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Wednesday, March 25, 2009

मुल्ला जी की दाढ़ी पर सवाल



-अलीका
मध्य प्रदेश के एक मुस्लिम स्टूडेंट को उसकी दाढ़ी कटाने का आदेश देकर एक स्कूल ने फिर से इस बहस को जन्म दे दिया कि आखिर इस देश में किसी अल्पसंख्यक के मूलभूत अधिकार की व्याख्या क्या फिर से करनी चाहिएय़ क्योंकि इस मामले में जिस तरह हाई कोर्ट ने भी स्कूल का साथ दिया है, उससे इस तरह के सवाल तो खड़े ही किए जाएंगे।
पहले जानिए कि पूरा मामला क्या है। मध्य प्रदेश में विदिशा जिले के निर्मला कॉन्वेंट हायर सेकेंडरी स्कूल स्कूल में 10 वीं कक्षा के छात्र मोहम्मद सलीम ने धार्मिक कारणों से दाढ़ी रखी और जब वह स्कूल में आया तो स्कूल की ईसाई प्रिंसिपल ने उसे नोटिस जारी करते हुए कहा कि या तो वह अपनी दाढ़ी कटाकर स्कूल में आए या फिर इस स्कूल से अपना नाम कटाकर कहीं और चला जाए। इस नोटिस का छात्र पर गहरा असर हुआ। उसने अदालत की शरण ली। हाई कोर्ट तक मामला पहुंचने के बाद हाई कोर्ट ने भी स्कूल का ही साथ दिया औऱ कहा कि अल्पसंख्यकों को अपने स्कूल के नियम खुद बनाने का अधिकार है। इसलिए इस बारे में कोर्ट उस स्कूल को कोई नोटिस जारी नहीं कर सकता। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आ गया है और 30 मार्च को इस मामले की अगली सुनवाई होनी है। (पूरी खबर पढ़ें- The Hindustan Times dated 24th March 2009 Page 11)हालांकि भारत में इस तरह के मामलों को कोर्ट में कम ही चुनौती दी जाती है। यह तो सभी को पता है कि ईसाईयों के अलावा इस देश में सिख और मुसलमानों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिला हुआ है। भारतीय संविधान में यह बात बहुत साफ-साफ दर्ज है कि इस देश में हर समुदाय के व्यक्ति को पूरी धार्मिक आजादी है और यह उसके मूलभूत अधिकारों में आता है।
देश के दो बड़े मुस्लिम शिक्षण संस्थान जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में तमाम ऐसे हिंदू छात्र पढ़ते हैं जो बालों में जटा (पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे चुरकी भी कहा जाता है) रखते हैं और जनेऊ पहनकर यूनिवर्सिटी या उससे जुड़े कॉलेज में जाते हैं। यह तो हुई इन दो संस्थानों की बात। सिख बच्चे आपको हर स्कूल में मिल जाएंगे। जिनके सिर पर पगड़ी होना तो सबसे आम बात है लेकिन प्रोफेशनल पढ़ाई करने वाले सिख युवक तो दाढ़ी भी रखते हैं। पिछले दिनों फ्रांस में जब वहां के स्कूलों में पगड़ी डालकर आने वाले सिख स्टूडेंट्स से कहा गया कि उन्हें अपने लंबे-लंबे बाल कटाने होंगे और बिना पगड़ी स्कूल-कॉलेज में आना पड़ेगा तो इस पर विश्वव्यापी प्रतिक्रिया हुई और भारत ने सरकारी तौर पर इस मामले में नाराजगी प्रकट की। अमेरिका और इंग्लैंड में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। इंग्लैंड में ही पिछले दिनों मुस्लिम लड़कियों के स्कॉर्फ अथवा चादर (रिदा) ओढ़कर आने पर पाबंदी लगाने की कोशिश की गई लेकिन भारी विरोध के चलते ब्रिटेन की सरकार को यह आदेश वापस लेना पड़ा।
