Pages

Monday, May 7, 2012

आमिर खान और सत्यमेव जयते…क्या सच की जीत होगी

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट nbt.in पर भी उपलब्ध है।


थोड़ी देर के लिए बॉलिवुड स्टार आमिर खान (Bollywood Star Aamir Khan) के टीवी प्रोग्राम सत्यमेव जयते (Satyamev  Jayate) को अलग रखकर डॉक्टरों की दुनिया पर बात करते हैं। तमाम मुद्दे...सरोकार...हमारे आसपास हैं और उनसे पूरा देश और समाज हर वक्त रूबरू होता रहता है। पर कितने हैं जो इनसे वास्ता रखते हैं या इनका खुलकर प्रतिकार करते हैं। आमिर खान बॉलिवुड के बड़े स्टार हैं, उनकी एक मॉस अपील है। आप लोगों में से जिन्होंने 6 मई को उनका टीवी शो सत्यमेव जयते देखा होगा, या तो बहुत पसंद आया होगा या फिर एकदम से खारिज कर दिया होगा।

फेसबुक (Facebook) हर बार की तरह ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया का पसंदीदा अड्डा है। शो खत्म होने के बाद प्रतिक्रियाएं आने लगीं। हमारे कुछ मित्रों ने कन्या भ्रूण हत्या (Female Foeticide) को धर्म और वर्ण में बांटने की कोशिश भी की। फेसबुक से पता चल रहा है कि वे इसे सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की समस्या मानते हैं। उनका यह भी कहना है कि मुसलमान और दलित अपनी बेटियों को नहीं मारते। उन्होंने आंकड़े भी पेश किए हैं। मैं कम से कम इस समस्या को इस तरह देखे जाने के खिलाफ हूं। यह समस्या बड़ी है। न तो इसे धर्म के आइने में देखा जाना चाहिए और न ही शहरी और ग्रामीण के बीच लकीर खींच कर। मैं ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी सोच वालों से भी सहमत नहीं हूं कि आमिर खान को प्रति एपिसोड इतने करोड़ मिलेंगे और इसे देखने वाले गरीब को क्या मिलेगा...मेरा ऐसे तथाकथित फेंकू बुद्धिजीवियों से निवेदन है कि अभी वे जो नौकरियां कर रहे हैं, उसे छोड़कर जाएं और जाकर गरीबों के बीच काम करें। दिल्ली में अपने दफ्तर के एसी हॉल या केबिन में लफ्फाजी करने से कुछ नहीं हासिल होने वाला।


आमतौर पर बातचीत में कन्या भ्रूण हत्या पर हम लोग बहुत खुलकर बात नहीं करते या करते भी हैं तो बहुत सतही बातें। बुद्धिजीवी और खासकर महानगरों में सड़क-नाली, फैशन शो या नेताओं की खबर लिखने वाले पत्रकारों की नजर में तो यह कोई बड़ा मुद्दा ही नहीं है। लेकिन इसी छोटे से मुद्दे से आमिर खान ने अपने शो की शुरुआत की है।
शो में ऐसी कुछ भी नई बात नहीं थी जिसे हम-आप न जानते हों।

अब मैं अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाता हूं कि तमाम डॉक्टर एक छोटा सा क्लिनिक खोलने के बाद इतने बड़े डॉक्टर कैसे बन गए। आमिर खान के शो से यह तथ्य सामने आया कि मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया आजतक किसी भी डॉक्टर को कन्या भ्रूण हत्या के जुर्म में सजा नहीं दे पाई। स्लम एरिया में सेवाभाव से डॉक्टरी कर पैसा कमाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) आए दिन झंडा बुलंद करती नजर आती है लेकिन कभी इस मुद्दे पर अपने डॉक्टर मेंबरों को समझाती नजर नहीं आती है।

एक मिनट के लिए आप आमिर के शो और क्या भ्रूण हत्या के तमाम आंकड़ों को ताक पर रख दें...क्या आपका पाला ऐसे डॉक्टर से नहीं पड़ा जो यह कहता है कि मैं जो दवा लिख रहा हूं वह फलां दवा की दुकान से ही खरीदें। आमतौर पर ज्यादातर लोग अपने घर के आसपास ही रहने वाले या क्लिनिक चलाने वाले डॉक्टर के पास जाते हैं। दवा की दुकाने भी आसपास ही होती हैं। आप अगर डॉक्टर की पंसद की केमिस्ट शॉप पर न भी जाएं और अगर दूसरी शॉप पर भी जाएंगे तो भी डॉक्टर को फायदा होगा। क्योंकि जिस कंपनी की दवा डॉक्टर ने लिखी है, वह पहले से ही डॉक्टर को अपने एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) के जरिए गिफ्ट भेजकर या विदेश यात्रा का लालच देकर प्रभावित कर चुकी है। वह डॉक्टर या अस्पताल सिर्फ उसी दवा कंपनी की दवा को अपनी पर्ची पर लिखेगा। चलिए अगर यह मामूली बात है तो इसे भी छोड़ देते हैं। आप दिल्ली या मुंबई में किसी भी बड़े सरकारी-गैर सरकारी अस्पताल चले जाइए। आपके जितने भी टेस्ट के लिए डॉक्टर लिखेगा, आपको वहीं सामने से ही कराना पड़ेगा। क्योंकि डॉक्टर को रिपोर्ट जल्दी चाहिए...आप सामने से कराने को मजबूर हैं। यह पूरा गोरखधंधा है, जो हमारी-आपकी और मीडिया की सहमति से चल रहा है। बराबर के गुनाहगार हैं हम सब।

...और यह सब क्या है। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में आए दिन डॉक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं। वजह यही कि किसी मरीज के तीमारदार ने डॉक्टर साहब को गाली दे दी है या थप्पड़ जड़ दिया। आखिर मरीज के घर वालों का गुस्सा क्यों फूट रहा है। क्या वे डॉक्टर को अनायास ही थप्पड़ मार देते हैं या गाली दे देते हैं। हालांकि मैं ऐसी हरकतों को जायज ठहराने और समर्थन करने के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन इसका विश्लेषण तो होना ही चाहिए कि आखिर लोगों को जिंदगी देने वाले डॉक्टरों को लेकर आम आदमी की नफरत क्यों बढ़ती जा रही है। आमिर खान ने डॉक्टरों की दुनिया का एक कोना ही अभी छुआ है, ऐसी तमाम बातें और घटनाएं देश के लाखों-करोड़ों लोगों के पास बताने के लिए हैं जिन्हें सुनकर कई सत्यमेव जयते बनाए जा सकते हैं।

यकीन मानिए आमिर के इस छोटे से मुद्दे पर लोगों को झकझोर दिया है। मुझे अपने घर में सबसे पहला रिएक्शन मिला। मेरी पत्नी और बेटी की आंखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बाद 6-7 लोगों से मेरी बात हुई, सभी आमिर के शो की चर्चा करते नजर आए और सभी की जबान पर एक ही बात थी कि आमिर ने सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है। शाम को हम लोग एक विवाह कार्यक्रम में शामिल हुए। शादी में खाने-पीने और चमक-दमक से ज्यादा आमिर के शो की चर्चा थी।

हालांकि मेरी कुछ ऐसे भी युवकों से बात हुई जिन्हें आमिर का शो रत्तीभर पसंद नहीं आया। उनका कहना था कि वो तो इस शो में कुछ नाच-गाने की उम्मीद लगाकर शो देखने बैठे लेकिन घोर निराशा हुई। फिर उन्होंने उलहना भी दिया कि आप जैसे लोग ही इन पर औऱ सचिन जैसे लोगों पर कागज काले कर इनकी स्टार वैल्यू बढ़ा देते हो, वरना यह लोग तो बस मनोरंजन करने के लिए हैं।...ऐसी सोच रखने वाले युवकों की संख्या थोड़ी ही है लेकिन इस सोच के बावजूद ऐसे मुद्दे संजीदा लोग उठाते रहेंगे, बेशक उसमें बाजारवाद का तड़का भी लगा होगा, खुद की पब्लिसिटी वाली बात भी शामिल हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह भी तो नहीं कि आमिर या बाकी लोग मुद्दे उठाना छोड़ दें...

