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Sunday, June 26, 2016

अमजद साबरी जैसा कोई नहीं

26 जून 2016 के नवभारत टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल अमजद साबरी पर

प्रकाशित मेरा लेख...बाकी पाठकों को भी यह उपलब्ध हो सके, इसलिए इसे यहां पेश किया जा रहा है...


पाकिस्तान में सूफी विरासत को मिटाने का सिलसिला जारी है। चाहे वो सूफियाना कलाम गाने वाले गायक हों या सूफी संतों की दरगाहें हों, लगातार वहाबियों व तालिबानी आतंकवादियों का निशाना बन रही हैं। 45 साल के अमजद साबरी 22 जून 2016 को इसी टारगेट किलिंग का शिकार बने। वहाबियों का सीधा सा फंडा है, पैगंबर और उनके परिवार का जिक्र करने वाले सूफी गायकों, शायरों और सूफी संतों की दरगाहों को अगर मिटा दिया गया तो इन लोगों का नामलेवा कोई नहीं बचेगा। लेकिन कट्टरपंथी यह भूल जाते हैं कि किसी को मारने से उस विचारधारा का खात्मा नहीं होता। वह और भी जोरदार तरीके से नए रूप में वापसी करती है।



अमजद साबरी के साथ भी तो यही हुआ। कहां तो अमजद को हमेशा कैरम और क्रिकेट खेलने का शौक रहा लेकिन विरासत में मिली जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें कव्वाल बनना पड़ा। ...और वो न सिर्फ बने बल्कि मरते दम तक वो पाकिस्तानी यूथ के आइकन थे।

क्रिकेट के खेल में मस्त अमजद को एक दिन उनके पिता फरीद गुलाम साबरी पकड़कर लाए और कहा, मेरे अपने चाचा के साथ बैठकर रियाज किया करो। उस दिन से अमजद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा लेकिन उनका क्रिकेट खेलने का शौक अंत तक जारी रहा। यही वजह थी कि कराची में 23 जून को अमजद के जनाजे में उमड़ी भीड़ में युवकों की तादाद ज्यादा थी। अमजद की मौत पर पूरा भारतीय उपमहाद्वीप और जहां-जहां उनके चाहने वाले थे, निहायत रंजों-गम में डूब गए।



साबरी घराने का ताल्लुक भारत से है। हरियाणा के भिवानी जिले की चरखी दादरी तहसील में कलियाणा गांव से साबरी परिवार 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त पाकिस्तान कूच कर गया था। भारत से पाकिस्तान गए इन लोगों को आज भी मुहाजिर (रिफ्यूजी) बोला जाता है। ये लोग पाकिस्तान बड़ी उम्मीदों से पहुंचे थे लेकिन वहां इन्हें अपने शुरुआती दिन बहुत ग़रीबी में बिताने पड़े। इसी दौर में गुलाम फरीद साबरी की ज़ुबान पर ये कलाम
- भर दो झोली मेरी या मोहम्मद, लौट के न जाउंगा खाली – आया और साबरी ब्रदर्स भारतीय उपमहाद्वीप में छा गए। इसके बाद तो उन्होंने एक से एक कव्वालियां पेश कीं और उन्होंने इस क्षेत्र में एक इतिहास रच दिया।

पिता और चाचा के निधन के बाद अमजद पर इस विरासत को संभालने की पूरी जिम्मेदारी आन पड़ी। अमजद की आवाज अपने पिता व चाचा से बहुत भिन्न नहीं थी तो अमजद के पैर भी आसानी से इस क्षेत्र में जम गए। तब तक कव्वाली भी महफिलों से निकलकर टीवी पर आ गई। अमजद ने अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के कलाम को नए अंदाज में पेश किया और वो बहुत जल्द पाकिस्तान के यूथ की पहचान बन गए। संगीत की दुनिया में नुसरत फतेह अली खान, राहत फतेह अली खान के बाद अगर किसी की पहचान थी तो वो अमजद साबरी ही थे।
मई 2014 में उन्होंने जियो टीवी पर एक कार्यक्रम पेश किया। इस कार्यक्रम के होते ही पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने शोर मचा दिया। उन्होंने कहा कि जियो पर इस कार्यक्रम को बंद कराया जाए और ईश निंदा (Blasphemy ) कानून के तहत अमजद साबरी, जियो टीवी के मालिक, एंकर, और शायर अकील मोहसिन नकवी पर केस दर्ज किया जाए। इसी के बाद से अपने पिता की तरह ही अमजद पर आतंक का साया मंडराने लगा। अमजद की खासियत थी कि वो महज कव्वाल नहीं थे। वो मूलतः एक शायर थे, जो पैगंबर की शान में, उनके परिवारों वालों की शान में, कर्बला की शान में तमाम रचनाएं पढ़ते थे। जिस दिन अमजद साबरी की हत्या हुई, उसी दिन कराची में ही कुछ घंटे बाद भारतीय मूल के प्रसिद्ध नौहाख्वान फरहान अली वारिस की कार पर भी गोलियां बरसाईं गईं। उस वक्त वो कार में नहीं थे। फरहान अली वारिस पिछले साल लखनऊ, फैजाबाद के कई कार्यक्रमों में आ चुके हैं। वहाबी कट्टरपंथियों को हर वो इंसान नापसंद है जो उनकी नीति के हिसाब से नहीं चलता। पाकिस्तान के कट्टर मौलवियों ने इस पूरे पाकिस्तान को इसी आग में झोंक दिया है। इन मौलवियों का हीरो मुल्ला उमर जैसा शख्स है।

साबरी ब्रदर्स समेत तमाम कलाकार, लेखक, शायर पाकिस्तान में बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं। वक्त ने साबरी ब्रदर्स का बार-बार इम्तेहान लिया है। 1977 में पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके जनरल जिया उल हक ने सत्ता संभाली और पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा दिया। जिया उल हक चूंकि वहाबी विचारधारा को मानता था इसलिए उसने फौरन पाकिस्तान को कट्टर इस्लामिक देश में बदलने का फैसला किया। पाकिस्तान में 1978 से 1988 तक काला दौर रहा। साबरी ब्रदर्स से कहा गया कि वे अपने सूफियाना कलाम में सिर्फ पैगंबर का जिक्र करें, उनके परिवार के अन्य लोगों का नहीं। साबरी ब्रदर्स ने पाकिस्तान की महफिलों में गाना छोड़ दिया और तब उनके कार्यक्रम अमेरिका, भारत में बहुतायत में होने लगे। इसी दौर में -बोल की लब आजाज हैं- और -हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे- जैसा तराना लिखने वाले मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ को भी पाकिस्तान छोड़कर बेरूत में राजनीतिक शरण लेनी पड़ी। यानी उस दौर में जिसने भी जिया उल हक की कट्टर वहाबी विचारधारा का विरोध किया, उसे पाकिस्तान छोड़ना पड़ा।