कुछ ऐसा ही मामला दिल्ली पुलिस में एक मुस्लिम पुलिसकर्मी के दाढ़ी रखने पर हुआ था। उसकी दाढ़ी के कारण कई अफसर उसका मजाक उड़ाते थे और इस वजह से उसकी तरक्की नहीं हुई। उसे सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ मिला।
बड़ा सवाल...
भारत में सदियों से गुरुकुल की पढ़ाई बहुत मशहूर रही है। अब भी देश में कुछ स्थानों पर गुरुकुल बचे हुए हैं। वहां पर एक खास ड्रेस और जटा रखवाकर पढ़ाई कराई जाती है। वहां जिन बच्चों को एडमिशन मिलता है, वे और उनके मां-बाप इसे बहुत बेहतर तरीके से जानते हैं कि उन्हें गुरुकुल के नियमों का पालन करना होगा। यहां पर सवाल यह है कि क्या देश के किसी भी ईसाई स्कूल ने अपने नियमों में यह शामिल कर रखा है कि वहां बना दाढ़ी रखने वालों को ही एडमिशन मिलेगा। ऐसा उनकी किसी भी बुकलेट या एडमिशन के नियमों में नहीं लिखा है।
मेरा भाई और कई रिश्तेदारों के बच्चे तमाम ईसाई कॉन्वेंट स्कूलों से पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन ऐसे किसी भी नियम की जानकारी मुझे नहीं है जिसमें यह पहले से शर्त के तौर पर शामिल हो। इन सभी स्कूलों में सिख बच्चे भी हैं और वे बाकायदा पगड़ी पहनकर आते हैं। इन स्कूलों में ईसाई चर्च के अनुरूप प्रार्थना रूम हैं जहां बच्चों को प्रार्थना के लिए ले जाया जाता है। बच्चे वहां ईसा मसीह की तस्वीर के सामने अपने सिर झुकाते हैं और कई बार उनसे एक खास तरह की प्रार्थना कराई जाती है। लेकिन इसका किसी तरह का विरोध मेरे परिवार ने या अन्य लोगों ने कभी नहीं किया। यही नहीं इन तमाम स्कूलों में कई ऐसे परिवारों के बच्चे भी हैं जिनके पिता कट्टर हिंदूवादी संगठन आरएसएस के सदस्य हैं और शाखा में भी जाते हैं। लेकिन उनमें से किसी ने भी इन स्कूलों में ऐसी किसी बात का विरोध नहीं किया।
यह समझ से परे है कि आखिर हाई कोर्ट ने भारतीय संविधान की मूलभावना को समझे बिना कैसे यह फैसला दे दिया कि ईसाई स्कूल का फैसला सलीम के बारे में सही है। मेरा इरादा हाई कोर्ट के फैसले की आलोचना का नहीं है लेकिन यह सवाल उठना तो जायज है कि क्या इस देश में अल्पसंख्यकों के मूलभूत अधिकारों की व्याख्या फिर से होनी चाहिए। क्या भारतीय जनता पार्टी जिस संविधान संशोधन की बात करती है, वह कुछ इसी तरह का होगा। अगर ऐसा हुआ तब तो सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को फिर से विचार करना होगा और उन्हें अपने नियम नए सिरे से बनाने होंगे।
अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले का निपटारा किस तरह करता है। अगर वह ईसाई स्कूल के स्टैंड को सही ठहराता है तब तो एक मिसाल कायम हो जाएगी और कई सारी बातें फिर से परिभाषित होंगी लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट सलीम नामक छात्र के स्टैंड को ही सही ठहराता है तब तो भारतीय संविधान के मूलभूत अधिकारों की जिस बात को मैंने उठाया है, वह सही है।

