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Thursday, July 22, 2010

आइए मिलबांटकर खाएं

क्या आप मिलबांटकर खाने में यकीन रखते हैं। नहीं रखते तो समझिए आपकी जिंदगी बेमानी है। हो सकता है आपकी मुलाकात मिलबांटकर खाने वालों के गिरोह से हुई हो। चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से। कोई ताज्जुब नहीं कि आप भी इसमें शामिल रहे हों। क्योंकि मैं भी तो इसमें शामिल हूं। मैं कैसे मान लूं कि मेरे अलावा बाकी सारे या आप ही राजा हरिश्चंद्र की औलाद हैं और मिलबांटकर खाने में यकीन नहीं रखते।

अगर आपने मिलबांटकर खाना शुरू नहीं किया है तो शुरू कर दें। अब भी समय है। हालांकि कई लोग चुपचाप इस काम को अंजाम देना चाहते हैं लेकिन समयचक्र बदल चुका है। अगर आपके मिलबांटकर खाने की बात सार्वजनिक नहीं हुई है तो भी मुश्किल में पड़ेंगे। जरा अपने दफ्तर के माहौल को याद कीजिए। जो अफसर या बाबू राजा हरिश्चंद्र की औलाद बनने की कोशिश करता है बड़े अफसर या बड़े बाबू के तमाम गुर्गे उसका मुर्गा बनाकर खा जाते हैं। वह अजीब सी मुद्रा लिए दफ्तर में आता है और शाम को उसी तरह विदा हो जाता है। सारे काम का बोझ उसी पर रहता है। जो लोग मिलबांटकर खाने वाले गिरोह में शामिल होते हैं वे सुबह-दोपहर-शाम रोजाना मिलबांटकर कहकहे लगा रहे होते हैं। उनके बदन से किसी महंगे इत्र की खुशबू आ रही होती है या फिर ब्रैंडेड कपड़ों (Branded Cloths) से चाल-ढाल बदली हुई होगी।

आप कहेंगे जमाना बदल चुका है। नई पीढ़ी टेक सैवी (Tech Savvy ) है। वह जितना कमाती है, उससे ज्यादा खर्च करने में यकीन रखती है। ब्रैंडेड वस्तुएं उसके रोम-रोम में बसी हुई होती हैं। आप सही कह रहे हैं लेकिन वह तो मिलबांटकर खाने वालों के ही साम्राज्य की पैदाइश है न। मल्टीनैशनल कंपनियां (MNC) हों या फिर इंडियन मल्टीनैशनल (India MNC) हों। कहां नहीं है ऐसे लोगों का गिरोह। हां उसे नाम बदलकर थोड़ा सम्मान के साथ इस तरह भी कह सकते हैं – मिलबांटकर खाने वालों का कॉरपोरेट वर्ल्ड (Corporate World)। वह सीधे कॉलेज-यूनिवर्सिटी से लड़के-लड़कियों को सेलेक्ट कर अपने गिरोह में शामिल करता है। उन्हें पहले तो कॉरपोरेट कल्चर (Corporate Culture) और इस देश के बाकी कल्चर का अंतर समझाया जाता है। फिर उसे मैदान में उतारा जाता है। अब अगर वह कॉलसेंटर (Call Centre) की टंटपुंजिया नौकरी में नहीं है और साफ्टवेयर (Software) बनाने के काम में लगाया गया है तो उसे बताया जाता है कि इन्फोसिस (Infoysis)कंपनी का साफ्टवेयर उड़ाकर क्लोन करना है और उसमें दो नई कमांड देकर उसे आईबीएम (IBM) का बना देना है। यह इसका उल्टा भी हो सकता है यानी आईबीएम का उड़ाकर इन्फोसिस का बना देना। सत्यम (Satyam) का किसी में मत लगाना, किसी दबे पड़े स्कैम (Scam) में फंसने का जोखिम हो सकता है।

