Pages

Saturday, November 27, 2010

पिछड़ों की राजनीति अब पीछे नहीं आगे बढ़ेगी



बिहार किसे चुनता है, इसका इंतजार सभी को था। तमाम नेता चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे। राजनीतिक विश्लेषक भी अपनी-अपनी धारा में बह रहे थे। जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रफेसर महेश रंगराजन की नजर भी इस चुनाव पर थी। नतीजे आने के बाद मैंने उनसे बात कीः



क्या नीतिश को वाकई विकास के ही नाम पर वोट मिला
बिहार के लोगों ने सिर्फ विकास के लिए वोट नहीं दिया है। भागलपुर, लातेहार, जैसे कई नरसंहार झेल चुका बिहार पहले से ही राजनीतिक रूप से जागरूक था और उसने हर बार विकास के लिए ही वोट दिया था लेकिन जिस सामाजिक न्याय को उससे छीन लिया गया था, इस चुनाव में उसे वापस लाने की छटपटाहट साफ नजर आ रही थी। नीतिश कुमार ने जनकल्याण की नींव तो पिछले ही चुनाव में डाल दी थी। लालू प्रसाद यादव के वक्त से भी पहले बिहार अपना राजनीतिक चेहरा बदलने के लिए परेशान था लेकिन गुंडो और बाहुबलियों की सेना उसे ऐसा करने से बार-बार रोक रही थी।

पर उन्होंने ऐसा क्या किया
नीतिश आए तो उन्होंने 50 हजार ऐसे गुंडों को सीधे जेल भेज दिया। भागलपुर के हत्यारों को सजा दिलाई। नीतिश ने बिहारी अस्मिता का नारा दिया। इसमें अगड़ा, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और पसमंदा सभी शामिल थे। राजनीति तो बिहार के खून में बसी हुई है लेकिन कानून आधारित राजनीति की बात कोई नहीं कर रहा था। नीतिश ने पिछले पांच साल में यही करके दिखाया कि कानून आधारित राजनीति कैसे की जाती है। उनकी नजर चारों तरफ थी। उन्होंने दूर-दराज के गांवों में सड़कें बनवाईं, कई ऐसे छोटे पुल बनवाए जो उन गांवों से बाहर निकलने के लिए जरूरी थे। हालत यह थी कि लोग इसके अभाव में अपने गांव में बंधकर रह जाते थे। उन्होंने स्कूल आने-जाने के लिए लड़कियों को साइकलें दीं। पांच लाख नए स्टूडेंट्स ने स्कूलों में दाखिला लिया। इनमें लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। यह सब बिहार में लौट रहे जनविश्वास का ही नतीजा है। अगर दिल्ली में बैठे लोग इसे चमत्कार मान रहे हैं या हैरान हो रहे हैं तो इसमे उनका दोष नहीं है। बिहार और वहां के लोगों के संघर्ष को पहचानने में दूर बैठे लोग अक्सर अनुमान गलत लगाते हैं। बिहार तो 20वीं सदी से ही भारत का मार्गदर्शन कर रहा है। अब वह 21 सदी में नई इबारत लिखने को तैयार है।

कहा जा रहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी को चुनाव प्रचार से दूर रखने का फायदा भी मिला नीतिश को?
नीतिश कुमार भी जयप्रकाश नारायण के मूल्यों वाली राजनीति के साथ जुड़े रहे हैं। उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में फिरकापरस्ती को जिस तरह उसकी औकात बताई है, इससे साबित हो गया कि उनके पास फिरकापरस्त लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। नीतिश के पूरे कार्यकाल में और इस चुनाव में भी बीजेपी के हिंदुत्व का अजेंडा कहीं पीछे रह गया। बीजेपी में इतना दम नहीं था कि वह इस अजेंडे के साथ बिहार के मतदाताओं के पास जाती और वह भी नीतिश कुमार के सामने रहते। नीतिश ने इस मामले में बीजेपी की जरा सा भी नहीं चलने दी। हालांकि नीतिश की इस सख्ती से बीजेपी को भी फायदा हुआ। उसकी सीटें बढ़ गईं। यह हकीकत है कि कई सीटों पर बीजेपी को नीतिश की इमेज का ही फायदा मिला है।

तो क्या बीजेपी इस तरह का प्रयोग किसी अन्य राज्य में भी कर सकती है?
मुश्किल है। क्योंकि जहां जैसी स्थिति होती है, बीजेपी अपनी रणनीति उसी तरह बनाती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और पंजाब में अकाली दल उसके सहयोगी हैं जिनके साथ वह मिलकर चुनाव लड़ती है। दोनों ही राज्यों में वे दोनों दल मुख्य दल हैं और बीजेपी उनके पीछे है। अपने-अपने राज्यों में दोनों ही दल अपनी कट्टर छवि के लिए जाने जाते हैं। वहां तमाम मामलों में बीजेपी की नहीं चलती है। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि बीजेपी बिहार मॉडल को कहीं और भी लागू करेगी। उसे जो चीज जहां सूट करती है, वैसा ही वह करती है।

नीतिश की आगे आप क्या भूमिका देखते हैं?
हालांकि वह कह चुके हैं कि वह खुद को बिहार तक ही सीमित रखेंगे लेकिन मैं समझता हूं कि राष्ट्रीय रंगमंच पर ही नहीं एनडीए में भी नीतिश की भूमिका अब महत्वपूर्ण हो जाएगी। बीजेपी को अब अपना अजेंडा या कोई बात मनवाना एनडीए के अंदर आसान नहीं होगा। उसके कई नेताओं के मुकाबले अब नीतिश का कद काफी बड़ा हो चुका है। बीजेपी को नीतिश की सुननी ही होगी।

और पिछड़ों की राजनीति का क्या होगा, जबकि आप कह रहे हैं कि नीतिश सभी वर्गों को साथ लेकर चल रहे हैं?
अब पिछड़ों की राजनीति पीछे नहीं जाने वाली है। वह आगे बढ़ेगी। नीतिश उसे आगे बढ़ाएंगे। पिछड़ों की राजनीति अब इस देश में निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाली है। नीतिश ने पिछड़ों को जोड़ने के लिए अपना नया फॉम्युर्ला ईजाद किया है। उनके पिछड़ों की राजनीति लालू, पासवान और मायावती से बिल्कुल अलग है। पर, बिहार को अभी सबसे बड़ी जरूरत आर्थिक रूप से मजबूत करने की है। इसके लिए चौतरफा काम करने की जरूरत है। तमिलनाडु जैसा उदाहरण नीतिश बिहार में पेश कर सकते हैं। जिस तरह के. कामराज नाडार ने तमिलनाडु का मुख्यमंत्री (1954-1963) रहते हुए उस राज्य को आर्थिक रूप से मजबूत किया, शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य बनाया और गांवों के गरीब बच्चे स्कूलों तक पहुंचे। उन्होंने वहां राजाजी की पॉलिसी बदलते हुए एकदम से 6000 स्कूल गांव-गांव में खोल दिए। तमिलनाडु का मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने दो प्रधानमंत्रियों लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। (कांग्रेस की राजनीति में कामराज प्लान काफी मशहूर रहा है।) नीतिश भी इस तरह का कुछ करने की स्थिति में पहुंच गए हैं। बिहार में तो दरअसल उस राज्य को अब बनाने की शुरुआत होनी है।

साभारः नवभारत टाइम्स, 27 नवंबर 2010
यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट http://nbt.in पर भी उपलब्ध है।

Courtesy: Nav Bharat Times, Nov. 27, 2010

Tuesday, November 23, 2010

इसे जरूर पढ़ें - भारत मां के ये मुस्लिम बच्चे...

यह लेख सतीश सक्सेना जी ने लिखा है। हम दोनों एक दूसरे को व्यक्तिगत रुप से नहीं जानते। पर उन्होंने एक अच्छे मुद्दे पर लिखा है। इसके पीछे उनका जो भी उद्देश्य हो...बहरहाल आप इस लिंक पर जाकर इस लेख को जरूर पढ़े। अगर आपको आपत्ति हो तो भी पढ़ें और आपत्ति न भी हो तो भी पढ़ें। यह लेख एक नई बहस की शुरुआत भी कर सकता है। इससे कई सवाल आपके मन में भी होंगे। उन सवालों को उठाना न भूलें। चाहें दोबारा वह सवाल यहां करें या सतीश सक्सेना के ब्लॉग पर करें। पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं -

ब्लॉग - मेरे गीत, लेख - भारत मां के ये मुस्लिम बच्चे, लेखक - सतीश सक्सेना

Wednesday, November 17, 2010

सिर्फ परंपरा निभाने के लिए मत मनाइए बकरीद


आपकी नजर से वह तस्वीरें जरूर गुजरी होंगी, जिनमें कुरबानी (Sacrifice) के बकरे काजू, बादाम और पिज्जा (Pizza)खाते हुए नजर आ रहे होंगे। यह सिलसिला कई साल से दोहराया जा रहा है और हर साल यह रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। जिसके पास जितना पैसा (Money)है, वह उसी हिसाब से कुरबानी के बकरे की सेवा करता है और उसके बाद उसे हलाल कर देता है।

यह अब रुतबे का सबब बन गया है। जिसके पास जितना ज्यादा पैसा, उसके पास उतना ही शानदार कुरबानी का बकरा और उसकी सेवा के लिए उतने ही इंतजाम। इस्लाम के जिस संदेश को पहुंचाने के लिए इस त्योहार का सृजन हुआ, उसका मकसद कहीं पीछे छूटता जा रहा है। इस त्योहार (Festival)की फिलासफी किसी हलाल जानवर की कुरबानी देना भर नहीं है। इस्लाम ने इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा सिर्फ इसलिए नहीं बनाया कि लोग खुश होकर खूब पैसा लुटाएं और उसका दिखावा भी करें।

हजरत इब्राहीम से अल्लाह ने अपनी सबसे कीमती चीज की कुरबानी मांगी थी। उन्होंने काफी सोचने के बाद अपने बेटे की कुरबानी का फैसला किया। उनके पास एक विकल्प यह भी था कि वह किसी जानवर की बलि देकर अपनी भक्ति पूरी कर लेते, लेकिन उन्होंने वह फैसला किया जिसके बारे में किसी को अंदाजा भी नहीं था।

हजरत इब्राहीम ने अल्लाह के सामने जो परीक्षा दी, क्या मौजूदा दौर में कोई इंसान उस तरह की परीक्षा दे सकेगा? नामुमकिन है। लेकिन उस कुरबानी के पीछे छिपे संदेश को तो हम अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर सकते हैं। कुर्बानी का मतलब है त्याग, उस चीज का त्याग जो आपको प्रिय हो।

आप कुरबानी के जिस बकरे को काजू, बादाम और पिज्जा खिला रहे हैं, वह इससे आपका अजीज नहीं हो जाता, क्योंकि आप उसे कुर्बानी की नीयत से ही मोल ले कर आए हैं। उसका मूल आहार तो कुछ और है। उसे यह सब चाहिए भी नहीं और न ही उसकी अंतिम इच्छा है कि उसे काजू, बादाम खिलाकर हलाल किया जाए। और कुरान शरीफ में भी यह नहीं लिखा है कि बिना काजू, बादाम खिलाए आप उसे हलाल नहीं कर सकते।

तो क्यों न ऐसा हो कि जो पैसा आप उसके काजू, बादाम पर खर्च कर रहे हैं और जो दिखावे के अलावा और कुछ नहीं है, वह पैसा आप जरूरतमंदों तक पहुंचाएं। यदि ईद में आपने खैरात और जकात किया था, और फितरा गरीब लोगों तक पहुंचाया था, तो वैसा ही करने से आपको बकरीद (Bakreed) में कौन रोक रहा है?

यह त्योहार सिर्फ परंपरा निभाने के लिए मत मनाइए। परंपरागत त्योहार होते हुए भी इस त्योहार का संदेश कुछ अलग तरह का है। यह त्याग करने का संदेश देता है। पैसे के बाद जिस चीज ने हम लोगों को सबसे ज्यादा अपने चंगुल में ले रखा है वह है हम लोगों का अहंकार। क्या आप ईद या बकरीद की नमाज में इस बात की दुआ मांगते हैं कि अल्लाह मुझे अहंकार से बचा लो। आज से मैं इसका त्याग करता हूं। मुझे गुनाहों से बचा लो, आज से मैं उनका त्याग करता हूं।

अब अगर अहंकार को खत्म करने की ही दुआ न मांगी गई तो वही अहंकार आप को अपने पैसे का प्रदर्शन करने- कराने के लिए बाध्य करेगा और आप लोगों को दिखाने के लिए कुरबानी के बकरे को काजू-बादाम खिलाते नजर आएंगे। दरअसल, वह अहंकार शैतान ही है जो आपको तमाम गुनाहों की तरफ धकेल रहा है। इस बकरीद पर इसे खत्म करने की दुआ मांगिए। इनका आप त्याग कर बहुत कुछ पा सकते हैं।

साभारः नवभारत टाइम्स, 17 नवंबर 2010
Courtesy: Nav Bharat Times, 17 Nov. 2010

Saturday, October 2, 2010

गवाह भी तुम, वकील भी तुम



उर्दू के मशहूर शायर राहत इंदौरी की दो गजलें...

जिधर से गुजरो धुआं बिछा दो
जहां भी पहुंचो धमाल कर दो

तुम्हें सियासत ने यह हक दिया है
हरी जमीनों को भी लाल कर दो

अपील भी तुम, दलील भी तुम,
गवाह भी तुम, वकील भी तुम

जिसे चाहे हराम कह दो
जिसे भी चाहे हलाल कर दो

जुल्म ढाए सितमगरों की तरह

जिस्म में कैद है घरों की तरह
अपनी हस्ती है मकबरों की तरह

तू नहीं था तो मेरी सांसों ने
जुल्म ढाए सितमगरों की तरह

अगले वक्तों के हाफिज अक्सर
मुझ को लगते हैं नश्तरों की तरह

और दो चार दिन हयात के हैं
ये भी कट जाएंगे सरों की तरह

कल कफस ही में थे तो अच्छे थे
आज फिरते हैं बेघरों की तरह

अपने पहलू पर उछलता है
कतरा कतरा समंदर की तरह

बन के सय्याद वक्त ने 'राहत'
नोच डाला मुझे परों की तरह
-राहत इंदौरी

Monday, September 27, 2010

राहत इंदौरी और जावेद अख्तरः दो रंग (ताजा शेर)

मौजूदा दौर में उर्दू के दो मशहूर शायरों की कलम अलग-अलग बातों और रुझानों को लेकर चलती रहती है। यह दोनों बॉलिवुड की फिल्मों के लिए गीत भी लिखते हैं। लेकिन इनका असली रंग झलकता है इनकी शायरी में। मुझे दोनों शायरों की गजल के कुछ ताजा शेर मिले हैं, जो आप लोगों के लिए भी पेश कर रहा हूं। हो सकता है कि बाद में यह शेर आपको सुधरे हुए या किसी बदलाव के साथ पढ़ने को मिले। फिलहाल तो दोनों शायरों ने जो बयान किया है, वह हाजिर है...