-अलीका

Wednesday, March 18, 2009

अम्मा तेरा मुंडा बिगड़ा जाए

देश को कुनबा परस्तों की राजनीति से कब छुटकारा मिलेगा, यह तो नहीं मालूम लेकिन राजनीति में आई नई पौध से उनसे एक पीढ़ी पीछे मुझ जैसों को ही नहीं देश को भी उम्मीदें थीं लेकिन अब तो सभी लोगों का मोहभंग हो रहा है। कल तक हम लोग इस बात का रोना रोते थे कि भारत को नेहरू-गांधी (इंदिरा गांधी) परिवार के राज से कब मुक्ति मिलेगी। लेकिन इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी...राहुल गांधी के नाम लेकर दिन रात कोसने वालों ने जब देखा कि यही हाल बीजेपी में है और यही हाल समाजवादी पार्टी से लेकर शिव सेना, शरद पवार की राष्ट्रवादी पार्टी में है तो लोगों ने मुंह बंद कर लिए। एक तरह से लोगों ने धीरे-धीरे कुनबापरस्ती की राजनीति को स्वीकार करना शुरू कर दिया। लेकिन तमाम बड़े नेताओं के लाडलों ने राजनीति में अब तक कोई बहुत अच्छी मिसाल कायम करने की कोशिश नहीं की। गांधी खानदान के दो लाडलों -राहुल गांधी और वरूण गांधी को लेकर पीआर-गीरी करने वाले पत्रकारों ने तरह-तरह से प्रोजेक्ट करने की कोशिश की। राहुल को कभी यूथ ऑइकन बताया गया, कभी बताया गया कि वह ग्रामीण भारत के लिए कुछ करना चाहते हैं और इसी सिलसिले में पिछले दिनों उनके लोकसभा क्षेत्र अमेठी में ग्रामीण ओलंपिक जैसी कई चीज भी हुई। किसी दिन वह दिल्ली के इलीट कॉलेज सेंट स्टीफंस में जा पहुंचे और मीडिया ने ऐसे प्रोजेक्ट किया कि बस देश का यूथ तो राहुल बाबा के पीछे चल पड़ा है।
उधर, वरूण गांधी के इमेज की भी आरती उतारी जा रही थी। उनकी अम्मा मेनका गांधी के वर्तमान या अतीत के बारे में मैं यहां कुछ नहीं कहना और लिखना चाहता हूं। वरुण गांधी के बारे में कभी पढऩे को मिला कि वह कवियों वाला दिल रखते हैं तो कभी बताया गया कि वह बहुत अत्त्छी पेंटिंग बनाते हैं और म्यूजिक के शौकीन हैं। पेज थ्री वाली पार्टियों से नफरत करते हैं। कहीं ये भी पढऩे को मिला कि वह अपने पिता स्व. संजय गांधी वाली राजनीति नहीं बल्कि गांधी जी वाली राजनीति पसंद करते हैं और उन्हें अपनी मंजिल की तलाश है।
...लीजिए साहब, उनको मंजिल गई। उनकी अम्मा मेनका गांधी की वजह से बीजेपी ने उनके बेटे वरूण गांधी को इस बार पीलीभीत से चुनाव लड़वाने का फैसला किया। हालांकि पीलीभीत मेनका गांधी का चुनाव क्षेत्र रहा है लेकिन इस बार वह पड़ोस के आंवला लोकसभा क्षेत्र से लडऩे चली गईं और बेटे को पीलीभीत में फिट कर दिया। इसी पीलीभीत के बरखेड़ा में एक पब्लिक मीटिंग को संबोधित करते हुए वरूण गांधी की जबान क्या फिसली कि देशभर में इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। जिस तरह का भड़काने वाला भाषण वरुण ने दिया, उस तरह का भाषण तो कोई हार्डलाइनर संघ का पदाधिकारी भी नहीं देगा। नीचे मैं एक वीडियो दे रहा हूं जहां आप सुन और देख सकते हैं कि वरुण गांधी ने क्या कहा और उनका कहने का मकसद क्या था। अन्य पार्टियों की बात तो छोडिए बीजेपी को वरुण की इस हरकत के बाद डिफेंसिव होना पड़ा। बीजेपी के कई नेताओं ने इस बयान के लिए वरूण की निंदा कर डाली। खासकर बीजेपी के वे नेता जो उसका मुस्लिम चेहरा हैं, ने फौरन इसके लिए कांग्रेस संस्कृति को जिम्मेदार ठहराया कि आखिर वरुण की पैदाइश तो उसी कांग्रेस संस्कृति की देन हैं।