अगर आप अब भी यह शो न देख पाए हों तो यहां मैं उसका विडियो दे रहा हूं...आप देख सकते हैं...


Saturday, April 28, 2012

कवि-कथाकार संजय कुंदन क्या वाकई ब्राह्मणवादी हैं


अविनाश के मोहल्ला ब्लॉग पर फॉरवर्ड प्रेस में प्रकाशित प्रमोद रंजन की संपादकीय टिप्पणी, मॉडरेटर का वक्तव्य और इन सब पर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं तो मन में कुछ सवाल उठे, बातें उभरीं, जिन्हें आप लोगों से शेयर करना चाहता हूं। पहली बार बहुजन आलोचना की अवधारणा का पता चला। अगर इस संदर्भ को समझने में परेशानी हो तो पहले प्रमोद रंजन की टिप्पणी मोहल्ला लाइव ब्लॉग पर पढ़ें, इस लिंक पर जाएं http://mohallalive.com/2012/04/24/bahujan-sahitya-varshiki-editorial-of-forward-press
- यूसुफ किरमानी

साहित्य एक जनतांत्रिक माध्यम है। हर किसी को हक है कि वह नई-नई अïवधारणा लेकर आए। वैसे बहुजन का फॉर्मूला यूपी और बिहार की राजनीति में पिट चुका है। राजनेता अब इससे आगे निकल चुके हैं। लेकिन अब साहित्य में इसे चलाने की कोशिश की जा रही है।

सच्चाई यह है कि सामाजिक संरचना को बौद्धिकों से बेहतर राजनेता ही समझते हैं। (क्या इसीलिए अब भी हिंदीभाषी क्षेत्र की जनता पर साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों से ज्यादा राजनेताओं की बात का असर होता है?) खैर, प्रमोद रंजन ने जो बहुजन आलोचना पेश की है उसके मानदंड बड़े दिलचस्प हैं। इसके मुताबिक एक कहानी के पात्रों की सूची तैयार करें। उनके सरनेम पर नजर डालिए। ज्यों ही कोई सवर्ण सरनेम नजर आए उसे खारिज कर दीजिए ब्राह्मणवादी कह कर। अगर सरनेम दलित-ओबीसी वगैरह का है तो कहानी बहुत अच्छी होगी। कोई सरनेम न हो तो उस पर मनमुताबिक सरनेम लगा दीजिए। कितना आसान है यह प्रतिमान। कहानी पढऩे की कोई जरूरत नहीं। कहानी की कथावस्तु क्या है, वह क्या कहती है, कहां ले जाती है, इस पर ज्यादा दिमाग खपाने की कोई जरूरत नहीं। कहानी वाकई कहानी है भी या नहीं। उसमें पठनीयता है या नहीं, वह पाठकों को अपने साथ जोड़ पाती है या नहीं-ये सब कोई मुद्दा ही नहीं है।

सचमुच आलोचना लिखने का एक नया शॉटकर्ट निकाला है प्रमोद रंजन ने। कहने को तो वह खुद को ब्राह्मणवाद विरोधी कहते हैं पर वह खुद नायक की पंडिताऊ परिभाषा से बाहर नहीं निकल सके हैं। वह नायक की परंपरागत परिभाषा (जो भरत मुनि और दूसरे कुछ आचार्यों ने दी है) में फंसे हुए हैं जो यह कहती है कि नायक को धीरोदात्त होना चाहिए। महान आदर्शों से युक्त होना चाहिए। साहित्य के पंडितों की तरह प्रमोद भी चरित्रों को ब्लैक एंड व्हाइट में देखते हैं यानी या तो व्यक्ति बहुत अच्छा होगा या बहुत बुरा। अगर विश्व साहित्य, नाटक या कुछ बेहतर फिल्मों की ओर उन्होंने नजरें डाली होतीं तो उन्हें पता चलता कि नायक का रूप कितना बदल चुका है। सच तो यह है कि सिनेमा के दर्शक ज्यादा परिपक्व हैं जो एंटी हीरो के कॉन्सेप्ट को आत्मसात कर चुके हैं। बड़ा और प्रामाणिक चरित्र वह होता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा शेड्स होते हैं, जो अपनी पूरी मानवीय अच्छाइयों और बुराइयों के साथ आता है। अगर इस रोशनी में खुले मन से उन्होंने बॉस की पार्टी के करैक्टर्स को देखा होता तो शायद उनकी राय कुछ और होती। वे ब्राह्मण होने और ब्राह्मणवादी होने में फर्क नहीं कर पाते।

जैसे कोई धार्मिक हिंदू या धार्मिक मुसलमान होने भर से ही सांप्रदायिक नहीं हो जाता, उसी तरह ब्राह्मण होने से ही कोई ब्राह्मणवादी नहीं हो जाता। जबकि दूसरी तरफ कोई गैर ब्राह्मण भी घोर ब्राह्मणवादी हो सकता है। ब्राह्मणवाद तो एक प्रवृत्ति है जिसका मतलब है हर तरह के परिवर्तनों का विरोध, यथास्थितिवाद का समर्थन और जातीय आत्ममुग्धता और अहंकार। प्रमोद सिर्फ इसलिए संजय कुंदन को ब्राह्मणवादी कहते हैं क्योंकि उनके कुछ पात्र ब्राह्मण हैं। अब केएनटी की कार कहानी पर गौर करें। अगर उसके पात्र का नाम कमल नारायण तिवारी न होकर कमल नारायण यादव होता तो क्या कोई फर्क पड़ता? वह कहानी तो हिंदी पत्रकारिता में आ रही गिरावट पर लिखी गई है जिससे प्रमोद भी भलीभांति परिचित हैं। 

क्या मुख्यधारा की पत्रकारिता का आम जनता के सरोकारों से कटने पर लिखना ब्राह्मणवाद है? इस कहानी में केएनटी भ्रष्ट लोगों की करतूतों को उजागर करने के लिए अखबार निकालते हैं। क्या यह ब्राह्मणवादी कार्य है? प्रमोद को यह बात अटपटी लगती है कि एक सवर्ण पात्र आखिर क्यों पिछड़ी जाति की सरकार आने पर चिढ़ रहा है? प्रमोद तो बिहार के हैं। वहां की सत्ता से बाहर होने पर सवर्णों के भीतर जो छटपटाहट पैदा हुई है, वह वहां का एक सामाजिक यथार्थ है। किसी भी सवर्ण परिवार में ऐसी बातें होना स्वाभाविक है। अगर संजय कुंदन ब्राह्मणवादी होते तो वह बड़ी चालाकी से इस तथ्य को छुपा ले जाते। पर उन्होंने इसे छुपाया नहीं बल्कि उजागर किया।

मुझे अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास झीनी झीनी बीनी चदरिया याद आता है जिसमें उन्होंने बुनकरों के जीवन का चित्रण करते हुए उनके भीतर के सांप्रदायिक रुझानों को भी साफ-साफ व्यक्त किया है। कुंदन ने भी ऐसा ही किया है। वह चाहते तो ब्राह्मण पात्रों को महान आदर्शवादी गरीब-पिछड़ा समर्थक, क्रांतिकारी साबित कर प्रगतिशील होने का तमगा हासिल कर सकते थे( ऐसा हाल में एक फैशन के तहत कई सवर्ण लेखकों ने किया है) पर उन्होंने लेखकीय ईमानदारी को नहीं छोड़ा। फिर केंद्रीय पात्र को अनिवार्य रूप से लेखक का प्रतिनिधि मानना भी बहुत बड़ी भूल है। जैसे मुक्तिबोध की अंधेरे में कविता के मैंको बहुत से आलोचकों ने कवि का प्रतिरूप बताकर उसकी अनर्थकारी आलोचना की है। कुंदन जैसे लेखक दरअसल हिंदी कहानी में चरित्रों के बने-बनाए ढांचे को तोड़ रहे हैं। ऐसा करने में गलत समझे जाने का जोखिम तो है ही।