वह शख्स जालसाज लगता है




सफर की हद है वहां तक, की कुछ निशां रहे
चले चलो कि जहां तक ये आसमां रहे/

यह क्या, उठे कदम और आ गई मंजिल
मजा तो जब है कि पैरों में कुछ थकन रहे/

वह शख्स मुझको कोई जालसाज लगता है
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे/
-राहत इंदौरी (शनिवार, 25 सितंबर 2010)


तन्हा...तन्हा...तन्हा

इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूढ़ता फिरा उसको वो नगर नगर तन्हा

तुम फूजूल बातों का दिल पे बोझ मत लेना
हम तो खैर कर लेंगे जिंदगी बसर तन्हा

जिंदगी की मंडी में क्या खरीद पाएगी
इक गरीब गूंगी सी प्यार की नजर तन्हा
-जावेद अख्तर (24 सितंबर 2010)

Thursday, September 23, 2010

एक रुका हुआ फैसला...किसकी कामयाबी

सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद और रामजन्म भूमि विवाद में हाई कोर्ट का फैसला 24 सितंबर को सुनाए जाने पर रोक लगा दी है। यह आदेश आज (बृहस्पतिवार) ही आया है और जो भी सुन रहा है वह यही कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा नहीं करना चाहिए था। हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगवाने की जो कोशिश रमेश चंद्र त्रिपाठी नामक शख्स कर रहा था वह उसमें सफल हो गया। यही कोशिश उस आदमी ने हाई कोर्ट में की थी जिसमें उसे कामयाबी नहीं मिली थी।

अयोध्या विवाद इतने लंबे समय से पेंडिग है कि इससे जुड़ा कोई भी मसला आने पर देश में उत्तेजना का माहौल बन जाता है। इस बार उम्मीद बंधी थी कि अब हाई कोर्ट का फैसला साफ-साफ आएगा और जिसे मानना होगा मानेगा, जिसे नहीं मानना होगा वह आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते बाद इसकी सुनवाई का आदेश आज सुनाया है। अगर एक हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट से कहता है कि वह अब फैसला सुना दे तो यह और भी घातक होगा क्योंकि अब दशहरा आने वाला है और जल्द ही रामलीलाओं का मंचन शुरू हो जाएगा। ऐसे में अगर फैसला आता है तो किसी भी एक पक्ष के लिए मुफीद नहीं है।

इस मसले को शुरू से ही लटका कर रखने की कोशिश की जाती रही है और अगर न्यायपालिका भी उस चीज में इस्तेमाल हो जाती है तो यह और भी गंभीर बात है। हाल के दिनों में जिस तरह से कुछ चर्चित मामलों में न्यायपालिका को इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे हैं, भारत का आम आदमी इस मामले में भी ऐसा ही मानने लगेगा। अभी तो इसी बात में आशंका है कि 29 सितंबर को भी सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई फैसला ले भी पाएगा या नहीं।

इससे नीचे लेख में दिए गए विडियो से पता चलता है कि यह मामला कितना पुराना है और भारत की न्यापालिका इस बारे में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है कि जमीन का वह एक छोटा सा टुकड़ा किसका है। अगर फैसला जल्द आता है तो इससे कई बातों के तय होने में मदद मिलेगी। इससे उन लोगों के चेहरे बेनकाब होंगे जिनका विश्वास भारत के संविधान और न्यायपालिका में नहीं है। इससे उन लोगों को भी धक्का लगेगा जिन्होंने इस एक मुद्दे के दम पर अब तक राजनीति की है और सत्ता के करीब पहुंचे हैं। इससे उन कट्टरपंथियों को भी धक्का लगेगा जो किसी एक कौम को ऐसे उलूल-जुलूल मुद्दों की तरफ लगा देते हैं।

आप लोगों ने भी शायद तमाम अखबारों और टीवी चैनलों पर वह बहस सुनी होगी कि देश की युवा पीढ़ी का ऐसे मुद्दों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वे वह बात कर रहे हैं जिसे सेक्युलर इंडिया कहता है, जिसे देश के संविधान में बाबा साहब आंबेडकर दर्ज कर गए हैं। जबकि इस मुद्दे को गरमाने वाले वे हैं जो बूढ़े हो चुके हैं या जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अभी भी जोर मार रही हैं।

इस जमीन के टुकड़े के लिए अब तक देश भर में जितने लोगों का खून बहा है चाहे वह दंगे की आड़ में और चाहे वह कारसेवा की आड़ में, इससे उनके घर वालों को क्या हासिल हुआ होगा, यह जानने की कोशिश न कभी की गई और कभी की जाएगी। अलबत्ता लोगों ने इसके दम पर सत्ता हासिल कर ली या अकूत संपत्ति बना ली। हाशिम अंसारी आज भी गरीब है और राम खेलावन के घर में मुश्किल से चूल्हा जलता है जो कभी कार सेवा करने अयोध्या गया था।


सुप्रीम कोर्ट के पूरे आदेश को आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं

Wednesday, September 22, 2010

अयोध्याः तथ्य और इतिहास कैसे बदलोगे

बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमि टाइटल पर अदालत का फैसला आने में अब महज कुछ घंटे बचे हैं। तमाम तरह के सांप्रदायिक, कट्टरपंथी और लंपट किस्म के लोग सक्रिय हो गए हैं। माहौल में उत्तेजना का एहसास कराने की कोशिश तमाम तरह के लोग कर रहे हैं।

अयोध्या का फैसला जो भी आए लेकिन उसके संदर्भ में जो बयान और बातें अब तक कही गई हैं, उनके मद्देनजर लोग अपना फैसला अदालत के फैसले के बाद देना शुरू कर देंगे। यह तय है। इस मुकदमे में 1949 से पक्षकार हाशिम अंसारी अयोध्या के रहने वाले हैं और उन्होंने यहां सब कुछ अपनी आंखों के सामने देखा है। उनकी उम्र इस वक्त 91-92 साल है।
एक साल पहले उन्होंने एक टु सर्कल डॉट नेट को हिंदी में दिए गए इंटरव्यू में बहुत कुछ कहा था। वह बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। इंटरव्यू सुनकर लगता है कि अभी यह बात जैसे उन्होंने आज ही कही है।

इस मुद्दे पर मैं अपनी ओर से कोई टिप्पणी न करते हुए हाशिम अंसारी का वह विडियो और उसके नीचे सुप्रसिद्ध मुस्लिम बुद्धिजीवी असगर अली इंजीनियर के भाषण का एक अंश दे रहा हूं जिसमें उन्होंने कहा है कि कैसे सांझी विरासत वाले इस देश को तोड़ने की कोशिश की जाती रही है। उन्होंने अयोध्या के संदर्भ में इतिहास का भी जिक्र किया है। माफ कीजिएगा वह पूरा भाषण अंग्रेजी में है और मुझे उसे हिंदी में अनुवाद करने का समय नहीं मिल पाया है।

हाशिम अंसारी का विडियो


इतिहास को फिर से टटोलोः असगर अली इंजीनियर
Ashgar Ali Engineer spoke at a 3-day long international conference on “Armed Conflcit and Peace Prospect’ at Guwahati, Assam. The conference was organized by Omeo Kumar Das Institute of Social Change and Development. He delivered a lecture on ‘Re-reading through History of Communal Harmony’.

History is not history in the long run. History can be reconstructed, can be used or misused, history is the only social science that can be reconstructed as it deals with the past. It is a powerful tool which strongly appealed to our emotion. It can be used for controlling power to make or unmake society by reconstructing the past.

Because, it is all about our past. We tend to glorify our past. Muslims glorify their past and Hindus glorify Hindu period. We always take refuge in the past if there is anything wrong in the present. It is related with our culture and identity. Hindus says, before Muslims came it was all peace, prosperity, and everything started once Muslims came to India. Muslims will say, Muslim period was a glorious period. Muslims rulers were more tolerant towards others. In this way we reconstruct our history.

Text book in history – our heroes are their villains and there villains are our heroes. We give selective glorification of our past. It is a part of human behavior, we suppress our bad aspects. Same thing we do with our history. So that past appears to be real and ideal.

One must think about human behavior in mind while interpreting history. Everyone thinks that his religion is great. The dynamics of human behavior is important. For rulers, their interest is more important than anything else in the world. If a ruler belongs to my religion we would shape according to my religion. If a ruler belongs to other religion we may focus his bad aspects. So, we need to understand human mind.

Our history was written from British period. It was written chronologically. We don’t have analytical analysis of our history. British had their own interest keeping in mind their political goals. They saw unity among the Hindus and Muslims here and wanted to destroy that. They wrote history in a way to create tension between Hindus and Muslims. Whole Babari Masjid Ram Janambhoomi, the way the British translated Babar Nama. Babar never visited Ayodhya. He passed through. It was six month period in the diary is missing. So it was interpreted that in this period ram janambhoomi was destroyed in order to construct Babri Masjid. There was absolutely no evidence. He wrote it in a foot note and it was repeatedly used when the ram janambhoomi controversy started.

We can write history which will be very helpful in creating harmony in the society. Ayodhya has been a city of composite culture. There are so many Sufi establishments, masjids and temples. It was a great place of Muslim culture. It is also a city of Tulsi Das who translated Ramayana. In this conflict thousands died along with the harmony.

History of India is a culture of composite heritage. I don’t believe is periodisation as Hindu period, Muslims period, etc. it is very wrong. When we use the term Hindu or Muslim it becomes problematic. All rulers are homogenized as Hindus or Muslims. There is nothing like Hindu past or Muslims past. Various Hindu rulers fought among themselves and Muslims among themselves. Babar defeated Ibrahim Lodhi to come to India. It was between two Muslim dynasties. How can we say that Muslims killed Hindus to reign over India. Except Babar, Akbar or Humayun, all Mughals fought among themselves for power.

Culture of India is a composite culture, even before the Muslims came. It was diversity. Diversity is a part of the history of the India. It was always a composite culture. In Hindi, we called sanjhi virasat.

Today Indian Muslims don’t follow Ram, but in their language, they are very Indian. Once I went to Saudi Arabia in my childhood. They addressed me as ‘Hindi kaafir’. They think Arab Muslims is the true Muslim. Indian Islam is different and divers. Islam in Kashmir and Kerala are different. Indian Muslims, sect wise, are culturally linguistically different. Say for example, Assamese Muslims are different from me. I am a Guajarati Muslim. In fact al communities are diverse.

Different communities co-existed in India for a long time. Kabir panth is a result of marriage between Hindus and Muslims. Kabir would criticize both Hindus and Muslims. Arya samaj is another example of marriage between Hindus and Muslims.

Parinam Panthi from Gujarat believe in both Prophet Mohammed and Krishna. They also believe in idol worshipping. They consider prophet as an avatar of Krishna. In earlier days those who adopt Parinam Panthi would follow both religions. One brother would go to temple and another one will go to masjid.

These things are not known. We don’t teach history in a way that fosters communal harmony. We teach only those that create communal conflict.

Sufis contributed a lot for communal harmony. Kaafir means ‘someone who hides’ in Arabic. A famous Sufi leader opposed the use of the term of kaafir.

Communalism will be a thing of the past if we teach out history in a way to create communal harmony. Our education system is a powerful tool for strengthening communal harmony in the country. There should free debate among the historians on multiple interpretations in the country. Let us rediscover our past of composite culture. We should not let our rules use history in a way to satisfy their interests.

Monday, September 20, 2010

पाकिस्तान को चांद चाहिए

अब मुस्लिम त्योहारों को लेकर भी प्राय: मतभेद उजागर होने लगे हैं। इस बार भारत में दो दिन ईद मनाई गई। पाकिस्तान में तो पिछले कई सालों से ऐसा हो रहा है। वहां कई त्योहार राजनेताओं और धर्मगुरुओं के लिए मूंछ की लड़ाई बन गए हैं।

इस बार वहां अचानक ईद के चांद पर बहस शुरू हो गई। इसमें सरकारी तौर पर भी बयानबाजी और बहस अब तक जारी है। इस विवाद का सिलसिला रमजान का चांद देखने के समय 11 अगस्त से शुरू हो गया था। सऊदी अरब में 11 अगस्त को पहला रोजा था। पाकिस्तान के खैबर पख्तून और पेशावर इलाके में लोगों ने सऊदी अरब का अनुसरण करते हुए उस दिन पहला रोजा रख लिया। इस पहल में उस सूबे की सरकार भी शामिल रही।

इससे उलट चांद देखे जाने पर मुहर लगाने वाली पाकिस्तान की सबसे सुप्रीम बॉडी रुयते हिलाल कमिटी ने 11 अगस्त को चांद देखे जाने की घोषणा की और 12 अगस्त को पहला रोजा घोषित किया। पाकिस्तान के अधिकांश इलाकों में इसी पर अमल हुआ। भारत में भी पहला रोजा 12 अगस्त को ही रखा गया था। लेकिन पाकिस्तान में रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा के बाद विवाद शुरू हो गया।

इसका क्लाइमैक्स 11 सितंबर को दिखाई पड़ा। एक बार फिर खैबर पख्तून और पेशावर इलाके के मौलानाओं ने 11 सितंबर को ही ईद मनाए जाने की घोषणा कर दी क्योंकि सऊदी अरब में भी इसी दिन ईद मनाने का फैसला हुआ था। लेकिन रुयते हिलाल कमिटी के चेयरमैन मुफ्ती मुनीब उर रहमान ने घोषणा की कि 12 सितंबर को ईद होगी।

पाकिस्तान में इस रस्साकशी के पीछे एक राजनीतिक अंधविश्वास है। वहां शुक्रवार (जुमा) के दिन पड़ने वाली ईद पाक शासकों के लिए अपशकुन साबित होती रही है। जिसके भी कार्यकाल में ईद जुमे को पड़ी, उस शासक को अगली ईद से पहले सत्ता से हाथ धोना पड़ा। हालांकि इस्लामिक विद्वानों की राय इससे भिन्न है। उनका मानना है कि जुमे के दिन पड़ने वाली ईद बहुत खास होती है।

लेकिन पाकिस्तान में तानाशाह अयूब खान के समय से ही ईद का चांद देखने को लेकर राजनीति होती रही है। वहां के लगभग हर शासक ने कोशिश की कि किसी साल ईद जुमे को न पड़े। इसलिए शासक वर्ग किसी भी तरह रुयते हिलाल कमिटी को प्रभावित करके इसकी घोषणा आगे-पीछे करा देता है। यही खेल इस बार भी दोहराया गया।

पिछले साल अवामी नैशनल पार्टी (एएनपी) के नेताओं और उनकी सरकार ने खैबर पख्तून में ईद मनाने की घोषणा रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा से एक दिन पहले कर दी और कमिटी से कहा कि वह इसे पूरे पाकिस्तान में लागू कर दे। कमिटी ने वहां के सरकार के इस अनुरोध को मानने से मना कर दिया तो एएनपी नेताओं ने मांग की कि कमिटी के चेयरमैन मुनीब फौरन इस्तीफा दें। लेकिन चेयरमैन ने इसे एएनपी नेताओं द्वारा कमिटी के काम में और अल्लाह की इच्छा में दखलंदाजी करने वाला कदम बताया और इस्तीफा देने से मना कर दिया।

कई बार यह मांग भी उठी कि रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा पर बैन लगाकर चांद के हिसाब से बने कैलंडर को मान्यता दी जाए लेकिन पाकिस्तानी शासक वर्ग में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह धर्मगुरुओं की इस कमिटी के खिलाफ जा सके।

दरअसल, ईद का कुछ संबंध बाजार से भी है। भारत-पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में अरबों रुपये का कारोबार इस त्योहार से जुड़ा है। आमतौर पर लोग चांद रात से पहले यानी ईद से एक दिन पहले खरीदारी के लिए निकलते हैं। अगर बाजार को ऐसा एक और दिन मिल जाए तो कारोबारियों को कितना लाभ होगा, इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। पाकिस्तान जैसे देश में जहां मुसलमानों की आबादी तकरीबन शत-प्रतिशत है, रुयते हिलाल कमिटी को अगर बिजनेस समूह नियंत्रित कर रहे हों तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। बेचारे चांद को क्या मालूम कि उसे कौन किस वजह से चाहता है।

साभारः नवभारत टाइम्स 20 सितंबर 2010
Courtesy: Nav Bharat Times September 20, 2010

Saturday, September 18, 2010

वह सपनों में भी बोलती हैं हिंदी

उनका नाम है मार्ग्ड ट्रम्पर, जन्म ब्रिटिश-इटली परिवार में हुआ, जिसमें विद्वानों और भाषा विज्ञानियों की भरमार है। इस परिवार का हर कोई किसी न किसी भाषा या संस्कृति से जुड़ा हुआ है। मार्ग्ड ने खुद हिंदी आनर्स की डिग्री वेनिस यूनिवर्सिटी से हासिल की है और वह अब खुद मिलान यूनिवर्सिटी में हिंदी टीचर हैं। हिंदी के अलावा उनका दूसरा प्यार भारतीय संगीत और तीसरा प्यार मेंहदी (हिना) है। बनारस घराने की वह फैन है। वह खुद भी ठुमरी गाती हैं। उन्होंने पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी, सुनंदा शर्मा से काफी कुछ सीखा है। इसके अलावा प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित राजन-साजन मिश्रा, पंडित ऋत्विक सान्याल और बीरेश्वर गौतम से टिप्स हासिल किए हैं।