इस लोकसभा चुनाव के जरिए जब बीजेपी ने केंद्र में अपनी सरकार बनाने का सपना देख रखा हो और ऐसे में वरुण के बयानों ने उसकी सारी रणनीति पर पानी फेर दिया है। दरअसल, बीजेपी इस बार इस कोशिश में है कि मुसलमानों वोटों को या तो बांट दिया जाए या फिर शांत रहा जाए क्योंकि समाजवादी पार्टी और बीएसपी की लड़ाई में कम से कम यूपी में मुस्लिम वोट तो बंटेगा ही। लेकिन अगर बीजेपी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की बात चलाती है तो इसका फायदा मुलायम या मायावती में से किसी को एक होगा यानी जो बीजेपी को हराने की ताकत रखता होगा। लेकिन इस सारी रणनीति पर वरुण गांधी के चंद लफ्जों ने पानी फेर दिया।
दरअसल, वरुण और मेनका गांधी शुरू से ही अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में वोटों का ध्रुवीकरण कराना चाहते थे। वरुण गांधी का बयान तो खैर नैशनल मीडिया में आया और सभी लोगों को इसकी जानकारी है लेकिन मेनका गांधी के लोकसभा क्षेत्र आंवला में भी चुनाव की घोषणा के बाद फरीदपुर इलाके में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। इसमें एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। लेकिन कुठ टीवी चैनलों ने समझदारी दिखाते हुए इसे बहुत ज्यादा फ्लैश नहीं किया। लेकिन इस घटना ने मंशा साफ कर दी कि बीजेपी या उसके प्रत्याशी किस दम पर वोटरों का सामना करना चाहते हैं।
वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारत में हालात वैसे भी बदतर होते जा रहे हैं और सरकार के खिलाफ माहौल बना हुआ है। लोग शायद सरकार के खिलाफ निगेटिव मतदान करें और बीजेपी किला फतह कर ले लेकिन वरुण गांधी सरीखे उसके अपरिपक्व नेताओं ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है। हालांकि बीजेपी के थिंक टैंक में जगह बनाने वाले और संघ के विचारधारा की पैरोकारी करने वाले तरुण विजय ने वरुण की बात का समर्थन किया लेकिन बीजेपी के बड़े नेताओं के आगे उनकी बोलती फिलहाल बंद हो गई है। हालांकि इस मामले में चुनाव आयोग ने फौरी कार्रवाई करते हुए वरुण गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है और बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने इसके लिए माफी मांगते हुए वरुण से खेद प्रकट करने को भी कहा है। पर, वरुण गांधी ने दो समुदायों के बीच घृणा और वैमनस्य का जो बीज बोया, वह तो अब लौट नहीं सकता। बात तो मुंह से निकल चुकी है। ऐसे लड़कपन की राजनीति करने वाले युवाओं से अब देश भला क्या उम्मीद करे।

