अपनी वेबसाइट भी लॉन्च कर दी है तो उन्हें इस माध्यम की ताकत का भी अंदाजा हो चुका है। इसलिए मंथन जारी रखिए। फुटकर टिप्पणियों से बात नहीं बनने वाली है।
हां...जिन ब्लॉगर्स को यह सब पसंद नहीं है, वे इस तरह की पहल के खिलाफ मुहिम भी छेड़ सकते हैं। क्योंकि हम अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसी मुहिम का विरोध नहीं करेंगे। यह उनकी सोच पर निर्भर करेगा।

Tuesday, February 24, 2009

ब्लॉगिंग पर लगेगा पहरा, आप जाएंगे जेल


यह लेख सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में तुरत-फुरत में लिखा गया है। यह जिस संदर्भ में वह खबर नीचे दी गई है। कृपया उस खबर को जरूर पढ़ें, तभी सही संदर्भ समझ में आएगा। - यूसुफ किरमानी

ब्लॉगर्स पर लगाम कसने वाली है और हैरानी की बात है कि इसके विरोध के स्वर कहीं से नहीं सुनाई दे रहे हैं। जिन्होंने 24 फरवरी को द टाइम्स आफ इंडिया के पेज 9 पर इस आशय की खबर पढ़ी होगी, वे जरूर चिंतित होंगे। लेकिन इसकी आहट काफी पहले से सुनाई दे रही थी और किसी भी स्तर पर इसके विरोध की शुरुआत नहीं हुई थी।
पहले यह जानिए की हुआ क्या है। केरल में रहने वाले 19 साल के अजिथ डी अपना ब्लॉग चलाते हैं। वह अपने ब्लॉग में शिवसेना की गुंडागर्दी के खिलाफ बराबर और असरदार ढंग से लिखते रहे हैं। यह सब शिवसेना को भला क्यों अच्छा लगता। महाराष्ट्र में शिवसेना यूथ विंग के राज्य सचिव ने अगस्त 2008 में मुंबई के ठाणे पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई कि इस ब्लॉग के जरिए शिवसेना के खिलाफ लिखकर घृणा फैलाई जा रही है और खासकर इसमें जो लोग टिप्पणी करते हैं उससे समाज में वैमनस्यता बढ़ सकती है। पुलिस ने भी बिना पड़ताल अजिथ डी के खिलाफ धारा 506 (धमकी) और 295A (दो समुदायों के बीच नफरत फैलाना) में केस दर्ज कर लिया।
अजिथ डी ने पहले तो केरल हाई कोर्ट से जमानत हासिल की और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गए। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन और जस्टिस पी. सत्याशिवम ने इस मामले में उसकी मदद से इनकार कर दिया। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ब्लॉगर्स को कुछ भी मनमाने ढंग से लिखने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि जिससे समाज में कोई बुराई फैले।
हालांकि ब्लॉग के जरिए अगर कोई वाकई घृणा फैलाने की कोशिश करता है तो यह न सिर्फ निंदनीय है बल्कि इसका विरोध भी पूरी ताकत से किया जाना चाहिए। लेकिन शिवसेना या अन्य दल अथवा संगठन अगर समाज को बांटने की कोशिश में लगे हुए तो क्या इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। याद कीजिए अमाची मुंबई के नाम पर पिछले दिनों मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीयों के साथ जो सलूक किया गया, क्या ब्लॉग के जरिए उसकी निंदा करना अपराध है। पिछले दिनों मंगलौर में एक पब में और सड़कों पर श्रीराम सेना ने संस्कृति के नाम पर जो बदमाशी की, क्या ब्लॉग पर उसकी निंदा गलत है। यह तो कुछ एक घटनाएं हैं, जिनका सहज जिक्र या जिनके जरिए ऐसे सवाल खड़े होना जरूरी है। हालांकि हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट हो सकता है अपने इस फैसले को और दुरुस्त करे लेकिन अभी जो फिलहाल स्थिति बनी है, वह प्रबुद्ध लोगों के लिए विचारणीय विषय तो है ही। दरअसल, तमाम प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की विभिन्न राजनीतिक दलों से जो प्रतिबद्धताएं या खेमेबाजी है, उसके बीच ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच बनकर आया, जहां आप अपने विचार, अपनी संवेदनाएं मुक्त भाव से रख सकते हैं। लेकिन अब भारत में इस पर भी पहरेदारी होगी।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपराध और तंत्र-मंत्र की खबरों को रेग्युलेट करने के लिए कुछ मानक बनाने चाहे थे लेकिन उसकी चर्चा मात्र से पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इतना हायतौबा मची कि सरकार को इस पर सफाई देनी पड़ी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी किया और अखबारों में इसके समर्थन में बड़े-बड़े लेख भी राजदीप सरदेसाई से लेकर बरखादत्त तक ने लिख डाले। मेरा भी यह मानना है कि इस तरह की कोई भी सरकारी गतिविधि दरअसल हमेशा से मीडिया को नियंत्रित करने के लिए ही होती है लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का ब्लॉगों को लेकर यह दिशा-निर्देश हमारी चिंता का विषय न होना बहुत भारी महंगी पड़ने वाली है।
शायद आप लोगों ने पिछले दिनों यह पढ़ा होगा कि तिब्बत और बर्मा में वहां के जन आंदोलन के दौरान जब प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई तो उस दौरान ब्लॉगर्स ने अपना कमाल दिखाया और वहां की सारी खबरें दुनिया ने ब्लॉगों के माध्यम से जानीं।
भारत में या कहिए हिंदी में ब्लॉगिंग अभी उस लेवल तक नहीं पहुंची है जहां अंग्रेजी के ब्लॉग पहुंच चुके हैं। इन हालात में अभी जब हिंदी ब्लॉगिंग अपने शुरुआती दौर में है तो ऐसे में यह फैसला हिंदी ब्लॉगिंग की बढ़त को रोक सकता है। बहरहाल, इस दिशा में फौरन ही किसी पहल की जरुरत है। चाहे वह हम सब लोग मिलकर करें या फिर भारत के राजनीतिक दल करें।