...लेकिन पाकिस्तान जिस रास्ते पर बढ़ चुका था, उससे पीछे नहीं पलटा। बाबा फरीद की मज़ार, दाता दरबार की दरगाह समेत पाकिस्तान में सूफी संतों की मजारों को चुन-चुनकर वहाबी कट्टरपंथियों ने निशाना बना रहे हैं। यह क्रम पिछले कई दशक से जारी है। इनमें वो हत्याएं शामिल नहीं हैं जिनमें अहमदियों, शियों, ईसाईयों, हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। वहां फौजी शासक या हुकुमतें बदलती रहीं लेकिन उसके डीएनए में कट्टरपंथ का जो बीज बोया गया था, उससे उसकी वापसी नहीं हुई। बहरहाल, अमजद का बेटा मुजदिद साबरी औऱ भाई तल्हा साबिरी अमजद की विरासत संभालने को तैयार हैं। सूफी गायिका आबिदा परवीन ने कहा है कि हालांकि अब अमजद जैसा दूसरा पैदा नहीं होगा लेकिन मुझे उनके बेटों से उम्मीद है कि वो परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।


Amjad Sabri none like

Pkistan continues to erase the Sufi heritage. Whether or Sufi singers who sing the melody Kalam Drgahen are Wahhabis, and constantly being hit by Taliban militants. Amjad Sabri June 22, 2016, corresponding to 45 years were victims of targeted killings. RIGHT plainly Wahhabis, the Prophet and his family to describe the Sufi singers, poets and Sufi shrines of saints deleted if none of these people will be left unheard. But do not forget that this radical ideology that killing someone is not eradicated. He has also returned strongly to the new look.

The same happened with Amjad Sabri. So where Amjad was always fond of cricket and carrom but inherited them Qawwal had to fulfill the responsibility. ... And he just made it to the death, but the icon of the Pakistani youth.

The game of cricket Mast Amjad Ghulam Fareed Sabri took a day to bring his father and said, I sit with my uncle Do Riaz. Amjad has not looked back since that day but he likes to play cricket continued until the end. That was the reason that Amjad funeral in Karachi on June 23, the number of youths in the thronging crowd over. Amjad's death and the Indian subcontinent, where their loved ones were, exceedingly Rnjon-drowned in sorrow.

Sabri's family hails from India. Charkhi Dadri Tehsil of Bhiwani district Kliana Sabri family from the village in 1947 had traveled to Pakistan during Partition of India and Pakistan. Even today these people from India to Pakistan Muhajir (refugee) is spoken. They had come from Pakistan but they are great expectations of his early days spent in poverty. About that time, the tongue of Ghulam Farid Sabri Kalam
- Fill my bag or Mohammed, will go not to return empty - Sabri Brothers came and rocked the Indian subcontinent. After that he gave a Kwwalian and he made history in this area.

Father and uncle after the death of Amjad assuming full responsibility for this heritage why not. Amjad's voice was not very different from his father and uncle Amjad feet so easily frozen in the region. Qawwali by then out of the gatherings came on TV. By Amjad Amir Khusrau, Nizamuddin Aulia, Khwaja Moinuddin Chishti Kalam presented in a way and they soon become the hallmark of Pakistani youth. In the world of music Nusrat Fateh Ali Khan, Rahat Fateh Ali Khan was the identity of anyone he was Amjad Sabri.
In May 2014, he presented a program on Geo TV. The program consists of the noise caused by extremists in Pakistan. He closed the program may be made on the Geo and blasphemy (Blasphemy) Act Amjad Sabri, owner of Geo TV, anchors, and poet Aqeel Mohsin Naqvi should file a case. Amjad like this since his father took over the looming shadow of terror. Amjad was typical of that he was not just Qawwal. He was originally a poet, to the elegance of the Prophet, in the elegance of those of their families, all the compositions studied elegance of Karbala. Amjad Sabri was assassinated the day, a few hours later the same day in Karachi famous Indian Nauhakwan Farhan Ali Waris were fired at the car. At that time he was not in the car. Farhan Ali Waris last Lucknow, Faizabad have arrived in many programs. Wahhabi fundamentalists dislike that person at all, according to their policy does not. Pakistan's hardline clerics have burned the whole Pakistan. Mullah Omar is somebody like the hero of these clerics.

Sabri Brothers, including many artists, writers, poets in Pakistan are going through a very bad phase. While the Sabri Brothers have repeatedly TEST. Zulfikar Ali Bhutto in Pakistan in 1977 by overthrowing the elected government of General Zia ul Haq took power and imposed martial law in Pakistan. Zia was the Wahhabi ideology considers Pakistan a radical Islamic country, he immediately decided to change. In Pakistan from 1978 to 1988 was charred. Sabri Brothers Kalam said in his melody, just refer to the Prophet, his family and not others. Sabri Brothers song gatherings left Pakistan and America and their program, there were in abundance in India. -We See -bol in this period and the club are Ajaj, Lajim that we will look at the famous poet Faiz Ahmad Faiz, who wrote the song, leaving Pakistan in Beirut also had to seek political asylum. At that time the radical Wahhabi ideology of Zia-ul Haq, who also opposed Pakistan had to leave him.

... But on the way in which Pakistan had increased, her second relapse. Mazar of Baba Farid, donor Darbar Sufi shrine in Pakistan, including the graves of selectively Wahhabi fundamentalists are targeting. This order continues the past several decades. They do not include these killings which Ahmadis, Shias, Christians, Hindus and other minorities were targeted. The military ruler or Hukumten varied but the seed was sown in the DNA of radicalism, that he did not return. However, the son of Amjad Sabri Mujadid Awrh brother Talha Amjad Sabiri are willing to assume the mantle. Sufi singer Abida Parveen as Amjad said that although the second will not arise now, but I hope that their sons will carry forward that tradition.


Amajad Saabaree jaisa koee nahin

-Yusuf Kirmani


paakistaan mein soophee viraasat ko mitaane ka silasila jaaree hai. chaahe vo soophiyaana kalaam gaane vaale gaayak hon ya soophee santon kee daragaahen hon, lagaataar vahaabiyon va taalibaanee aatankavaadiyon ka nishaana ban rahee hain. 45 saal ke amajad saabaree 22 joon 2016 ko isee taaraget kiling ka shikaar bane. vahaabiyon ka seedha sa phanda hai, paigambar aur unake parivaar ka jikr karane vaale soophee gaayakon, shaayaron aur soophee santon kee daragaahon ko agar mita diya gaya to in logon ka naamaleva koee nahin bachega. lekin kattarapanthee yah bhool jaate hain ki kisee ko maarane se us vichaaradhaara ka khaatma nahin hota. vah aur bhee joradaar tareeke se nae roop mein vaapasee karatee hai. 

amajad saabaree ke saath bhee to yahee hua. kahaan to amajad ko hamesha kairam aur kriket khelane ka shauk raha lekin viraasat mein milee jimmedaaree ko nibhaane ke lie unhen kavvaal banana pada. ...aur vo na sirph bane balki marate dam tak vo paakistaanee yooth ke aaikan the.