यह गिरोह सिर्फ आईटी कंपनी तक ही सीमित नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में उसका दखल है। मीडिया (Media) को ही ले लीजिए। वह किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे की खबर सीधे उसके पैड पर छापने के लिए तैयार नहीं है। हां उसी नत्थू खैरे ने अगर किसी पीआर कंपनी (PR CO.) को हायर कर लिया है और उस पीआर कंपनी की बाला उस प्रेसनोट को लेकर मीडिया हाउस तक पहुंच जाती है तो खबर बनकर रहेगी। क्योंकि नत्थूखैरे की ब्रैंड वैल्यू वह पीआर कंपनी तय करती है।...बाबू पेड न्यूज (Paid News) का जमाना है। हर चीज स्पांसर है। कान चाहे जैसे पकड़ो।
मिलबांटकर खाने वाले कॉरपोरेट ने ऐसी पीढ़ी की आंख में धूल झोंकने के लिए नया दे दिया है वर्क अल्कोहिलक (Work Alcoholic ) । यानी वह शराब बेशक न पीता हो लेकिन उसे बड़े प्यार से काम के बोझ की शराब पिलाई जाती है। बेचारे एक टेक सैवी के बारे में पिछले दिनों खबर आई कि पिज्जा कल्चर (Pizza Culture) ने उन्हें कैसे कैंसर (Cancer) के कगार पर पहुंचा दिया। अब इस शनीचर को खबर आई कि वह चल बसे। पूरे श्मशान घाट में सिर्फ और सिर्फ उनके वर्क अल्कोहलिक होने की चर्चा रही।

ऐसा नहीं है कि मिलबांटकर खाने वाले कॉरपोरेट ने इनके मनोरंजन के लिए कोई इंतजाम नहीं किया। उसने इनके आसपास ऐसा माहौल बनाया कि यह लोग सिर्फ और सिर्फ खाने-पीने के बारे में बातें करें। उसे सुबह-सुबह टीवी पर मौर्या शेरटन होटल में नाश्ता परोसने का दृश्य दिखाने से लेकर अखबार में चांदनी चौक में फुटपाथ पर बेचने वाले राधेश्याम की थर्ड क्लास कचौड़ी तक के बारे में बताया जाता है। इससे भी बात नहीं बनी तो उसे थाईलैंड से लेकर ऊंटी तक के देशाटन पैकेज के बारे में बताया जाता है। उसे बताया जाता है कि यह पैकेज सिर्फ वर्क अल्कोहलिक लोगों के लिए है क्योंकि जो वेतन उन्हें मिलता है, सिर्फ वे ही इसे अफोर्ड कर सकते हैं। बाकी लोग पतली गली से निकल लें। यानी राजा हरिश्चंद्र की औलादों के बारे में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है।

हो सकता है कि आप के पास यक्ष प्रश्न हो। कैसे खाएं...मेरे पास तो मौका ही नहीं है। भई ऐसे लोग उस कहानी को क्यों नहीं याद करते जिसकी ड्यूटी समुद्र के किनारे लहरें गिनने की थी और उसने उसमें भी जुगाड़ तलाश लिया था। वह उसी मछुआरे को लहरों की सही गिनती बताता था जो मछुआरा उसे दो मछली देने का वादा करता। इस तरह वह एक-दो किलो मछली का जुगाड़ कर लेता और बाजार में बेच देता था। कैश जेब में। बस, मेरे पास तो इसी तरह की गैरपंचतंत्र वाली कहानियां हैं भइये, इसी में से मिलबांटकर खाने का जुगाड़ तलाश लो। शेष वीरूभाई अंबानी की औलादों से पूछ लो।

Tuesday, July 13, 2010

पहले फतवा...बाकी बातें बाद में


भारत में इस्लाम को भी समसामयिक बनाने के प्रयास जारी हैं, लेकिन चर्चा सिर्फ फतवों पर हो रही है

उदाहरण नं. 1 - टाइम्स ऑफ इंडिया में 21 जून को एक खबर थी कि सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी है।