प्रमोद रंजन को लगता है कि हिंदी साहित्य में सिर्फ जाति, पैसे और ताकत से ही जगह बनाई जाती है। अगर ऐसा होता तो आज सभी आईएएस-आईपीएस लेखक हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित रचनाकार होते। पर ऐसा नहीं है। दरअसल प्रमोद इस बात को भूल रहे हैं कि साहित्य में सबसे बड़ी सत्ता है- पाठक वर्ग। हिंदी का पाठक समुदाय बहुत मौन होकर पर्दे के पीछे से फैसले करता है। वह जिसे महत्व देता है वही प्रतिष्ठित होता है। वह सवर्ण-अवर्ण से ऊपर उठकर सोचता है। नामवर सिंह आज अगर इस ऊंचाई पर हैं तो यह जगह उन्हें पाठकों ने ही सौंपी है। वरना जोड़तोड़ करने वाले तो बहुत आए और गए। अगर साहित्य में जाति विशेष का ही वर्चस्व होता तो रेणु आज कथा साहित्य के शिखर पर नहीं होते। पुरस्कारों और संस्थानों में जरूर घटिया राजनीति होती है पर साहित्य का भविष्य इन सब से निर्धारित नहीं होता। अंतत: वही चलता है वही टिकता है जिस पर पाठक अपनी मुहर लगाता है।   


Thursday, April 26, 2012

ज्योति संग की खूबसूरत खलिश


यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। मैं इसे वहां से साभार अपने इस ब्लॉग के लिए ले रहा हूं।

उस शख्स को मैं पिछले दो दशक से तो जानता ही हूं। उसके व्यक्तित्व के कई आयाम हैं। कुछ से मैं रूबरू रहा। यूं ही तमाम कहानियों और किताबों पर चर्चा करने के दौरान एक दिन उसकी कहानियों की किताब पहला उड़ने वाला घोड़ा आई और वह उस किताब के साथ गायब हो गया।...वक्त बीत गया। ज्योति संग रचना कर्म से लेकर रंग कर्म में जुटे रहे। मैं भी कई शहरों की खाक छानकर जब वापस दिल्ली पहुंचा तो दोबारा मुलाकात हुई ज्योति संग से। उसने तो खबर नहीं दी लेकिन दूसरे लोगों ने बताया कि ज्योति संग की गजलों की किताब खूबसूरत खलिश आने वाली है। पर, किताब जब मेरे हाथ आई तो मैं दंग था, एक तरफ हिंदी में गजल और दूसरी तरफ उसी का उर्दू में अनुवाद।

मुझे यह तो मालूम था कि ज्योति संग के पिता उन लाखों रिफ्यूजी लोगों में शामिल थे जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त उजड़कर भारत में आए और उन लोगों को दिल्ली के आसपास बसाया गया था। लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि इस शख्स को उर्दू से जुनून की हद तक लगाव है। किताब के पन्ने पलटे तो पाकिस्तान में उर्दू साहित्य और पत्रकारिता के कुछ चिरपरिचित नाम भी पढ़ने को मिले। लाहौर का जाना-माना नाम आयशा जी़ खान ने तो खैर किताब की भूमिका ही लिखी है। भारत में अब उर्दू एक मरणासन्न भाषा (कम से कम लिखे और पढ़े जाने के लिहाज से) की तरफ बढ़ रही है। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि उसमें भी मेरे जैसे लोगों का हाथ है। मेरे परिवार में माहौल होने के बावजूद मेरे डॉक्टर पिता ने कभी उर्दू पढ़ने के लिए न तो दबाव डाला और न प्रेरित किया। मुझे इसका अफसोस आज भी है। हालांकि मेरे बोलने की वजह से लोग अंदाजा नहीं लगा पाते कि मुझे उर्दू आती है या नहीं।


 
खैर, ज्योति संग की उर्दू-हिंदी शायरी को साहित्य के किसी आंदोलन से जोड़ने के झमेले में न पड़ते हुए उनके कुछ शेर मेरी निगाह से गुजरे हैं, वह आपकी नजर कर रहा हूं

हजार बस्तियां मैंने बसा के रख दी हैं
तमाम उम्र खुदाया मैं घर बना न सका
करता दीवार-ओ-दरीचों का तसव्वुर कैसे
एक बुनियाद का पत्थर भी मैं जुटा न सका
मेरे घऱ और मेरे बीच इक सूखी नदी थी
मैं कश्ती में ही बैठा रह गया, घर जा न सका

यह शख्स अपने साथ हुई ज्यादतियों का अपने शेरों के जरिए शिकवा तो करता है लेकिन अपनी गलती मानने से भी परहेज नहीं करता। यह शेर देखिए

तारीकी-ए-शब में नहीं खाई कभी ठोकर
मैं दिन के उजालों में कई बार गिरा हूं
बेकार मुझे दार पे लटका रहे हैं लोग
मैं जिल्लत-ए-अहसास से सौ बार मरा हूं

उनकी शायरी का एक रंग इस शेर में मिलता है-

हर अपरिचित को लगा लो दिल से आंखें मूंद कर
एक ही अल्लाह की हैं औलाद मत घबराइए
गर सलीबों पर ही होगा झूठ सच का फैसला
तान कर चादर कयामत तक सभी सो जाइए
आपको रास आए गर मौज-ए-फकीरी का सरूर
बेझिझक इस झोपड़े में लौट कर आ जाइए

यहां खूबसूरत खलिश की सारी गजलों के शेरों को समेट पाना नामुमकिन है। ज्योति संग के जिस जुनून का जिक्र मैंने ऊपर किया है, उससे जुड़ी एक घटना मैं आप लोगों से बांटना चाहता हूं। 1 जनवरी 1989 को एक नुक्कड़ नाटक (हल्ला बोल) खेलने के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी सफदर हाशमी (इनके बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इस लाइन को क्लिक करें) और उनके साथियों पर जानलेवा हमला हुआ। घायल सफदर हाशमी की दो दिन बाद मौत हो गई। इस हत्याकांड से हर कोई दहल उठा। ज्योति संग ने मुझे फोन करके कहा, मेरा खून खौल रहा है, मैं एक नाटक कर इसका विरोध करना चाहता हूं। उन दिनों फरीदाबाद में नगर निगम का आडिटोरियम बनकर तैयार नहीं हुआ था, सिर्फ फर्श बना था और ऊपर खुला आसमान। मैंने किसी तरह वहां नाटक खेलने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को तरह-तरह से फुसलाकर हासिल कर ली।

ज्योति ने रामलीला में विभिन्न पात्र निभाने वालों को जुटाया, उन्हें मकसद समझाया और दो दिन में स्क्रिप्ट तैयार कर थमा दी। मेरे जिम्मे सूत्रधार का काम था और उस गाने की तलाश जो मोहम्मद रफी ने कई दशक पहले गाया था- वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हों...। इस गाने को क्लाइमैक्स पर बजना था। तीसरे दिन शाम को नाटक था। जो नाटक देखने के शौकीन नहीं थे, वे भी पहुंचे। एंट्री फ्री थी। नाटक खत्म हुआ तो लोगों की आंखें नम थीं। मैं एक जुनून वाले चेहरे पर संतोष के भाव पढ़ सकता था।




किसी शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ऐसे ही लोगों की जरूरत होती है। अब जब सबकुछ व्यावसायिक होता जा रहा है तो ऐसे लोग भला उसमें कहां खपेंगे। जिस शहर में ज्योति संग रहते हैं, वहां भी वक्त के साथ सबकुछ बदल चुका है। 

नोट - ठीक ऊपर का फोटो किताब के विमोचन समारोह का है। फरीदाबाद के डीएवी कॉलेज में जाने-माने पत्रकार और लेखक कुलदीप नैयर ने इसका विमोचन किया था। कार्यक्रम में हरियाणा उर्दू अकादमी के डायरेक्टर डी. आर. सपरा, शायर के.के. बहल, जीवा शिक्षण संस्थान के एमडी ऋषिपाल चौहान वगैरह मौजूद थे।