इटली में हिंदी से जुड़ी हर गतिविधि में वह आगे-आगे रहती हैं। इटली में तो लोग उन्हें भारत का सांस्कृति दूत तक कहते हैं। मार्ग्ड के बारे में यह संक्षिप्त सी जानकारी है, पूरा बायोडेटा लंबा है। मैंने मार्ग्ड ट्रम्पर से उनके हिंदी प्रेम पर बात की हैः

हिंदी से लगाव कब हुआ ?
वैसे यह कहना मुश्किल है कि हिंदी से मेरा लगाव कब हुआ क्योंकि इसमें कई संयोग जुड़े हुए हैं। मेरे परिवार में सब लोग अनुवादक या लिंग्विस्टिक के जानकार हैं और अलग-अलग देशों से हैं इसलिए बचपन से ही भाषाओ का बहुत शौक रहा है। भारत के बारे में बहुत कम जानती थी पर यूनिर्वसिटी में पढ़ाई शुरू करने के समय पर सोचा था कि कोई ओरिएंटल भाषा सीखना चाहती हूं। अंत में मैंने हिंदी चुनी क्योंकि सब ओरिएंटल भाषाओं में से यह यूरोपीय भाषाओं के बहुत समान थी। मुझे भारतीय संस्कृति भी आकर्षित करती थी। उस वक्त से मेरी रूचि इतना बढ़ती गई कि आजकल इटैलियन व अंग्रेजी के बाद हिंदी मेरी तीसरी भाषा हो गयी। कभी-कभी तो मैं सपनों में भी हिंदी बोलती हूं।
आखिर इस लगाव की वजह क्या थी ?
यह भी कहना मुश्किल है क्योंकि ऐसे प्यार की कोई वजह नहीं होती...पर सच पूछें तो बहुत-सी वजहें थीं। जैसे मैं कह चुकी हूं कि यूरोपीय भाषाओं और हिंदी में बहुत सी समानताएं हैं और अवश्य ही हिन्दुस्तानी संस्कृति में भी मेरी बहुत रूचि रही है। शुरू में कोई ऐसी भाषा सीखना चाहती थी जो मेरे देश में बहुत कम लोगों को आए पर उसे भाषा के मामले में भी रोचक होना चाहिए। इसलिए यह लगाव हुआ।

हिंदी की ऐसी कौन सी विशेषता है जिसकी वजह से आप इसकी तरफ आकर्षित हुईं ?
ऐसे लगता है कि हिंदी काफी स्वाभाविक भाषा है।... मेरा मतलब है कि जाने क्यों कुछ शब्दों का अर्थ बहुत साफ़ सुनाई देता है। यह भी हिंदी की एक और विशेषता है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है कि इसमें बहुत समानार्थक शब्द प्रयोग किये जा सकते हैं।

दूसरी भाषाओं के मुकाबले आप हिंदी को आज कहां पाती हैं?
दुनिया में सब भाषाओं में से हिंदी आज तीसरी सबसे प्रचलित भाषा है पर इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हिंदी बोलनेवाले लोगों का ही अपनी भाषा से काफी लगाव नहीं है। मेरे ख्याल से इस समस्या की वजह भारतीय उपनिवेशन का इतिहास है। इस कारण बहुत कम विदेशी लोग हिंदी सीखने में रुचि लेते हैं।

अगर हिंदी और उर्दू को मिलाकर इस भाषा को बढ़ावा दिया जाए तो आपकी नजर में ऐसा करना ठीक होगा?
मेरे ख्याल से हिंदी और उर्दू में जो सब से बड़ा अंतर है वह तो भाषा का नहीं, संस्कृति का है। उन दोनों की बहुमूल्य संस्कृति है और इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि उर्दू भारत में पैदा हुई किसी और देश में नहीं । मैं नहीं चाहती की राजनीति की वजह से उन दोनों में से एक को चुनना पड़े। वैसे तो सबको पता ही है कि दोनों बोलचाल की भाषाएं हैं और बोलने में कई बार जरा भी अंतर महसूस नहीं होता।

हिंदी जहां पैदा हुई, वहां उसकी हालत का आपको क्या कुछ अंदाजा है ?
मुझे पता है। विशेष रूप से बड़े शहरों में भारतीय युवकों की हिंदी बहुत घटिया हो गई है। कारण यह है कि वे बहुत ज्यादा अंग्रेजी शब्द मिलाकर हिंदी बोलते हैं। मिश्रण तो स्वाभाविक रीति है, पर बिगाड़ कर बोलना बिल्कुल दूसरी बात होती है... अगर अंग्रेजी के साथ हिंदी को मिलाकर इसी तरह बोला जाता रहा तो संस्कृति का मनोभाव खो जाएगा । मेरी माता जी प्रकाशकों के लिए अनुवाद का काम करती हैं और अक्सर एंग्लो-इंडियन लेखकों का अनुवाद भी करती हैं । इसीलिए मैं काफी अच्छी तरह जानती हूं कि भारत में और दुनिया में आजकल हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की रचनाएं बहुत प्रचलित नहीं हैं क्योंकि उनसे ज्यादा पैसे नहीं मिलते और नाम भी नहीं होता। वैसे ही पश्चिमी देशों में आजकल भारतीय साहित्य से जुड़ने का फैशन चल पड़ा है। पर यह सब अंग्रेजी में है। मौजूदा दौर के बड़े हिंदी लेखकों का तो दुनिया में कहीं नाम नहीं है।

आप भारत अक्सर आती रहती हैं, यहां की और कौन सी चीज आपको प्रभावित करती है?
हिन्दुस्तानी संस्कृति के मुझे अलग-अलग शौक हैं। इनमें से शास्त्रीय संगीत प्रमुख है। मैं लगभग 10 साल से हिन्दुस्तानी संगीत सीख रही हूं और आजकल पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी और उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा जी से सीखती हूं। मुझे बनारस घराने की परंपरा बहुत पसंद है और संगीत सीखने और सुनने के लिए भारत आती रहती हूं। वैसे मैं अच्छी पर्यटक नहीं हूं, मैंने ताजमहल अभी तक नहीं देखा है क्योंकि मैं ज्यादा से ज्यादा दो-तीन जगहों में रहना, लोगों से परिचय करना, उनसे बात करना आदि पसंद करती हूं। अगर किसी जगह की सैर करने का मौका मिले तो अच्छी बात है, पर यह मेरी वरीयता नहीं।
हिंदी की कोई किताब जो आपने पढ़ी हो और पसंदीदा लेखक?
यूनिवर्सिटी के समय मैंने बहुत हिंदी उपन्यास पढ़े थे। कुछ हिंदी में, कुछ अनुवाद से। दो-तीन उपन्यास जो सबसे अच्छे लगे अभी याद आ रहे हैं, जैसे प्रेमचंद का लिखा हुआ गोदान,रेणु का लिखा हुआ मैला आंचल’ और एक उपन्यास जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, रूद्र का लिखा हुआ 'बहती गंगा'।

कोई बॉलिवुड मूवी जो हाल ही में आपने देखी हो और उससे खूब मनोरंजन हुआ हो?
इटली के सिनेमघरों में बॉलिवुड मूवी का प्रचलन पहले नहीं था।मगर अभी दो-तीन साल से बॉलिवुड सिनेमा भी पसंद किया जाने लगा है। इटैलियन टेलिविज़न पर भी हिंदी मूवी अब कभी-कभी पेश की जाती हैं । इसलिए हाल में ‘कभी अलविदा न कहना’, ‘स्वदेश’ आदि देखी हैं। पता चला है की अक्टूबर में इटली में भी ‘माई नेम इज खान’
पेश की जाएगी। वैसे ही अभी मैं रावण मूवी देखना चाहती हूं।

क्या अपनी ओर से कुछ कहना चाहेंगी ?
जी, आजकल भारत अर्थव्यवस्था में काफी ज़ोरदार जा रहा है और सब लोग अंग्रेजी बोलना और टेक्नॉलजी का प्रयोग करना चाहते हैं, फिर भी याद रखना पड़ेगा कि किसी देश का जोर उसकी सांस्कृतिक पहचान में भी होता है। अपनी संस्कृति और भाषा बनाए रखना अपने भविष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है।

साभार - नवभारत टाइम्स, 18 सितंबर 2010, नई दिल्ली

Monday, August 16, 2010

ऐसे आंदोलनों का दबना अब मुश्किल

भारत जब अपनी आजादी की जब 63वीं वर्षगांठ मना रहा था और लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसानों के लिए लंबी-चौड़ी बातें कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त अलीगढ़-मथुरा मार्ग पर पुलिस ही पुलिस थी। यह सडक ठहर गई थी। सड़क के दोनों तरफ बसे गांवों के किसानों और उनके परिवार के लोगों को बाहर निकलने की मनाही थी। जो निकला, उसे पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। यह सब किसी अंग्रेजी पुलिस ने नहीं बल्कि देश की पुलिस फोर्स ने किया। यहां के किसानों ने गलती यह की थी कि इन्होंने सरकार से उनकी जमीन का ज्यादा मुआवजा मांगने की गलती कर दी थी। आंदोलन कोई नया नहीं था और महीनों से चल रहा था लेकिन पुलिस वालों की नासमझी से 14 अगस्त की शाम को हालात बिगड़े और जिसने इस पूरी बेल्ट को झुलसा दिया। यह सब बातें आप अखबारों में पढ़ चुके होंगे और टीवी पर देख चुके होंगे।

अपनी जमीन के लिए मुआवजे की ज्यादा मांग का आंदोलन कोई नया नहीं है। इस आंदोलन को कभी लालगढ़ में वहां के खेतिहर लोग वामपंथियों के खिलाफ लड़ते हैं तो कभी बिहार के भूमिहीन लोग सामंतों के खिलाफ लड़ते हैं तो हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न इलाकों में वहां के किसान शासन के खिलाफ लड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में यह तेंदुपत्ता माफिया के खिलाफ लड़ा जाता है।

लेकिन मुद्दा हर जगह किसान या खेतिहर मजदूरों की जमीन का ही है, जिसे सरकार अपने नियंत्रण में लेकर वहां कंक्रीट के जंगल खड़ा करना चाहती है या फिर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी (एमएनसी) के पालन-पोषण का जरिया बनाने के लिए सौदा किया जाता है। कतिपय लोग विकास, रोटी-रोजी का वास्ता देकर इस तर्क को खारिज कर सकते हैं। लेकिन यह तर्क सुनने वाला कोई नहीं है कि जिस किसान से उसकी जमीन छीनी जा रही है वह उसके बाद क्या खाएगा और कैसे जिंदा रहेगा। आपके कुछ लाख रुपये कुछ समय के लिए उसका लाइफ स्टाइल तो बदल देंगे लेकिन उसके मुंह में जिंदगी भर निवाला नहीं डाल सकेंगे।

मैं ही क्या आप तमाम लोगों में से बहुतों ने देखा होगा कि इस तरह का पैसा किस तरह किसानों को या उस इलाके की आबादी के हालात को बदल देता है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली के शहरीकृत गांवों और एनसीआर के तमाम गांवों के किसानों को बड़ा मुआवजा मिला और देखते ही देखते उन गांवों में लैंड क्रूजर और पजेरों पहुंच गई। मुखिया और उनके बेटे शहर में आकर बार में बैठने लगे और कुछ ने होटल में कमरा लेकर कॉलगर्ल भी बुला ली। यह सब गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, बहादुरगढ़, लोनी में हुआ। और अगर दिल्ली के गांवों की बात करें तो जौनापुर, जैतपुर, पल्ला, मुनीरका, महरौली के किसानों के साथ भी यही बीता। इन इलाकों के गांवों में आप चले जाएं तो पाएंगे कि दरवाजे पर पजेरो खड़ी है, पूछेंगे कि आपका बिजनेस क्या है तो जवाब मिलेगा कि – हम तो पुराने जमींदार हैं। तगड़ा मुआवजा मिला है, उसी को खर्च कर रहे हैं। या फिर किसी ने ब्लूलाइन बस खरीद ली है और उसको चलवा रहा है।

फरीदाबाद के ग्रेटर फरीदाबाद या नहरपार इलाके में चले जाइए, आपको सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े अपार्टमेंट नजर आएंगे, लेकिन जैसे ही आप इन इलाकों के गांवों में जाएंगे तो घरों के सामने कोई न कोई गाड़ी खड़ी नजर आएगी। पता चलेगा कि घर का मुखिया सुबह से शराब पी रहा है और लड़का अपनी अलग मंडली लगाए हुए हैं। जिन किसान परिवारों का पैसा खत्म हो चुका है वे कब को जमीन पर आ चुके हैं और उस घर का लड़का अब उसकी जमीन पर बने अपार्टमेंट में या तो तीन हजार रुपये वेतन पाने वाला चौकीदार बन चुका है या फिर किसी की गाड़ी की धुलाई करके दो हजार रुपये कमा रहा है।

मैं चाहता तो इन तथ्यों को तमाम आंकड़ों औऱ नामों की चाशनी के साथ पेश करके बड़े ही गंभीर किस्म की रिपोर्ट बना सकता था लेकिन मैं यहां किसी नई रिसर्च रिपोर्ट को पेश करने नहीं आया हूं। यह हकीकत मेरे सामने की है इसलिए बयान कर रहा हूं। मुझे इन तमाम गांवों में जाने का मौका मिलता रहता है और हर बार कुछ नई जानकारी किसी न किसी परिवार के बारे में मिलती रहती है। यह ऐसे गांव हैं जहां टीवी भी उपलब्ध है और अखबार भी।

इन्हीं गांवों का किसान जब उसी अखबार में पढ़ता है कि किस तरह जिस जमीन का मुआवजा उसे सरकार ने छह लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिया है और अब वही जमीन डीएलएफ, यूनीटेक, बीपीटीपी या ओमेक्स जैसे बिल्डर सरकार से नीलामी में कई करोड़ रुपयों में खरीद रहे हैं तब उसकी नींद टूटती है। उसे अपने छले जाने का एहसास होता है। फिर वह अपनी बात कहने का मंच कहीं तो टिकैत के साथ खोजता है तो कहीं माओवादियों के रूप में उसे नजर आता है। कहीं उसे कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल भी मिल जाते हैं। पर लाठी, गोली में उसका आंदोलन बिगड़ जाता है। वह जेल जाता है और वहां से लौटने के बाद यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है। तब तक उसकी जमीन पर कोई न कोई मॉल या पीवीआर अपनी शक्ल ले चुका होता है।

बहरहाल, इन बातों और तर्कों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, यह ब्लॉग मेरे नियंत्रण में है तो इन विचारों को यहां जगह भी मिल गई है, चाहे आप उसे पढ़ें या न पढ़ें। वरना ऐसी सोच रखने वाले अब हाशिए पर जा चुके हैं। शहरों में रहने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, जिन्हें बड़े-बड़े मॉल्स में विकास नजर आता है, वे ऐसी तमाम बातों को खारिज करते रहे हैं और आगे भी करेंगे लेकिन वे ऐसे छोटे-छोटे आंदोलनों को अपने तर्कों से रोक नहीं पाएंगे। बेशक, उनका हिमायती, दलाल या पेड जर्नलिजम करने वाला मीडिया भी उनका साथ दे लेकिन वे समाज में आ रही चेतना को रोक नहीं पाएंगे। वह किसी न किसी रूप में फूटकर सामने आएगी। यह डरे हुए लोग लोगों को और डराना चाहते हैं। लेकिन इधर आंदोलनों का रुख बता रहा है कि इन डरे हुए लोगों के तर्क अब पब्लिक में खारिज होने लगे हैं।

अंत में एक अपील

यह लेख लिखने की सबसे बड़ी वजह वह संदेश है, जो मुझे पत्रकार और अंग्रेजी की मशहूर लेखिका अनी जैदी ( recent book - Known Turf) की ओर से मिला। उन्होंने शीतल रामजी बर्डे नामक बालिक की ओर से एक अपील इंटरनेट पर जारी की है जो दिल को हिला देती है। इस लड़की के पिता किसान थे और अब आत्महत्या कर चुके हैं। अब यह परिवार कागज के लिफाफे बनाकर अपना पेट पालता है। इस लड़की ने देशभर के लोगों से अपील की है कि वे उसे हर महीने एक पुरानी मैगजीन उसके पते पर भेजें, जिसका वह इस्तेमाल लिफाफा बनाने में कर सके। इससे उसकी मदद तो होगी ही और पर्यावरण की भी मदद होगी। प्लास्टिक की थैलियों का प्रचलन रुक सकेगा। आप नीचे उस बच्ची की अपील पढ़ें और जो कर सकते हैं करें।

From Annie Zaidi, Mumbai
One old magazine = somebody's freedom of livelihood
"I was barely nine when my dear father committed suicide. My mother has worked really hard to send my brother, sister & me to school. She is still working hard to make our two ends meet... all she wants is ONE OLD MAGAZINE from you all, so she can make paper envelopes to earn & save environment... dear uncles & aunties, please-please do send us one old magazine every month to support us, so that we can go to better schools and live our lives with dignity and less suffering. My mother and other widow mothers like her will not hesitate to work hard to earn for us while saving the environment for the nation...I will be waiting with great expectations dear uncles & aunties for ONE OLD MAGAZINE from each one of you every month...If each one of you send one, it will become so many for my mother and other widow mothers to work hard to earn some amount every month...
A very BIG THANK YOU from my brother, sister, my mother and me...
SHEETAL RAMJI BARDE"
our address:
support 4 suicide farmers families, House No: 200 Opp: Dr. Harne's Hospital, Dhantoli Chowk Wardha: 442001


अगर मौका हो तो इस लिंक (South Asia Report) पर इसे भी पढ़ें....

