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Tuesday, February 24, 2009

ब्लॉगिंग पर लगेगा पहरा, आप जाएंगे जेल


यह लेख सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में तुरत-फुरत में लिखा गया है। यह जिस संदर्भ में वह खबर नीचे दी गई है। कृपया उस खबर को जरूर पढ़ें, तभी सही संदर्भ समझ में आएगा। - यूसुफ किरमानी

ब्लॉगर्स पर लगाम कसने वाली है और हैरानी की बात है कि इसके विरोध के स्वर कहीं से नहीं सुनाई दे रहे हैं। जिन्होंने 24 फरवरी को द टाइम्स आफ इंडिया के पेज 9 पर इस आशय की खबर पढ़ी होगी, वे जरूर चिंतित होंगे। लेकिन इसकी आहट काफी पहले से सुनाई दे रही थी और किसी भी स्तर पर इसके विरोध की शुरुआत नहीं हुई थी।
पहले यह जानिए की हुआ क्या है। केरल में रहने वाले 19 साल के अजिथ डी अपना ब्लॉग चलाते हैं। वह अपने ब्लॉग में शिवसेना की गुंडागर्दी के खिलाफ बराबर और असरदार ढंग से लिखते रहे हैं। यह सब शिवसेना को भला क्यों अच्छा लगता। महाराष्ट्र में शिवसेना यूथ विंग के राज्य सचिव ने अगस्त 2008 में मुंबई के ठाणे पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज कराई कि इस ब्लॉग के जरिए शिवसेना के खिलाफ लिखकर घृणा फैलाई जा रही है और खासकर इसमें जो लोग टिप्पणी करते हैं उससे समाज में वैमनस्यता बढ़ सकती है। पुलिस ने भी बिना पड़ताल अजिथ डी के खिलाफ धारा 506 (धमकी) और 295A (दो समुदायों के बीच नफरत फैलाना) में केस दर्ज कर लिया।
अजिथ डी ने पहले तो केरल हाई कोर्ट से जमानत हासिल की और इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गए। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन और जस्टिस पी. सत्याशिवम ने इस मामले में उसकी मदद से इनकार कर दिया। बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ब्लॉगर्स को कुछ भी मनमाने ढंग से लिखने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि जिससे समाज में कोई बुराई फैले।
हालांकि ब्लॉग के जरिए अगर कोई वाकई घृणा फैलाने की कोशिश करता है तो यह न सिर्फ निंदनीय है बल्कि इसका विरोध भी पूरी ताकत से किया जाना चाहिए। लेकिन शिवसेना या अन्य दल अथवा संगठन अगर समाज को बांटने की कोशिश में लगे हुए तो क्या इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। याद कीजिए अमाची मुंबई के नाम पर पिछले दिनों मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीयों के साथ जो सलूक किया गया, क्या ब्लॉग के जरिए उसकी निंदा करना अपराध है। पिछले दिनों मंगलौर में एक पब में और सड़कों पर श्रीराम सेना ने संस्कृति के नाम पर जो बदमाशी की, क्या ब्लॉग पर उसकी निंदा गलत है। यह तो कुछ एक घटनाएं हैं, जिनका सहज जिक्र या जिनके जरिए ऐसे सवाल खड़े होना जरूरी है। हालांकि हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट हो सकता है अपने इस फैसले को और दुरुस्त करे लेकिन अभी जो फिलहाल स्थिति बनी है, वह प्रबुद्ध लोगों के लिए विचारणीय विषय तो है ही। दरअसल, तमाम प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की विभिन्न राजनीतिक दलों से जो प्रतिबद्धताएं या खेमेबाजी है, उसके बीच ब्लॉगिंग एक ऐसा मंच बनकर आया, जहां आप अपने विचार, अपनी संवेदनाएं मुक्त भाव से रख सकते हैं। लेकिन अब भारत में इस पर भी पहरेदारी होगी।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपराध और तंत्र-मंत्र की खबरों को रेग्युलेट करने के लिए कुछ मानक बनाने चाहे थे लेकिन उसकी चर्चा मात्र से पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इतना हायतौबा मची कि सरकार को इस पर सफाई देनी पड़ी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी किया और अखबारों में इसके समर्थन में बड़े-बड़े लेख भी राजदीप सरदेसाई से लेकर बरखादत्त तक ने लिख डाले। मेरा भी यह मानना है कि इस तरह की कोई भी सरकारी गतिविधि दरअसल हमेशा से मीडिया को नियंत्रित करने के लिए ही होती है लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का ब्लॉगों को लेकर यह दिशा-निर्देश हमारी चिंता का विषय न होना बहुत भारी महंगी पड़ने वाली है।
शायद आप लोगों ने पिछले दिनों यह पढ़ा होगा कि तिब्बत और बर्मा में वहां के जन आंदोलन के दौरान जब प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई तो उस दौरान ब्लॉगर्स ने अपना कमाल दिखाया और वहां की सारी खबरें दुनिया ने ब्लॉगों के माध्यम से जानीं।
भारत में या कहिए हिंदी में ब्लॉगिंग अभी उस लेवल तक नहीं पहुंची है जहां अंग्रेजी के ब्लॉग पहुंच चुके हैं। इन हालात में अभी जब हिंदी ब्लॉगिंग अपने शुरुआती दौर में है तो ऐसे में यह फैसला हिंदी ब्लॉगिंग की बढ़त को रोक सकता है। बहरहाल, इस दिशा में फौरन ही किसी पहल की जरुरत है। चाहे वह हम सब लोग मिलकर करें या फिर भारत के राजनीतिक दल करें।

