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Saturday, February 11, 2012

एक ख्वाब ले आया मुझे भारत की दहलीज पर

 बैले नृत्य से कोई कैसे खुद को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की शैली में ढाल लेता है यह कोई लुइस मारिया चबुशनिग से सीखे। उन्हें हाल ही में एक प्रतिष्ठित भारतीय पुरस्कार एकलव्य से नवाजा गया है। इटली में पैदा हुई और जर्मनी के थिएटर ग्रुप से लंबे वक्त जुड़ी रही मारिया को कुचिपुड़ी का इंटरनैशनल एंबेसडर बनाया गया है। पेश है उनका इंटरव्यू...यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 11 फरवरी, 2012 को छपा है। अंग्रेजी में पढ़ने वाले पाठकों के लिए उसके अंश भी नीचे दिए जा रहे हैं। मूल इंटरव्यू अंग्रेजी में ही है, हिंदी में उसका संपादित अंश है...

क्या आपको लगा था कि एक दिन भारत से आपको एकलव्य पुरस्कार लेने का बुलावा आएगा। आपके नृत्य की यात्रा इटली से शुरू होकर पेरिस, जर्मनी, अमेरिका और फिर भारत पहुंची। आप इस बारे में कुछ बताइए

कुचीपुड़ी नृत्य में एक मुकाम हासिल करना मेरा एक ख्वाब था, उसी ख्वाब का पीछा करते-करते मैं यहां तक पहुंची। नृत्य किसी एक देश की जबान या भाषा नहीं है, यह वैश्विक भाषा है, इसके जरिए अगर मैं अपना संदेश रत्तीभर भी पहुंचा सकी तो यही मेरा मकसद है। यूरोप में अपने प्रशिक्षण के दौरान कदम-कदम पर मैंने वह प्रयोग किए जो भारत की अपनी विशेषता है, चाहे वह जिंदगी जीने का तरीका हो या नृत्य की शैली हो। कभी नहीं सोचा था कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य में मेरा जुनून मुझे एकलव्य पुरस्कार दिलाएगा। लेकिन 7 जनवरी को जब यह मिला तो लगा कि मैं कोई सपना तो नहीं देख रही।  

 चार साल की उम्र में आपको सिर्फ पश्चिमी बैले के बारे में मालूम था। जर्मनी के बयरुथ बरीक थिएटर के बाद फिर आप अचानक कुचिपुड़ी की ओर कैसे मुड़ गईं

जब मैं 7 साल की थी, तभी से भारत मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया और अचानक एक दिन यहां के शास्त्रीय नृत्य ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। जब सन् 2000 में मैं यहां आई तो मैं एक पूर्ण बैले डांसर बन चुकी थी पर इसके बाद मैं भारतीय परफॉर्मिंग आर्ट की विरासत के मोह में फंसती चली गई। तब तक मुझे नहीं पता था कि मुझे कौन सा नृत्य सीखना चाहिए और कौन सा नहीं। संयोग से कुचीपुडी परंपरा की एक डांस गुरु से मुलाकात हुई, मैं उन्हें बता ही नहीं पाई कि दरअसल मुझे उनसे क्या सीखना है। वह जैसा मुझे बताती रहीं, मैं वैसा ही करती रही।

भारत के शास्त्रीय नृत्य और संगीत के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा पर क्या सोचती हैं
 
इस सवाल के जवाब से कई विवाद उठ खड़े होंगे। मुझे पक्की तौर पर यह भी पता है कि कुछ लोग मेरे जवाब से नाखुश भी होंगे। बहरहाल अब जो भी हो। मेरी नृत्य शिक्षा पूरी तौर पर गुरु-शिष्य परंपरा के तहत ही हुई है। मेरा सौभाग्य रहा कि पूरे होशो-हवास में मैंने इसे चुना और कम से कम मेरे मामले में तो परंपरा को ही कामयाबी मिली। लेकिन क्या ऐसी कामयाबी हमेशा मिला करती है। या सिर्फ यही सफलता का मूलमंत्र है। और अगर हां तो इसकी कीमत क्या है। मुझे प्लीज आप एक यूरोपियन की नजर से न देखें। परंपरा में तमाम तरह के प्रतिबंध, कड़ा अनुशासन, तमाम तरह की शर्ते रहती हैं और इससे कहीं न कहीं जिस टैलंट को कुदरती आगे बढ़ना चाहिए वह मुरझा जाता है। इसलिए मुझे तो एक मिक्स सिस्टम पसंद है, जहां परंपरा भी हो और आपके टैलंट को आगे बढने दिया जाए।  

किन भारतीय कलाकारों ने ज्यादा प्रभावित किया

मैं अपनी गुरु चित्रांगी उपमाह मैडम से बहुत प्रभावित हूं। मेरी जिंदगी पर उनकी छवि का बहुत असर है। उनके साथ-साथ मल्लिका साराभाई, स्वपन सुंदरी, नाहिद सिद्दीकी और पारुल शाह ने मुझे नृत्य में एक विजन दिया। विद्वानों में मुझे कपिला वात्सायन के अलावा किसी की जरूरत नहीं पड़ी।  

आप भारतीय नृत्य को सिर्फ परफॉर्मिंग आर्ट मानती हैं या कुछ और

मैं अक्सर कहती हूं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य को सिर्फ परफॉर्मिंग आर्ट न समझा जाए। क्यों कि यह इससे भी बेशकीमती है। तमाम लेवल खुद को अभिव्यक्त करने का यह एक रास्ता है, एक उत्तर है और एक अलग तरह की सवारी है।  