Saturday, August 14, 2010

किसने उठाया भगत सिंह की शहादत का फायदा...जरा याद करो कुर्बानी


जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सेंटर ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के चेयरपर्सन प्रोफेसर चमनलाल ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जीवन और विचारों को प्रस्तुत करने में अहम भूमिका निभाई है। वह भारत की आजादी में क्रांतिकारी आंदोलन की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं और उसे व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव से जोड़कर देखते हैं। प्रो. चमनलाल से बातचीत

जब भी स्वाधीनता आंदोलन की बात होती है, इसके नेताओं के रूप में गांधी, नेहरू और पटेल को ज्यादा याद किया जाता है। भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति श्रद्धा के बावजूद उन्हें पूरा श्रेय नहीं दिया जाता। ऐसा क्यों?

गांधी, नेहरू आदि नेताओं का जो भी योगदान रहा हो, लेकिन भगत सिंह के आंदोलन और बाद में उनके शहीद होने से ही आजादी को लेकर लोगों में जागृति फैली। इसका फायदा कांग्रेस और मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों ने उठा लिया। कुछ दक्षिणपंथी संगठन भी अपने आप को आजादी के आंदोलन में शामिल बताने लगे हैं। वे खुद को पटेल से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं।

लेकिन कुछ इतिहासकार भगत सिंह के संघर्ष को असफल करार देते हैं। वे कहते हैं कि भारत के सामाजिक- आर्थिक हालात उनके पक्ष में नहीं थे...

यह सच है कि भगत सिंह ने जब आंदोलन छेड़ा था, उस वक्त भारत के राजनीतिक हालात उनके पक्ष में नहीं थे। लेकिन आजादी की लड़ाई में वह सबसे कामयाब शख्सियतों में से एक हैं। उन्होंने जो कुछ भी किया, उसके पीछे तर्क था, सोच थी। भगत सिंह का लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं था, व्यवस्था परिवर्तन था। दूसरी तरफ नेहरू, जिन्ना जैसी शख्सियतों का मकसद सत्ता प्राप्ति ही था, जो बाद में साबित भी हुआ।

भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की धारा गदर आंदोलन से निकली है। आप उसे किस रूप में देखते हैं?

1913 में अमेरिका में गदर पार्टी बनी, जिसने कई भाषाओं में गदर नाम से अपना अखबार भी निकाला। फिर 1915 में इस पार्टी ने ही भारत में सशस्त्र आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में शामिल युवकों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। इन्हीं में थे- युवा शहीद करतार सिंह सराभा, जिनसे भगत सिंह बहुत प्रभावित थे। सराभा ही भगत सिंह के आदर्श थे। इस आंदोलन में दक्षिण भारत तक के लोग शामिल थे। सच कहा जाए तो 1857 और 20 वीं शताब्दी में छेड़े गए क्रांतिकारी आंदोलन दरअसल परिवर्तन के आंदोलन थे और परिवर्तन के आंदोलन कभी खत्म नहीं होने वाले हंै। ये आज भी भारत में किसी न किसी रूप में जारी हंै। परिवर्तन के आंदोलन की कई धाराएं रही हैं, किसी पर वामपंथी प्रभाव रहा, किसी पर दक्षिणपंथी प्रभाव तो किसी पर धार्मिक प्रभाव। लेकिन धार्मिक आधार पर छेड़े गए आंदोलनों का क्रांतिकारी आंदोलन से दूर-दूर का रिश्ता भी नहीं था।

यानी गदर आंदोलन के प्रभाव में ही भगत सिंह के भीतर एक विश्वदृष्टि विकसित हुई और उन्होंने अपने संघर्ष को एक बड़े और दीर्घकालीन मकसद से जोड़ा...

भगत सिंह के साथ जुड़ी घटनाओं की गहराई में जाएं तो इस बारे में काफी कुछ पता चलता है। सबसे पहले लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए सांडर्स को मारने का प्लान बना। असेंबली में बम फेंकने का प्लान भी जनसामान्य के जनतांत्रिक अधिकारों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बनाया गया। भगत सिंह ने अपने मुद्दे को पूरी दुनिया के सामने इसके जरिए रखा। वह जानते थे कि उनके किसी भी एक्शन की सजा मौत है। उन्होंने लिखा भी है कि उनकी शहादत के बाद भारत में आजादी के लिए लोग और भी उतावले हो उठेंगे। वह अपने मकसद में कामयाब रहे। अदालत में दिए गए उनके बयान भारत के लिए उनकी दूरदृष्टि का नायाब नमूना हंै। वह सिर्फ भारत की आजादी नहीं चाहते थे बल्कि देश का संचालन सामाजिक आधार पर करना चाहते थे। उन्होंने रूसी क्रांति को सामने रखकर भारत के बारे में सोचा था।

आम जनता महसूस कर रही है कि उसे अब भी वास्तविक आजादी नहीं मिल सकी है। रोज-रोज सिस्टम की नई विसंगतियां सामने आ रही हैं। कहीं स्वाधीनता की लड़ाई में ही कोई बुनियादी गड़बड़ी तो नहीं थी?

हां, बुनियादी गड़बड़ी कांग्रेस की सोच में थी। उसने अंग्रेजों के जाने के बाद देश के निर्माण की जो परिकल्पना की, वह गलत थी। जिस पार्टी में गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद, जैसी महत्वपूर्ण शख्सियतें थीं, उसे उस वक्त देश के चंद धनी वर्ग कंट्रोल कर रहे थे। नेहरू की सोच समाजवादी थी लेकिन वह एक बार भी इस बात का विरोध नहीं कर सके कि गांधी जी क्यों उस समय देश के एक सबसे बड़े औद्योगिक घराने के मेहमान बनते थे। इस धनिक वर्ग की सोच यह थी कि अंग्रेजों के जाते ही सत्ता पर उसका अप्रत्यक्ष कब्जा होगा और देश के आर्थिक व राजनीतिक हालात का फायदा दरअसल वही उठाएगा। ऐसा हुआ भी और नतीजा हमारे सामने है।

साभारः नवभारत टाइम्स, 14 अगस्त 2010

Courtesy: Nav Bharat Times, 14 August 2010

Saturday, August 7, 2010

क्या भारत में एक और गदर (1857) मुमकिन है

महमूद फारुकी तब चर्चा में आए थे जब विलियम डेल रेम्पेल की किताब द लास्ट मुगल आई थी। लेकिन इस वक्त यह शख्स दो खास वजहों से चर्चा में है, एक तो उनकी फिल्म फिल्म पीपली लाइव आने वाली है दूसरा उनकी किताब बीसीज्ड वायसेज फ्रॉम दिल्ली 1857 पेंग्विन से छपकर बाजार में आ चुकी है। 1857 की क्रांति में दिल्ली के बाशिंदों की भूमिका और उनकी तकलीफों को बयान करने वाली यह किताब कई मायने में अद्भभुद है। महमूद फारूकी ने मुझसे इस किताब को लेकर बातचीत की है...यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 7 अगस्त 2010 को प्रकाशित हो चुका है। इसे वहां से साभार सहित लिया जा रहा है...

इसे महज इतिहास की किताब कहें या दस्तावेज

इसे दस्तावेज कहना ही ठीक होगा। यह ऐसा दस्तावेज है जो लोगों की अपनी जबान में था। मैंने उसे एक जगह कलमबंद करके पेश कर दिया है। लेकिन अगर उसे जिल्द के अंदर इतिहास की एक किताब मानते हैं तो हमें कोई ऐतराज नहीं है।

आपने इसमें क्या बताया है

यह 1857 में दिल्ली के आम लोगों की दास्तान है। अंग्रेजों ने शहर का जब घेराब कर लिया तो उस वक्त दिल्ली के बाशिंदों पर क्या गुजरी। यह किताब दरअसल यही बताती है। इतिहास में 1857 की क्रांति को अलग-अलग नजरिए से पेश करने की कोशिश की जाती रही है। उस वक्त के इतिहास को जिन लोगों ने कलमबंद किया, उनके अपने-अपने हीरो इस क्रांति को बयान करते नजर आते हैं लेकिन जिस दिल्ली में अंग्रेजों ने सबसे बड़ा कत्लोगारत किया, उसका जिक्र कम है। इस किताब में दिल्ली के लोगों की रोजमर्रा जिंदगी पर क्या बीती, उन्हें किस तरह दरबदर होना पड़ा है, यह घटनाओं सहित बताया गया है। यह भारत की पहली ऐसी क्रांति थी जिसमें आम लोगों शामिल थे। लोगों में एक विश्वास था कि वे अंग्रेजों को उखाड़ फेकेंगे। ऐसा हुआ भी लेकिन इस क्रांति का श्रेय आम लोगों को नहीं मिला। यह क्रांति अपने वजूद, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा को कायम रखने के लिए थी। कांग्रेस, महात्मा गांधी व आजादी के अन्य हीरो बाद में पिक्चर में आए। लेकिन बाद के इतिहास को जितना बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया, उतना 1857 के इतिहास को नहीं।

इसे कलमबंद करने का विचार कैसे आय़ा

द लास्ट मुगल पर काम करते वक्त दरअसल विलियम डेलरेम्पेल और मैंने वह दस्तावेज देखे थे। 1857 में दिल्ली के लोगों ने उस वक्त की हुकूमत के अफसरों और शहजादों को खत और शिकायतें लिखी थीं कि अंग्रेजों के कब्जे के दौरान उन पर क्या गुजर रही है। किसी में इस बात का जिक्र था कि अंग्रेजी फौज का सिपाही उसकी बीवी को लेकर भाग गया है, किसी ने लिखा है कि उसे 20 दिन से पान तक खाने को नहीं मिला और वह एकतरह से नजरबंद होकर रह गया। किसी को एक महीने तक दाल खाने को नहीं मिली। उन खतूत को देखने के दौरान ही यह ख्याल आया कि क्यों न दिल्ली के बाशिंदों पर जो गुजरी है, उसे एक किताब की शक्ल में सामने आय़ा। पेंग्विन वालों को भी यह आइडिया पसंद आया और उन्होंने काम करने की सहमति दे दी।

तो यह सारे दस्तावेज जो खतों की शक्ल में हैं, कैसे बचे रह गए

दरअसल, अंग्रेज बहादुर शाह जफर को अंग्रेजी हुकूमत का गद्दार साबित करने के लिए सुबूत जुटा रहे थे। उन्होंने ही इन सारे खतों को इकट्ठा किया था और एक जगह सुरक्षित रख दिया। बाद में यह राष्ट्रीय अभिलेखागार (नैशनल आरकाइव्ज) की संपत्ति बन गए। यह सारे खत या तो पर्शियन (फारसी) या फिर शिकस्ता उर्दू में हैं।



इन सारे दस्तावेजों की कोई बहुत खास बात

देखिए जब अंग्रेजों ने इस शहर पर कब्जा किया तो उन्होंने सबसे पहले यहां के लोकल लोगों को शहर से बाहर जाने को मजबूर कर दिया। इसके बाद जब लोकल लोगों को आने की इजाजत मिली तो सबसे पहले हिंदुओं को शहर में घुसने दिया गया और उसके बाद मुसलमानों को। शहर की जामा मस्जिद मुसलमानों को 1862 में वापस सौंपी गई और इससे पहले अंग्रेजों और इसके अफसरों ने इसकी बेहुरमती में कोई कसर नहीं छोड़ी। मस्जिद के अंदर अंग्रेज फौजों ने अपने घोड़े बांधे और बूट पहनकर चले। वह पांच साल का वक्त दिल्ली के लिए बहुत बुरा बीता। इस किताब से यह भी पता चलता है कि बहादुर शाह जफर ने दिल्ली के लोगों की मदद से किस तरह अंग्रेज फौजों का अंतिम समय तक मुकाबला किया। दिल्ली के हर मजहब के लोगों ने किस तरह जफर की मदद की।

तो किस तरह के धार्मिक आघात लग रहे थे

उस वक्त दीन धर्म के तहत बहुत ऐसी चीजें आती थीं जिन्हें आज हम धर्म का हिस्सा नहीं समझते। ऐसे खत भी मिले हैं जिसमें लोगों ने शिकायत की है कि जिस हकीम के पास वे इलाज के लिए जाते थे, उसे नुस्खा नहीं लिखने दिया जाता था। अंग्रेज डरते थे कि क्या पता इसके जरिए उर्दू में कोई संदेश शहर में फ्लैश कर दिया जाए। उस वक्त साहित्य की स्थिति तो बहुत अच्छी थी लेकिन अंग्रेजी पढ़ने के लिए माहौल बनने लगा था और इसे अंग्रेजों की तरफ से काफी बढ़ावा भी मिल रहा था।

1857 की क्रांति और मौजूदा दौर कहीं आपस में जुड़ते हैं

यह दुखद है कि देश के पहले बड़े जनआंदोलन को कोर्स की किताबों में चंद पेज का चैप्टर बना दिया गया। भारत के लोगों ने जगह-जगह जिस आत्मविश्वास से अंग्रेजों का मुकाबला किया, वैसा आत्मविश्वास फिर किसी आंदोलन में नहीं दिखा। यह ऐसा आंदोलन था जिसे लोगों ने अपने देश को बचाने, अपने स्वाभिमान को बचाने, अपनी सेकुलर तहजीब को बचाने के लिए छेड़ा था। भारत के लोगों से आज जिस तरह छिपे रूप में और विभिन्न शक्लों में उसकी आजादी छीनी जा रही है, मानवता का गला घोंटा जा रहा है, धर्म के नाम पर राजनीति की जा रही है, लोगों को लड़ाया जा रहा है, दरअसल आज जरूरत 1857 के उसी नफरत वाले विद्रोह की है। लेकिन उस विद्रोह को अंग्रेजों से ज्यादा भारत में राज करने वाली हुकूमतों ने कहीं गहराई में दफना दिया है। लोगों में अब वह आत्मविश्वास बाकी नहीं बचा है जो उन्होंने 1857 में दिखाया था।

आपकी फिल्म पीपली लाइव आने से पहले चर्चा में है और उसके गाने भी लोगों की जबान पर हैं, क्या आपके विचारों की उसमें कहीं झलक मिलेगी

इस फिल्म को मैंने अपनी पत्नी अनुषा रिजवी के साथ डायरेक्ट किया है। बस इतना कह सकता हूं कि फिल्म आने दीजिए और फिर बताइएगा कि आजकल के हालात पर हम लोग कितनी सटीक टिप्पणी कर पाए हैं। यह फैसला भारत की जनता और मीडिय़ा पर छोड़ता हूं।

Courtesy: Nav Bharat Times, 7th August 2010

नोट – पीपली लाइव (Peepli Live)फिल्म का यह गाना खासा पॉपुलर हो चुका है। आप उसकी एक झलक यहां देख सकते हैं। यह फिल्म इसी महीने रिलीज होने वाली है।