Saturday, April 21, 2012

पहचानिए शब्दों की ताकत को


अगर न होते शब्द

लेखक - सागर कौशिक  

लेखक का परिचय - सागर कौशिक दरअसल टीवी से जुड़े हुए पत्रकार हैं और जब-तब लिखते भी रहते हैं। उनका मानना है कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो समाज के लिए भी सार्थक हो। उनके मुताबिक लोगों तक कुछ सकारात्मक बातें पहुंचाने के लिए वह कलम और कैमरे का इस्तेमाल करते हैं। उम्मीद है कि उनका यह लेख आपको पसंद आएगा।
संपर्क - 361, गली नं. 12, वेस्ट गुरु अंगद नगर, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092


बुजुर्गों की एक कहावत है: लात का घाव तो भर जाता है, नहीं भरता तो बातों का घाव! बातें, जो शब्दों से बनती है! शब्द, जिनसे इतिहास बनता है! शब्द, जिनसे जहां प्यार झलकता है, वहीं नफरत भी जन्म लेती है! शब्द, जो अपने आप में पूरे जहान को समेट लेता है, प्यार का इजहार भी तो इन्हीं शब्दों से ही होता है!  - जब बच्चा पहली बार बोलता है तो लगता है तीनों जहां की खुशियां जैसे सिमट कर मांकी झोली में गिर आई हैं! प्रेमिका भी तो अपने प्रेम का इजहार करने के लिए शब्दों का ही तो सहारा लेती है।

लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि इन शब्दों की अपनी एक ताकतभी होती है। जैसे समय को कभी किसी ने नहीं देखा होता और बड़े से बड़ा पहलवान भी उसके सामने धराशायी हो जाता है, ठीक ऐसे ही शब्दों को भी किसी ने कभी नहीं देखा होता और इतिहास के इतिहास ये शब्द बना जाते हैं! इन्हीं शब्दोंने ही महाकाव्यों गीता’, ‘रामायण’ ‘महाभारत’ ‘कुरानबाइबिल की रचना की। अगर ये शब्द नहीं होते तो शायद इतिहास भी न होता!
देखा आपने शब्दों की ताकत का चमत्कार! एक बहुत ही प्रसिद्ध कव्वाली की याद आ रही है, जिसका अर्थ है मानव जब इस धरती पर जन्म लेता है, तब से मृत्युपर्यंत लकड़ीउसका साथ नहीं छोड़ती, परन्तु लकड़ी  तो उसके शरीर का साथ नहीं छोड़ती, लेकिन शब्दतो मृत्यु के बाद भी उसका साथ नहीं छोड़ते! लोग संसार में आ कर तो चले जाते हैं, परन्तु उनके कहे शब्दही तो इतिहास बन कर संसार को चलायमान बनाए रखते हैं।

शब्द, जो हमें कभी प्यार करते हैं, कभी रूलाते हैं, कभी हंसाते हैं, कभी डराते हैं, कभी दोस्त को दुश्मन बना देते हैं तो कभी दुश्मनी दोस्ती में बदल डालते हैं। क्या मजेदार बात है कि स्वयं अस्तित्वहीन होकर सारे संसार को चलाते रहते हैं। जो स्वयं अस्तित्वहीन होते हैं, मगर अस्तित्व की तरह अपनी ताकतरखते हैं। इनकी ताकत क्या होती है, इसके लिए एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है, जो हमने तब समझ ली होती तो शायद हमारे समाज का वह हाल न होता, जो आज हो रहा है।

एक बहेलिया था, जिसके पास दो तोते थे। वह उन्हें बाजार में बेचने के लिए गया। ग्राहक उससे उन दोनों तोतों के दाम पूछते तो एक का दाम नगण्य और दूसरे का अनमोल बताता। एक सभ्य ग्राहक ने जब उससे इसका कारण जानना चाहता तो उसने जवाब दिया, ‘खुद ही तोतों से पूछ लो।उसने जब नगण्यदाम वाले तोते से कुछ कहना चाहा तो उस तोते ने जवाब देने से पूर्व ही उसको गालियों से तोल दिया, जब कि अमूल्यदाम वाले तोते ने पूरे स्वागत-सत्कार के साथ उसकी बातों का जवाब दिया। तब बहेलिए ने बताया कि ये नगण्य दाम वाला तोता डाकुओं का साथी रहा, जबकि ये अमूल्यदाम वाला तोता साधु-संतों का साथी रहा है।

इस कहानी का सार केवल यही है कि वे शब्द, ,जो हम गुस्से में अथवा प्यार में बोलते हैं, उसका प्रभाव हमारे आसपास के वातावरण को भी दूषित अथवा स्वच्छ बना देता है। हमारे कहे हुए शब्द अथवा अपशब्द हमारे मुख से निकल कर समाप्तनहीं होते, बल्कि वे हमारे इस समाज की आबोहवा में घुल जाते हैं। हमारे घर की दीवारों में वे जज्ब हो जाते हैं। हमारे घर के वातावरण में वे घुल-मिल जाते हैं और जब हम उस घर के वातावरण में सांस लेते हैं तो वे हमारे शरीर पर वही दुष्प्रभाव छोड़ते हैं, जैसे हमने वातावरण में उन्हें छोड़ा था। ये वातावरण ही तो था कि एक तोता नगण्यदाम वाला बन गया और दूसरा अमूल्य

इन शब्दों को वातावरण में लाने में जो सबसे सहायक सिद्ध होती है, वह है हमारी जिह्वï, जिसके लिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:
तुलसी जिह्वïा बावरी,
कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर गई,
जूती खात कपाल॥
तो ये है शब्दों की ताकत। इन्हें पहचानो और अपने आसपास के वातावरण को दूषित होने से बचाओ।
 

Wednesday, April 18, 2012

धर्म गुरुओं की राजनीतिक चाहतें

भारत के धर्मगुरुओं की राजनीतिक चाहतें छिपी नहीं हैं। पर, वे लोग जब यही काम कौम के नाम पर करने लगें तो उन पर तरह-तरह के संदेह पैदा होते हैं। फिर अगर इस खेल में धार्मिक संस्थाएं भी शामिल हो जाएं तो कौम बेचारी बेवकूफ बनती रहती है। मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स की आनलाइन साइट पर उपलब्ध है। पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - नवभारत टाइम्स

Saturday, March 31, 2012

सब कुछ होते हुए भी नाखुश हैं वो....

छत्तीसगढ़ की आवाज....

सुधीर तंबोली "आज़ाद"अखिल भारतीय पत्रकार एवं संपादक एशोसिएशन के छत्तीसगढ़ के प्रदेश महासचिव हैं। उन्होंने हिंदीवाणी ब्लॉग पर लिखने की इच्छा जताई है। उन्होंने एक लेख प्रेषित भी किया है, जिसे बिना किसी संपादन के यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस मौके पर मैं हिंदीवाणी के सभी पाठकों, मित्रों व शुभचिंतकों को आमंत्रित करता हूं कि अगर वे इस पर कुछ लिखना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। मुझे अपना लेख ईमेल करें। - यूसुफ किरमानी

सब कुछ होते हुए भी नाखुश हैं वो....
                                                             -सुधीर तंबोली "आज़ाद"

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने शिक्षा कर्मियों के तीनो वर्गो को क्रमंश वर्ग 3 का 2000 , वर्ग 2 का  3000 , वर्ग 1 का  4000 रुपये की मासिक सौगात दी। जानकार ख़ुशी हुई कि डॉ. साहब ने सभी का ख्याल रखते हुए ये निर्णय लिया।

इस सूचना को पाकर मैंने अपने शिक्षाकर्मी मित्रो को फ़ोन कर के बधाई दी उन्होंने धन्यवाद तो दिया और आगे कहा की जो और अपेक्षाए थी सरकार उनमे खरी नही उतरी झुनझुना थमा दिया बस.!