courtesy : THE TIMES OF INDIA dated 24th Feb. 2009

NO MORE SHOOT AND SCOOT
Free run over? Bloggers can be nailed for slur

Dhananjay Mahapatra | TNN

New Delhi: A 19-year-old blogger’s case could forever change the ground rules of blogging. Bloggers may no longer express their uninhibited views on everything under the sun, for the Supreme Court said they may face libel and even prosecution for the blog content.
It will no longer be safe to start a blog and invite others to register their raunchy, caustic and even abusive comments on an issue while seeking protection behind the disclaimer — views expressed on the blog are that of the writers. This chilling warning emerged as a bench comprising Chief Justice K G Balakrishnan and Justice P Sathasivam refused to protect a 19-year-old Kerala boy Ajith D, who had started a community on a networking site against Shiv Sena, from protection against summons received from a Maharashtra court on a criminal case filed against him.
In this community, there were several posts and discussions by anonymous persons who alleged that Shiv Sena was trying to divide the country on region and caste basis.
Reacting to these posts, the Shiv Sena youth wing’s state secretary registered a criminal complaint at Thane police station in August 2008 based on which FIR was registered against Ajith under Sections 506 and 295A pertaining to hurting public sentiment.
After getting anticipatory bail from Kerala HC, Ajith moved the Supreme Court through counsel Jogy Scaria seeking quashing of the criminal complaint on the ground that the blog contents were restricted to communication within the community and did not have defamation value. He also pleaded that there was threat to his life if he appeared in a Maharashtra court.