Friday, August 6, 2010

भजन और अजान को मधुर और विनम्र होना चाहिए

अजान की आवाज आपने कभी न कभी जरूर सुनी होगी। इसमें एक तरह का निमंत्रण होता है नमाजियों के लिए कि आइए आप भी शामिल हो जाएं ईश्वरीय इबादत में। अजान का उद्घोष आपका रुख ईश्वर की ओर मोडऩे के लिए होता है।

पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने अपने समय में हजरत बिलाल को खास तौर पर अजान देने का निर्देश दिया था। हजरत बिलाल का उस समय अरब समाज में जो स्टेटस था, वह बाकी लोगों के मुकाबले बहुत निम्न स्तरीय था। वह ब्लैक थे और एक यहूदी के यहां गुलाम थे। उन्हें पैगंबर मोहम्मद साहब ने ही आजाद कराया था। उन्होंने अजान के लिए हजरत बिलाल का चयन बहुत सोच समझकर किया था। इस्लाम की तारीख में पैगंबर के इस फैसले को इतिहासकारों ने सामाजिक क्रांति का नाम दिया है।

अजान में जो बात पढ़ी जाती है, उसका मतलब है इबादत के लिए बुलाना। इसमें इस बात को भी दोहराया जाता है कि और कोई ईश्वर नहीं है। अरब में जब इस्लाम फैला और अजान की शुरुआत हुई, उन दिनों लाउडस्पीकर नहीं थे। सुरीली आवाज में अजान का प्रचलन सिर्फ इसलिए शुरू हुआ कि लोगों तक यह सूचना सुखद ढंग से पहुंचे कि नमाज का वक्त हो चुका है।

जब लाउडस्पीकर - माइक का आविष्कार हो गया तो लोगों तक यह संदेश पहुंचाने में सुविधा हो गई। लेकिन अजान देने के उस तरीके पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जो पैगंबर के समय में प्रचलित था। किताबों में मिलता है कि विभिन्न देशों में अलग-अलग समय में अनेक लोग सिर्फ अजान की अपनी सुरीली आवाज के लिए प्रसिद्ध और सम्मानित हुए थे। आज भी यह रुतबा एकाध लोगों को ही हासिल है। उनकी आवाज सुन कर लोग खुद खिंचे चले आते हैं।

लेकिन कई बार अजान इतनी कर्कश आवाज में सुनाई देती है कि वह सुनने वाले को मुग्ध करने और प्रेरित करने की जगह किसी असुखद शोर जैसा प्रभाव डालता है। अजान देने के लिए जिस प्रतिभा और प्रयास की दरकार होती है, उसके प्रति हम तनिक गंभीर नहीं दिखाई देते।

गुरुद्वारों में रागी गुरुवाणी पढ़ते समय आवाज को अद्भुत ढंग से संतुलित करते हैं। इसके लिए वे रोजाना घंटों रियाज करते हैं। वैसी ही कोशिश अजान को लेकर भी होनी चाहिए। अजान ऐसी हो कि लगे कि आपके कानों में कोई रस घोल रहा हो।

ईसाईयों में कैरल गायन के दौरान ऐसा ही होता है। कैरल में वे लोग ईसा मसीह की वंदना करते हैं। हर चर्च अपनी कैरल टीम तैयार करता है। लेकिन हर किसी को कैरल गाने का अधिकार नहीं मिलता। टीम के लोगों को इसकी तैयारी के लिए खासी मेहनत करनी पड़ती है।


ईश्वर की वंदना के लिए हिंदू धर्म में भजन-कीर्तन का प्रचलन है। आजकल तो भगवती जागरण का खासा क्रेज है। लेकिन वहां भी भजन गायन के लिए किसी अभ्यास या प्रशिक्षण की जरूरत को महत्व नहीं दिया जाता। यही वजह है कि अक्सर भक्त जन ऐसे आयोजनों पर फिल्मी धुनों की पैरोडी बना कर भजन गाते नजर आते हैं। कई बार वह कर्कश शोर बन कर रह जाता है।

अब रमजान जल्द शुरू होने वाले हैं। जिन मस्जिदों से तेज आवाज में अजान नहीं सुनाई देती, वहां से भी रमजान के दिनों में तेज अजान सुनाई देती है, सुबह और शाम के वक्त की अजान की टोन में फर्क आ जाता है। वह हमेेशा सुरीली हो एक जैसी हो। न तो अजान देने वाले को कोई हड़बड़ी हो और न ही उस अजान को सुनने वाले को कोई असुविधा हो।

ईश्वर की वंदना में कर्कश स्वरों की कोई जरूरत नहीं होती। अजान या भजन में आवाज की जरूरत तो दूसरों को प्रेरित करने के लिए पड़ती है। यदि उसमें मधुरता और विनम्रता न हो तो वह इबादत का हिस्सा नहीं बन सकती।

(नवभारत टाइम्स 6 अगस्त से साभार)

Thursday, July 22, 2010

आइए मिलबांटकर खाएं

क्या आप मिलबांटकर खाने में यकीन रखते हैं। नहीं रखते तो समझिए आपकी जिंदगी बेमानी है। हो सकता है आपकी मुलाकात मिलबांटकर खाने वालों के गिरोह से हुई हो। चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से। कोई ताज्जुब नहीं कि आप भी इसमें शामिल रहे हों। क्योंकि मैं भी तो इसमें शामिल हूं। मैं कैसे मान लूं कि मेरे अलावा बाकी सारे या आप ही राजा हरिश्चंद्र की औलाद हैं और मिलबांटकर खाने में यकीन नहीं रखते।

अगर आपने मिलबांटकर खाना शुरू नहीं किया है तो शुरू कर दें। अब भी समय है। हालांकि कई लोग चुपचाप इस काम को अंजाम देना चाहते हैं लेकिन समयचक्र बदल चुका है। अगर आपके मिलबांटकर खाने की बात सार्वजनिक नहीं हुई है तो भी मुश्किल में पड़ेंगे। जरा अपने दफ्तर के माहौल को याद कीजिए। जो अफसर या बाबू राजा हरिश्चंद्र की औलाद बनने की कोशिश करता है बड़े अफसर या बड़े बाबू के तमाम गुर्गे उसका मुर्गा बनाकर खा जाते हैं। वह अजीब सी मुद्रा लिए दफ्तर में आता है और शाम को उसी तरह विदा हो जाता है। सारे काम का बोझ उसी पर रहता है। जो लोग मिलबांटकर खाने वाले गिरोह में शामिल होते हैं वे सुबह-दोपहर-शाम रोजाना मिलबांटकर कहकहे लगा रहे होते हैं। उनके बदन से किसी महंगे इत्र की खुशबू आ रही होती है या फिर ब्रैंडेड कपड़ों (Branded Cloths) से चाल-ढाल बदली हुई होगी।

आप कहेंगे जमाना बदल चुका है। नई पीढ़ी टेक सैवी (Tech Savvy ) है। वह जितना कमाती है, उससे ज्यादा खर्च करने में यकीन रखती है। ब्रैंडेड वस्तुएं उसके रोम-रोम में बसी हुई होती हैं। आप सही कह रहे हैं लेकिन वह तो मिलबांटकर खाने वालों के ही साम्राज्य की पैदाइश है न। मल्टीनैशनल कंपनियां (MNC) हों या फिर इंडियन मल्टीनैशनल (India MNC) हों। कहां नहीं है ऐसे लोगों का गिरोह। हां उसे नाम बदलकर थोड़ा सम्मान के साथ इस तरह भी कह सकते हैं – मिलबांटकर खाने वालों का कॉरपोरेट वर्ल्ड (Corporate World)। वह सीधे कॉलेज-यूनिवर्सिटी से लड़के-लड़कियों को सेलेक्ट कर अपने गिरोह में शामिल करता है। उन्हें पहले तो कॉरपोरेट कल्चर (Corporate Culture) और इस देश के बाकी कल्चर का अंतर समझाया जाता है। फिर उसे मैदान में उतारा जाता है। अब अगर वह कॉलसेंटर (Call Centre) की टंटपुंजिया नौकरी में नहीं है और साफ्टवेयर (Software) बनाने के काम में लगाया गया है तो उसे बताया जाता है कि इन्फोसिस (Infoysis)कंपनी का साफ्टवेयर उड़ाकर क्लोन करना है और उसमें दो नई कमांड देकर उसे आईबीएम (IBM) का बना देना है। यह इसका उल्टा भी हो सकता है यानी आईबीएम का उड़ाकर इन्फोसिस का बना देना। सत्यम (Satyam) का किसी में मत लगाना, किसी दबे पड़े स्कैम (Scam) में फंसने का जोखिम हो सकता है।

यह गिरोह सिर्फ आईटी कंपनी तक ही सीमित नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में उसका दखल है। मीडिया (Media) को ही ले लीजिए। वह किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे की खबर सीधे उसके पैड पर छापने के लिए तैयार नहीं है। हां उसी नत्थू खैरे ने अगर किसी पीआर कंपनी (PR CO.) को हायर कर लिया है और उस पीआर कंपनी की बाला उस प्रेसनोट को लेकर मीडिया हाउस तक पहुंच जाती है तो खबर बनकर रहेगी। क्योंकि नत्थूखैरे की ब्रैंड वैल्यू वह पीआर कंपनी तय करती है।...बाबू पेड न्यूज (Paid News) का जमाना है। हर चीज स्पांसर है। कान चाहे जैसे पकड़ो।
मिलबांटकर खाने वाले कॉरपोरेट ने ऐसी पीढ़ी की आंख में धूल झोंकने के लिए नया दे दिया है वर्क अल्कोहिलक (Work Alcoholic ) । यानी वह शराब बेशक न पीता हो लेकिन उसे बड़े प्यार से काम के बोझ की शराब पिलाई जाती है। बेचारे एक टेक सैवी के बारे में पिछले दिनों खबर आई कि पिज्जा कल्चर (Pizza Culture) ने उन्हें कैसे कैंसर (Cancer) के कगार पर पहुंचा दिया। अब इस शनीचर को खबर आई कि वह चल बसे। पूरे श्मशान घाट में सिर्फ और सिर्फ उनके वर्क अल्कोहलिक होने की चर्चा रही।

ऐसा नहीं है कि मिलबांटकर खाने वाले कॉरपोरेट ने इनके मनोरंजन के लिए कोई इंतजाम नहीं किया। उसने इनके आसपास ऐसा माहौल बनाया कि यह लोग सिर्फ और सिर्फ खाने-पीने के बारे में बातें करें। उसे सुबह-सुबह टीवी पर मौर्या शेरटन होटल में नाश्ता परोसने का दृश्य दिखाने से लेकर अखबार में चांदनी चौक में फुटपाथ पर बेचने वाले राधेश्याम की थर्ड क्लास कचौड़ी तक के बारे में बताया जाता है। इससे भी बात नहीं बनी तो उसे थाईलैंड से लेकर ऊंटी तक के देशाटन पैकेज के बारे में बताया जाता है। उसे बताया जाता है कि यह पैकेज सिर्फ वर्क अल्कोहलिक लोगों के लिए है क्योंकि जो वेतन उन्हें मिलता है, सिर्फ वे ही इसे अफोर्ड कर सकते हैं। बाकी लोग पतली गली से निकल लें। यानी राजा हरिश्चंद्र की औलादों के बारे में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है।

हो सकता है कि आप के पास यक्ष प्रश्न हो। कैसे खाएं...मेरे पास तो मौका ही नहीं है। भई ऐसे लोग उस कहानी को क्यों नहीं याद करते जिसकी ड्यूटी समुद्र के किनारे लहरें गिनने की थी और उसने उसमें भी जुगाड़ तलाश लिया था। वह उसी मछुआरे को लहरों की सही गिनती बताता था जो मछुआरा उसे दो मछली देने का वादा करता। इस तरह वह एक-दो किलो मछली का जुगाड़ कर लेता और बाजार में बेच देता था। कैश जेब में। बस, मेरे पास तो इसी तरह की गैरपंचतंत्र वाली कहानियां हैं भइये, इसी में से मिलबांटकर खाने का जुगाड़ तलाश लो। शेष वीरूभाई अंबानी की औलादों से पूछ लो।

Tuesday, July 13, 2010

पहले फतवा...बाकी बातें बाद में


भारत में इस्लाम को भी समसामयिक बनाने के प्रयास जारी हैं, लेकिन चर्चा सिर्फ फतवों पर हो रही है

उदाहरण नं. 1 - टाइम्स ऑफ इंडिया में 21 जून को एक खबर थी कि सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी है।

उदाहरण नं. 2- नवभारत टाइम्स में 19 जून को खबर छपी कि यूपी मदरसा बोर्ड ने अपने पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए अब अंग्रेजी, हिंदी और कंप्यूटर की पढ़ाई अनिवार्य कर दी है।

इन दोनों उदाहरणों में मौजूद खबरें अखबारों में वह जगह नहीं बना सकीं जितनी जगह आम तौर पर फतवे पा लेते हैं। इनके बरक्स पिछले दिनों दारुल उलूम देवबंद (Darul Uloom Deoband) के विवादित फतवों की खबरें तमाम अखबारों में गैरजरूरी जगह पाती रहीं। इन फतवों पर अपनी बाइट देने के लिए टीवी चैनलों पर कुछ स्वयंभू मौलाना-मौलवी और विशेषज्ञ भी रातोंरात पैदा हो गए। अप्रैल और मई महीने में फतवों का ऐसा दौर चला कि लगा जैसे उलेमाओं के पास फतवा देने के अलावा और कोई काम ही नहीं है, हालांकि इस बार मुसलमानों का एक बहुत बड़ा वर्ग इन फतवों पर चल रही बहस को देखकर कसमसा रहा था।

बाइट और बतंगड़
हाल ही में सुन्नी मुसलमानों की बरेलवी विचारधारा (Sunni Bareillyavi Sect) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खां ने उनकी इस कसमसाहट को सामने रखा। उनका कहना है कि मीडिया, खासकर टीवी चैनल वही बात उठाते हैं जिसे उनको बाजार में बेचना होता है। उनका संगठन दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी जिस मांग पर धरना दे रहा था, उसे कवर करने के बजाय टीवी चैनल के लोग उनसे फतवों पर बाइट मांग रहे थे। इसी बात को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष और शिया धर्मगुरु (Shia Cleric) मौलाना कल्बे सादिक ने दूसरे ढंग से कहा। उनका कहना है कि तमाम तरह के फतवे जारी करना उन उलेमाओं की बेवकूफी और मीडिया की चालाकी है। उलेमा मीडिया (Media) के जाल में फंस रहे हैं। मीडिया फतवों की आड़ में उलेमा का शोषण करना चाहता है और उलेमा भी इसके लिए तैयार रहते हैं।

इमेज का बंधन
मौलाना तौकीर रजा खां और मौलाना कल्बे सादिक की बातें फतवों के इस दौर में महत्वपूर्ण हैं। इनकी बातों और ऊपर दी गई दो खबरों के उदाहरणों का आपस में गहरा रिश्ता है। मुसलमानों के एक बहुत बड़े तबके में बदलाव की इस इच्छा को साफ देखा जा सकता है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र, भारतीय मुसलमान बदलना चाहते हैं। लेकिन मीडिया और राजनीतिक दल उनको उसी इमेज में बांधे रखना चाहते हैं, जो पिछले कई दशकों से बनी है। अब जिस तरह से राइट टु एजुकेशन कानून (Right to Education Law) का विरोध शुरू हो गया है, वह मुसलमानों को उसी कठमुल्ले वाली इमेज में फंसाए रखने की साजिश है।

हाल ही में जब सिविल सर्विसेज परीक्षा में कश्मीरी युवक शाह फैसल ने टॉप किया तभी लोगों ने जाना कि दिल्ली का जामिया हमदर्द होनहार गरीब युवकों के लिए इस तरह का सेंटर भी चला रहा है, जहां फैसल जैसे युवक तैयार किए जाते हैं। बटला हाउस एनकाउंटर के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया की छवि ऐसी बनाने की कोशिश हुई कि जैसे यहां बड़ी तादाद में ऐसे युवक पढ़ाई कर रहे हैं जिनका आतंकवाद से रिश्ता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो उलेमा अपना चेहरा दिखाने के लिए उतावले रहते हैं, क्या वे इस पर ठंडे दिल से विचार करने को तैयार हो सकते हैं कि ऐसी इमेज बनाने वालों का सामना किस तरह से किया जा सकता है? लेकिन नया विवाद इस इमेज को कहां बदल सकेगा।

