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Thursday, March 7, 2013

गुंडे कैसे बन जाते हैं राजा


मेरे मोबाइल पर यूपी से कॉल आमतौर पर दोस्तों या रिश्तेदारों की ही आती है लेकिन इधर दो दिनों से  कुंडा (प्रतापगढ़) में डीएसपी जिया-उल-हक की हत्या के बाद ऐसे लोगों की कॉल आई जो या तो सियासी लोग हैं या ऐसे मुसलमान जिनका किसी संगठन या पॉलिटिक्स (Politics) से कोई मतलब नहीं है। ये लोग यूपी के सीएम अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव को जी भरकर गालियां दे रहे थे। मैं हैरान था कि ये वे लोग हैं जो समाजवादी पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर लाए थे और अखिलेश के चुनावी वादे लैपटॉप-टैबलेट (Laptop-Tablate) और बेरोजगारी भत्ते के हसीन सपनों में खोए हुए थे। मैं जब पिछली बार फैजाबाद में था तो इनमें से कुछ लोग मोहल्ले और पड़ोस की लिस्ट बनाने में जुटे थे और हिसाब लगा रहे थे कि किसको नेताजी से लैपटॉप दिलवाना है और किसको मुफ्त का भत्ता दिलाना है।
...लेकिन भत्ता तो नहीं लेकिन अखिलेश और उनके प्रशासन ने यूपी के मुसलमानों को ऐसी टैबलेट दी है कि जिसे वे न तो निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। कुंडा में डीएसपी की हत्या के बाद टांडा में हिंदू-मुस्लिम दंगे के बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा। बरेली के लोगों का ऐसा कोई दिन गुजरता जब वहां किसी तरह की टेंशन न होती हो, यही हाल मुरादाबाद, रामपुर, मेरठ वगैरह का है। पुलिस को पूरी छूट है और समाजवादी पार्टी के नेता मरहम लगाने के नाम पर भय फैलाते हैं। अभी तक अखिलेश के लगभग एक साल के कार्यकाल में एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर दंगे हो चुके हैं। राज्य के 16-17 जिले इतने संवेदनशील हैं कि हर समय हाई अलर्ट पर रहते हैं।

ऐसा यूपी में पहली बार नहीं हुआ। यूपी के मुसलमानों ने जब-जब मुलायम को आंख बंद करके वोट डाला, उसे उनकी पार्टी ने टेकन फॉर ग्रांटेड लिया। मेरे एक पूर्व सपाई मित्र ने फोन पर लगभग चिल्लाने की आवाज में कहा कि आप मायावती जी के पिछले 5 साल का शासन देख लें, रिपोर्ट मंगा लें कहीं न तो दंगा हुआ और न ही पुलिस या लोकल गुंडों ने किसी भी शहर में मुसलमानों को दबाने की कोशिश की। लेकिन मुलायम ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा। हमें तो मायावती की वही सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) वापस चाहिए। मैंने उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव तक फिर से इस बात पर विचार करने को कहा...हो सकता है कि तब तक उन जैसे मुसलमानों का दिल मुलायम को लेकर फिर से पिघल जाए।

दरअसल, यूपी के मुसलमानों की हताशा का सबब कुछ और है। फैजाबाद,  बरेली, टांडा, मुरादाबाद, मेरठ, रामपुर या कहीं और हो रहे दंगों या मुसलमान बनाम पुलिस के आपसी संघर्ष के बाद उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस और बीएसपी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए समाजवादी पार्टी के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ देंगे और मुलायम व अखिलेश घुटने टेकते हुए दोबारा उनके पास आएंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही है कि यूपी में वह अपनी सियासत को किस डिटर्जेंट पाउडर से धोकर चमकाए। बीएसपी सुप्रीमो मायावती का गिला यह है कि इतना सब करने के बावजूद पिछले चुनाव में मुसलमानों ने उन्हें खुलकर वोट नहीं दिया। इसलिए वह चाहती हैं कि यूपी के मुसलमान थोड़ा और पिट-पिटा लें तो वो सड़कों पर आकर आंदोलन छेड़ेंगी। यह हकीकत है कि यूपी का मुसलमान दोराहे पर खड़ा है, मुलायम से उसका मोह भंग होना शुरू हो चुका है, कांग्रेस अकेले दम पर बीजेपी को हरा नहीं पाएगी, बीएसपी फिलहाल बहुत आक्रामक मुद्रा में नजर नहीं आ रही है। बीएसपी के एक बड़े मुस्लिम नेता से जब मैंने लखनऊ फोन कर इस हिचकिचाहट का राज जानना चाहा तो उसने कहा कि हम इन पर भरोसा नहीं कर सकते। पिछली बार इनके पास दलित-मुस्लिम गठजोड़ का विकल्प था लेकिन इन लोगों ने खुलकर साथ नहीं दिया। हम इनके लिए क्यों सड़कों पर आएं। अगले लोकसभा चुनाव की गारंटी में भी इनका हमारे साथ आने का भरोसा नहीं है। 