Monday, February 23, 2009

स्लमडॉग मिलियनेयर : इन खुशियों को साझा करें


-अलीका
स्लम डॉग मिलियनेयर को 8 आस्कर पुरस्कार मिलने की खुशी कम से कम प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जबर्दस्त ढंग से दिखाई दे रही है। हालांकि यह मूल रूप से ब्रिटिश फिल्म है लेकिन हम भारतीयों को ऐसी खुशियां साझा करते देर नहीं लगती जिसमें भारत के लोगों का कुछ न कुछ योगदान रहता हो। रिचर्ड एडनबरो की फिल्म गांधी से लेकर स्लम डॉग... तक मिले पुरस्कारों से तो यही बात साबित होती है। लेकिन स्लम डॉग कई मायने में कुछ अलग हटकर है। जैसे इसके सारे पात्रों में भारतीय छाए हुए हैं और इस फिल्म की जान इसका संगीत तो बहरहाल खालिस देसी ही है। मुझे अच्छी तरह याद है कि इस फिल्म में ए. आर. रहमान के म्यूजिक को जब जारी किया गया था और गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतने के बाद तो लोगों ने मुंह बना लिया था और स्लम डॉग... के म्यूजिक को पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया था। लोग आपसी बातचीत में कहते थे कि रहमान ने इससे बेहतर म्यूजिक कई फिल्मों में दिया है। यह उनका बेस्ट म्यूजिक नहीं है।

बहरहाल, अपनी-अपनी सोच है। देश का एक बड़ा हिस्सा इस फिल्म को मिले आस्कर पुरस्कार से उत्साहित है लेकिन अब भी इस बात की चर्चा तो हो ही रही है कि इस फिल्म के बहाने भारत की गरीबी को बेचा गया है। हालांकि इस पर इस फिल्म के रिलीज होने के साथ काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन अब आस्कर मिलने के बाद इस चर्चा का फिर से उठना स्वाभाविक है। लेकिन भारत की गरीबी को बेचने के नाम पर इस फिल्म का विरोध करना नितांत गलत है। इससे पहले कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली ढेरों डॉक्युमेंटरी फिल्मों में भारत की गरीबी का चित्रण किया गया है। भारत की गरीबी या यहां धर्म के नाम पर दंगा-फसाद होना एक कड़वी सच्चाई है, आखिर फिर हम लोग क्यों और दुनिया में किन लोगों से अपनी गरीबी छिपाना चाहते हैं। माफ कीजिएगा शाहरूख खान या आमिर खान भारत की जो रूपहली तस्वीर अपनी फिल्मों में दिखाते हैं क्या वही सच्चाई है। करण जौहर की जिस सुपरहिट फिल्म कभी खुशी कभी गम में भारत की जिस रईसी को दिखाया गया है, क्या वह आम भारतीय की हकीकत है। दरअसल, हम लोग अपने देश में चाहे जितनी वीभत्स फिल्म बनाकर यहां की भाषा और संस्कृति का मजाक उड़ाएं तो कोई बात नहीं लेकिन अगर वही काम कोई विदेशी करता है तो हमारी अस्मिता फौरन जाग जाती है और हमें तमाम राष्ट्रहित दिखाई देने लगते हैं।
मुद्दा तो यह उठना चाहिए कि इससे पहले मदर इंडिया जैसी फिल्म या बॉलिवुड की किसी भी फिल्म को आस्कर की जूरी ने पुरस्कार लायक क्यों नहीं माना। आमिर खान की बच्चों के मनोविज्ञान पर बनी सशक्त फिल्म तारे जमीन पर कम से कम एकाध आस्कर पुरस्कार लायक तो है ही लेकिन उसकी अनदेखी क्यों की गई। दरअसल, हम भारतीयों की पुरानी आदत रही है लकीर पीटने की और हम लोग भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ाए चले जा रहे हैं। खुद नया करने की बजाय सारा वक्त दूसरों को कोसने में लगाते हैं।

Thursday, February 19, 2009

पाक के हालात पर खुश होने की जरूरत नहीं

भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान में जो हालात बन रहे हैं, उस पर हम सभी की नजर जाना स्वाभाविक है। एक प्रमुख पाक्षिक पत्रिका के पत्रकार अमलेन्दु उपाध्याय ने यह लेख खास तौर पर हिंदी वाणी के पाठकों के लिए भेजा है।

अभी खबर आई थी कि पाकिस्तान के कबायली इलाके की स्वात घाटी में तालिबान और पाक सरकार के बीच युद्ध विराम का समझौता हो गया है और पाक सरकार इस बात पर राजी हो गई है कि स्वात घाटी में तालिबान अब शरीयत का कानून लागू करेंगे। ठीक इसी समय पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का बयान आया कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