तब से मेरा दिमाग आम इन्सान पर आकर ठिठक गया जैसे की मैं अभी खुद अभी बेरोजगार हूं, आजीविका पे शंशय बरकरार है। महीने के 2000 कहां से आएंगे, तय नहीं है और सरकारी नौकरी पे काबिज लोगो के लिए  2000 रुपये  अतरिक्त भी मात्र  झुनझुना है। सरकारी नौकरी सरकारी लाभ हर तरह की सरकारी सुविधाय प्राप्त होने के बाद भी नाखुश मेरे शिक्षाकर्मी मित्र और उसमे भी साहब लोग ये कहते है की हम भविष्य तैयार करते है हमारी हर मांग को सरकार को एक बार में स्वीकार कर लेना चाहिए।

और दूसरी तरफ हर सुविधा से महोताज़ गरीब जो रोज़ रोटी की चिंता में घर से निकलता है एक समय का खाना भी मिल पाएगा की नहीं, सोचता है तबियत गर बिगड़ जाये तो दवा ले आये तो तो भूखे  पेट सोने की मज़बूरी हो जाती है ऐसे में किसी दिन कल ही तरह बाज़ार बंद और रोज़ी रोटी कमाने का साधन भी नदारद। अनिश्चय भविष्य कोई पूछ परख नहीं और जिनके पास ये समस्या नहीं है वो और अपने सुविधाओ में बढ़ोतरी के लिए आन्दोलन धरना प्रदर्शन कर रहे है। सब कुछ होने और मिलने के बाद भी नाखुश...

क्या वो उन लोगो के बारे में एक बार भी सोचते है की खुले आसमान के नीचे कमाने खाने वाले., मेहनत के बल पर रोज़ी पकाने वाले कैसे अपना घर-परिवार चलाते होंगे.?

और वो गरीब तो अपने हक के लिए आंदोलन / धरना प्रदर्शन का रास्ता भी अख्तियार नहीं कर सकते, क्योंकि ये काम स्वार्थ की राजनीती करने वाले नेताओ ने ले रखा है गरीबो के हक के लिए वो आवाज़ बुलंद करते है पर जब और कोई मुद्दा नज़र नही आता तब।

गरीब अपनी रोज़ी--रोटी छोड़कर आंदोलन करने भी नहीं बैठ सकता क्योंकि वो बैठ जाएगा तो उसके परिवार को कौन खिलायेगा..

कौन कब समझेगा आमआदमी की तकलीफ को जो वो बयान भी नहीं कर सकता,
अपने दर्द को, अपनी जरूरतों को,
मशगूल है अपने रोज़ी की चिंता में जी रहा है अनिश्चित आने वाले समय की राह ताकते...


Tuesday, March 13, 2012

आप मानते रहिए मुसलमानों को वोट बैंक

नवभारत टाइम्स में मेरा यह लेख आज (13 मार्च 2012) को प्रकाशित हो चुका है। इस ब्लॉग के नियमित पाठकों के लिए उसे यहां भी पेश किया जा रहा है। लेकिन यहां मैं एक विडियो दे रहा हूं जो मुस्लिम वोटरों से बातचीत के बाद विशेष रिपोर्ट के तौर पर आईबीएन लाइव पर करीब एक महीने पहले दी गई थी। अगर कांग्रेस पार्टी के पॉलिसीमेकर्स ने इसे देखा होता तो शायद वे खुद को सुधार सकते थे....


पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। इनमें से यूपी के चुनाव नतीजों पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है और उसके केंद्र में हैं मुस्लिम वोटर (Muslim Voter)। मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को देखते हुए चुनाव अभियान से बहुत पहले और प्रचार के दौरान सभी पार्टियों का फोकस मुस्लिम वोटर ही था। 
मुस्लिम वोटों को बांटने के लिए रातोंरात कई मुस्लिम पार्टियां खड़ी कर दी गईं। माहौल ऐसा बनाया गया अगर मुसलमान कांग्रेस, बीएसपी, समाजवादी पार्टी (एसपी) को वोट न देना चाहें तो उसके पास मुस्लिम पार्टियों का विकल्प मौजूद है। हर पार्टी का एक ही अजेंडा था कि या तो मुस्लिम वोट उसकी पार्टी को मिले या फिर वह इतना बंट जाए कि किसी को उसका फायदा न मिले। लेकिन इसके साथ ही तमाम राजनीतिक दल मुस्लिम वोटरों से एक हास्यास्पद अपील भी कर रहे थे कि वे किसी पार्टी का वोट बैंक न बनें। 

इसके बरक्स बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती यूपी के हर जिले में कुछ खानकाहों के सज्जदानशीनों को लेकर दलित-मुस्लिम सम्मेलन कर रही थीं तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह किसी तरह से आजम खान की मान-मनोव्वल कर उन्हें पार्टी में ला चुके थे।...और दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस व बीजेपी, वे भी पीछे नहीं थीं। 30 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में आरएसएस ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बैनर तले एक सम्मलेन आयोजित किया। इसमें पूर्व संघ प्रमुख के. सी. सुदर्शन के अलावा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) के उपाध्यक्ष व प्रमुख शिया धर्म गुरु मौलाना कल्बे सादिक ने हिस्सा लिया था। सम्मेलन के बाद दोनों ने एक बयान जारी किया कि मुसलमान किसी पार्टी का वोट बैंक बनने की बजाय साफ सुथरी छवि वाले प्रत्याशियों को वोट दें। कांग्रेस के भी कई दरबारी सक्रिय थे जो कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी के बटला हाउस एनकाउंटर पर रोने से लेकर मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण की टॉफी बांट रहे थे। 

...लेकिन अगर कोई चुप था तो वह यूपी का मुस्लिम वोटर था। वह सुदर्शन और कल्बे सादिक के बयान के पीछे छिपी हुई इबारत को आसानी से पढ़ पा रहा था। उसे कांग्रेसी दरबारियों के राग-अलाप की भी समझ थी। वह एक बार फिर खुद को वोट बैंक कहलवाने को तो तैयार था लेकिन धोखा खाने को नहीं। यूपी के नतीजे आए तो उसने इस बार वहां की विधानसभा में पिछले चुनाव (2007) के मुकाबले 69 मुस्लिमों को भेज दिया। 2007 में यह तादाद 56 थी। इस बार इसमें समाजवादी पार्टी का शेयर 43, बीएसपी का 16, कांग्रेस 4, पीस पार्टी 3, कौमी एकता दल 2 व इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल का 1 विधायक है। यूपी में कुल आबादी के मुकाबले मुस्लिम आबादी 18.50 फीसदी है और इस बार यूपी विधानसभा की 403 सीटों में उसका शेयर 17.12 फीसदी है। यानी आबादी के लिहाज से यह शेयर काफी करीब है। 

इस चुनाव में तमाम तथाकथित मुस्लिम पार्टियों को मुसलमानों ने बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया है। मुसलमान वोटर को बेशक कोई भी पार्टी वोट बैंक मानती रहे लेकिन उसने इस बार फिर साबित किया है कि अगर वह वाकई वोट बैंक होते तो उन्हें मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को वोट देना चाहिए था। लेकिन सिर्फ यूपी का ही नहीं इस देश का मुसलमान बार-बार इन पार्टियों को तो छोड़िए, मुस्लिम राजनीति करने वाली सबसे पुरानी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग तक को बार-बार रिजेक्ट करता रहा है, वरना वह आज भारतीय मुसलमानों की बहुत बड़ी पार्टी होती। यूपी चुनाव से पहले जिस तरह रातोंरात कई नए मुस्लिम राजनीतिक दल बने या पैसा देकर बनाए गए, उन्हें इन नतीजों से जरूर सदमा लगा होगा। मुस्लिम वोटर ने इस कदम को न तो पसंद किया और न ही इसके हक में फैसला सुनाया। हालांकि यूपी के नतीजों पर बहुत ही कम नोटिस की गई एक टिप्पणी एक टीवी चैनल पर सुनाई दी कि मुसलमानों ने यह प्रोटेक्शन वोट (Protection Vote) दिया है। 