kriket ke khel mein mast amajad ko ek din unake pita phareed gulaam saabaree pakadakar lae aur kaha, mere apane chaacha ke saath baithakar riyaaj kiya karo. us din se amajad ne peechhe mudakar nahin dekha lekin unaka kriket khelane ka shauk ant tak jaaree raha. yahee vajah thee ki karaachee mein 23 joon ko amajad ke janaaje mein umadee bheed mein yuvakon kee taadaad jyaada thee. amajad kee maut par poora bhaarateey upamahaadveep aur jahaan-jahaan unake chaahane vaale the, nihaayat ranjon-gam mein doob gae. 

saabaree gharaane ka taalluk bhaarat se hai. hariyaana ke bhivaanee jile kee charakhee daadaree tahaseel mein kaliyaana gaanv se saabaree parivaar 1947 mein bhaarat-paakistaan bantavaare ke vakt paakistaan kooch kar gaya tha. bhaarat se paakistaan gae in logon ko aaj bhee muhaajir (riphyoojee) bola jaata hai. ye log paakistaan badee ummeedon se pahunche the lekin vahaan inhen apane shuruaatee din bahut gareebee mein bitaane pade. isee daur mein gulaam phareed saabaree kee zubaan par ye kalaam

- bhar do jholee meree ya mohammad, laut ke na jaunga khaalee – aaya aur saabaree bradars bhaarateey upamahaadveep mein chha gae. isake baad to unhonne ek se ek kavvaaliyaan pesh keen aur unhonne is kshetr mein ek itihaas rach diya. 

pita aur chaacha ke nidhan ke baad amajad par is viraasat ko sambhaalane kee pooree jimmedaaree aan padee. amajad kee aavaaj apane pita va chaacha se bahut bhinn nahin thee to amajad ke pair bhee aasaanee se is kshetr mein jam gae. tab tak kavvaalee bhee mahaphilon se nikalakar teevee par aa gaee. amajad ne ameer khusaro, nijaamuddeen auliya, khvaaja moinuddeen chishtee ke kalaam ko nae andaaj mein pesh kiya aur vo bahut jald paakistaan ke yooth kee pahachaan ban gae. sangeet kee duniya mein nusarat phateh alee khaan, raahat phateh alee khaan ke baad agar kisee kee pahachaan thee to vo amajad saabaree hee the. 

maee 2014 mein unhonne jiyo teevee par ek kaaryakram pesh kiya. is kaaryakram ke hote hee paakistaan mein kattarapanthiyon ne shor macha diya. unhonne kaha ki jiyo par is kaaryakram ko band karaaya jae aur eesh ninda (blasphaimy ) kaanoon ke tahat amajad saabaree, jiyo teevee ke maalik, enkar, aur shaayar akeel mohasin nakavee par kes darj kiya jae. isee ke baad se apane pita kee tarah hee amajad par aatank ka saaya mandaraane laga. amajad kee khaasiyat thee ki vo mahaj kavvaal nahin the. vo moolatah ek shaayar the, jo paigambar kee shaan mein, unake parivaaron vaalon kee shaan mein, karbala kee shaan mein tamaam 

rachanaen padhate the. jis din amajad saabaree kee hatya huee, usee din karaachee mein hee kuchh ghante baad bhaarateey mool ke prasiddh nauhaakhvaan pharahaan alee vaaris kee kaar par bhee goliyaan barasaeen gaeen. us vakt vo kaar mein nahin the. pharahaan alee vaaris pichhale saal lakhanoo, phaijaabaad ke kaee kaaryakramon mein aa chuke hain. vahaabee kattarapanthiyon ko har vo insaan naapasand hai jo unakee neeti ke hisaab se nahin chalata. paakistaan ke kattar maulaviyon ne is poore paakistaan ko isee aag mein jhonk diya hai. in maulaviyon ka heero mulla umar jaisa shakhs hai.

saabaree bradars samet tamaam kalaakaar, lekhak, shaayar paakistaan mein bahut bure daur se gujar rahe hain. vakt ne saabaree bradars ka baar-baar imtehaan liya hai. 1977 mein paakistaan mein julphikaar alee bhutto kee chunee huee sarakaar ko apadasth karake janaral jiya ul hak ne satta sambhaalee aur paakistaan mein maarshal lo laga diya. jiya ul hak choonki vahaabee vichaaradhaara ko maanata tha isalie usane phauran paakistaan ko kattar islaamik desh mein badalane ka phaisala kiya. paakistaan mein 1978 se 1988 tak kaala daur raha. saabaree bradars se kaha gaya ki ve apane soophiyaana kalaam mein sirph paigambar ka jikr karen, unake parivaar ke any logon ka nahin. saabaree bradars ne paakistaan kee mahaphilon mein gaana chhod diya aur tab unake kaaryakram amerika, bhaarat mein bahutaayat mein hone lage.

 isee daur mein -bol kee lab aajaaj hain- aur -ham dekhenge, laazim hai ki ham bhee dekhenge- jaisa taraana likhane vaale mashahoor shaayar phaiz ahamad phaiz ko bhee paakistaan chhodakar beroot mein raajaneetik sharan lenee padee. yaanee us daur mein jisane bhee jiya ul hak kee kattar vahaabee vichaaradhaara ka virodh kiya, use paakistaan chhodana pada.

...lekin paakistaan jis raaste par badh chuka tha, usase peechhe nahin palata. baaba phareed kee mazaar, daata darabaar kee daragaah samet paakistaan mein soophee santon kee majaaron ko chun-chunakar vahaabee kattarapanthiyon ne nishaana bana rahe hain. yah kram pichhale kaee dashak se jaaree hai. inamen vo hatyaen shaamil nahin hain jinamen ahamadiyon, shiyon, eesaeeyon, hinduon va any alpasankhyakon ko nishaana banaaya gaya. vahaan phaujee shaasak ya hukumaten badalatee raheen lekin usake deeene mein kattarapanth ka jo beej boya gaya tha, usase usakee vaapasee nahin huee. baharahaal, amajad ka beta mujadid saabaree aur bhaee talha saabiree amajad kee viraasat sambhaalane ko taiyaar hain. soophee gaayika aabida paraveen ne kaha hai ki haalaanki ab amajad jaisa doosara paida nahin hoga lekin mujhe unake beton se ummeed hai ki vo parampara ko aage badhaenge. 