दोनों खबरें भारत को परेशान करने वाली हैं। स्वात में तालिबान के सामने पाक हुकूमत का घुटने टेकना और जरदारी की स्वीकारोक्ति यह बताती है कि पाकिस्तान विघटन के कगार पर खड़ा है। इस खबर पर भारत में तथाकथित राष्ट्रवादी खुशी में झूम रहे हैं कि अब ‘नक्षे में से पापी पाकिस्तान का नाम मिट जाएगा’। लेकिन ऐसी खुशियां मनाने वाले उन लोगों में हैं जो पड़ोसी का घर जलते देखकर खुशियां मनाते वक्त यह भूल जाते हैं कि पड़ोसी के घर से उठी लपटें हमारा अपना घर भी स्वाहा कर देंगी।
मान लिया जाए कि पाकिस्तान के हालात और खराब होते हैं और वहां की लोकतांत्रिक पद्धति से चुनी गई जरदारी सरकार कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं रहती है तब वहां हुकूमत पर कौन काबिज होंगे? जाहिर है ऐसी परिस्थिति में या तो फौज की हुकूमत में वापसी होगी या फिर तालिबान और कट्टरपंथी कठमुल्ले काबिज होंगे।
आजादी के बाद से भारत लगातार पाक प्रायोजित छद्म युद्ध का सामना इसलिए करता रहा है क्योंकि पाक में अधिकांश समय फौजी हुकूमत रही है और वहां की फौज को हुकूमत कायम रखने के लिए भारत से अदावत रखना लाजिमी था, ठीक उसी तरह से जैसे हमारे देष में कुछ सियासी जमातों को जिंदा रहने के लिए पाकिस्तान का नाम जपना जरूरी है।

काबिले गौर बात यह है कि स्वात घाटी समेत समूचे कबायली इलाकों में अनेक बार अमेरिकी फौजों ने पाक सीमा में घुसकर बमबारी की है और पाक फौज को मदद भी पहुंचाई है। यह वही इलाका है जहां ओसामा बिन लादेन के छिपे होने का संदेह है। उधर पाकिस्तान में अमेरिकी चरणपादुकाएं लेकर शासन कर रहे अमेरिकी दूत हामिद करजई भी तालिबानों से सहयोग की अपील कर रहे हैं। खबर तो यहां तक है कि अफगानिस्तान के कुछ हिस्सें में तालिबान समानांतर सरकार चला रहे हैं। इसका संदेश साफ है कि भारतीय उपमहाद्वीप समेत पूरे एशिया में अमेरिकी नीति बुरी तरह विफल रही है।

भारत के लिए सर्वाधिक चिंता का विशय यह है कि अगर जरदारी पाक में कमजोर पड़ते हैं तो तालिबान हावी होंगे जो भारत के लिए बड़ा खतरा है। अमेरिका को उसके घर में घुसकर न मार पाने की खुन्नस तालिबान अमेरिका के नए दोस्त भारत से ही निकालेंगे। मुशर्रफ की फौज हो या अययूब खां की, पाकिस्तान के रूप में एक संप्रभु राष्ट्र से लड़ना भारत के लिए आसान था, चूंकि जंग के बावजूद कहीं न कहीं अंतर्राष्ट्रीय दबावों के आगे पाकिस्तान को झुकना ही पड़ता था। आज भी अजमल आमिर कस्साब के मसले पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव में ही सही पाकिस्तान यह मानने को तैयार तो हुआ कि मुंबई हमले की साजिश में उसकी जमीन का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन अगर तालिबान पाकिस्तान में हुकूमत करेंगे तो क्या वे अंतर्राष्ट्रीय कानून और दबाव को मानेंगे? जिन तालिबानों से अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटों सेनाएं पार नहीं पा रही हैं क्या उनसे भारत पार पा लेगा?