Monday, March 16, 2009

भूखे पेट को स्मार्ट फोन, क्या आइडिया है

जिस देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों (बीपीएल) की भूख शांत करने के लिए फर्जी तौर पर ही सही तमाम राज्य सरकारों द्वारा अनाज बांटा जाता हो, उन बीपीएल लोगों को बीजेपी के भावी प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सत्ता में आने पर स्मार्ट फोन बांटेंगे। इतना ही नहीं दस हजार का लैपटॉप बिकवाएंगे और सभी स्कूलों में इंटरनेट से पढ़ाई करवाई जाएगी। यह बात बीजेपी नेता ने शनिवार को नई दिल्ली में बीजेपी का आईटी विजन पत्र जारी करते हुए कही।
मैंने यूपी के जिस स्कूल से ग्रासरूट लेवल की पढ़ाई की है, वहां मेरे एक टीचर अक्सर एक कहावत सुनाया करते थे – घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने। यह कहावत कोई इतनी गूढ़ नहीं है कि आप को समझ में न आए लेकिन अगर समझ में नहीं आ रही है तो वह है इस देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी, जो मई में केंद्र में सरकार बनाने का दावा अभी से कर रही है। बीपीएल आबादी के मामले में सबसे खराब हालत बिहार की है, जहां बीजेपी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में भागीदारी कर रही है। इस राज्य में बीपीएल परिवारों की आबादी 1 करोड़ 21 लाख है। वहां पर बीपीएल आबादी बढ़ रही है और इस आबादी को दो वक्त की रोटी मुहैया कराने के लिए जो सरकारी फंड सरकार से मिलता है, उस पैसे को खा-खाकर सरकारी अफसरों की तोंद निकल आई है। जिस उड़ीसा में अभी हाल तक बीजेपी सत्ता में नवीन पटनायक के साथ सत्ता में भागीदारी कर रही थी, वहीं पर कालाहांडी है और उड़ीसी में भी बीपीएल परिवारों की हालत बिहार के मुकाबले जरा भी अच्छी नहीं है। हालांकि मेरे पास उन राज्यों का भी आंकड़ा है जहां बीजेपी शासित और कांग्रेस शासित सरकारें हैं लेकिन इस लेख को महज आंकड़ो का लेख न बनाने की वजह से उनकी बात नहीं की जा रही है। जब भी इस देश में गरीबी, भुखमरी और आपदाओं का जिक्र आता है तो उसमें सबसे पहले बिहार, उड़ीसा और यूपी की ही चर्चा की जाती है।
मंदी की मार अभी खत्म नहीं हुई है। यूपीए सरकार को काफी हद तक इसके लिए दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन बीजेपी या कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल इस मुद्दे पर बात करने की बजाय भूखे पेटों को स्मार्ट कार्ड देने की बात कर रहे हैं। अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि यह मंदी लंबी चलेगी और कोई-कोई इसके चार साल तक चलते रहने की अटकलें लगा रहे हैं लेकिन ये पार्टियां इससे उबरने के लिए कोई हल या विजन पेश नहीं कर रही हैं। आखिर ये लोग देश के किन लोगों को बेवकूफ बनाना चाहते हैं, यह मेरी भी समझ से बाहर है। क्या यह माना जाए कि देश में कोई टेलीकॉम लाबी सक्रिय है जिसने भूखे और गरीब लोगों को स्मार्ट फोन देने का अनोखा आइडिया बीजेपी को दे दिया हो। और अगर देश के 10 करोड़ बीपीएल परिवारों को सिर्फ पांच रुपया लेकर भी बीजेपी ने स्मार्ट फोन दिया तो जिस टेलीकाम कंपनी को यह ठेका मिलेगा...बस अब अंदाजा लगा लीजिए। कम से कम एक गंभीर नेता से देश को इतने भद्दे मजाक की उम्मीद नहीं थी और विशेषकर जब वह प्रधानमंत्री बनने के सपनों में खोया हो।
जिस देश के सभी स्कूलों में ठीक से पानी पीने का भी इंतजाम नहीं है और बच्चे कई-कई मील चलकर स्कूल पहुंचते हैं, वहां हर स्कूल में इंटरनेट पहुंचाने की बात की जा रही है। यानी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की जगह सीधे इंटरनेट पहुंचाने की बात हो रही है। हां, अगर बीजेपी और आडवाणी ने यह बात शहरी स्कूलों के संदर्भ में कही है तो कुछ समझ में आती है लेकिन वहां तो गांव के ऐसे स्कूलों में इंटरनेट पहुंचाने की बात की जा रही है जहां के स्कूल में हेड मास्टर को सामुदायिक फोन जैसी सुविधा भी हासिल नहीं है। अगर किसी गांव में सामुदायिक फोन है भी तो वह वहां के ग्राम प्रधान को ही मिलता है।
कंप्यूटर शिक्षा का जो हाल शहर के पब्लिक स्कूलों और सरकारी स्कूलों में है, वह भी किसी छिपा नहीं है। अगर आपका बच्चा शहर में किसी आलीशान बिल्डिंग वाले स्कूल में पढ़ता है तो हफ्ते में दो-चार दिन कंप्यूटर क्लास भी लगेगी लेकिन क्या मजाल है कि बच्चा स्कूल के कंप्यूटरों को हाथ लगा सके या उस पर अपने किसी बालसुलभ हरकत को व्यक्त कर सके। और अगर गलती से किसी सरकारी स्कूल में कंप्यूटर है तो वहां उसका पढ़ाने वाला टीचर न होने की वजह से वह पड़े-पड़े खराब हो गया होगा। आप कह सकते हैं कि यह सब बातें तो बहुत सामान्य हैं और इस आधार पर इंटरनेट के जरिए पढ़ाई के आइडिया को खारिज नहीं किया जा सकता। आप सही हैं लेकिन अकेले में जरूर सोचिएगा कि क्या यह संभव है बिना बुनियादी सुविधाएं जुटाए?
फिर भी अगर आप सोचते हैं कि बीजेपी का गरीबों और भूखे लोगों को स्मार्ट फोन देने का विजन बुरा नहीं है तो पांच साल पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में जब यही पार्टी पांच साल एनडीए के रूप में राज करने के बाद आपसे कह रही थी कि इंडिया इज शाइनिंग (भारत उदय) तब आपने उसे ठीक से पूरा वोट क्यों नहीं दिया था?