Tuesday, June 21, 2016

यूसुफ किरमानी का कवितासन

तुम करो आसन                                        
हम करें शासन

भाड़ में जाए जनता का राशन
गरीब हो तो भूखे पेट ही करो शीर्षासन

कंगाल हो तो टमाटर पर करो ताड़ासन
सरकार और संतरी भी करें योगासन

न आए कुछ समझ तो करें चमचासन
दाल के रेट पर मत करें क्रोधासन

आलू के दाम पर करें पद्मासन
बैंगन पर करें स्वार्गं आसन

लौकी पर करें सर्पासन
जी हां, योग अब 100 पर्सेंट धंधा है

काले को सफेद करने वाला बंदा है
कैसे उस ब्रैंड को मार भगाया

और कैसे अपना पैर जमाया
जो न समझे खेल को वो अंधा है

सत्ता की आड़ है, धर्म की बाड़ है
गऊ माता के देश में बाबा ही सांड़ है

जागो मेरे भारत जागो अभी सवेरा है
यूसुफ तुम भी जुटो जहां बहुत अंधेरा है
फिर मत कहना, दरवाजे पर खड़ा लुटेरा है

कुछ बातें, कुछ संदर्भ
..............................

मेरी इस कविता की पहली दो लाइन रिटायर्ड आईपीएस जनाब Vikash Narain Rai (वीएन राय) के सौजन्य से है। उन्होंने पिछले साल योग दिवस पर दिल्ली के राजपथ पर हुए तमाशे के मौके पर वो दो लाइने अपने फेसबुक स्टेटस में लिखी थीं। आज फिर योग दिवस था और उनकी वही दो लाइनें मुझे फिर से दिखीं तो मैंने उसी पर ये कविता कह डाली। ...स्थापित कवि-लेखक बिरादरी इस कविता को न तो हिदी साहित्य की कसौटी पर कसें और न कोई रदीफ-काफिया तलाशें।


मौजूदा दौर के हालात पर आपकी नज़र जरूर होगी। यह कविता उसी की अभिव्यक्ति है।... जनता को रोटी चाहिए...रोजगार चाहिए... तो उसे एक तमाशे में उलझाकर पहले निरोग रहने का भाषण पिलाया जा रहा है। अदालतें नरसंहार, आतंकवाद के फैसलों में अपना नजरिया बहुत संकीर्ण बनाती जा रही हैं। प्रिंट मीडिया की भूमिका सीमित हो गई है। इलेक्ट्रानिक मीडिया छिनरई और दलाली पर उतर आया है।...ऐसे में अपनी बात कहने और पहुंचाने का कोई तरीका तो खोजना ही होगा। ...ये कविता मेरे फेसबुक पेज पर भी उपलब्ध है। 



Wednesday, June 15, 2016

अमेरिकी सीनेट में तेरे भाषण पर क्या ताली बजाना याद है….




धत्त तेरे की…अमेरिकन कितने मतलबी होते हैं…खबर तो आप लोगों को मिल गई होगी। लेकिन बराक के दोस्त और उनका खानदान इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं…

…उस अमेरिकी संसद ने भारत को अपना खास दोस्त और ग्लोबल स्ट्रैटजिक (वैश्विक रणनीतिक) और डिफेंस फ्रेंड का दर्जा देने वाले बिल को पास करने से मना कर दिया, जिसके पास होने पर भारत-अमेरिका और करीब आ जाते।

…ये वही अमेरिकी संसद है, जिसके बारे में भारतीय मीडिया और बराक के दोस्त के खानदान वाले उचक-उचक कर बता रहे थे कि देखो आज अमेरिकी सांसद इतनी बार दोस्त के लिए ताली बजाने को अपनी कुर्सी से उठे। किसी भक्त ने 16 बार बताया तो एक भक्त ने 66 बार ताली बजाने की बात बता डाली। भक्तों ने ये भी बताया कि इतनी तालियां तो पंडित जवाहर लाल नेहरू के भाषण पर अमेरिकी संसद में नहीं बजी थीं। …भक्तों ने कहा कि अटल जी को भी पीछे छोड़ दिया बराक के दोस्त ने…

…मीडिया के एक वर्ग ने अभी चार दिन पहले बराक के दोस्त की यात्रा को लिखा था कि फलाने की डाक्टरिन (DOCTORINE) को आखिर अमेरिका ने मान ही लिया…अब तो बीसो ऊंगली घी में…

….बुधवार अमेरिकी सांसदों ने सारे हवाबाजों और भक्तों की हवा निकाल दी….चंपू तो कहीं मुंह छिपाए बैठे होंगे….

…मि…त्रों…बताइए…अमेरिका ने अपने दोस्त को धोखा दिया की नहीं….दिया की नहीं….दिया की नहीं…

….दोस्त को जब तक अमेरिकी वीजा नहीं मिल रहा था तब तक अमेरिका सबसे बड़ा दुश्मन था…जब बकौल भक्तों के अमेरिका ने नाक रगड़ को दोस्त को वीजा दिया तो अमेरिका को भक्त और चंपू दोस्त मानने की भूल कर बैठे।…चंपू और भक्त शायद ये भूल गए कि अमेरिकी रिलिजियस और फ्रीडम रिपोर्ट का भी कोई मतलब होता है, जहां भारत का नंबर जीरो है। इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले भी अमेरिकी सीनेटर ही होते हैं।

…………..

महंगाई पर घड़ियाली आंसू…

…जब मैं आपके लिए ये सब लिख रहा हूं तो सरकार महंगाई पर चिंता जताते हुए अफसरों-मंत्रियों के साथ बैठक कर रही है। सरकार ने कहा कि बाजार में कोई दाल 120 रुपये किलो से ज्यादा नहीं बिकेगी। अभी तक सरकार के चंपू और भक्तगण 200 रुपये किलो की दाल खाकर खुश थे और जयजयकार की मुद्रा में थे और 200 रुपये के रेट को जायज ठहरा रहे थे…उन्हें बताना होगा कि सरकार की इस पहल पर उनकी क्या राय है…

…हालांकि मुझे संदेह है कि बाजार सरकार की बात मानेगी या सुनेगी…भाई जिन लोगों के चंदे से सरकार चुनी गई है क्या वे लोग 120 रुपये किलो में दाल बेचेंगे…ये सब मीडिया में खबर छपवाने और ध्यान बंटाने की कवायद जान पड़ते हैं…

…क्या आप जानते हैं कि दोस्त का एक दोस्त जो खुदरा व्यापार के धंधे में था, उसे देखकर दूसरा वाला दोस्त भी इस धंधे में उतरा है…जल्दी है उसके स्टोर आपको अपने आसपास दिखाई देंगे…आखिर ये गिरोह किसको मूर्ख बना रहा है…

…अब देखिए इस लिखने के दौरान ही खबर आ गई है कि सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम फिर बढ़ा दिए हैं। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी डीजल के दाम की गई है, जिसका इस्तेमाल किसान करते हैं। पेट्रोल का अंतरराष्ट्रीय दाम बुरी तरह गिर चुका है लेकिन कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए इस रेट को लगातार सेट किया जा रहा है। भारत के रेट में और अंतरराष्ट्रीय बाजार के रेट में जमीन-आसमान का अंतर है….लेकिन न चंपू कुछ सुनने या लिखने को तैयार हैं और न भक्त….

……………..

हाय…माय डियर…..

