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Saturday, September 18, 2010

वह सपनों में भी बोलती हैं हिंदी

उनका नाम है मार्ग्ड ट्रम्पर, जन्म ब्रिटिश-इटली परिवार में हुआ, जिसमें विद्वानों और भाषा विज्ञानियों की भरमार है। इस परिवार का हर कोई किसी न किसी भाषा या संस्कृति से जुड़ा हुआ है। मार्ग्ड ने खुद हिंदी आनर्स की डिग्री वेनिस यूनिवर्सिटी से हासिल की है और वह अब खुद मिलान यूनिवर्सिटी में हिंदी टीचर हैं। हिंदी के अलावा उनका दूसरा प्यार भारतीय संगीत और तीसरा प्यार मेंहदी (हिना) है। बनारस घराने की वह फैन है। वह खुद भी ठुमरी गाती हैं। उन्होंने पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी, सुनंदा शर्मा से काफी कुछ सीखा है। इसके अलावा प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित राजन-साजन मिश्रा, पंडित ऋत्विक सान्याल और बीरेश्वर गौतम से टिप्स हासिल किए हैं।

इटली में हिंदी से जुड़ी हर गतिविधि में वह आगे-आगे रहती हैं। इटली में तो लोग उन्हें भारत का सांस्कृति दूत तक कहते हैं। मार्ग्ड के बारे में यह संक्षिप्त सी जानकारी है, पूरा बायोडेटा लंबा है। मैंने मार्ग्ड ट्रम्पर से उनके हिंदी प्रेम पर बात की हैः

हिंदी से लगाव कब हुआ ?
वैसे यह कहना मुश्किल है कि हिंदी से मेरा लगाव कब हुआ क्योंकि इसमें कई संयोग जुड़े हुए हैं। मेरे परिवार में सब लोग अनुवादक या लिंग्विस्टिक के जानकार हैं और अलग-अलग देशों से हैं इसलिए बचपन से ही भाषाओ का बहुत शौक रहा है। भारत के बारे में बहुत कम जानती थी पर यूनिर्वसिटी में पढ़ाई शुरू करने के समय पर सोचा था कि कोई ओरिएंटल भाषा सीखना चाहती हूं। अंत में मैंने हिंदी चुनी क्योंकि सब ओरिएंटल भाषाओं में से यह यूरोपीय भाषाओं के बहुत समान थी। मुझे भारतीय संस्कृति भी आकर्षित करती थी। उस वक्त से मेरी रूचि इतना बढ़ती गई कि आजकल इटैलियन व अंग्रेजी के बाद हिंदी मेरी तीसरी भाषा हो गयी। कभी-कभी तो मैं सपनों में भी हिंदी बोलती हूं।
आखिर इस लगाव की वजह क्या थी ?
यह भी कहना मुश्किल है क्योंकि ऐसे प्यार की कोई वजह नहीं होती...पर सच पूछें तो बहुत-सी वजहें थीं। जैसे मैं कह चुकी हूं कि यूरोपीय भाषाओं और हिंदी में बहुत सी समानताएं हैं और अवश्य ही हिन्दुस्तानी संस्कृति में भी मेरी बहुत रूचि रही है। शुरू में कोई ऐसी भाषा सीखना चाहती थी जो मेरे देश में बहुत कम लोगों को आए पर उसे भाषा के मामले में भी रोचक होना चाहिए। इसलिए यह लगाव हुआ।

हिंदी की ऐसी कौन सी विशेषता है जिसकी वजह से आप इसकी तरफ आकर्षित हुईं ?
ऐसे लगता है कि हिंदी काफी स्वाभाविक भाषा है।... मेरा मतलब है कि जाने क्यों कुछ शब्दों का अर्थ बहुत साफ़ सुनाई देता है। यह भी हिंदी की एक और विशेषता है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है कि इसमें बहुत समानार्थक शब्द प्रयोग किये जा सकते हैं।

दूसरी भाषाओं के मुकाबले आप हिंदी को आज कहां पाती हैं?
दुनिया में सब भाषाओं में से हिंदी आज तीसरी सबसे प्रचलित भाषा है पर इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हिंदी बोलनेवाले लोगों का ही अपनी भाषा से काफी लगाव नहीं है। मेरे ख्याल से इस समस्या की वजह भारतीय उपनिवेशन का इतिहास है। इस कारण बहुत कम विदेशी लोग हिंदी सीखने में रुचि लेते हैं।

अगर हिंदी और उर्दू को मिलाकर इस भाषा को बढ़ावा दिया जाए तो आपकी नजर में ऐसा करना ठीक होगा?
मेरे ख्याल से हिंदी और उर्दू में जो सब से बड़ा अंतर है वह तो भाषा का नहीं, संस्कृति का है। उन दोनों की बहुमूल्य संस्कृति है और इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि उर्दू भारत में पैदा हुई किसी और देश में नहीं । मैं नहीं चाहती की राजनीति की वजह से उन दोनों में से एक को चुनना पड़े। वैसे तो सबको पता ही है कि दोनों बोलचाल की भाषाएं हैं और बोलने में कई बार जरा भी अंतर महसूस नहीं होता।