ऐसी टिप्पणी करने वाले भूल गए कि जब तमाम राजनीतिक दल ओबीसी और अन्य फैक्टर देखकर ही टिकट बांटते हैं तो फिर मुसलमानों को आप वोट बैंक न बनने या किसी एक पार्टी का साथ न देने की पैरोकारी क्यों करते हैं। अगर कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी की ओबीसी पॉलिटिक्स (OBC Politics) फेल करने के लिए इंपोर्टेड नेता ला सकती है तो फिर मुसलान वोटर अगर अपनी बेहतरी के लिए मुस्लिम के बजाय हिंदू नेतृत्व वाली पार्टी का दामन थामते हैं तो इसमें बुराई कैसी। 

हालांकि मुलायम-मुसलमान गठजोड़ का पिछला अनुभव कोई अच्छा नहीं रहा है। पिछली बार सत्ता मिलने पर मुलायम मुसलमान को उर्दू अनुवादक तो बना रहे थे लेकिन पीएसी और यूपी पुलिस की भर्तियों में उसे कोई शेयर नहीं दिया जा रहा था। बाकी सरकारी नौकरियां भी किसी और के लिए थीं। तब से हालात और बदले हैं। इस बार मुलायम की ऐसी कोई चालाकी नहीं चलने वाली है। देश और यूपी में युवा वोटर अगर बढे़ हैं तो उनकी तादाद मुसलमानों में भी बढ़ी है। कम से कम मुलायम उसे दोबारा उर्दू अनुवादक बनने का झांसा तो नहीं देंगे खासकर तब जब 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान एक बार फिर अपनी भूमिका निभाने को तैयार बैठा है।

 बेशक आप उसे वोट बैंक कहते रहें लेकिन वह तमाम पॉलिटिक्स के पीछे छिपी इबारत पढ़ना सीख चुका है। मायावती के लिए भी मुस्लिम वोटर ने गुंजाइश रख छोड़ी है, जहां-जहां से मायावती ने ठीकठाक मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए थे, वहां मुस्लिम वोटर ने उसे एसपी के मुकाबले तरजीह दी है। दलित-मुस्लिम गठजोड़ भविष्य में या 2014 में ही नए रूप में आ सकता है, बशर्ते की उसके लिए दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद छोड़कर कुछ कुर्बानी देने को तैयार रहें।
Courtesy : NavBharat Times, March 13, 2012
edited article is also available at this newspaper's website http://nbt.in   


Saturday, March 3, 2012

अरब देशों में आजादी की भूख...जाग चुकी हैः अब्बास खिदर

इराकी मूल के जर्मन लेखक अब्बास खिदर (Iraqi born German Writer Abbas Khider) का भारतीय युवक जैसा दिखना एक तरफ मुसीबत बना तो दूसरी तरफ उसने उन्हें एक पहचान भी दी। डैर फाल्शे इन्डैर (गलत भारतीय) नॉवेल ने उन्हें भारत के करीब ला दिया है। इराक में सद्दाम हुसैन (Saddam Hussain) के शासनकाल में युवा आंदोलनकारियों का नेतृत्व करने की वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया था। सद्दाम ने उनकी हत्या करानी चाही तो उन्होंने सन् 2000 में इराक छोड़ दिया। तमाम अरब, अफ्रीकी मुल्कों से होते हुए स्वीडन जाने की कोशिश में उन्हें जर्मनी की पुलिस ने बॉडर्र पर गिरफ्तार कर लिया। वहां उन्होंने शरण ले ली और वहां पैदा हुआ जर्मन साहित्य को समृद्ध करने वाला एक लेखक। ढेरों अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजे जा चुके अब्बास खिदर ने भारत आने पर सबसे पहला इंटरव्यू मुझे नवभारत टाइम्स के लिए दिया, उनका यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 3 मार्च, 2012 को छपा है। अखबार में आपको इस इंटरव्यू के संपादित अंश मिलेंगे लेकिन यहां आपको उसके असंपादित अंश पढ़ने को मिलेंगे।

अब जबकि इराक से अमेरिकी फौजों (US Army) की वापसी हो चुकी है। आप इराक में हुई तबाही के लिए किसको जिम्मेदार मानते हैं

मैं झूठ नहीं बोलना चाहता और न ही चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहता हूं। हकीकत यह है कि इराक में तबाही के लिए अमेरिका, सद्दाम हुसैन और वहां की पब्लिक बराबर की जिम्मेदार है। इराक में 60 फीसदी शिया, 20 फीसदी सुन्नी और 20 फीसदी अन्य लोग हैं। खुद को इंसान न मानकर और अलग-अलग तबकों में बांटकर देखने से वहां के लोग कमजोर हो गए। इराक में अमेरिका का निजी हित था। वहां पर अमेरिका और सद्दाम दोनों ही लोकतंत्र लाने की बात कर रहे थे जो एक फरेब था। यही वजह है कि इराक में न सिर्फ अमेरिका हारा बल्कि वहां सद्दाम और वहां के लोग भी हारे। लोग अमेरिकी हस्तक्षेप का सही ढंग से विरोध नहीं कर सके।

अमेरिका को किसने मौका दिया। आखिर इसकी कुछ वजह तो होगी
 आप इराक का मैप गौर से देखें। उसके चारों तरफ जो हुकुमतें अलग-अलग देशों में हैं, वे सब के सब तानाशाह हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिका ने सिर्फ इराक में प्रजातंत्र लाने के नाम पर वहां हस्तक्षेप किया और बर्बादी मचाई। उसकी यह कार्रवाई कुछ ऐसी ही हुई कि जैसे किसी मयखाने से कुछ लोगों को उठाकर इमाम बनाने की कोशिश की जाए। यह एक असंभावित विचार था, जिसकी नाकामी भी तय थी। क्योंकि अमेरिका का असली मकसद इराक के संसाधनों पर कब्जा करना था न कि वहां प्रजातंत्र लाना था। बाद की घटनाओं ने इसे साबित भी किया।
 
 
अमेरिका को लेकर सिर्फ इराकी लोगों की ही नहीं बल्कि आम मुसलमानों की भी सोच बदल रही है, इसकी वजह आप क्या मानते हैं
         यह दुर्भाग्यपूर्ण है। अमेरिका को इस बारे में खुद ही विचार करना चाहिए। यह वक्त का कितना बड़ा मजाक है कि विश्व के सबसे विकसित देशों (Developed Countries) के बारे में इराक के आम आदमी के दिल पर ऐसी नफरत की ऐसी लकीर बन चुकी है जो मिटाए से नहीं मिटने वाली। उनके साथ धोखा हुआ है और उन्हें कम से कम अमेरिका से कोई उम्मीद नहीं है। आगे बढ़ने की तमन्ना और एहसास ही इराकियों को अपने दम पर खड़ा कर सकता है।

अरब अपराइजिंग (Arab Uprising) या तमाम अरब मुल्कों में वहां की तानाशाह हुकूमतों के बदलाव को लेकर जो आंदोलन चल रहा है, आप उसे किस नजरिए से देखते हैं

         बदलाव और विकास कभी बाहर से नहीं आता। ऐसी चीजें हमेशा इंसान के अंदर से आती हैं। इस बदलाव की बुनियाद प्यार और क्रांति हो सकते हैं न कि जंग। अब अरब के तमाम देशों में आजादी की असली भूख जाग चुकी है। हमें नतीजे के लिए कुछ इंतजार करना होगा लेकिन यह होकर रहेगा, कोई उसे रोक नहीं सकता। यह आजादी एक्सपोर्ट या इंपोर्ट की हुई नहीं होगी।   

आपकी किताब का नाम गलत हिंदुस्तानी (डैर फाल्शे इन्डेर) क्यों रखा गया
  -जब मैंने अपनी मूल जर्मन पुस्तक का नाम डैर फाल्शे इन्डेर दिया था तो यह अहसास नहीं था कि इन शब्दों का अर्थ कुछ अलग भी निकलेगा या इसका मतलब कुछ अलग भी हो सकता है। यानी जो मैंने सोचा था वह कुछ अलग था और मतलब कुछ और निकला। दरअसल, इराक में जेल से मेरी रिहाई से लेकर लीबिया, सूडान, मिश्र और फिर जर्मनी पहुंचने के दौरान मैंने जो मुसीबतें झेली हैं, उसका ब्योरा इसमें है। मैं जहां भी जाता लोग मुझे भारतीय जैसी शक्ल वाला कहकर चिढ़ाते। मुझे हर जगह यह साबित करना पड़ता था कि मैं असली नहीं बल्कि नकली भारतीय हूं और मूल रूप से इराकी हूं। लोगों द्वारा इस तरह मुझे चिढ़ाया जाना मेरे जेहन में बैठता चला गया। किताब का नाम मैंने रखना चाहा था नकली हिंदुस्तानी लेकिन अनुवादक महोदय ने उसे गलत हिंदुस्तानी लिख मारा। वह गलती अब मशहूर हो गई। मैंने उसे स्वीकार कर लिया।