उदाहरण नं. 2- नवभारत टाइम्स में 19 जून को खबर छपी कि यूपी मदरसा बोर्ड ने अपने पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए अब अंग्रेजी, हिंदी और कंप्यूटर की पढ़ाई अनिवार्य कर दी है।

इन दोनों उदाहरणों में मौजूद खबरें अखबारों में वह जगह नहीं बना सकीं जितनी जगह आम तौर पर फतवे पा लेते हैं। इनके बरक्स पिछले दिनों दारुल उलूम देवबंद (Darul Uloom Deoband) के विवादित फतवों की खबरें तमाम अखबारों में गैरजरूरी जगह पाती रहीं। इन फतवों पर अपनी बाइट देने के लिए टीवी चैनलों पर कुछ स्वयंभू मौलाना-मौलवी और विशेषज्ञ भी रातोंरात पैदा हो गए। अप्रैल और मई महीने में फतवों का ऐसा दौर चला कि लगा जैसे उलेमाओं के पास फतवा देने के अलावा और कोई काम ही नहीं है, हालांकि इस बार मुसलमानों का एक बहुत बड़ा वर्ग इन फतवों पर चल रही बहस को देखकर कसमसा रहा था।

बाइट और बतंगड़
हाल ही में सुन्नी मुसलमानों की बरेलवी विचारधारा (Sunni Bareillyavi Sect) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खां ने उनकी इस कसमसाहट को सामने रखा। उनका कहना है कि मीडिया, खासकर टीवी चैनल वही बात उठाते हैं जिसे उनको बाजार में बेचना होता है। उनका संगठन दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी जिस मांग पर धरना दे रहा था, उसे कवर करने के बजाय टीवी चैनल के लोग उनसे फतवों पर बाइट मांग रहे थे। इसी बात को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष और शिया धर्मगुरु (Shia Cleric) मौलाना कल्बे सादिक ने दूसरे ढंग से कहा। उनका कहना है कि तमाम तरह के फतवे जारी करना उन उलेमाओं की बेवकूफी और मीडिया की चालाकी है। उलेमा मीडिया (Media) के जाल में फंस रहे हैं। मीडिया फतवों की आड़ में उलेमा का शोषण करना चाहता है और उलेमा भी इसके लिए तैयार रहते हैं।

इमेज का बंधन
मौलाना तौकीर रजा खां और मौलाना कल्बे सादिक की बातें फतवों के इस दौर में महत्वपूर्ण हैं। इनकी बातों और ऊपर दी गई दो खबरों के उदाहरणों का आपस में गहरा रिश्ता है। मुसलमानों के एक बहुत बड़े तबके में बदलाव की इस इच्छा को साफ देखा जा सकता है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र, भारतीय मुसलमान बदलना चाहते हैं। लेकिन मीडिया और राजनीतिक दल उनको उसी इमेज में बांधे रखना चाहते हैं, जो पिछले कई दशकों से बनी है। अब जिस तरह से राइट टु एजुकेशन कानून (Right to Education Law) का विरोध शुरू हो गया है, वह मुसलमानों को उसी कठमुल्ले वाली इमेज में फंसाए रखने की साजिश है।

हाल ही में जब सिविल सर्विसेज परीक्षा में कश्मीरी युवक शाह फैसल ने टॉप किया तभी लोगों ने जाना कि दिल्ली का जामिया हमदर्द होनहार गरीब युवकों के लिए इस तरह का सेंटर भी चला रहा है, जहां फैसल जैसे युवक तैयार किए जाते हैं। बटला हाउस एनकाउंटर के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया की छवि ऐसी बनाने की कोशिश हुई कि जैसे यहां बड़ी तादाद में ऐसे युवक पढ़ाई कर रहे हैं जिनका आतंकवाद से रिश्ता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो उलेमा अपना चेहरा दिखाने के लिए उतावले रहते हैं, क्या वे इस पर ठंडे दिल से विचार करने को तैयार हो सकते हैं कि ऐसी इमेज बनाने वालों का सामना किस तरह से किया जा सकता है? लेकिन नया विवाद इस इमेज को कहां बदल सकेगा।