courtesy : THE TIMES OF INDIA dated 24th Feb. 2009

NO MORE SHOOT AND SCOOT
Free run over? Bloggers can be nailed for slur

Dhananjay Mahapatra | TNN

New Delhi: A 19-year-old blogger’s case could forever change the ground rules of blogging. Bloggers may no longer express their uninhibited views on everything under the sun, for the Supreme Court said they may face libel and even prosecution for the blog content.
It will no longer be safe to start a blog and invite others to register their raunchy, caustic and even abusive comments on an issue while seeking protection behind the disclaimer — views expressed on the blog are that of the writers. This chilling warning emerged as a bench comprising Chief Justice K G Balakrishnan and Justice P Sathasivam refused to protect a 19-year-old Kerala boy Ajith D, who had started a community on a networking site against Shiv Sena, from protection against summons received from a Maharashtra court on a criminal case filed against him.
In this community, there were several posts and discussions by anonymous persons who alleged that Shiv Sena was trying to divide the country on region and caste basis.
Reacting to these posts, the Shiv Sena youth wing’s state secretary registered a criminal complaint at Thane police station in August 2008 based on which FIR was registered against Ajith under Sections 506 and 295A pertaining to hurting public sentiment.
After getting anticipatory bail from Kerala HC, Ajith moved the Supreme Court through counsel Jogy Scaria seeking quashing of the criminal complaint on the ground that the blog contents were restricted to communication within the community and did not have defamation value. He also pleaded that there was threat to his life if he appeared in a Maharashtra court.

8 comments:

swapandarshi said...

"सुप्रीम कोर्ट का ब्लॉगों को लेकर यह दिशा-निर्देश हमारी चिंता का विषय न होना बहुत भारी महंगी पड़ने वाली है।"

virodh kaa vimarsh khatm karane kaa ye sabse kaargar tareeka hai. sirf kahane ko hee hai abhivyakti kee swatantrtaa?

राज भाटिय़ा said...