एक हजार साल पहले शरीयत (Sharaiat) के हिसाब से कलमबंद किए गए फतवों को अब भुनाने की वजह समझ से बाहर है। बल्कि मौलाना कल्बे सादिक और मौलाना तौकीर रजा खां के शब्दों में कहें तो उन फतवों का बतंगड़ बनाने का तुक नहीं है। जो हिदायत एक हजार साल पहले दी गई थी, क्या उसे मौजूदा वक्त की कसौटी पर रखकर सही माना जा सकता है? पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब से जुड़ी हुई हजारों हदीसें तमाम फिरकों की किताबों में मौजूद हैं। क्या जरूरी है कि उन बातों की आड़ में या उन्हें सामने रखकर पूरी कौम को ही उलझा दिया जाए। वक्त आ गया है कि आम मुसलमान बदलाव को स्वीकार करे। इज्तेहाद (समसामयिक) के लिए जरूरी है कि जेहनों के दरवाजे खोले जाएं। इससे किसी पर कोई अजाब (अल्लाह का प्रकोप) नहीं पडऩे वाला है।

आधुनिकता की चादर ओढ़े कुछ स्वयंभू लोग इस्लाम की 'अपनी व्याख्याÓ के साथ टीवी चैनलों तक पहुंचने लगे हैं। इन पर भी जब कोई अजाब नहीं पड़ रहा तो आम मुसलमान, जो इन लोगों के मुकाबले नमाज, रोजे, हज, जकात का कहीं ज्यादा पाबंद है और कुरान शरीफ की तिलावत करता है, उस पर अजाब क्यों पड़ेगा। वह तो फतवों से ऊपर उठकर जीना चाहता है। यूपी मदरसा बोर्ड की एक पहल का जिक्र ऊपर के उदाहरण में हुआ है। यूपी के 16 हजार मदरसों में से 2400 इस बोर्ड से संबद्ध हैं। बोर्ड के सिलेबस में अंग्रेजी, हिंदी और कंप्यूटर एजुकेशन हासिल करने के लिए जो बदलाव किया गया है उससे 13,600 मदरसे वंचित रहेंगे। ये मदरसे जरूर किसी न किसी उलेमा के नियंत्रण में होंगे या उस फिरके की विचारधारा से प्रभावित होंगे। हो सकता है कि इनमें बहुत अच्छी पढ़ाई होती हो, लेकिन बदलाव की जो पहल यूपी मदरसा बोर्ड (UP Madrasa Board) ने की है, उससे तो ये वंचित ही रह जाएंगे।

क्यों न बदले सिलेबस
यह हाल सिर्फ एक राज्य का है। ऐसे न जाने कितने मदरसे देश के तमाम राज्यों में हैं। वहां के बोर्ड इस तरह की पहल करते हैं या नहीं, कम से कम वह बात सामने नहीं आ पाती है। आखिर मदरसों का सिलेबस बदलने में किसका भला है? उलेमाओं को चाहिए कि वे अपने-अपने मदरसों में सिलेबस बदलने से ही बदलाव की शुरुआत करें। दीनी तालीम जरूर दी जाए लेकिन उसके साथ-साथ मौजूदा दौर की शिक्षा से भी बच्चों को जोडऩे की जरूरत है। अरब मुल्कों में तो यह बदलाव बहुत पहले शुरू हो चुका है। अबूधाबी यूनिवर्सिटी में अब 9000 स्टूडेंट्स पढऩे के लिए फॉर्म भरते हैं। ईरान (Iran) में वहां के युवक अपने देश को न्यूक्लियर टेक्नॉलजी (Nuclear Technology) में सक्षम बनाने में जुटे हुए हैं। फिर ऐसी पहल भारत में क्यों नहीं हो सकती।

(साभारः नवभारत टाइम्स 13 जुलाई 2010 संपादकीय पृष्ठ)

Sunday, June 27, 2010

बिंदी के मोहपाश में फंसी एक अमेरिकी लेखिका

आजकल अनेक अमेरिकी लोग भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर उसके प्रचार-प्रसार में लग गए हैं। ब्रिटनी जॉनसन उनमें से एक हैं। अपनी किताब 'कलर फॉर किड्स' से चर्चा में आईं ब्रिटनी आजकल भारतीय बिंदी को अमेरिका में लोकप्रिय बनाने के लिए अपने ढंग से सक्रिय हैं। ब्रिटनी ने यूसुफ किरमानी को दिए ई-मेल इंटरव्यू में भारतीय संस्कृति और अपने बिंदी आंदोलन पर खुलकर बात की... ब्रिटनी का यह इंटरव्यू शनिवार (26 जून 2010) को नवभारत टाइम्स में संपादकीय पेज पर प्रकाशित किया गया है। इसे वहीं से साभार लिया जा रहा है।
अमेरिका में आजकल योग और भारतीय जीवन पद्धति की काफी चर्चा है। इसकी कोई खास वजह?
मैं भारतीय संस्कृति और योग की कहां तक तारीफ करूं। यह बहुत ही शानदार, उत्सुकता पैदा करने वाली और आपको व्यस्त रखने वाली चीजें हैं। आप जानकर हैरान होंगे कि न्यू यॉर्क शहर में योग इतना पॉपुलर है कि जब किसी संस्था को योग टीचर की जरूरत होती है तो दो सौ लोग उसके ऑडिशन में पहुंचते हैं। कीर्तन म्यूजिक के तो कहने ही क्या। मेरे जैसे बहुत सारे अमेरिकी ड्राइव करते हुए कार में कीर्तन सुनते हैं और गुनगुनाते हैं। योग क्लास रोजाना जाना हमारी दिनचर्या में शामिल हो गया है। मैं तो इससे इतनी ज्यादा प्रेरित हूं कि योग टीचर बन गई। इससे दिलोदिमाग लचीला बनता है। अपने प्रति रवैया तो बदलता ही है, हम दूसरों के प्रति भी सहिष्णु और दयालु होते हैं। सही मायने में भारतीय संस्कृति और योग जैसी चीजें अमेरिकी लोगों को उनकी रोजमर्रा जिंदगी के लिए गिफ्ट की तरह हैं।

आप तो अमेरिका की संस्कृति में पली-बढ़ी हैं। योग के बाद अचानक बिंदी की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ?
पहले योग, फिर आयुर्वेदिक दवाएं, कीर्तन म्यूजिक और हां अब बिंदी के प्रति मेरा झुकाव साफ है। मैं तो इन सभी को भारतीय संस्कृति की ओर से एक गिफ्ट मानती हूं...। परंपरागत भारतीय बिंदी लगाने का जो तरीका है, उसको मैंने यहां नए तरीके से पेश किया है। मैंने जिस योगा बिंदी (Yoga Bindi)को डिजाइन किया है, वह आज के फैशन सीन के मद्देनजर किया गया है। योगा बिंदियां साइज में बड़ी हैं और शरीर के किसी भी हिस्से में उन्हें लगाया जा सकता है। अमेरिका में टैटू और गोरी कलाइयों पर न जाने क्या-क्या बनवाने का फैशन जोरों पर है। मेरा मानना है कि योगा बिंदी (Yoga Bindi), जो आपकी स्किन को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती, उस टैटू से कहीं ज्यादा खूबसूरत है। इसे लगाने के लिए इंजेक्शन की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह टैटू के मुकाबले ज्यादा कलरफुल और मजे वाली चीज है।
क्या आप अमेरिका में बिंदी को इसके कल्चर का हिस्सा बनाने के लिए आंदोलन छेड़ने का इरादा रखती हैं?
हां बिल्कुल। मैं एक बिंदी बुक (Bindi Book)भी लिख रही हूं। मैंने योगा बिंदी को ओमेगा और कृपालु आनंद आश्रम में पेश भी किया है। उत्तर पूर्व अमेरिका में बहुत बड़े योग कॉन्फ्रेंस सेंटर हैं। सितंबर में मैं क्लोरेडो में होने वाली योगा जर्नल कॉन्फ्रेंस में जा रही हूं और योगा बिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्च करूंगी। मेरा मकसद है योगा बिंदी को लोकप्रिय बनाना, जो माथे पर लगाने के अलावा बॉडी स्टाइल की बिंदी (Body Style Bindi)भी है। मैं तो चाहती हूं कि सभी महिलाएं बिंदी लगाएं, बेशक वह अमेरिकी ही क्यों न हों।

दीपक चोपड़ा ने अमेरिका में जिस तरह योग और भारतीय जीवन पद्धति को पॉपुलर किया, उसे आप किस रूप में देखती हैं?
मैं दीपक चोपड़ा से काफी प्रभावित हूं। उनकी वजह से यूएस में योग और भारतीय कल्चर को पहचान मिली। बहुत साल पहले जब दीपक यूएस के सबसे लोकप्रिय टीवी शो ओपेरा विनफ्रे शो (Opera Winfray Show)में आए थे, तब मैंने उनको देखा था। जब उन्होंने अपनी किताब और अन्य चीजों पर बोलना शुरू किया तो मुझे लगा कि यह सब पूरी तरह सच है और मेरी सोच के करीब है। उसके बाद मैं उनकी फैन बन गई। मैंने अपनी किताब में दीपक को याद किया है।
अपनी किताब (Color4Kids)में आपने ब्लैक बच्चों को, जिन्हें भारतीय अपने नजदीक पाते हैं, क्यों फोकस किया?
मैं तो हर बच्चे को खूबसूरत मानती हूं, स्पेशल मानती हूं और मेरा मानना है कि उन्हें भी वही सम्मान और मान्यता मिलनी चाहिए जिसे सोसायटी के बाकी लोग चाहते हैं। चाहे वे बच्चे यूएस के हों, भारत के या फिर इथोपिया के। इन सभी देशों के बच्चों को गौर से देखिए, उनके बाल, उनकी आंखें और स्किन टोन क्या अलग लगते हैं? मेरी किताब बहुत ही सिंपल है जो बताती है कि किस बच्चे पर कौन सा रंग जमेगा और इससे वह बच्चा खुद को परफेक्ट मानते हुए उसे उसी रूप में स्वीकार करेगा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ गोरी चमड़ी वाले बच्चों पर कोई रंग जमता है। जब मैं इस किताब को छपवाने के लिए पब्लिशर्स के पास भटक रही थी तो उन्होंने भी यह सवाल किया था। सभी उस काले रंग वाली लड़की की तरफ आकर्षित हुए थे जो मेरी किताब के कवर पर थी, किसी ने उस गोरे लड़के का जिक्र नहीं किया जो मेरा बेटा है। वह उस कवर पर एक कोने में था।

Saturday, June 12, 2010

क्या हो मीडिया की भाषा



अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के सेंट लुई कैंपस में भाषा विज्ञान के प्रफेसर डॉ. एम. जे. वारसी मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं। अब तक भाषा विज्ञान से जुड़े उनके 25 शोधपत्र और अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। यूनिवर्सिटी आफ बर्कले ने उन्हें हाल ही में सम्मानित किया है। उसके बाद अमेरिका में भाषा विज्ञान के मामले में भारत की कद बढ़ी है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी (एएमयू) के छात्र रह चुके डॉ. वारसी से यूसुफ किरमानी की बातचीत। यह इंटरव्यू शनिवार 12 जून 2010 को नवभारत टाइम्स में संपादकीय पेज पर छपा है। वहां से इसे साभार लिया जा रहा है।



आपकी किताब लैंग्वेज एंड कम्युनिकेशन की काफी चर्चा हो रही है। आप मीडिया के लिए किस तरह की भाषा का सुझाव देना चाहते हैं?
मैंने इसी विषय से जुड़ा पेपर वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के लिए तैयार किया था। बाद में इस पर किताब लिखने का प्रस्ताव मिला। इस किताब में मैंने इस बात को उठाया है कि मीडिया की भाषा कैसी होनी चाहिए और चूंकि मीडिया सीधे आम आदमी से जुड़ा है तो इसके इस्तेमाल की क्या तकनीक होनी चाहिए। मैंने एक बात खासतौर पर रेखांकित की है कि मीडिया की भाषा साहित्यिक नहीं होनी चाहिए। उसमें उन शब्दों का ही इस्तेमाल हो जिसे सोसायटी ने अपना लिया है। मसलन आपके दफ्तर का चपरासी यह नहीं बोलेगा कि साहब आज कार्यालय नहीं आएंगे। वह यही कहेगा कि साहब आज ऑफिस नहीं आएंगे। मैंने एक और बात पर जोर दिया है कि वाक्य बहुत लंबे नहीं होने चाहिए। वाक्य लंबे होने से वह लेख या खबर बोझिल हो जाती है। अमेरिका के कई अंग्रेजी अखबार पहले इन सब चीजों की परवाह नहीं करते थे लेकिन अब उन्होंने भी इस तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है।

तो क्या नवभारत टाइम्स की भाषा इस मामले में यूनीक मानी जानी चाहिए?
यकीनन। इसी ने इस तरह की भाषा की शुरुआत की है तो इसका श्रेय इसे नहीं देंगे तो किसे देंगे। लेकिन मैं इस बात को फिर दोहरा रहा हूं कि आप हिंदी का कोई वाक्य बनाते समय सिर्फ उन्हीं शब्दों का चयन करें जिसे सोसायटी ने अपना लिया हो। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम लोग शब्दों को जबरन मनवाने पर तुल जाएं।

बतौर भाषा वैज्ञानिक आप भारत को किस स्थिति में पाते हैं?
भाषा के नजरिए से भारत दुनिया का सबसे धनी देश है। अमेरिका और अन्य देशों में लोग मुझसे बातचीत के दौरान इस बात पर हैरानी जताते हैं कि इतनी भाषाएं और संस्कृति होने के बाद भी यह देश कैसे सरवाइव कर रहा है। यहां की भाषा और संस्कृति से पूरी दुनिया में इसकी अलग पहचान है।

कहा जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन और शहरीकरण के कारण भारत में कम बोले जानी वाली भाषाओं का विकास नहीं हो सका। आपको क्या लगता है?
यह बात सही है। अगर भाषा खो गई तो सब कुछ खो जाएगा। भारत के किसी भी वर्ग या समाज की पहचान काफी हद तक उसकी भाषा से भी होती है। जिन भाषाओं के बोलने वाले कम लोग बचे हैं, उनकी पहचान कर उन्हें संरक्षण दिया जाना बेहद जरूरी है। समय आ गया है कि भारत सरकार अपनी देखरेख में भाषाई सर्वेक्षण कराए। देश के भाषा विज्ञानियों को इसके लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।

अगर भाषा विज्ञान का इतना ही महत्व है तो इसे करियर के साथ क्यों नहीं जोड़ा जाता?
बहुत अच्छा सवाल है। देखिए, भारत में सिर्फ सेंट्रल और कुछ राज्यों की यूनिवर्सिटी में ही इसकी पढ़ाई होती है। कई सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में तो यह ग्रैजुएशन लेवल पर और कहीं पोस्ट ग्रैजुएशन लेवल पर पढ़ाई जाती है। मैं आपको अपना अनुभव बता रहा हूं। एएमयू से अब तक जितने भी लोग लिंग्विस्टिक में पीएचडी या एमफिल कर निकले हैं वे तमाम यूरोपीय देशों और अमेरिका में अपने ज्ञान का लोहा मनवा रहे हैं। मैं किन-किन देशों का नाम लूं। लिंग्विस्टिक के लोगों की वहां बड़ी संख्या में जरूरत है। लेकिन भारत जैसा विशाल देश भी उतने लोग वहां नहीं भेज पा रहा। वैसे पश्चिम देशों की यूनिवर्सिटीज में भी लिंग्विस्टिक की पढ़ाई हो रही है लेकिन भारतीय भाषाओं के लिए भाषा विज्ञानियों की बहुत ज्यादा जरूरत है।

तो यह बताइए कि कमी कहां है, क्या करने की जरूरत है?
सरकार और यूजीसी को जरूरी कदम उठाने होंगे। वे बीए या एमए की पढ़ाई को लिंग्विस्टिक के साथ भी जोड़ दें। अगर कोई स्टूडेंट एमए उर्दू या एमए हिंदी करता है तो उसकी मार्केट वैल्यू उतनी नहीं है, लेकिन उसके साथ उसमें अगर लिंग्विस्टिक को भी जोड़ दिया जाए तो वह एक प्रफेशनल डिग्री के साथ मार्केट में आएगा और अपनी अलग जगह बना लेगा। भारत में लिंग्विस्टिक की ज्यादा मार्केटिंग न होने की वजह से इसका महत्व न तो यूजीसी को समझ में आ रहा है न ही प्राइवेट यूनिवर्सिटियों को। आप जब तक भाषा को भी साइंस नहीं मानेंगे, हालात ऐसे ही रहेंगे। इसे साइंस मानने और गंभीरता से लेने पर ही इसमें करियर की अपार संभावनाएं पैदा होंगी।

(साभारः नवभारत टाइम्स 12 जून 2010)

Tuesday, May 18, 2010

दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

इस वक्त दिल्ली का जो हाल है, वह यहां के बाशिंदों से पूछिए। कॉमनवेल्थ गेम्स की वजह से दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने की जो तैयारियां की जा रही हैं, उसने इस शहर की शक्ल बिगाड़ दी है। सरकार को पहले यह याद नहीं आय़ा कि एनसीआर के किसी शहर से दिल्ली में प्रवेश करने के लिए कम से कम सीमा पर जो व्यवस्थाएं होनी चाहिए, वह नहीं थीं और उसे वक्त रहते मुहैया कराने की कोशिश की जाती। अब जब ध्यान आया है तो पूरे बॉर्डर को ही तहस-नहस कर दिया गया है, चाहे आप गाजियाबाद से आ रहे हैं या फिर फरीदाबाद या गुड़गांव से...सोनीपत से...नोएडा से...यही आलम है...