एक हजार साल पहले शरीयत (Sharaiat) के हिसाब से कलमबंद किए गए फतवों को अब भुनाने की वजह समझ से बाहर है। बल्कि मौलाना कल्बे सादिक और मौलाना तौकीर रजा खां के शब्दों में कहें तो उन फतवों का बतंगड़ बनाने का तुक नहीं है। जो हिदायत एक हजार साल पहले दी गई थी, क्या उसे मौजूदा वक्त की कसौटी पर रखकर सही माना जा सकता है? पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब से जुड़ी हुई हजारों हदीसें तमाम फिरकों की किताबों में मौजूद हैं। क्या जरूरी है कि उन बातों की आड़ में या उन्हें सामने रखकर पूरी कौम को ही उलझा दिया जाए। वक्त आ गया है कि आम मुसलमान बदलाव को स्वीकार करे। इज्तेहाद (समसामयिक) के लिए जरूरी है कि जेहनों के दरवाजे खोले जाएं। इससे किसी पर कोई अजाब (अल्लाह का प्रकोप) नहीं पडऩे वाला है।

आधुनिकता की चादर ओढ़े कुछ स्वयंभू लोग इस्लाम की 'अपनी व्याख्याÓ के साथ टीवी चैनलों तक पहुंचने लगे हैं। इन पर भी जब कोई अजाब नहीं पड़ रहा तो आम मुसलमान, जो इन लोगों के मुकाबले नमाज, रोजे, हज, जकात का कहीं ज्यादा पाबंद है और कुरान शरीफ की तिलावत करता है, उस पर अजाब क्यों पड़ेगा। वह तो फतवों से ऊपर उठकर जीना चाहता है। यूपी मदरसा बोर्ड की एक पहल का जिक्र ऊपर के उदाहरण में हुआ है। यूपी के 16 हजार मदरसों में से 2400 इस बोर्ड से संबद्ध हैं। बोर्ड के सिलेबस में अंग्रेजी, हिंदी और कंप्यूटर एजुकेशन हासिल करने के लिए जो बदलाव किया गया है उससे 13,600 मदरसे वंचित रहेंगे। ये मदरसे जरूर किसी न किसी उलेमा के नियंत्रण में होंगे या उस फिरके की विचारधारा से प्रभावित होंगे। हो सकता है कि इनमें बहुत अच्छी पढ़ाई होती हो, लेकिन बदलाव की जो पहल यूपी मदरसा बोर्ड (UP Madrasa Board) ने की है, उससे तो ये वंचित ही रह जाएंगे।

क्यों न बदले सिलेबस
यह हाल सिर्फ एक राज्य का है। ऐसे न जाने कितने मदरसे देश के तमाम राज्यों में हैं। वहां के बोर्ड इस तरह की पहल करते हैं या नहीं, कम से कम वह बात सामने नहीं आ पाती है। आखिर मदरसों का सिलेबस बदलने में किसका भला है? उलेमाओं को चाहिए कि वे अपने-अपने मदरसों में सिलेबस बदलने से ही बदलाव की शुरुआत करें। दीनी तालीम जरूर दी जाए लेकिन उसके साथ-साथ मौजूदा दौर की शिक्षा से भी बच्चों को जोडऩे की जरूरत है। अरब मुल्कों में तो यह बदलाव बहुत पहले शुरू हो चुका है। अबूधाबी यूनिवर्सिटी में अब 9000 स्टूडेंट्स पढऩे के लिए फॉर्म भरते हैं। ईरान (Iran) में वहां के युवक अपने देश को न्यूक्लियर टेक्नॉलजी (Nuclear Technology) में सक्षम बनाने में जुटे हुए हैं। फिर ऐसी पहल भारत में क्यों नहीं हो सकती।

(साभारः नवभारत टाइम्स 13 जुलाई 2010 संपादकीय पृष्ठ)