मेरे मित्र नाराज हैं…ईरानी जी के डियर पर कुछ रोशनी नहीं डाली….भाई क्षमा…जाहिलों की जमात में मुझे शामिल नहीं करें। अगर कोई कम पढ़ा लिखा है तो इसका ये मतलब नहीं है कि हम लोग उसका मजाक उड़ाएं। बेचारी इतनी मेहनत से मानव संसाधन मंत्री बनी है, अगर उन्हें डियर कहे जाने पर ऐतराज है तो हम लोग बीच में क्यूं तीन-पांच करें। अरे उनको नहीं पसंद तो नहीं पसंद। आप अपनी अंग्रेजी अपने पास रखें….

Friday, June 3, 2016

खुफिया एजेंसियों को मथुरा के आश्रम में हथियार क्यों नहीं दिखे...अदालत को गुलबर्ग सोसायटी में साजिश क्यों नहीं दिखती...



-यूसुफ किरमानी

दो घटनाएं...

1.मथुरा में सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे जयगुरुदेव के तथाकथित चेलों को हटाने के लिए फायरिंग होती है, जिसमें दो पुलिस अफसर शहीद हो जाते हैं। वहां से बड़े पैमाने पर हथियार और गोला-बारुद बरामद होता है। बीजेपी मामले की विशेष जांच की मांग करती है।

2. अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में अदालत का फैसला 14 साल बाद आता है, जिसमें अदालत कहती है कि इस घटना के पीछे कोई साजिश नहीं थी। अदालत 36 लोगों को बरी कर देती है और 24 को दोषी मानती है। गुलबर्ग सोसायटी में गोधरा दंगों के बाद 28 फरवरी 2002 को पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत 69 लोगों को जिंदा जलाकर मार दिया जाता है। 

दिल्ली से मथुरा बहुत दूर नहीं है। अगर आप किसी भी गाड़ी से चलेंगे तो ज्यादा से ज्यादा तीन घंटे में पहुंच जाएंगे। मथुरा में आश्रम-मंदिरों की भरमार है। जिनके मालिकाना हक को लेकर सैकड़ों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं। लेकिन सिर्फ दो साल पहले जयगुरुदेव के कुछ तथाकथित चेले निहायत ही वाहियात मांगों को लेकर आंदोलन छेड़ते हैं और जवाहरबाग जैसी जगह में सैकड़ों वर्गफुट जमीन पर कब्जा जमा लेते हैं। इनकी मांग है कि 1रुपये लीटर पेट्रोल दिया जाए, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के चुनाव रद्द किए जाएं और इसके अलावा भी निहायत ही उलूलजुलूल मांगें हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक गुंडा इस आंदोलन की आड़ में होता है। पुलिस चुपचाप तमाशा देखती रही।



दिल्ली में एनआईए, आईबी, सीबीआई, दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल और न जाने क्या-क्या सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात आतंकवादी पकड़ने में जुटी रहती हैं। लेकिन उन्हें तीन घंटे की दूरी पर स्थित मथुरा में एके 47, रॉकेट लांचर, ग्रेनेड जैसे असलहे जमा होने की भनक तक नहीं लगी। दिल्ली पुलिस का वो स्पेशल सेल जिसने देश के कई गांवों और शहरों को आतंकवादियों की फर्जी शरणस्थली होने के नाम पर बदनाम कर दिया, उसे एक बाबा के तथाकथित चेलों के हथियारों के जखीरे का पता नहीं चला। वो एनआईए जो पठानकोट टेरर अटैक केस की जांच पाकिस्तान में जाकर करने का दमखम रखती है, उसे भी कुछ पता नहीं चला। इस मामले में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव या यूपी के सीएम अखिलेश यादव के निकम्मे प्रशासन पर टिप्पणी करना तो वक्त बर्बाद करने जैसा है लेकिन जब राष्ट्रीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को संभल, भटकल, संजरपुर, औरंगाबाद, मालेगांव में छिपे आतंकियों का पता चल जाता है, जब उसे यह तक पता चल जाता है कि दाऊद कराची में कहां रहता है तो एक बाबा के चेलों के गतिविधियों की भनक तक नहीं मिलती है।

मथुरा में और क्या-क्या होता है, उसकी गहराई में जाने का वक्त अभी नहीं है। लेकिन इतना बता दें कि यहां पर कई साध्वियों ने कौड़ी के दाम पर जमीन लेकर अपने आश्रम बना रखे हैं। दिल्ली और देश के बहुत सारी जगहों से तमाम लोग सप्ताह के अंत में यहां आराम फरमाने जाते हैं। यहां पर उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो मथुरा के प्राचीन मंदिरों में आस्था के तहत दर्शन करने जाते हैं। बात उन आश्रमों की हो रही है, जिनमें ऐशोआराम की हर सुविधा मौजूद है। विदेशियों की भी इन आश्रमों में भरमार रहती है। ड्रग्स की बिक्री यहां पर सामान्य सी बात है। विदेशों से यहां के आश्रमों में जो फंडिंग हो रही है, उसकी तरफ आजतक किसी भी खुफिया एजेंसी का ध्यान नहीं गया। आखिर विदेशियों की इन आश्रमों में क्यों दिलचस्पी है...अगर किसी धर्म में विदेशियों की आस्था है तो उसका पालन उसी रूप में होना चाहिए न कि किसी सहिष्णु धर्म और अपनी संस्कृति के घालमेल के साथ ड्रग्स के इस्तेमाल को आप नए धर्म का नाम दे दें। कुल मिलाकर यहां पर धर्म की आड़ में तमाम तरह की अनैतिक गतिविधियां चलाकर एक सहिष्णु धर्म को बदनाम किया जा रहा है। क्या आप यकीन करेंगे कि मथुरा में कुछ आश्रम ऐसे हैं, जिनमें जाने के लिए आईकार्ड जारी किए गए हैं। मेन गेट पर बैठा गार्ड हर किसी को जाने की अनुमति नहीं देता है। पुलिस अधिकारियों तक की हिम्मत नहीं होती है कि वे किसी आश्रम में सीधे घुस जाएं। 

अब आप कहेंगे कि मथुरा की घटना और गुलबर्ग सोसायटी के फैसले को आपस में कैसे जोड़ा जा सकता है और क्यों जोड़ा जा रहा है...गुजरात के दंगे भी धर्म के नाम पर शुरु हुए थे। जब-जब धर्म में राजनीति घुसती है या राजनीति धर्म को अपने लिए इस्तेमाल करती है, तब-तब कत्ल-ए-आम होते हैं। पाकिस्तान अगर आज बर्बाद है तो वहां राजनीति धर्म को अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रही है। वहां की सेना भी उसका हिस्सा है। पाकिस्तान की सेना द्वारा खड़े किए गए मुल्ला-मौलवी वहां के राजनीतिज्ञों को खुलेआम गालियां देते हैं। वहां की सेना उनको शह देती है और संरक्षण देती है। 