लेकिन हम जिन कुत्तो के बारे लिखते है, क्या उन्हे यह हक है की वो देश कॊ चाहे बेचते रहे, ओर वो गुण्डे नेता बन कर हमारा खुन पीते रहे, ओर हम घुटनो मै मुंह छिपा कर बस सुबुकते रहे, खाली पेट सोये, ओर अपने दिल का दर्द कहे तो अराजकत फ़ेलती है,डरो नही कोई ना कोई रास्ता ओर भी होगा...
धन्यवाद इस खबर के लिये

रजनीश मंगला said...

ब्लॉगिंग को कैसे रोका जाएगा। क्या तमाम ब्लॉगिंग कंपनियों को चुनौती दी जाएगी कि अगर ऐसा वैसा कुछ छपा तो ठीक नहीं होगा, या फिर वे कुछ खास आपत्तीजनक ब्लॉगों पर प्रतिबंध लगेगा? ब्लॉगिंग कंपनियां तो वैसे भी भारत में नहीं हैं, तो उनपर प्रतिबंध कैसे लगेगा, थोड़ा विस्तार से बताएं।

Anonymous said...

सुप्रीम कोर्ट में कौन-से दूध के धुले लोग बैठे हैं. जिस न्याय पालिका के भ्रष्टाचार से देश का बच्चा-बच्चा वाकिफ है, उससे किसी जनमंच के प्रति ईमानदारी की उम्मीद करना ही नासमझी होगी. यह ब्लॉगर्स की गलतफहमी हो सकती है कि इस देश की भ्रष्ट न्याय पालिका समय आने पर कोई ईमानदार रवैया अख्तियार करेगी.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

इसके ख़िलाफ़ मिलकर आवाज़ उठाए जाने की ज़रूरत है. और उन चिट्ठाकारों के खिलाफ़ भी जो वाकई समाज को बांटने और अश्लीलता या घृणा फैलाने जैसी टुच्ची हरकतें कर रहे हैं.

sareetha said...

आपकी चिंता जायज़ है ,लेकिन शुरुआत कहाँ से और कैसे हो ? इस पर विचार होना चाहिए जल्दी ही इस मुद्दे पर काम शुरु किया जाना चाहिए

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

आज फिल्मों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया द्वारा जो कुछ दिखाया जा रहा है उसकी तुलना में हिंदी ब्लॉगस काफी साफ़ सुथरे और ज्ञानपरक हैं. सुप्रीम कोर्ट को लोगों के अभिव्यक्ति के मूल अधिकार पर शिकंजे लगाने का कोइ अधिकार नहीं है. कानों लोगों के लिए हैं न की लोग कानून के लिए.

ab inconvenienti said...

भ्रामक पोस्ट, आप मुक़दमे की मूल भावना को समझ ही नहीं पाए (सुप्रीम कोर्ट निश्चय ही ज्यादा अनुभवी और विद्वान है). तथ्यों को सामने लाना एक बात है और ब्लॉग के माध्यम से भ्रमपूर्ण प्रचार (प्रोपेगेंडा) करना एकदम दूसरी. कुछ वैसे ही जैसे छोटे-मोटे चोर को आंतकवादी और देश के खिलाफ षडयंत्र का आरोपी बताया जाए.

सुप्रीम कोर्ट में ही, कुछ ऐसा ही मुकदमा मंगलोर के निवासियों ने खुद को तालिबानी कहे जाने के खिलाफ दायर किया है.

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/02/legal-notice-to-renuka-choudhary.html

बात मानहानि की है न की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की. आप किसी व्यक्ति या संगठन को पसंद नहीं करते है तो वह आपकी मर्ज़ी, पर उसके बारे में अनर्गल कुप्रचार या जो मन में आये लिखना आपराधिक कृत्य है, हर व्यक्ति और संस्था को यह कानूनी अधिकार है की वह प्रोपेगेंडा के खिलाफ न्यायलय की शरण ले.

ब्लॉगर होने का यह मतलब नहीं की प्रोपेगेंडा करते फिरो.और अगर मामला कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है तो सही गलत का फैसला भी उसी पर क्यों न छोड़ा जाए?