...और वो मुलायम सिंह यादव की छाया में बाबरी मस्जिद आंदोलन चलाने वाले आजम खान कहां गए। खबर मिल रही है कि ये मुस्लिम नेता जी रामपुर में सरकार की मदद से कोई यूनिवर्सिटी खड़ी कर रहे हैं और आजकल उनका अंदाजा गोया इस तरह का है जैसे वो ही भारत के अगले सर सैयद अहमद हैं। अखिलेश की कृपा तले दबे चल रहे इस कथित मुस्लिम नेता फिर कोई कैसे उनके पुराने बयानों की तर्ज पर नए बयानों की उम्मीद कर सकता है। हैरानी है कि अखिलेश यादव के सीएम बनने के बाद इस शख्स ने जो नाराजगी दिखाई वो यह थी कि उन्हें अच्छा विभाग क्यों नहीं दिया। लेकिन यह साहब उस आदमी (रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया) का विरोध नहीं कर सके जो निर्दलीय चुनाव जीतकर आया था, समाजवादी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलने के बावजूद उसे मंत्री बनाया गया। आखिर ऐसा क्या था कि इस तथाकथित राजा को मंत्री बनाना जरूरी था। यह वही राजा है जिसे मायावती ने पूरे शासनकाल के दौरान जेल में रखा और इसकी हवेली को जहन्नुम बना दिया। शायद कुछ लोगों को याद होगा कि कुंडा में इसके तालाब से नरकंकाल बरामद हुआ था। बॉलिवुड फिल्मों में जिस तरह किसी डॉन का ठिकाना दिखाया जाता है, कुछ उसी अंदाज में रहता है यह राजा।

आईपीएस अरुण कुमार को मैं तब से जानता हूं जब उन्होंने पश्चिमी यूपी के कई शहरों में रहते हुए अपनी जांबाजी के जौहर दिखाए, टास्क फोर्स में नाम कमाया, सीबीआई में अच्छी सफलताएं हासिल कीं लेकिन अभी दो दिन पहले इन महोदय ने लखनऊ में प्रेसकॉन्फ्रेंस में अपनी जो बेबसी दिखाई, उससे मुझे बड़ा झटका लगा। बतौर अडिशनल डीजी (कानून व्यवस्था) इन्होंने पत्रकारों से कहा कि राजा भैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है, कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है। कोई चश्मदीद तक नहीं मिल रहा।...आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नेताओं की नकेल कसने के लिए सचमुच बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है, और जब कोई कसता है तो वह जिया-उल-हक की तरह शहीद हो जाता है। 
 
बहरहाल, चुनाव 2014 आते-आते कुंडा के जख्म नहीं भरेंगे। अखिलेश और मुलायम कोशिश में जुटे हैं लेकिन इस बार यह कोशिश कामयाब नहीं होगी। कहते हैं कि भारत में जनता की याददाश्त कमजोर होती है और वह भूल जाया करती है। नेता इसी का फायदा उठाते आए हैं लेकिन मेरी समझ कहती है कि ऐसा नहीं है। कुछ न कुछ नतीजा जरूर निकलेगा। चाहे वो चुनाव के मद्देनजर नए समीकरण के रूप में ही क्यों न निकले। अगले लेख में हम लोग इस समीकरण पर बात कर सकते हैं।

कौन है राजा भैया - इस शख्स पर लगभग 50 क्रिमिनल केस हैं। मायावती के 5 साल के कार्यकाल में यह शख्स लगभग जेल में रहा। मायावती ने ही इस पर पोटा लगाया था। इसके तालाब से नरकंकाल बरामद हुआ था। 2007 में यूपी पुलिस के डीएसपी रामशिरोमणि पांडे की संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। उसमें भी साजिश का आरोप इसी पर है। बीजेपी के शासनकाल में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से भी इस शख्स के मधुर संबंध रहे हैं। 

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के पोर्टल  http://nbt.in  के ब्लॉग सेक्शन में भी उपलब्ध है।