भारत को उसी तरफ तेजी से ढकेलने की साजिश हो रही है। यहां भी राजनीतिक दल धर्म की ढाल बनाकर समुदायों को बांटने में लगे हुए हैं। इन राजनीतिक दलों ने तमाम बाबाओं को संरक्षण दे ऱखा है। कई राजनीतिक दलों ने धर्म के आधार पर अलग-अलग फ्रंटल संगठन बना रखे हैं जो सिर्फ उसी समुदाय के बीच काम करके अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं।

गुजरात नामकर प्रयोगशाला से इसकी शुरुआत हुई। जहां साफ-साफ दो धार्मिक समुदायों को बांट दिया गया और फिर कत्ल-ए-आम हुआ। ...भारत में अदालतों का बहुत सम्मान है। आज भी अदालतों ने इस जर्जर लोकतंत्र को किसी तरह बचा रखा है। ये ठीक है कि अदालतें सबूतों के आधार पर चलती हैं। लेकिन गुजरात में जो जनसंहार हुआ क्या जज साहिबान उससे नावाकिफ थे...क्यों जज साहिबान इतने भी संवेदनशील नहीं थे कि उन्हें सही-गलत का फर्क न नजर आया हो...लेकिन हैरानी तब होती है जब उसी अदालत को एक सोसायटी में 69 लोगों को जिंदा जलाकर मार दिए जाने की घटना के पीछे कोई साजिश नहीं दिखती। 




28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद शहर में हालात बदतर थे। जिसको जहां जगह मिल रही थी, वहीं शरण ले रहा था। एहसान जाफरी चूंकि एक राजनीतिक दल से जुड़े थे, सांसद रह चुके थे, उनके घर में गुलबर्ग सोसायटी के 68 लोगों ने शरण ली। शायद ये समझकर कि यहां तो दंगाई हाथ डालने से रहे। लेकिन दंगाई वहां पहुंचे और उन्होंने बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से घटना को अंजाम दिया। यह क्षणिक आवेश में किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया नरसंहार नहीं था। इसके पीछे बाकायदा साजिश थी। हां, अगर इस घटना में अकेला कोई शख्स शामिल होता तो लगता कि साजिश नहीं थी लेकिन इतनी बड़ी घटना बिना ज्यादा लोगों के आपस में जुड़े और तैयारी के अंजाम दी ही नहीं जा सकती। साजिश तो वहीं होती है जहां किसी घटना को तैयारी के साथ अंजाम दिया जाए। मेरा ही नहीं इस देश के करोड़ों लोगों का मानना है कि गुलबर्ग सोसायटी की घटना के पीछे सौ फीसदी साजिश थी। भले किसी को दिखे या न दिखे। 





खतरनाक खेल
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जैसा कि मैंने अपने पहले के लेखों में जिक्र किया है, भारत को बर्बाद करने के लिए कुछ लोग साजिश रच रहे हैं। जिनमें राजनीतिक दलों की भूमिका ज्यादा है। खुद को राष्ट्रवादी या देशभक्त कहने वाला शख्स या दल अगर दो समुदायों को आपस में लड़ाकर अगर शासन करना चाहता है तो उससे बड़ा देशद्रोही कोई नहीं है। आप किसी एक समुदाय को खुश करने के लिए दूसरे समुदाय को दबाकर या उसके लोगों को आतंकवादी करार देकर भारत पर निष्कंटक राज नहीं कर सकते। अगर किसी की आबादी 100 है और उसके सामने दूसरे समुदाय की आबादी 10 है तो भी निष्कंटक राज मुश्किल है। क्योंकि 10 लोग किसी न किसी रूप में अपनी आवाज तो उठाएंगे ही। बेहतर तो यह है कि कोई भी राजनीतिक दल 110 लोगों को साथ लेकर भारत पर राज करे और इसे फिर से सोने की चिड़िया बनाए। 


चलते-चलते
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पत्रकार राना अयूब ने गुजरात के दंगों पर एक किताब लिखी है – गुजरात डायरी। इस किताब के बारे में देश के किसी मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) ने कोई खबर नहीं छापी। फ्लिपकार्ट ने इस किताब को आनलाइन बेचने में आनाकानी की। आमेजन बेचने को तैयार हुआ लेकिन अचानक आउट आफ स्टाक बता दिया। सोशल मीडिया के दबाव में किताब आमेजन पर बिकने के लिए वापस लौटी। गुजरात दंगों का सच जानने के लिए ये किताब पढ़ना चाहिए। खासकर उन लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए जिनके लिए उनका अपना धर्म अफीम नहीं है। उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जो जज या पत्रकार बनना चाहते हैं ताकि वे कमजोर लोगों के दर्द को समझने और सच्चाई को अपनी कसौटी पर कसने का माद्दा रख सकें। 


khuphiya ejensiyon ko mathura ke aashram mein hathiyaar nahin kyon nahin dikhate...adaalat ko gulabarg sosaayatee mein saajish kyon nahin dikhatee...

-Yusuf Kirmani

do ghatanaen...
1.mathura mein sarakaaree jameen par kabja jamae baithe jayagurudev ke tathaakathit chelon ko hataane ke lie phaayaring hotee hai, jisamen do pulis aphasar shaheed ho jaate hain. vahaan se bade paimaane par hathiyaar aur gola-baarud baraamad hota hai. beejepee maamale kee vishesh jaanch kee maang karatee hai.

2. ahamadaabaad kee gulabarg sosaayatee mein adaalat ka phaisala 14 saal baad aata hai, jisamen adaalat kahatee hai ki is ghatana ke peechhe koee saajish nahin thee. adaalat 36 logon ko baree kar detee hai aur 24 ko doshee maanatee hai. gulabarg sosaayatee mein godhara dangon ke baad 28 pharavaree 2002 ko poorv saansad ehasaan jaapharee samet 69 logon ko jinda jalaakar maar diya jaata hai. 

dillee se mathura bahut door nahin hai. agar aap kisee bhee gaadee se chalenge to jyaada se jyaada teen ghante mein pahunch jaenge. mathura mein aashram-mandiron kee bharamaar hai. jinake maalikaana hak ko lekar saikadon mukadame adaalaton mein chal rahe hain. lekin sirph do saal pahale jayagurudev ke kuchh tathaakathit chele nihaayat hee vaahiyaat maangon ko lekar aandolan chhedate hain aur javaaharabaag jaisee jagah mein saikadon vargaphut jameen par kabja jama lete hain. inakee maang hai ki 1rupaye mein 100 leetar petrol diya jae, raashtrapati-pradhaanamantree ke chunaav radd kie jaen aur isake alaava bhee nihaayat hee uloolajulool maangen hain. poorvee uttar pradesh ka ek gunda is aandolan kee aad mein hota hai. pulis chupachaap tamaasha dekhatee rahee.