नवभारत टाइम्स में कार्यरत जयकांत शर्मा ने अपनी व्यथा पर कलम चलाई है...उनकी कविता पढ़े। कृपया इस कविता में साहित्य न तलाशें, यह उनके अपने विचार हैं।

दिल्ली को पेरिस बनाएंगे,
वहां सौ-सौ मजिल की इमारते हैं,
यहां पांच मजिला को भी गिराएंगे
दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

वहां टावर या मकान सील नहीं होते,
यहां सब कुछ सील करवाएंगे
दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

वहां छोटी-मोटी बातों पर झगड़े नहीं होते,
यहां बिना बात के झगड़े करवाएंगे
दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

वहां हर काम तरतीब से होता है
यहां काम बेतरतीब से करवाएंगे
दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

तभी तो आज तक नारा गूंजता था
गरीबी हटाओ, गरीबी हटाओ
अब गरीबी नहीं गरीब को हटवाएंगे
दिल्ली को पेरिस बनाएंगे

-जयकांत शर्मा, लक्ष्मी नगर, दिल्ली

Saturday, May 15, 2010

आरटीआई पर भारत सरकार की नीयत ठीक नहीं



सूचना का अधिकार (आरटीआई) पर सरकार की नीयत ठीक नहीं है। भारत में इस मुहिम को छेड़ने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी व्यस्तता के बावजूद इस विषय पर मुझसे खुलकर बातचीत की। इस बातचीत को प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स ने 15 मई 2010 को संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया है। अगर आप कहीं ऐसी जगह हैं जहां नवभारत टाइम्स उपलब्ध नहीं है तो इस इंटरव्यू को नवभारत टाइम्स की वेब साइट पर आनलाइन भी पढ़ सकते हैं।

उस साइट पर जाने के लिए क्लिक करें। मेरी कोशिश होगी कि आज या कल में उस इंटरव्यू को अपने इस ब्लॉग पर भी लगा दूं। --यूसुफ किरमानी

Wednesday, May 12, 2010

खुतबों से नहीं शाह फैसल जैसों से करें उम्मीद

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स में 12 मई 2010 को संपादकीय पेज पर पहले लेख के रूप में प्रकाशित हुआ है। वह लेख संपादित है और इस ब्लॉग पर वही लेख असंपादित रूप में आप लोगों के सामने है। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित लेख उसके आनलाइन वेब पोर्टल पर भी उपलब्ध है। वहां पाठकों की प्रतिक्रिया भी आ रही है। - यूसुफ किरमानी




बीते शुक्रवार यानी जुमे को अखबारों में पहले पेज पर दो खबरें थीं, एक तो कसाब को फांसी की सजा सुनाई जाने की और दूसरी सिविल सर्विस परीक्षा में आल इंडिया टॉपर शाह फैसल की। आप इसे इस तरह भी देख सकते हैं कि एक तरफ तो मुसलमान का एक पाकिस्तानी चेहरा है तो दूसरी तरफ भारतीय चेहरा। हर जुमे की नमाज में मस्जिदों में खुतबा पढ़ा जाता है जिसमें तमाम मजहबी बातों के अलावा अगर मौलवी-मौलाना चाहते हैं तो मौजूदा हालात पर भी रोशनी डालते हैं। अक्सर अमेरिका की निंदा के स्वर इन खुतबों से सुनाई देते हैं। उम्मीद थी कि इस बार जुमे को किसी न किसी बड़ी मस्जिद से आम मुसलमान के इन दो चेहरों की तुलना शायद कोई मौलवी या मौलाना करें लेकिन मुस्लिम उलेमा इस मौके को खो बैठे।

देश की आजादी के बाद यह चौथा ऐसा मौका है जब किसी मुस्लिम युवक ने आईएएस परीक्षा में इतनी बड़ी सफलता पाई है। जिसके पिता का आतंकवादियों ने कत्ल कर दिया हो, जिसने एमबीबीएस परीक्षा भी पास कर ली हो और जिसकी शिक्षक मां ने उसे रास्ता दिखाया, वह जुमे की नमाज में कम से कम उल्लेख किए जाने का हकदार तो है ही। लेकिन कुछ और वजहों से भी शाह फैसल का उल्लेख मस्जिदों और मदरसों से लेकर गली-कूंचों तक में किया जाना जरूरी हो गया है।

पिछले 25 साल से सिविल सर्विसेज की परीक्षा में मुस्लिम कैंडिडेट्स की सफलता का प्रतिशत 2.5 से 3.5 फीसदी के बीच चल रहा था । ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब 2006 के नतीजे सामने आए तो यह आंकड़ा 2.2 फीसदी पर टिका था लेकिन 2008 से इसमें सुधार का सिलसिला शुरू हुआ है। 2009 में जब 2008 की परीक्षा के नतीजे घोषित हुए तो मुस्लिम कैंडिडेट्स की सफलता का प्रतिशत बढ़कर 3.9 फीसदी हो गया। पिछले साल 791 सफल घोषित कैंडिडेट्स में से 31 मुस्लिम युवक थे हालांकि इस बार 2010 में घोषित नतीजों में 21 मुस्लिम कैंडिडेट्स ही इस परीक्षा में चुने गए लेकिन उनकी रैंक में जबर्दस्त सुधार हुआ है। उसका उदाहरण सिर्फ और सिर्फ शाह फैसल है जबकि 2009 में घोषित नतीजों में किसी मुस्लिम कैंडिडेट (सूफिया फारुकी) की सबसे अच्छी रैंक 20वीं थी। देश की कुल आबादी में मुसलमान 13.4 फीसदी हैं, इस नजरिए से सिविल सेवा में 3.92 या 3.62 फीसदी तक पहुंचना कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं है लेकिन शाह फैसल ने एक उम्मीद जगा दी है, भारतीय मुसलमानों की उस युवा पीढ़ी के लिए जो सचमुच में फतवों से ऊपर उठकर कुछ करना चाहती है। जो अपने धर्म और देश के कल्चर में रहकर कुछ पाने की तमन्ना रखता है।

इस बात पर जब-तब बहस होती रही है कि भारतीय मुस्लिम युवक शिक्षा के नजरिए से बाकी समुदायों के मुकाबले बहुत पिछड़े हुए हैं। नैशनल सैंपल सर्वे का आंकड़ा (1 जनवरी 2006) इसकी पुष्टि भी करता है। उसके मुताबिक मुसलमानों की कुल आबादी में कॉलेज ग्रैजुएट सिर्फ 3.6 फीसदी हैं। सिविल सेवा परीक्षा के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता ग्रैजुएट है। मुसलमानों में शैक्षणिक रूप से पिछड़ेपन की बहस को अंत में सरकार पर ले जाकर खत्म कर दिया जाता है। राजेंद्र सच्चर कमिटी की रिपोर्ट आने के बाद तो इस बहस को और भी मजबूती मिली है।

बात जुमे पर पढ़े जाने वाले खुतबे से शुरू हुई थी। सरकार जब कुछ करेगी, तब करेगी। नमाज पढ़ाने वाले इमाम या मौलवी जुमे पर जुटने वाली भीड़ से क्या इन खुतबों में कभी यह कहते हैं कि हमें ज्यादा मुस्लिम युवकों को आईएएस-आईपीएस बनाने के लिए या आईआईएम तक पहुंचाने के लिए स्टडी सेंटर चाहिए। कितने ऐसे उलेमा या मौलाना हैं जो अपने समुदाय के लोगों से यह अपील करते नजर आते हैं कि हमें भी बिहार और झारखंड के सुपर 30 मॉडल को अपनाकर अपने बच्चों को आईआईटी तक पहुंचाने का रास्ता अपनाना चाहिए। आप मस्जिद और मदरसे के लिए चंदा मांग सकते हैं तो इस काम के लिए परहेज क्यों। अकेले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) और जामिया हमदर्द डीम्ड यूनिवर्सिटी में स्टडी सर्कल चलाकर आप बड़ी तादाद में आईएएस, आईपीएस या आईआटीइन पैदा नहीं कर सकते। यह सही है कि शाह फैसल की सफलता से हमदर्द स्टडी सर्कल का नाम रोशन हुआ है लेकिन क्या यह सफलता हर साल दोहराई जाती रहेगी। क्या अनंतनाग या सीवान का हर युवक शाह फैसल की तरह दिल्ली आकर हमदर्द स्टडी सर्कल में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर सकेगा। कुछ नामुमकिन सा लगता है। पर अगर शाह फैसल को रोल मॉडल बनाकर आप इसे एक आंदोलन का रूप दे दें तो यह मुमकिन है। शाह फैसल ने आपको एक मौका दे दिया है। आप चाहें तो मुस्लिम युवकों में इस सकारात्मक पक्ष को उभारकर मौलाना अबुल कलाम आजाद या डॉ. जाकिर हुसैन बन सकते हैं। कुछ ऐसा कीजिए की दारुल उलूम देवबंद या दारुल उलूम नदवा (लखनऊ) को एक ऐसे मदरसे के रूप में भी जाना जाए कि यहां से भी पढ़कर मुस्लिम युवक आईएएस या आईआईएम तक पहुंच सकते हैं।

देवबंद और नदवा के उलेमाओं के पास एक और भी मौका है – अपनी छवि और विचारधारा में हल्का सा बदलाव करने का। वे चाहें तो अपनी दीनी विचारधारा के साथ-साथ शाह फैसल के रोल मॉडल को भी अपनी विचारधारा में शामिल कर उसे देश के मुस्लिम युवकों के सामने रख सकते हैं। शाह फैसल आतंकवाद से ग्रस्त कश्मीर के रहने वाले हैं। वह खुद भी आतंकवाद से पीड़ित हैं। जरा सोचिए कि जिस राज्य में अलगाववाद की आग में झुलसकर भी तमाम युवक उसे गले लगा रहे हैं तो ऐसे में उन्हीं के बीच से ऐसे युवक का आना जो कुछ करना चाहता है, इस देश के धर्म निरपेक्ष स्वरूप की बहुत बड़ी सफलता है। इस संदेश के व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत है। इस संदेश को देवबंद और नदवा के उलेमा बहुत आसानी के साथ आम मुसलमानों तक पहुंचा सकते हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर का नाम सभी ने सुना होगा। पर कितने लोग तिरुपति देवस्थानम द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के बारे में जानते हैं। यहां के मठ की शिक्षण संस्थाएं वेल्लूर से लेकर दिल्ली तक फैली हुई हैं और उसमें प्राइमरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज तक हैं। इनकी संस्थाओं में गरीब बच्चे पढ़कर आईएएस और आईआईटी की मंजिल तयकरते हैं। अम्मा के नाम से विख्यात मां अमृतानंदमयी तो अब उत्तर भारतीय लोगों में ही उतनी प्रसिद्ध हो गई हैं जितनी दक्षिण भारत में। आज वह अपने प्रवचन से ज्यादा स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटी खोलने के लिए जानी जा रही हैं। जहां-जहां वह जाती हैं, शिक्षा के लिए उनका संदेश विशेष रूप से होता है। मुस्लिम समुदाय से भी एकाध उदाहरण आप ले सकते हैं। कर्नाटक में गुलबर्गा शरीफ दरगाह में आने वाले चढ़ावे और अन्य आमदनी से वहां की कमिटी कई सफल वोकेशनल कॉलेज चला रही है। शिया धर्म गुरु मौलाना कल्बे सादिक ने अलीगढ़ में एकदम एएमयू की तर्ज पर एक ऐसा शिक्षण संस्थान खड़ा किया है जहां कई रोजगारपरक विषयों की पढ़ाई हो रही है। मौलाना कल्बे जव्वाद लखनऊ में ऐसा कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं। पर, ईसाई मिशनरियों की तरह इसे जिस रूप में लिया जाना चाहिए था, उस रूप में नहीं लिया गया। अजमेर शरीफ दरगाह को भारत ही नहीं पूरी दुनिया के मुसलमानों में एक पवित्र स्थल के रूप में जाना जाता है, क्या वहां की कमिटी ने कभी कोई यूनिवर्सिटी या प्रोफेशनल कॉलेज खोलने की पहल की। ज्यादा दूर न जाकर राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में अजमेर के मुकाबले कम चढ़ावा नहीं आता, लेकिन उस पैसे का इस्तेमाल क्या और शाह फैसल पैदा करने में खर्च नहीं किया जा सकता। दिल्ली की सबसे बड़ी शाही जामा मस्जिद में हर जुमे को नमाज पढ़ने वाला मुसलमान अगर एक रुपया भी इस काम के लिए दे तो आप कुछ साल में एक अच्छा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थान खड़ा कर सकते हैं। पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब तो धर्म के अलावा इल्म की बात भी बताकर गए थे, पर कितने लोग हैं जो इल्म की अलख जगाने के लिए मौजूदा हालात में सामने आए हैं। यहां पर उन लोगों का जिक्र बेमानी होगा जिन्होंने सांसद और एमएलए बनने के बाद निजी हितों के लिए शिक्षण संस्थाएं खोलीं।

यह वे लोग हैं जो प्रधानमंत्री रोजगार योजना और अल्पसंख्यक कल्याण निगमों से कर्ज दिलाने की बात कर आपको हमेशा हस्तशिल्पी बनाए रखना चाहते हैं। यह लोग नहीं चाहते कि फिरोजाबाद में कांच की भट्ठी में तपने वाला मुस्लिम युवक आईएएस का सपना भी देखे। वे लोग लखनऊ के चिकन कपड़ों का का एक्सपोर्ट लाइसेंस तो खुद हासिल करेंगे लेकिन अपने समुदाय के लड़के और लड़कियों से चाहेंगे कि वे सारी जिंदगी उन कपड़ों पर चिकन की कढ़ाई करते रहें। इनकी नजर वक्फ की संपत्तियों पर रहती है, ऐसी संपत्तियों पर शिक्षण संस्थाएं खोलना सबसे आसान है लेकिन इसका सौदा यह तत्व कौड़ियों में कर लेते हैं।