नीचे दो खबरें अंग्रेजी में हैं, जिनसे आपको इस लेख का संदर्भ समझने में मदद मिलेगी-

Two trillion on IT Vision if BJP wins

Source : DNA INDIA March 15 2009

New Delhi: Change through information technology (IT) is the new mantra of the Bharatiya Janata Party (BJP) to woo young voters, after its `Shining India' campaign failed five years ago. If implemented, the party's IT Vision would mean an estimated investment of Rs 2 trillion (Rs 200,000 crore) over a period of five years, though there's no official comment on the project cost.
The party has promised fully-loaded laptop computers worth Rs 10,000 for 10 millionstudents if it comes to power, as opposed to the "under-powered Net-top" that was recently launched by the UPA government. It also wants to give out smart mobile phones free to every BPL (below poverty line) family, overcome the economic slowdown through use of technology, create 1.2 crore IT-enabled jobs in rural areas, provide broadband internet across all towns and villages, strengthen e-banking facility, roll out unrestricted voice over internet protocol (VoIP) for making cheap long-distance calls, offer health insurance scheme for all using the IT platform, introduce multi-purpose national identity card, and support open-source software. Not just that, India must equal China in every IT parameter in five years. All this and more was part of the ambitious IT Vision of the biggest Opposition Party of the country.
On Saturday, BJP's Prime Ministerial candidate LK Advani, flanked by other leaders including Rajnath Singh, Sushma Swaraj, Ravi Shankar Prasad, Arun Shourie, Jaswant Singh and Arun Jaitley, launched the party's IT Vision. Somemajor software companies havebacked the BJP's mega plan.

BPL population declines, says Centre; 8 states refute claim

Source: DNAINDIA march 17 2008

NEW DELHI: Eight states, including Bihar, Orissa and Punjab, have sought additional food grain from the Centre to feed their increasing BPL population, which is in contrast to the Centre's claim that the number of people under this category has declined by 8.5 per cent.
"A number of state governments have requested to enhance allocation of foodgrain to their states on the basis of the higher number of BPL cards issued by them," Food Minister Sharad Pawar said in a written reply to Lok Sabha.
According to the list, Bihar, Kerala, Orissa, Karnataka, West Bengal, Punjab, Madhya Pradesh, Chhattisgarh and the union territory of Daman and Diu have requested the Centre to increase allocation of foodgrain for BPL families.
While Bihar has requested allocation of foodgrain for 1.21 crore BPL families, the Centre says only 65.23 lakh families are covered under BPL in the state. Similarly, Karnataka wants food grains for 63 lakh BPL families, but the Centre pegs the number at 31.29 lakh.
According to Planning Commission, the percentage of BPL population has come down to 27.5 per cent in 2004-05 from 36 per cent in 1993-94. However, the Centre continues to allocate food grain on 1993-94 estimate and there has been no reduction in the PDS subsidised kerosene oil after 2004-05, he said.