dillee mein enaeee, aaeebee, seebeeaee, dillee pulis ka speshal sel aur na jaane kya-kya suraksha ejensiyaan din-raat aatankavaadee pakadane mein jutee rahatee hain. lekin unhen teen ghante kee dooree par sthit mathura mein eke 47, roket laanchar, grened jaise asalahe jama hone kee bhanak tak nahin lagee. dillee pulis ka vo speshal sel jisane desh ke kaee gaanvon aur shaharon ko aatankavaadiyon kee pharjee sharanasthalee hone ke naam par badanaam kar diya, use ek baaba ke tathaakathit chelon ke hathiyaaron ke jakheere ka pata nahin chala. vo enaeee jo pathaanakot terar ataik kes kee jaanch paakistaan mein jaakar karane ka damakham rakhatee hai, use bhee kuchh pata nahin chala. is maamale mein mulaayam sinh yaadav, shivapaal yaadav ya yoopee ke seeem akhilesh yaadav ke nikamme prashaasan par tippanee karana to vakt barbaad karane jaisa hai lekin jab raashtreey khuphiya aur suraksha ejensiyon ko sambhal, bhatakal, sanjarapur, aurangaabaad, maalegaanv mein chhipe aatankiyon ka pata chal jaata hai, jab use yah tak pata chal jaata hai ki daood karaachee mein kahaan rahata hai to ek baaba ke chelon ke gatividhiyon kee bhanak tak nahin milatee hai.

mathura mein aur kya-kya hota hai, usakee gaharaee mein jaane ka vakt abhee nahin hai. lekin itana bata den ki yahaan par kaee saadhviyon ne kaudee ke daam par jameen lekar apane aashram bana rakhe hain. dillee aur desh ke bahut saaree jagahon se tamaam log saptaah ke ant mein yahaan aaraam pharamaane jaate hain. yahaan par un logon kee baat nahin ho rahee hai jo mathura ke praacheen mandiron mein aastha ke tahat darshan karane jaate hain. baat un aashramon kee ho rahee hai, jinamen aishoaaraam kee har suvidha maujood hai. videshiyon kee bhee in aashramon mein bharamaar rahatee hai. drags kee bikree yahaan par saamaany see baat hai. videshon se yahaan ke aashramon mein jo phanding ho rahee hai, usakee taraph aajatak kisee bhee khuphiya ejensee ka dhyaan nahin gaya.

 aakhir videshiyon kee in aashramon mein kyon dilachaspee hai...agar kisee dharm mein videshiyon kee aastha hai to usaka paalan usee roop mein hona chaahie na ki kisee sahishnu dharm aur apanee sanskrti ke ghaalamel ke saath drags ke istemaal ko aap nae dharm ka naam de den. kul milaakar yahaan par dharm kee aad mein tamaam tarah kee anaitik gatividhiyaan chalaakar ek sahishnu dharm ko badanaam kiya ja raha hai. kya aap yakeen karenge ki mathura mein kuchh aashram aise hain, jinamen jaane ke lie aaeekaard jaaree kie gae hain. men get par baitha gaard har kisee ko jaane kee anumati nahin deta hai. pulis adhikaariyon tak kee himmat nahin hotee hai ki ve kisee aashram mein seedhe ghus jaen. 

ab aap kahenge ki mathura kee ghatana aur gulabarg sosaayatee ke phaisale ko aapas mein kaise joda ja sakata hai aur kyon joda ja raha hai...gujaraat ke dange bhee dharm ke naam par shuru hue the. jab-jab dharm mein raajaneeti ghusatee hai ya raajaneeti dharm ko apane lie istemaal karatee hai, tab-tab katl-e-aam hote hain. paakistaan agar aaj barbaad hai to vahaan raajaneeti dharm ko apane hisaab se istemaal kar rahee hai. vahaan kee sena bhee usaka hissa hai. paakistaan kee sena dvaara khade kie gae mulla-maulavee vahaan ke raajaneetigyon ko khuleaam gaaliyaan dete hain. vahaan kee sena unako shah detee hai aur sanrakshan detee hai. 

bhaarat ko usee taraph tejee se dhakelane kee saajish ho rahee hai. yahaan bhee raajaneetik dal dharm kee dhaal banaakar samudaayon ko baantane mein lage hue hain. in raajaneetik dalon ne tamaam baabaon ko sanrakshan de rakha hai. kaee raajaneetik dalon ne dharm ke aadhaar par alag-alag phrantal sangathan bana rakhe hain jo sirph usee samudaay ke beech kaam karake apane raajaneetik ejende ko aage badhaate hain.
gujaraat naamakar prayogashaala se isakee shuruaat huee. jahaan saaph-saaph do dhaarmik samudaayon ko baant diya gaya aur phir katl-e-aam hua. ...bhaarat mein adaalaton ka bahut sammaan hai. aaj bhee adaalaton ne is jarjar lokatantr ko kisee tarah bacha rakha hai. ye theek hai ki adaalaten sabooton ke aadhaar par chalatee hain. lekin gujaraat mein jo janasanhaar hua kya jaj saahibaan usase naavaakiph the...kyon jaj saahibaan itane bhee sanvedanasheel nahin the ki unhen sahee-galat ka phark na najar aaya ho...lekin hairaanee tab hotee hai jab usee adaalat ko ek sosaayatee mein 69 logon ko jinda jalaakar maar die jaane kee ghatana ke peechhe koee saajish nahin dikhatee. 

28 pharavaree 2002 ko ahamadaabaad shahar mein haalaat badatar the. jisako jahaan jagah mil rahee thee, vaheen sharan le raha tha. ehasaan jaapharee choonki ek raajaneetik dal se jude the, saansad rah chuke the, unake ghar mein gulabarg sosaayatee ke 68 logon ne sharan lee. shaayad ye samajhakar ki yahaan to dangaee haath daalane se rahe. lekin dangaee vahaan pahunche aur unhonne baakaayada yojanaabaddh tareeke se ghatana ko anjaam diya. yah kshanik aavesh mein kisee ek vyakti dvaara kiya gaya narasanhaar nahin tha. isake peechhe baakaayada saajish thee. haan, agar is ghatana mein akela koee shakhs shaamil hota to lagata ki saajish nahin thee lekin itanee badee ghatana bina jyaada logon ke aapas mein jude aur taiyaaree ke anjaam dee hee nahin ja sakatee. saajish to vaheen hotee hai jahaan kisee ghatana ko taiyaaree ke saath anjaam diya jae. mera hee nahin is desh ke karodon logon ka maanana hai ki gulabarg sosaayatee kee ghatana ke peechhe sau pheesadee saajish thee. bhale kisee ko dikhe ya na dikhe. 