हाल के दिनों में कुछ लोगों ने शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में मुसलमानों के रिजर्वेशन की बात उठाई है। हालांकि यह मुद्दा वोट बैंक से भी जुड़ा है और आने वाले वर्षों में इस मुद्दे को और हवा भी मिलेगी लेकिन आगे बढ़ने के लिए सिर्फ रिजर्वेशन की बाट जोहना गलत होगा। मुसलमानों में पिछड़े लोगों (पसेमंदा) की बहुत बड़ी तादाद है। उनमें से कुछ को कुछ राज्यों में रिजर्वेशन भी हासिल है लेकिन इससे उनकी स्थिति में कोई चमत्कार होता नजर नहीं आ रहा है। यह सही है कि इस वर्ग को रिजर्वेशन मिलना चाहिए क्योंकि अन्य समुदाय के पिछड़े वर्गों के मुकाबले उसके हालात भिन्न नहीं हैं लेकिन यह काम सरकार और राजनीतिक दलों पर छोड़ देना चाहिए। रिजर्वेशन को लेकर देश के एक बहुत बड़े वर्ग में नफरत भी है। इसलिए इस मसले को राजनीतिक दलों को ही तय करने दें। हां, समय-समय पर इनके चेहरों को पढ़ते भी रहें लेकिन मंजिल की तरफ बढ़ने के लिए किसी रिजर्वेशन का इंतजार करना वक्त बर्बाद करना है।

शाह फैसल ने सिविल सर्विसेज का नतीजा घोषित होने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में जो एक बात खासतौर पर रेखांकित की है, उस पर भी उलेमाओं को मुस्लिम युवकों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह इस मौके का इस्तेमाल एक बड़े बदलाव के लिए करेंगे। यह एक बड़ी बात उन्होंने कही है, जिससे ध्वनि यह निकलती है कि देश की इस प्रतिष्ठित मानी जाने वाली सेवा में जब तक इन समुदायों के लोग नहीं पहुंचेंगे तब तक आप किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकते। देश की नीतियों को अपने हिसाब से नौकरशाही यानी आईएएस लॉबी ही नियंत्रित करती है। फैसल का यह संदेश भी अगर इस समुदाय के लोगों को इस सेवा में आने के लिए प्रेरित कर सका तो यह बड़ी कामयाबी मानी जाएगी।

Thursday, April 22, 2010

जज साहबान...मीडिया ट्रायल तो होगा


मॉडल जेसिका लाल मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और मंगलवार को यह खबर अखबारों में प्रमुखता से छपी। मेरे साथ काम करने वाले एक साथी पत्रकार की दिलचस्पी यह देखने की थी कि जेसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा के परिवार के अखबार आज समाज ने इस खबर को किस तरह छापा।

हमारे वह सहयोगी खुद ही उठे और जाकर आईटीओ के स्टाल से आज समाज अखबार खरीद लाए। हम दोनों ने उस अखबार की हर खबर पर उंगली रख-रखकर पढ़ा कि कहीं वही खबर तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नहीं है लेकिन आखिरी पेज और लोकल पेज खंगालने के बावजूद न तो वह खबर मिली और नही कोई संपादकीय उस पर पढ़ने को मिला। मंगलवार का वह अखबार पत्रकारिता जगत में अब ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुका है।

हम लोग झूठों की दुनिया में रहते हैं लेकिन इसके बावजूद ऐसी उम्मीद करते हैं कि सभी लोग अपने प्रोफेशन में ईमानदार और कम से कम सच बात कहने की कोशिश तो जरूर करें। हालांकि मिशनरी पत्रकारिता तो नहीं रही लेकिन कम से कम इतना तो है ही कि और प्रोफेशनों के मुकाबले पत्रकारों के प्रोफेशन में अलग किस्म की हल्की लकीर तो खिंची हुई है जो उसे बार-बार उसके जिम्मेदार होने का एहसास कराती को रहती ही है। वे लोग भी जो इसे (पत्रकारिता को) महज एक नौकरी समझ कर कर रहे हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि आम आदमी तक सही और सच्ची खबर पहुंचे।

बहरहाल, मैं और मेरे वह सहयोगी पत्रकार गलत थे। आज समाज अखबार भला क्यों कातिल मनु शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला छापता। आप आरएसएस के अखबार में यह सोचें कि वह गुलबर्गा सोसायटी (अहमदाबाद) नरसंहार के आरोपी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ छापेगा तो जाहिर है कि नाममुकिन है। पर भावुकता में बहुत सारे पत्रकार ऐसा सोच लेते हैं। बहरहाल, ऐसा होता तो एक चमत्कार होता लेकिन न्यूज चैनलों के बजाय अखबारों में चमत्कार की आशा करना मूर्खता से कम नहीं। अब सारे चमत्कार न्यूज चैनल पर दिखते हैं। जादू...टोना...फूंक.. वगैरह।

खैर, आज समाज अखबार के मालिक कार्तिकेय शर्मा हैं जो मनु शर्मा के भाई हैं। मनु शर्मा और कार्तिकेय शर्मा हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा के बेटे हैं। चंडीगढ़ का मशहूर पिकाडली होटल इन्हीं का है और इसके अलावा भी इनका बड़ा बिजनेस साम्राज्य है।

जेसिका लाल कांड दरअसल मीडिया की जीत की जीती-जागती मिसाल है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में मीडिया पर बहुत सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे केसों में या किसी भी केस में मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। मीडिया को इससे बचना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से मैं सहमत नहीं हूं। कानून की कुछ किताबें पढ़ लेने वाले जज साहबान मीडिया को बार-बार उसका कर्तव्यबोध क्यों याद दिलाते हुए नजर आते हैं। मैं जज साहबान से जानना चाहता हूं कि आखिर ऐसे लोग जिन्हें समाज में रसूखदार कहा जाता है, उनसे किस तरह निपटा जाए। हजूर, माई-बाप का फैसला आने में तो दशक लग जाते हैं। तारीख पर तारीख...क्या करे इंसान, सिवाय इस फिल्मी डॉयलॉग के दोहराने के अलावा।

यह बिल्कुल सही है कि मीडिया के अपने स्वार्थ हैं और वह उसी ढंग से चलता है लेकिन इस देश में जितने भी बड़े मामले या कह लीजिए हाई प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, वह मीडिया ट्रायल की ही बदौलत अपने अंजाम तक पहुंचे। अगर जेसिका लाल मामले में मीडिया ट्रायल नहीं हो रहा होता तो क्या जरूरत थी मनु शर्मा के पिता और भाई को अपना अखबार और न्यूज चैनल लाने की। वे लोग सिर्फ मीडिया से मुकाबला करने के लिए ही अपना मीडिया लेकर आए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने तक तमाम अखबार और न्यूज चैनल अपने स्टैंड पर कायम रहे और उनके मीडिया की परवाह नहीं की। जब अंतिम फैसला आया तो साबित हो गया कि विनोद शर्मा ने जिस मकसद के लिए अखबार और न्यूज चैनल का जुआ खेला था वह उसी में फंस कर रह गए।

क्या उनके अखबार और न्यूज चैनल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर न होने से इस देश के लोग वह सूचना जानने से वंचित रह गए...नहीं क्योंकि अब कोई मीडिया हाउस, राजनीतिक पार्टी या असरदार लोग सूचना के प्रवाह को नहीं रोक पाएंगे। यहां तक कि अदालतें भी एक सीमा तक ही कुछ कर पाएंगी लेकिन मेरे इस ब्लॉग को ब्लॉक कराने के लिए अदालत को गूगल से कहना पड़ेगा और अगर गूगल पाएगा कि मैं समाज में घृणा फैला रहा हूं तो वह इसे ब्लॉक करने के बारे में सोचेगा। वह दिन आएगा जब भारतीय अदालतों के फैसलों पर एक बहस सोशल मीडिया में भी होगी। जब ट्विटर के जरिए अदालत की रिपोर्टिंग हो सकती है तो बहस क्यों नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया सभी के सामने सीना ताने खड़ा है। रोक सको तो रोक लो। यह उसी की देन है कि मैं अपने यह तुच्छ विचार आप लोगों को तक पहुंचा सका। अगर यह लेख मैं किसी अखबार या अपने अखबार में देता तो शायद वहां पॉलिसी का वास्ता देकर उसे नहीं छापा जाता या फिर उसमें संपादन कर दिया जाता। अब वह वक्त गया। अपनी बात आप पहुंचा सकते हैं।

पर, यह तो एक मामला, एक अखबार, एक चैनल और कोर्ट की बात थी। हम लोग तमाम ऐसे अखबारों को जानते हैं जो इस या उस पार्टी अथवा विचारधारा का समर्थन करते हुए नजर आते हैं। यही वजह है कि जब बड़े मामले सामने आते हैं तो तमाम अखबार या चैनल अपने आप किसी न किसी खेमे से जुड़ा हुआ पाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के संदर्भ में अगर यह कहा होता कि मीडिया किसी भी व्यक्ति या किसी भी पार्टी के प्रति पूर्वाग्रह न अपनाए तो बात कुछ समझ में आती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट तो सिर्फ कर्तव्यबोध करा रहा है।

मेरा यह कहने का कतई मकसद नहीं है कि मीडिया बहुत साफसुथरा है। मीडिया के पूर्वाग्रह की बात मैं बार-बार कर रहा हूं। होना तो यह चाहिए कि मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाए और अदालतें अपनी जिम्मेदारी निभाएं। आखिर दोनों ही तो सोसायटी के वॉच डॉग हैं।

Thursday, April 8, 2010

आओ, सवाल पूछकर जहर फैलाएं

नक्सलवाद पर आपका क्या कहना है...सानिया मिर्जा - शोएब की शादी के बारे में आप क्या सोचते हैं...यह सवाल अचानक सोशल नेटवर्किंग साइट, आपके दफ्तर या आपके आसपास रहने वाले लोग किसी भी वक्त पूछ सकते हैं। जरा सोच समझकर जवाब दीजिएगा, नहीं तो आपको राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही और न जाने किन-किन खिताबों से नवाजा जा सकता है। अंध राष्ट्रभक्त अब इस देश में फैशन बन चुका है। जर्मनी में हिटलर के दौर में अंध राष्ट्रभक्त के चलते जो नाजीवाद पैदा हुआ था, कुछ-कुछ उस तरह का खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

सानिया-शोएब विवाह का मसाला जब इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों ने परोसना शुरू किया तो फौरन इसे भारत-पाकिस्तान का सवाल बना डाला गया। जाहिर है इसकी अगुआई उन्हीं लोगों ने की, जिनके जिम्मे इसका ठेका है। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब आपके आसपास के लोग भी आपके सामने वही बेतुके और बेहूदे सवाल पेश करने लगें। यह सवाल सिर्फ पढ़े-लिखे और सलीके वाले ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने आपको हाई-फाई प्रोफेशनल मानने वाले भी कर रहे हैं। जाहिर है कि रणनीतिक तौर पर ऐसे सवाल पूछकर जहरीला वातावरण पैदा किया जा रहा है।

फेसबुक पर एक सज्जन ने एक बुर्के वाली महिला का फोटो डालकर सवाल पूछा कि क्या इस्लाम में वाकई चार शादियों की इजाजत है...फिर उनका अगला सवाल या सुझाव था कि क्यों नहीं इसमें बदलाव कर मुसलमान इससे छुटकारा पा लेते। यह सवाल अब से नहीं जबसे मैंने होश संभाला है तभी से पूछा जा रहा है और वक्त-वक्त पर इस बारे में तमाम तथ्य उलेमा और प्रबुद्ध मुसलमानों का तबका रखता भी है लेकिन उन तथ्यों से ऐसे लोगों को चैन नहीं आया। उन्हें तो महज माहौल बनाने के लिए सवाल पूछना है।

इस तरह के सवाल उठाने वालों का न तो पढ़ने-लिखने में यकीन है और न ही दूसरे धर्म की गहराई में जाकर चीजों को समझना चाहते हैं। यहां मैं आपके सामने चार शादियों पर सफाई नहीं पेश करने जा रहा हूं बल्कि बताना चाहता हूं कि इस तरह के प्रचार के जरिए माहौल में जो जहर घोला जा रहा है, उससे इस तरह के लोग समाज का कोई बहुत बड़ा भला नहीं कर रहे हैं। हंस हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक है। उसमें रिसर्च स्कॉलर शीबा असलम फहमी का कॉलम छपता है – जेंडर जिहाद। अभी मार्च महीने में हंस में ही प्रकाशित लेख में उन्होंने मुल्ला-मौलवियों की जमकर खबर ली है लेकिन साथ ही यह भी बताया कि इस्लाम में चार शादियां किन परिस्थितियों में होती रही हैं और मौजूदा सूरतेहाल क्या है। वह लेख पढ़ने से ताल्लुक रखता है। लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर इस तरह का अभियान चलाने वालों के पास ऐसे लेख पढ़ने की फुर्सत नहीं है। हालांकि वह इसे पढ़कर इसमें से नया शगूफा भी छेड़ सकते हैं लेकिन चूंकि सारा मामला कहीं और से संचालित हो रहा है तो उसकी वे जरूरत भी नहीं महसूस करते। एक खास बात का जिक्र करना चाहूंगा कि हंस में जब वह लेख आया था तो उस वक्त सानिया-शोएब शादी की चर्चा दूर-दूर तक नहीं थी। लेकिन इस संदर्भ में अब वह लेख सबसे सामयिक बन गया है।

अब बढ़ते हैं नक्सलवाद की चर्चा की तरफ। इस मामले में भी वही सब दोहराया जा रहा है जो सानिया-शोएब विवाह के मामले में दोहराया गया। दंतेवाड़ा में नक्सली हमले से बहुत पहले पिछले दिनों अंग्रेजी आउटलुक में मशहूर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति राय की रिपोर्ट आई है। उन्होंने नक्सलियों के बीच जाकर विस्तार से उनसे बात की और उस पर अपनी कलम चलाई। उन्होंने देश के सामने तमाम तथ्यों को रखा। उन्होंने वहां तैनात अफसरों के हवाले से लिखा कि नक्सलियों को कुचलने की मौजूदा सरकारी नीति से नक्सलियों को खत्म नहीं किया जा सकता। उनके साथ आदिवासी दिलोजान से लगे हुए हैं।

इस रिपोर्ट का आना था कि लोगों ने अरुंधति राय को राष्ट्र विरोधी होने का प्रमाणपत्र जारी करते देर नहीं लगाई। लोगों ने कहा कि देश के तमाम बुद्धिजीवियों के पास और कोई काम नहीं है, वे सिर्फ ऐसी बातों को सामने लाते हैं जिनसे राष्ट्रद्रोहियों यानी नक्सलियों को मदद मिलती है। अब देखिए जिस मीडिया के बीच ऐसे लोग रहते हैं, उसी मीडिया पर नक्सली भी भरोसा करते हैं। उन्हीं नक्सलियों ने अपनी बात पहुंचाने के लिए अरुंधति राय को उनके बीच आने और बात करने की इजाजत दी। इसी बीच एक और छोटी सी घटना हुई जिसे दिल्ली में बैठे मीडिया मुगल समझ नहीं पाए। नक्सलियों ने झारखंड से एक अफसर का अपहरण किया और उसे शर्ते पूरी होने के बाद प्रभात खबर के पत्रकार को सौपा। आखिर ऐसी क्या वजह है कि नक्सली पत्रकारों और लेखकों पर भरोसा करने को तो तैयार हैं लेकिन सरकार और उसकी मशीनरी पर नहीं।

इस घटना के बाद सरकार और पुलिस की नजर ऐसे पत्रकारों की तरफ गई जो नक्सलियों की खबरें छापते हैं या उनके संपर्क में रहते हैं। एक महिला पत्रकार को इसी आधार पर गिरफ्तार भी कर लिया गया। दिल्ली यूनीवर्सिटी के एक प्रोफेसर से पुलिस ने सिर्फ इसलिए पूछताछ कर डाली कि वह नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। अब कल को सरकार अरुंधति राय को गिरफ्तार कर लेती है तो कतई हैरान मत होइएगा। जेल में बंद नक्सली नेता कोबाद गांधी के इलाज को लेकर पिछले दिनों दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, उसमें जिन लोगों ने कोबाद के समर्थन में बोला, वह सब के सब पुलिस के रेडार पर आ गए।

जहरीला माहौल बनाने वालों की यह रणनीति काफी कारगर साबित हो रही है। पहले वे लोग ऐसे सवाल पूछते हैं, जिससे आप उबलें और कुछ टिप्पणी करें। उसके बाद उनका पूरा परिवार (खानदान भी कह सकते हैं) इस मामले को भुनाने में जुट जाता है।