हिंदी जहां पैदा हुई, वहां उसकी हालत का आपको क्या कुछ अंदाजा है ?
मुझे पता है। विशेष रूप से बड़े शहरों में भारतीय युवकों की हिंदी बहुत घटिया हो गई है। कारण यह है कि वे बहुत ज्यादा अंग्रेजी शब्द मिलाकर हिंदी बोलते हैं। मिश्रण तो स्वाभाविक रीति है, पर बिगाड़ कर बोलना बिल्कुल दूसरी बात होती है... अगर अंग्रेजी के साथ हिंदी को मिलाकर इसी तरह बोला जाता रहा तो संस्कृति का मनोभाव खो जाएगा । मेरी माता जी प्रकाशकों के लिए अनुवाद का काम करती हैं और अक्सर एंग्लो-इंडियन लेखकों का अनुवाद भी करती हैं । इसीलिए मैं काफी अच्छी तरह जानती हूं कि भारत में और दुनिया में आजकल हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की रचनाएं बहुत प्रचलित नहीं हैं क्योंकि उनसे ज्यादा पैसे नहीं मिलते और नाम भी नहीं होता। वैसे ही पश्चिमी देशों में आजकल भारतीय साहित्य से जुड़ने का फैशन चल पड़ा है। पर यह सब अंग्रेजी में है। मौजूदा दौर के बड़े हिंदी लेखकों का तो दुनिया में कहीं नाम नहीं है।

आप भारत अक्सर आती रहती हैं, यहां की और कौन सी चीज आपको प्रभावित करती है?
हिन्दुस्तानी संस्कृति के मुझे अलग-अलग शौक हैं। इनमें से शास्त्रीय संगीत प्रमुख है। मैं लगभग 10 साल से हिन्दुस्तानी संगीत सीख रही हूं और आजकल पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी और उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा जी से सीखती हूं। मुझे बनारस घराने की परंपरा बहुत पसंद है और संगीत सीखने और सुनने के लिए भारत आती रहती हूं। वैसे मैं अच्छी पर्यटक नहीं हूं, मैंने ताजमहल अभी तक नहीं देखा है क्योंकि मैं ज्यादा से ज्यादा दो-तीन जगहों में रहना, लोगों से परिचय करना, उनसे बात करना आदि पसंद करती हूं। अगर किसी जगह की सैर करने का मौका मिले तो अच्छी बात है, पर यह मेरी वरीयता नहीं।
हिंदी की कोई किताब जो आपने पढ़ी हो और पसंदीदा लेखक?
यूनिवर्सिटी के समय मैंने बहुत हिंदी उपन्यास पढ़े थे। कुछ हिंदी में, कुछ अनुवाद से। दो-तीन उपन्यास जो सबसे अच्छे लगे अभी याद आ रहे हैं, जैसे प्रेमचंद का लिखा हुआ गोदान,रेणु का लिखा हुआ मैला आंचल’ और एक उपन्यास जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, रूद्र का लिखा हुआ 'बहती गंगा'।

कोई बॉलिवुड मूवी जो हाल ही में आपने देखी हो और उससे खूब मनोरंजन हुआ हो?
इटली के सिनेमघरों में बॉलिवुड मूवी का प्रचलन पहले नहीं था।मगर अभी दो-तीन साल से बॉलिवुड सिनेमा भी पसंद किया जाने लगा है। इटैलियन टेलिविज़न पर भी हिंदी मूवी अब कभी-कभी पेश की जाती हैं । इसलिए हाल में ‘कभी अलविदा न कहना’, ‘स्वदेश’ आदि देखी हैं। पता चला है की अक्टूबर में इटली में भी ‘माई नेम इज खान’
पेश की जाएगी। वैसे ही अभी मैं रावण मूवी देखना चाहती हूं।

क्या अपनी ओर से कुछ कहना चाहेंगी ?
जी, आजकल भारत अर्थव्यवस्था में काफी ज़ोरदार जा रहा है और सब लोग अंग्रेजी बोलना और टेक्नॉलजी का प्रयोग करना चाहते हैं, फिर भी याद रखना पड़ेगा कि किसी देश का जोर उसकी सांस्कृतिक पहचान में भी होता है। अपनी संस्कृति और भाषा बनाए रखना अपने भविष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है।

साभार - नवभारत टाइम्स, 18 सितंबर 2010, नई दिल्ली

8 comments:

Farid Khan said...

हिन्दी से आपका लगाव अद्वितीय है मर्ग्ड। आपको बधाई और शुभकामनाएँ।

उन्मुक्त said...

मार्ग्ड ट्रम्पर जी से मिक अच्छा लगा।

Harnek said...

behad asshi story. vedeshi log hamari rastri bhasha sekha to yah hamare liea garave ke bat ha

Marged said...

जवाब देकर बहुत ख़ुशी हुई

VICHAAR SHOONYA said...

किरमानी साहब आपने हिंदुस्तान तो पढ़ा लिखा वही माना जाता है जो स्वप्न में ही हिंदी बोलता हो और जागते हुए अंग्रेजी भाषा का जयादा से ज्यादा उपयोग करता हो.

Yusuf Kirmani said...

टिप्पणी के लिए आप सभी का धन्यवाद। विचार शून्य जी, आपने जिस बात की तरफ इशारा किया है, वह मुद्दा काबिले गौर है। यहां बात हिंदी - अंग्रेजी को महत्व देने की नहीं हो रही है। आप जितनी ज्यादा भाषाएं जानेंगे या पढ़ेंगे, आपको उतना ही ज्यादा फायदा होगा। आपकी जानकारी में ज्यादा इजाफा होगा।

Marged said...

बिलकुल, मैं अंग्रेजी के विरुद्ध नहीं, हिंदी की उपेक्षा के विरुद्ध तो हूँ...

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

मार्ग्ड ट्रम्पर जी से मिलकर प्रभावित हुई हूँ, उनके विचारों से सहमत हूँ...

युसूफ जी व मार्ग्ड ट्रम्पर जी आप दोनों को ही हार्दिक शुभकामनाएं...