Thursday, March 12, 2009

मुशर्रफ और भारतीय मुसलमान



भारतीय मीडिया की यह विडंबना है कि अगर कोई मीडिया हाउस अच्छा काम करता है तो दूसरा उसे दिखाने या छापने के लिए तैयार नहीं होता। हिंदी मीडिया में तो यह स्थिति तो और भी बदतर है। अभी इंडिया टुडे का एक कॉनक्लेव हुआ, जिसमें पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व मिलिट्री डिक्टेटर परवेज मुशर्फ भी आए। उस कॉनक्लेव में जो कुछ हुआ, उसकी रिपोर्टिंग अधिकांश मीडिया हाउसों ने नहीं की। खैर वह तो अलग मुद्दा है लेकिन मुशर्रफ साहब ने जो कुछ कहा और जो उनको जवाब मिला, वह सभी को जानना चाहिए।
पाकिस्तान में तो लोकतंत्र कहीं गुमशुदा बच्चे की तरह हो गया है, इसलिए वहां के नेता अक्सर भारत में आकर अपना गला साफ कर जाते हैं। मुशर्रफ ने अपने भाषण में भारत और पाकिस्तान की तुलना मिलिट्री रेकॉर्ड, आईएसआई और रॉ (रिसर्च एनॉलिसिस विंग, भारत) के मामले में कर डाली। दोनों ही देशों की मिलिट्री को कोसा। दोनों देशों में सुरसा की मुंह की तरफ फैल रहे आतंकवाद पर भी घड़ियाली आंसू बहाए। यहां तक सब ठीक था लेकिन जब उन्होंने भारतीय मुसलमानों की तुलना पाकिस्तान के मुसलमानों से की तो गजब ही हो गया। मेरा और मेरे जैसे तमाम लोगों को इसका अनुमान नहीं था। लेकिन राज्यसभा सदस्य और जमात-ए-उलमाए हिंद के नेता महमूद मदनी उठकर खड़े हो गए और उन्होंने मुशर्रफ की जमकर खबर ली। मुशर्रफ ने दरअसल यह कहा था कि भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया गया है, यहां वे सुरक्षित नहीं हैं। उनके मुकाबले पाकिस्तान में मुसलमान ज्यादा महफूज और खुशहाल हैं। आए दिन दंगे-फसाद होते हैं। महमूद मदनी ने मुशर्रफ को लगभग लताड़ते हुए कहा कि उन्हें यह बात कहने का हक कम से कम भारत की सरजमीं पर नहीं है। उन्हें पाकिस्तान की राजनीति की शुरुआत यहां से नहीं करनी चाहिए। यहां के मुसलमानों को मुशर्रफ जैसों की हमदर्दी की जरूरत नहीं है। कृपया करके वह भारतीय मुसलमानों को बांटने का काम न करें। अगर उनका कोई मसला होगा तो वे यहीं पर आपस में सुलझा लेंगे। वैसे हम भी जानते हैं कि पाकिस्तान में क्या हालात हैं।
यह सब सुनकर मुशर्रफ पर घड़ों पानी पड़ गया और वे बहुत देर तक सामान्य नहीं रह पाए। मुशर्रफ ने यह सब क्यों कहा और मदनी ने उस पर जो पलटवार किया, उसे सही परिपेक्ष्य में समझने की जरूरत है।
दरअसल, पाकिस्तान में वही नेता ज्यादा पॉपुलर माना जाता है जो भारतीय मुसलमानों की तंगहाली को बयान करे और उसे मुद्दा बनाए। क्योंकि पाकिस्तान के लोग अब भी अपने आप को यहां के मुसलमानों से जुड़ा पाते हैं लेकिन भारतीय मीडिय़ा के एक वर्ग ने जिस तरह से तस्वीर का एक ही पहलू दिखाने का बीड़ा उठा रखा है तो पाकिस्तान में भी वहां का मीडिया ऐसी ही हरकत कर रहा है। भारतीय मुसलमानों से जुड़ी किसी भी घटना को वहां बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की आदत बन गई है। पिछले दिनों मुंबई में जब आतंकवादी हमला हुआ और भारत ने जिस तरह पाकिस्तान को कूटनीतिक मंच पर नंगा किया, उसके उलट पाकिस्तानी मीडिया उसे इस तरह पेश करता रहा कि सारी साजिश भारत में रची गई। अभी जब श्रीलंका के क्रिकेट खिलाड़ियों पर पाकिस्तान में हमला हुआ तो वहां के मीडिया ने भारत पर उंगली उठा दी। हालांकि बाद में पाकिस्तानी हुकूमत ने बयान देकर इसका खंडन किया। ...तो मुशर्रफ ने पाकिस्तान में लोकप्रियता हासिल करने के लिए भारत में आकर इस तरह का बयान देने की कोशिश की। मुशर्रफ को असल में उम्मीद यह है कि बहुत जल्द पाकिस्तान में सेना फिर से सत्ता पर कब्जा करेगी और तब उनकी भूमिका शुरू होगी। उनके द्वारा पाकिस्तानी सेना की बागडोर जिस व्यक्ति के हाथ में सौंपी गई है, वह नमक का हक अदा करने के लिए इतना ख्याल तो मुशर्रफ का रखेगा ही। इसलिए मुशर्रफ ने इस मौके को गंवाया नहीं।
मदनी ने जो कुछ कहा, वह भी सोलह आने सच है।
भारतीय मुसलमानों की अगर कोई समस्या है तो वे यहीं पर सुलझा लेंगे। यह ठीक है कि गुजरात जैसे नरसंहार को लेकर लोगों को एक मौका मिला है और वे भारतीय मुसलमानों को जब-तब उसकी याद दिलाते रहते हैं लेकिन क्या गुजरात को ही रोते रहने से सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। वहां की घटनाओं के लिए बीजेपी नेताओं को जो रक्त रंजित चेहरा इतिहास में दर्ज हो चुका है, वह मिटेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि कल को बीजेपी को केंद्र में सत्ता की बागडोर मिल जाए तो भी वे गुजरात की घटनाओं के मामले में इतिहास का पुनर्लेखन नहीं कर पाएंगे। यह नामुमकिन है। लेकिन इसके लिए भारतीय मुसलमानों को किसी मुशर्रफ जैसे हमदर्द की जरूरत नहीं है।

Sunday, March 8, 2009

उठ मेरी जान...