भारत को लेकर कोई फ्यूतर प्लान

भविष्य के हिसाब से मेरे लिए 2012 में भारत में करने को बहुत कुछ है। एक बैले अकादमी से यहां मैं जुड़ने वाली हूं। ताजमहल पर मेरी एक नृत्य नाटिका तैयार हो रही है। इसमें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इसके लिए डागर बंधुओं से बात की गई है।  

भारत के युवाओं के बारे में क्या सोचती हैं

भारतीय युवा सबसे अलग और दुनिया के सबसे काबिल दिमाग वाले हैं। भारत की चमकती तस्वीर के असली हीरो वही हैं। लेकिन अब उनके लिए सबसे मुश्किल दौर आ रहा है। उन्हें पश्चिमी और अमेरिकी संस्कृति के जाल में फंसाया जा रहा है।ये हालात उनकी मौलिकता को खत्म कर सकते हैं और उन्हें अपने कल्चर का गुलाम बना सकते हैं। उससे बचना होगा। पश्चिम की कुछ चीजें अच्छी हैं लेकिन वहां खराब चीजों की तादाद ज्यादा है।

(Courtesy: Nav Bharat Times Dated Feb. 11, 2012)
(साभारः नवभारत टाइम्स 11 फरवरी 2012)  

Louise Maria Tschabuschnig’s Interview in english  

Do you ever dream about this Akleyaya award? Because your journey for dance from Itlay to Paris, then Germany and now US and India….a lot of struggle and achievements. How you will elaborate this in your words?

Well, I have always been nurturing ambitious dreams about my dance, thinking that through this wonderful, universal language I could have spread somehow, a message… During my training, in Europe I build up my background which culminates with the unique experience of life in India, I have enriched my path at every step and phase with incomparable teachings dreaming, of course, that one day my dedication towards Indian Classical Dance would receive the right and bright answer… And Aekalavya Award nomination came, and last Jan 7th the Award itself, in the bright, renown frame of Orissa …

At age of 4 your introduction was just to western ballet, then you your first debut in Bayreuth Baroque Theatre (Germany ), how you turned to our Kuchipudi

India is part of my life since the age of seven years old when suddenly the interest for this world raised up in my mind, better I should say in my heart. Was an accomplished Ballet dancer when I came here for the first time, in year 2000 and got deeply fascinated by Indian Performing Arts heritage. . Again dance is the one who chose me according to a kind of predestinated design: few months later I accidentally met the person who was going to be my dance Guru, belonging to Kuchipudi tradition. I did not even enquire about what style I wanted to learn, I just knew that it was my dance and she was my guide.  

How you rate our Guru-Shishya Prampra (Guru-Pupil Tradition) ? if it really works ?

This question opens a very controversial matter and I am sure I will make someone unhappy with my answer… Whatever the case, I was educated in a pure Guru-Shishya Prampra system but I have been very lucky and for many aspect privileged… as I was already adult enough to chose, to accept, to understand … and yes, in this case, in my case, the tradition worked successfully … Is it always a success? Or has it always been a success? And, if yes, at what price? I mean at a very personal, human, psychological and, after all, even artistic level ? I am not very sure… and I don’t say it not with the European eye of an intellectual turist… Restrictions, impositions, severe discipline do not match, according to me to the natural flourishing of a talent, of a personality… so I would prefer a mixed system where the traditional way happens later, as a special upgrading training after graduation, maybe, not in tender age.  

Which Indian artist inspired you more?

My Guru, Chitrangee Uppamah Madam inspired me a lot, in dance and in life, with her Mallika Sarabhai, Swapna Sundari, but also Nahid Siddiqui and Parul Shah, to whom I owe part of my vision about dance, and, in the field of scholars, one for all: Kapila Vatsyayan.

What is your concept about Indian Dance? I remember, you often say that Indian Dance should not be considered as performing art?

I often say that Indian Classical Dance should not be considered ONLY a performing art because it is much more… it is a path, it is an answer, it is a unique vehicle of expression at many different levels…  

 What you think about Indian Youth?

Indian Youth is wonderful and among the most brilliant in the world. It is the shiny future of this country. I was invited just few days ago in a renown kathak kshetra in Jaipur, to meet the students and their dedication, their purity, their enthusiasm, brought tears of joy to my eyes… But this Youth it is also facing a crucial juncture: westernization and Americanization which captivate their mind with new values and new challenge, not always meaningful. They will face hard times and hard choices and it is our role and our duty, as good elder brothers and sister to support them in understanding who they are, from which culture are coming from and where to go. Only in this way they will understand that the time has come to build up a true” Indian Dream” .  

What are your next assignments in India? Any new project for 2012?
 
Well, yes… 2012 is going to be a very important year: my future projects are largely concerning India and are very ambitious. First of all I have been asked to join Avra Group’s Entertainment Company, in order to give birth, together, to something called Indo Italian Opera House, a structure fully dedicated to music, dance and ballet where the activity of seasonal events and performances will merge with a high educational program linked to a Ballet Academy.

The IIOH will be on stages next September with a production dedicated to one of the pillars of Hindustani Classical Music, the legendary Dagar lineage, and will close the year with a Grand Ballet consecrated to the immaculate glory of India, the Taj Mahal… For more than ten years India has been nurturing my soul, my spirit and my creativity with never ending inspiration… now its time to give something back… but to tell this chapter I will need another interview…!

2 comments:

Ek ziddi dhun said...

अनुमित के बिना फेसबुक पर उठा लिया है मित्र।

कविता रावत said...

sach koi n koi khwab har insan ke dil mein palta hai..