आप मूल रूप से शिया (Shia-Shiite Muslim) मुसलमान हैं। कर्बला (Karbala), इमाम हुसैन (Imam Hussain), इनके नाना पैगंबर मोहम्मद (Prophet Mohammad) साहब का शिया (Shiites) बहुत आदर करते हैं। आप का इन महान हस्तियों के बारे में क्या विचार है
ये सारे किरदार मेरे लिए और मेरे जैसे मानवीय मूल्यों से सरोकार रखने वाले लोगों के लिए एक हीरो और रोल मॉडल की तरह ही हैं। मैं भी उनका बहुत आदर और सम्मान करता हूं। उनके बलिदान और योगदान सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। लेकिन मैं साफ कर दूं कि मैं कोई धार्मिक शख्स नहीं हूं। मैं सबसे पहले खुद को इंसान मानता हूं। इंसान सारे धर्मों से ऊपर है। मानवता मेरा धर्म है और बिना बॉर्डर वाली दुनिया मेरा घर है।

  

 फारसी, अंग्रेजी बोलने, लिखने के बावजूद जर्मन भाषा में आपने क्यों लिखना शुरू किया

-इराक में अपना वतन छोड़ने के बाद जर्मनी में जब शरण मिली तो वहां खुद को बचाकर और जिंदा रहना ही मेरा मकसद नहीं था। मुझे अपनी पहचान करानी थी जिसमें जर्मन भाषा ही मेरी मदद कर सकती थी। मेरे जर्मन प्रवास का सबसे सुखद पड़ाव वह था जिस दिन जर्मनी के विख्यात भाषाविद ने मेरी पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जर्मनी के मूल लेखक भी इतनी सुंदर जर्मन नहीं लिख सकते।


भारत में पहली बार आने पर कैसा महसूस कर रहे हैं
       अब तो मुझे भी खुद पर शक हो रहा है कि कहीं न कहीं से मैं भारतीय ही हूं। दरअसल मैं एक इराकी पिता और एक जिप्सी मां की संतान हूं। आप जानते हैं कि जिप्सियों का कोई देश या घर नहीं होता। हो सकता है मेरी मां की जड़ें भारत से हों। अब तो भारत का हर कोना मुझे अपना लगता है। रंगकर्मी और लेखक ज्योति संग ने मेरे लिए जो साहित्यिक गोष्ठी रखवाई, उससे इतना उत्साह मिला कि मुझे भारत का मुरीद कर दिया।


यहां के यूथ के बारे में आपकी क्या राय है
मैं तो अभिभूत हूं उन्हें देखकर। एनसीआर एक शहर में मेरी किताब पर बहस हुई और सवाल पूछे गए, वहां सबसे ज्यादा तादाद युवा लोगों की थी। उन्होंने अंत तक मुझे बहुत ही धैर्य से सुना और सवाल पर सवाल पूछे। यहां के यूथ के सवालों की क्वॉलिटी ने मुझे भारतीय युवकों के बारे में अलग राय बनाने को मजबूर किया। आप जर्मनी के किसी शहर को तो छोड़िए बर्लिन जैसी जगह में इतने यूथ नहीं जमा हो सकते जितना मुझे फरीदाबाद की पीपल्सपॉर्लियामेंट में सुनने को पहुंचे। भारतीय यूथ अब भी साहित्य, कला, रंगकर्म से जुड़ा है, यह मेरे एक सुखद एहसास है।

Courtesy : NavBharat Times, March 3, 2012

Monday, February 27, 2012

अमेरिका की हकीकतः गरीब अमेरिका और युद्ध का धंधा


American Realty:  Poor America and War of Business

अमेरिका दरअसल क्या है...एक ऐसा देश जहां दुनिया के हर कोने का बाशिंदा जाना चाहता है। अमेरिका की जो तस्वीर हमारे आपके जेहनों में उभरती है वह एक अति आधुनिक विकसित देश की है। तमाम आर्थिक मंदी (economic crisis) और वहां के बैंकों के डूबने के बावजूद, इराक-अफगानिस्तान में बुरी तरह पिटने या मात खाने के बावजूद वहां की मीडिया अमेरिका (US Media) की अभी भी जो तस्वीर पेश करता है, वह वहां तरक्की, दादागीरी, दूसरे देशों की जबरन मदद करने वाली है।...पर यह मिथक टूट रहा है। भारत और अमेरिकन मीडिया हालांकि चीजों को जबर्दस्त ढंग से छिपाते हैं लेकिन फिर भी कुछ चीजें तो बाहर निकल कर आ ही जाती है।

मेरे पास इधर दो ताजा विडियो क्लिक अमेरिका के ही कुछ जागरूक मित्रों ने यह कहते हुए भेजी कि अमेरिका के बारे में जो मिथ है, उसको इन्हें देखने के बाद दूर कर लीजिए। इसमें एक विडियो तो बीबीसी ने गरीब अमेरिका (Poor America a film by BBC) के नाम से बनाया है जो हमें अमेरिका की असलियत से रूबरू कराता है। दूसरा विडियो क्लास वॉर फिल्म (Class War Films) ने बनाया है। इस विडियो साफ-साफ बताया गया है कि अमेरिका का इरादा क्या है और वह क्या करना चाहता है।

दोनों ही विडियो में जो एक बात साफ दिखाई देती है कि अमेरिका ने पूरी दुनिया में जिस तरक्की या एक लोकतांत्रिक देश की अपनी जो छवि बनाई है, वह एक बहुत बड़ा धोखा है। वह युद्ध का धंधा (War of Business) कर रहा है, वह पूंजीवादी (Capitalism) साम्राज्य को बढ़ाने के लिए तमाम तरह के करतब कर रहा है, अमेरिका के बड़े कॉरपोरेट हाउस और अमेरिकी सेना (US Army) उसमें इसकी मदद कर रहे हैं। बदले में यह गिरोह दूसरे देशों के संसाधनों पर कब्जा करके अपनी तिजौरी भर रहा है। यही उसने इराक में किया, यही उसने अफगानिस्तान-पाकिस्तान में किया, यही वह भारत में दूसरे तरीकों से करने में जुटा है। वह चीजों का ताना-बाना इस ढंग से बुन रहा है कि उसके विरोधी गुट के देश चीन, ईरान, उत्तरी कोरिया, क्यूबा, अर्जेंटीना किसी भी तरह तबाह हो जाएं या उसके झंडे के नीचे आ जाएं। लेकिन ऐसे मंसूबों में कई बार कुछ छोटे देश कोई न कोई रुकावट डाल देते हैं।

इस पोस्ट में अमेरिका के बारे में काफी कुछ कहा और बताया जा सकता है लेकिन उस बात को विस्तार दिए बिना, पेश है दोनों विडियो। आप तय कीजिए, आप कहां खड़े हैं, किसके साथ हैं, जो लोग अमेरिका में आकुपाय वॉल स्ट्रीट जैसा कैंपेन चला रहे हैं, जरा उनसे अपनी तुलना करके देखिए।

अगर भारत के कुछ राजनीतिक दल अमेरिका का समर्थन या विरोध आज भी मजहब के नाम पर करते हैं तो उनके तमाम सवालों के जवाब दोनों विडियो में मिल जाएंगे।  


 