khataranaak khel
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jaisa ki mainne apane pahale ke lekhon mein jikr kiya hai, bhaarat ko barbaad karane ke lie kuchh log saajish rach rahe hain. jinamen raajaneetik dalon kee bhoomika jyaada hai. khud ko raashtravaadee ya deshabhakt kahane vaala shakhs ya dal agar do samudaayon ko aapas mein ladaakar agar shaasan karana chaahata hai to usase bada deshadrohee koee nahin hai. aap kisee ek samudaay ko khush karane ke lie doosare samudaay ko dabaakar ya usake logon ko aatankavaadee karaar dekar bhaarat par nishkantak raaj nahin kar sakate. agar kisee kee aabaadee 100 hai aur usake saamane doosare samudaay kee aabaadee 10 hai to bhee nishkantak raaj mushkil hai. kyonki 10 log kisee na kisee roop mein apanee aavaaj to uthaenge hee. behatar to yah hai ki koee bhee raajaneetik dal 110 logon ko saath lekar bhaarat par raaj kare aur ise phir se sone kee chidiya banae. 

chalate-chalate
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patrakaar raana ayoob ne gujaraat ke dangon par ek kitaab likhee hai – gujaraat daayaree. is kitaab ke baare mein desh ke kisee meediya (print va ilektronik) ne koee khabar nahin chhaapee. phlipakaart ne is kitaab ko aanalain bechane mein aanaakaanee kee. aamejan bechane ko taiyaar hua lekin achaanak aaut aaph staak bata diya. soshal meediya ke dabaav mein kitaab aamejan par bikane ke lie vaapas lautee. gujaraat dangon ka sach jaanane ke lie ye kitaab padhana chaahie. khaasakar un logon ko jaroor padhana chaahie jinake lie unaka apana dharm apheem nahin hai. un logon ko bhee padhana chaahie jo jaj ya patrakaar banana chaahate hain taaki ve kamajor logon ke dard ko samajhane aur sachchaee ko apanee kasautee 




Why Intelligence agencies blind in Mathura Ashram weapons ... why Court does not see any Conspiracy  in Gulberg Society ...


-Yusuf Kirmani


Two Incidents ...
Sitting on government land occupied in mthura Jaygurudev firing to remove the so-called disciples, in which two police officers are killed. The arms and ammunition recovered from the mass. BJP demands special investigation of the case.

2. The decision of the court in Ahmedabad's Gulberg Society comes after 14 years in which the court said that there was a conspiracy behind the incident. Court clears 36 people and 24 blame. Godhra riots in Gulberg Society February 28, 2002, including former MP Ehsan Jafri killed 69 people burned alive.

Mathura from Delhi is not far away. If you have any more than three hours by car will take you to run. There is an abundance of temples in Mathura Ashram. Whose ownership of hundreds of cases are pending in courts. But just two years ago, some of the so-called disciples Jaygurudev grossly absurd wage demands movement and in a place like Jwahrbag take control of hundreds of square feet of land. Rs 1 100 liters of petrol in demand that may be given to canceling the presidential election of Prime Minister and also grossly Ululjulul demands. Eastern Uttar Pradesh, in the guise of this movement is a punk. Police quietly bystanders.

Delhi NIA, IB, CBI, Delhi Police Special Cell and not what the security agencies are working day and night to catch terrorists. But three hours away in Mathura AK-47, rocket launchers, grenades were invisible to be stored, such as fireworks. Delhi Police's Special Cell of the villages and cities of the country in the name of the infamous haven for terrorists was fake, a so-called followers of Baba did not find weapons stockpile. NIA which they terror attack case probe Pathankot holds the potential to go to Pakistan, he also did not know anything. In this case, Mulayam Singh Yadav, Shivpal Yadav and Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav Scraps administration time to waste, so as to comment on the national intelligence and security agencies, but steady, Bhatkal, Sanjrpur, Aurangabad, Malegaon militants hiding out in that is, when it becomes known that Dawood in Karachi, where the remains of a Baba's disciples does not clue activities.

What else happens in Mathura, is not it time to go into details. But tell that to the many nuns who have made his ashram on the ground at throwaway prices. Delhi and many other places of the country, all the people are relaxing weekend here. We are not talking here of those who believe in the philosophy of the ancient temples of Mathura go. Getting to the point, ashrams, which has every comfort of luxury. There is a glut of foreigners in these ashrams. The sale of drugs is common here. The ashrams are getting funding from abroad who, on his side to date have not noticed any intelligence agency.Please. Overall, he can get here in the guise of religion immoral activities being disgraced by running a tolerant religion. Do you believe that there are ashram in Mathura, which are issued to Aikard. Sitting at the main gate guard does not allow everyone to go. Police officers that they would not dare to penetrate directly into the grotto.

Whenever religion or politics, religion in politics Gusati is used each time are decapitation-e-Aam. Pakistan today is doomed if there is using its own politics, religion. There is a part of the army. Pakistan army set up by the mullahs openly abusing the politicians. And ensure the protection of the army, he is fueled.

India on the same side of the plot is fast-pusher. The shield of faith with a political party are engaged in sharing communities. Rhkha all the political parties give protection to these babas. Several political parties based on religion are kept separate frontal organization which only the community by working to further their political agenda.

Namkr laboratory originated from Gujarat. Clearly the two religious communities were divided and re-e-Aam, was killed. ... Is very respectful of the courts in India. The courts still have kept some kind of shabby democracy. It is precisely on the basis of evidence that courts are run. But what happened in Gujarat massacres Sahibaan judges were ignorant of him ... Why not judge Sahibaan were so sensitive that they saw no difference between right and wrong ... but surprising in a society occurs when the same court 69 people burnt alive to death do not see a conspiracy behind the incident.

February 28, 2002, things were worse in the city of Ahmedabad. Which was the place where the mill, was taking refuge there. Ehsan Jafri, were linked to a political party because, being a former MP, Gulberg Society, 68 people took refuge in his house. Maybe they are thinking that to get involved even if marauders. But the mob had arrived and been done with proper planning. The massacre was carried out by a single person impulsively did. Behind it was a regular conspiracy. Then there is the plot where the preparation for an event to be executed with. I do not believe that the country's millions of Gulberg Society hundred percent behind the event was a conspiracy. Or even if you do not see anyone.

extreme sports
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As I mentioned in my previous articles, some people in India are conspiring to ruin. Much of which is the role of political parties. Nationalist or patriotic person or party asking themselves if the government wants to Ldhakr two communities together, then it's no big traitor. You press a community to appease the community or its people by terrorists can not rule India Nishkantk. If someone has a population of 100 and 10 in front of him, even if the population of the community is difficult to rule Nishkantk. 10 people in one way or another because it will raise your voice only. Better so that no political party to rule over India with 110 people and made it again the golden bird.

...and in Last
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Ayub Rana journalist has written a book on the Gujarat riots - people Gu. This book about the country any media (print and electronic) has published no news. Flipkart's reluctance to sell the book online. Amazon was willing to sell out-of-stocks suddenly told. Social media pressure returned to selling the book on Amazon. Gujarat riots should read this book to learn the truth. Should read especially those for whom their religion is opium. Journalists should also read those who want to be a judge or vulnerable people so that they understand the pain and reality can have the courage to tighten their criteria.