उज्मा रिजवी ने यह लेख खासतौर पर महिला दिवस पर एक अखबार के लिए लिखा था। उन्होंने दरअसल इसे मेरे पास पढ़ने के लिए भेजा था लेकिन मैं इसे अपने ब्लॉग पर बाकी पाठकों और मित्रों के लिए देने का लोभ संवरण न कर सका। उज्मा रिजवी अंग्रेजी-हिंदी में प्रकाशित एजुकेशन वर्ल्ड मैगजीन में असिस्टेंट एडिटर हैं। तमाम समसामयिक विषयों पर उनकी कलम चलती रही है। उनका वादा है कि हिंदी वाणी के लिए वह कुछ और भी लिखेंगी।

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं

तुझ में शोले भी हैं बस अश्क पिफशानी ही नहीं

तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है एक चीज जवानी ही नहीं

अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान............


मशहूर शायर कैफी आजमी की औरत को पुकारती औरत उन्वान की यह खास गज़ल तुझे अपने अंदर इतनी गहराई
से उतार लेनी है ताकि इन अल्फाजों का कर्ज़ अदा हो जाए। क्योंकि तू इतनी खुशकिसमत नहीं कि ऐसी इंकलाबी पुकार
तुझे बार-बार नसीब हो। हकीकत यही है खुदा भी उनकी मदद नहीं करता जो अपनी मदद खुद नहीं करता.... हां! तुझे
अपना उन्वान, अपनी तकदीर खुद बदलनी है, और ऐसी तदबीर करनी है कि तारीख भी बदल जाए। तू बेजान वजूद के
चोले से निकलकर एक हस्ती के रूप में ढल जाए... उठ मेरी जान....! हां उठ! आज तेरी तारीख, तेरा दिन है। अपने
आपको बदलने के लिए कहीं से तो शुरूआत करनी होती है तो पिफर यह शुरूआत आज ही कर, अभी से कर। अपने
रोते-बिसूरते अन्दाज को उतार पफेंक, अपने जिस्म पर पड़ने वाले फफोलों और जुल्म के निशानात को मिटा डाल, अपने
लिए तय किए गए दोयम दर्जे को नकार, अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना, अपने हक को पहचान। जब तक तू
ऐसा नहीं करेगी। जहेज के लिए जलती रहेगी, अपनी ही कोख को उजड़ते देखती रहेगी, जिस्म और जवानी की लाश
को ढोती रहेगी, दुनिया के रहमो-करम पर पलती रहेगी, रस्मो रिवाज की भेंट चढ़ती रहेगी।

तू ये जान ले समाज तुझसे है तू समाज से नहीं। तु तो जननी है, तेरे आंचल में एक जहान बसता है, तेरे कदमों में जन्नत है अगर तू नहीं तो दुनिया का वजूद नहीं, समाज का सवाल नहीं। बस इस ख्याल को अपनी ताकत बना । कि तो समाज
की रचयिता है, कायनात का हसीन तोहपफा है, तो पिफर तू क्यों जहालत के जहन्नुम में जलती है, अश्कों में अपने आप
को डुबोती है। तुझे न अब जलना है न रोना है बस अपने होने का यकीन करना है अपने वजूद को तस्लीम करना है।
देख आज तेरा दिन है, सिपर्फ तेरा!

लेकिन तुझे दिन-तारीख के बन्धन में भी नहीं बंधना बल्कि हर दिन तेरा हो तुझे कुछ ऐसा करना है, ऐसा बनना है।
तुझे बराबरी की हक की मांग नहीं करनी, तुझे तो समाज को रचना है एक बयार बनना है। ये तू ही है जो अपने मुल्क
के तख्त पर भी है और तख्त को ठुकराने वाली भी है। तू दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, पफात्मा, ज़हरा, मरियम है, तू इन्दिरा से लेकर सानिया है पिफर क्यों परेशान, पशेमान है! अपने आप को पहचान! उठ मेरी जान..

-उज्मा रिजवी