...और यह है गरीब अमेरिका...बीबीसी का विडियो
 








Monday, February 6, 2012

आखिर अमेरिका के लोग क्यों नहीं चाहते हैं ईरान पर हमला

हालांकि ओबामा सरकार इस जनमत के खिलाफ है विदेशी पत्रिकाओं और आनलाइन साइटों के राजनीतिक लेखों पर भारतीय नाममात्र को टिप्पणी करते मिलेंगे। यदा-कदा कोई दक्षिण भारतीय नाम ही देखने को मिलता है। उत्तर भारत के लोगों के नाम तो तलाशने पर भी नहीं मिलते। इधर जब से ईरान (Iran)को अमेरिका (US) और इस्राइल (Israel) चौतरफा घेर रहे हैं (Operation Infinite Justice), तमाम विदेशी अखबारों, पत्रिकाओं और आनलाइन साइटों पर ईरान विरोधी लेखों की बाढ़ आ गई है। इन लेखों का मकसद है कि ईरान को लेकर हर तरह की दहशत फैलाई जाए। (Anglo-American aggression) अमेरिका जैसा देश ऐसे मामलों में किस तरह मीडिया का इस्तेमाल करता है, यह इसका जीता जागता सबूत है। कुछ लेखों पर मैंने टिप्पणियां कीं और संभावित युद्ध का पूरी तरह से विरोध किया। कुछ जगहों पर मेरी टिप्पणियों को छपने दिया गया और कुछ जगहों पर रोक लगा दी गई और कुछ जगहों पर सिर्फ एन इंडियन रीडर लिखकर काम चला लिया गया लेकिन आप यह जानकर हैरान होंगे कि उन टिप्पणियों पर अमेरिकी लोगों ने सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दीं। उनमें से तमाम लोगों ने ओबामा सरकार की ईरान नीति की निंदा की। कुछ ने कहा जब बात अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संभालने की होनी चाहिए, जब बात अमेरिकी बेरोजगारों के लिए नए अवसर पैदा करने की होनी चाहिए तो उस समय ईरान से युद्ध की बात की जा रही है। कुछ टिप्पणियों में कहा गया कि अमेरिका ने अपनी विदेश नीति यहूदियों (इस्राइली) के पास गिरवी रख दी है। कुछ ने कहा कि यह सब ज्यादा से ज्यादा हथियार बेचने और तेल का जबरन संकट खड़ा करने की साजिश के तहत हो रहा है। कुछ ने याद दिलाया कि कैसे इराक में जनसंहार के खतरनाक हथियारों की बात करके उस देश पर अमेरिका ने हमला बोला और उसके संसाधनों पर कब्जा किया। बुश की इस खतरनाक रणनीति की कीमत अमेरिकी फौज को चुकानी पड़ी। उसके कितने ही फौजी वहां विपरीत परिस्थितियों में मारे गए... यह साफ है कि बराक ओबामा (Obama), सीआईए (CIA), पेंटागन (Pentagon), मोस्साद (Mossad)...इस्राइल यह सारे अमेरिकी जनमानस के खिलाफ चल रहे हैं। ये लोग ऐसे मकसद को हासिल करना चाहते हैं जो नापाक तो है ही, आम अमेरिकी भी उसके खिलाफ है। अब भारत का हाल सुनिए। बहुत कम लोगों की दिलचस्पी ईरान-अमेरिका के संभावित युद्ध में है। हालांकि यह बुरा नहीं है लेकिन अगर यह युद्ध हुआ तो भारत की जनता इस मामले में बिना पड़े ही पिसेगी। तेल का संकट खड़ा होगा तो यहां महंगाई को आसमान पर पहुंचना ही है। नौकरियों पर असर पड़ेगा, भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी। पर कोई भी राजनीतिक दल या अन्य संगठन सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाते नहीं दिखते कि सरकार खुलकर अमेरिका का विरोध करे। तेल के आयात के संबंध में सरकार का एक बयान आया लेकिन उसके बाद सरकार की तरफ से अमेरिकी राजनयिकों के सामने सफाई भी पेश की गई। इससे लगता है एशिया महाद्वीप की तमाम हलचलों से जैसे भारत को कोई खास सरोकार नहीं हो। ब्रिटेन के जाने-माने अखबार द गार्डियन में छपे एंड्रयू मुर्रे के एक लेख को पेश कर रहा हूं जिसमें साफ कहा गया है कि ईरान पर अमेरिकी या इस्राइली हमला क्यों रोका जाना जरूरी है। एंड्र्यू मुर्रे का यह लेख उन लाखों-करोड़ों अमेरिकी-ब्रिटिश लोगों की नुमाइंदगी करता है जो ऐसे खून-खराबे के खिलाफ हैं। इस लेख पर गार्डियन में जो टिप्पणियां आई थीं, सारी पढ़ी जाने लायक हैं। अधिकांश लोग इस हमले के खिलाफ हैं। An Attack on Iran Must be Stopped As the US and UK gear up for another senseless war in the Middle East, one thing is certain – it will end in disaster By Andrew Murray The Anglo-American aggression addicts haven't kicked the habit. The team that brought you shock and awe and Operation Infinite Justice is gearing up for yet another crack at winning a senseless war in the Middle East. This time the target is Iran, the pretence the regime's imminent possession of nuclear weapons. But some things will remain the same – it will lead to slaughter and end in disaster. A brief recap of the Anglo-American "war on terror" in the Middle East, 2001 to date: Afghanistan was occupied to "eliminate terrorism" but, many thousands of dead later, terror has spread to Pakistan and beyond, leaving Kabul with the most corrupt government on earth. Iraq was invaded to disarm Saddam of weapons he didn't have. US troops have finally withdrawn, leaving millions dead or displaced and the country broken in dysfunctional sectarian misery. Libya, far from being the war that went well, was bombed to "protect civilians" with the result that 30,000 died and thousands more remain in prison reportedly being tortured by the regime Nato installed. "They couldn't be so crazy" is therefore not an unreasonable response to the speculation about yet another Middle East war. But here we go again. The US national intelligence director James Clapper's unsubstantiated claim that Iran is preparing attacks in the US itself – without even a 45-minute warning, apparently – is one sign among many that the familiar spook-media propaganda coalition is in overdrive again, selling another cock-eyed conflict. An attack against Iran will not stop the regime acquiring nuclear weapons if it wishes to do so. It can only make it more likely that it will decide to acquire them, and will eventually surely succeed. Along the way thousands more will die, conflict will extend across the region, oil supplies will be disrupted and the Iranian regime will be strengthened domestically. Iran is not a liberal democracy. That is an issue which, as the Arab spring shows, is more likely to be addressed by the Iranian people themselves than by a foreign attack sponsored by Saudi Arabia, most recently the butchers of Bahraini democracy. The central case for attacking Iran is animated by the determination that Washington and its allies have the right to dominate the Middle East come what may. That is the argument offered by Matthew Kroenig, until six months ago the Pentagon's special adviser on Iran, in an article in Foreign Affairs baldly titled Time to Attack Iran: "A nuclear-armed Iran would immediately limit US freedom of action in the Middle East … Iran could threaten any US political or military initiative in the Middle East with nuclear war, forcing Washington to think twice before acting in the region." The pragmatic case against war is overwhelming. But the principled case is even stronger. Britain and the US have launched a series of wars across the Middle East for no better purpose than maintaining their control over a region whose peoples they dare not allow to be self-governing and independent. Can an attack be stopped? If Britain can be detached that would help derail the war drive. Five British warships sail alongside the US navy in the Gulf, and we can be sure that Diego Garcia will be a base for the bombing onslaught – it was ethnically cleansed by the Wilson government for precisely this sort of purpose. William Hague has made plain government support for US policy so far. The delight of the Commons exchanges on the issue was Jack Straw, whose only contribution to diplomacy was marketing the novel concept of the "unreasonable UN veto" at the time of the Iraq aggression, insisting that Britain should not act without clear UN authority now. Millions of British people peacefully and democratically opposed the Iraq war and were ignored by Tony Blair. He got his war but lost his political momentum, reputation and job, in that order, as a result. Today's anti-war campaign must learn from the Occupy movement and UK Uncut, as well as breaking that bipartisan parliamentary consensus for war which proved so calamitous in 2003, if the cycle of war is to end. A nationwide day of action on Saturday 11 February against attacking Iran is the start. (courtesy : The Guardian)