सवाल यह है कि क्या हमने अपनी अतीत की गल्तियों और पड़ोसियों के तजुर्बे से कुछ सबक लिया है? वे जुल्फिकार अली भुट्टो जो जियाउलहक की फौजों के बल पर फूलकर हुंकार भर रहे थे कि ‘भारत से एक हजार साल तक लड़ेंगे’, उसी जिया के हाथों फांसी के फंदे तक पहुंचाए गए। अमेरिका ने ओसामा को पाला बदले में 9/11 पाया। श्रीलंकाई छापामारों लिट्टे को भारत ने संरक्षण दिया नतीजे में क्या मिला? हमने राजीव गांधी को खोया! भिंडरवाला को कांग्रेस ने पैदा किया फलस्वरूप इंदिरा गांधी की शहादत हुई! अतिवादी ताकतें चाहे कोई हों, मुल्ला उमर हो या प्रमोद मुतालिक, नागफनी की फसल की तरह हैं। इसलिए जो तथाकथित राष्ट्रवादी पाकिस्तान की तबाही पर जश्न मना रहे हैं वे आने वाले दिनों में अपने घर की तबाही से बेखबर हैं। बेहतर है कि पाकिस्तान में हमारी दुश्मनी के बावजूद लोकतंत्र की शमां जलती रहे।

-अमलेन्दु उपाध्याय
संपर्क - amalendu.upadhyay@gmail.com

Monday, February 16, 2009

कहीं पछताना न पड़े



वैलंटाइंस डे पर जिस बेहूदगी और मॉरल पुलिसिंग को इस देश ने अपनी आंखों से देखा, सुना और पढ़ा, वह सचमुच शर्मनाक है। चंद लोगों ने भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर जो घटिया अभियान चलाया, यह देखकर अफसोस होता है कि वे और हम सभी आजाद भारत के नागरिक हैं।
आमतौर पर संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदार अब तक सिर्फ उत्तरी भारत में ही वैलंटाइंस डे का विरोध और शौर्य दिवस मनाया करते थे लेकिन इस बार शुरुआत दक्षिण भारत से हुई और वहां भी मुट्ठी भर लोग लड़के- लड़कियों से बदतमीजी करते नजर आए।
उज्जैन शहर में जो कुछ भी हुआ वह तो तमाम संघियों के लिए डूब मरने की बात है। आप लोगों में से लगभग सारे लोगों ने वह खबर पढ़ी होगी कि स्कूटर पर जा रहे भाई- बहन को बजरंगी सेना के गुंडों ने रोक लिया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया। उनका स्कूटर क्षतिग्रस्त कर दिया। यह वही शहर है, जहां एक प्रोफेसर को सरेआम एक राजनीतिक दल के छात्र संगठन के नेताओं ने गला दबाकर मार डाला। ये लोग प्रोफेसर को ज्ञापन देने गए थे। यह छात्र संगठन अपने आप को सबसे अनुशासित संगठन बताता है लेकिन उसके नेताओं की करनी अभी उज्जैन शहर भूला नहीं है। उसी शहर में भाई-बहन के साथ हुई यह घटना यह बताती है कि ऐसे लोग जब सत्ता में आते हैं तो आम आदमी से किस तरह का बर्ताव करते हैं।
जिस भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार से इन तत्वों का जन्म हुआ है, उन लोगों ने तमाम किंतु-परंतु से इन घटनाओं पर घड़ियाली आंसू बहाए लेकिन यह कहना भी नहीं भूले कि किसी को भारतीय संस्कृति से खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं है। इन लोगों से कोई यह नहीं पूछता कि भाई भारतीय संस्कृति के मॉडल कोड आफ कंडक्ट आप लोगों ने ही बनाए हैं ?




अब एकाध महीने बाद देश में आम चुनाव होना है। इस बार कहा जा रहा है कि बीजेपी के चांस अच्छे हैं और प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग को ज्यादा वेट नहीं करना पड़ेगा लेकिन जो पार्टी देश का शासन चलाने का सपना देख रही हो, उसकी सोच सांप्रदायिक होने के साथ-साथ संकीर्ण और घटिया मानसिकता की होगी, यह इस देश की जनता को देखना है कि वह दरअसल ऐसी पार्टियों से किस तरह के लोकतांत्रिक व्यवस्था की आपेक्षा रखती है। कहीं बाद में पछताना न पड़े।