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Monday, May 7, 2012

आमिर खान और सत्यमेव जयते…क्या सच की जीत होगी

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट nbt.in पर भी उपलब्ध है।


थोड़ी देर के लिए बॉलिवुड स्टार आमिर खान (Bollywood Star Aamir Khan) के टीवी प्रोग्राम सत्यमेव जयते (Satyamev  Jayate) को अलग रखकर डॉक्टरों की दुनिया पर बात करते हैं। तमाम मुद्दे...सरोकार...हमारे आसपास हैं और उनसे पूरा देश और समाज हर वक्त रूबरू होता रहता है। पर कितने हैं जो इनसे वास्ता रखते हैं या इनका खुलकर प्रतिकार करते हैं। आमिर खान बॉलिवुड के बड़े स्टार हैं, उनकी एक मॉस अपील है। आप लोगों में से जिन्होंने 6 मई को उनका टीवी शो सत्यमेव जयते देखा होगा, या तो बहुत पसंद आया होगा या फिर एकदम से खारिज कर दिया होगा।

फेसबुक (Facebook) हर बार की तरह ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया का पसंदीदा अड्डा है। शो खत्म होने के बाद प्रतिक्रियाएं आने लगीं। हमारे कुछ मित्रों ने कन्या भ्रूण हत्या (Female Foeticide) को धर्म और वर्ण में बांटने की कोशिश भी की। फेसबुक से पता चल रहा है कि वे इसे सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की समस्या मानते हैं। उनका यह भी कहना है कि मुसलमान और दलित अपनी बेटियों को नहीं मारते। उन्होंने आंकड़े भी पेश किए हैं। मैं कम से कम इस समस्या को इस तरह देखे जाने के खिलाफ हूं। यह समस्या बड़ी है। न तो इसे धर्म के आइने में देखा जाना चाहिए और न ही शहरी और ग्रामीण के बीच लकीर खींच कर। मैं ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी सोच वालों से भी सहमत नहीं हूं कि आमिर खान को प्रति एपिसोड इतने करोड़ मिलेंगे और इसे देखने वाले गरीब को क्या मिलेगा...मेरा ऐसे तथाकथित फेंकू बुद्धिजीवियों से निवेदन है कि अभी वे जो नौकरियां कर रहे हैं, उसे छोड़कर जाएं और जाकर गरीबों के बीच काम करें। दिल्ली में अपने दफ्तर के एसी हॉल या केबिन में लफ्फाजी करने से कुछ नहीं हासिल होने वाला।


आमतौर पर बातचीत में कन्या भ्रूण हत्या पर हम लोग बहुत खुलकर बात नहीं करते या करते भी हैं तो बहुत सतही बातें। बुद्धिजीवी और खासकर महानगरों में सड़क-नाली, फैशन शो या नेताओं की खबर लिखने वाले पत्रकारों की नजर में तो यह कोई बड़ा मुद्दा ही नहीं है। लेकिन इसी छोटे से मुद्दे से आमिर खान ने अपने शो की शुरुआत की है।
शो में ऐसी कुछ भी नई बात नहीं थी जिसे हम-आप न जानते हों।

अब मैं अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाता हूं कि तमाम डॉक्टर एक छोटा सा क्लिनिक खोलने के बाद इतने बड़े डॉक्टर कैसे बन गए। आमिर खान के शो से यह तथ्य सामने आया कि मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया आजतक किसी भी डॉक्टर को कन्या भ्रूण हत्या के जुर्म में सजा नहीं दे पाई। स्लम एरिया में सेवाभाव से डॉक्टरी कर पैसा कमाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) आए दिन झंडा बुलंद करती नजर आती है लेकिन कभी इस मुद्दे पर अपने डॉक्टर मेंबरों को समझाती नजर नहीं आती है।

एक मिनट के लिए आप आमिर के शो और क्या भ्रूण हत्या के तमाम आंकड़ों को ताक पर रख दें...क्या आपका पाला ऐसे डॉक्टर से नहीं पड़ा जो यह कहता है कि मैं जो दवा लिख रहा हूं वह फलां दवा की दुकान से ही खरीदें। आमतौर पर ज्यादातर लोग अपने घर के आसपास ही रहने वाले या क्लिनिक चलाने वाले डॉक्टर के पास जाते हैं। दवा की दुकाने भी आसपास ही होती हैं। आप अगर डॉक्टर की पंसद की केमिस्ट शॉप पर न भी जाएं और अगर दूसरी शॉप पर भी जाएंगे तो भी डॉक्टर को फायदा होगा। क्योंकि जिस कंपनी की दवा डॉक्टर ने लिखी है, वह पहले से ही डॉक्टर को अपने एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) के जरिए गिफ्ट भेजकर या विदेश यात्रा का लालच देकर प्रभावित कर चुकी है। वह डॉक्टर या अस्पताल सिर्फ उसी दवा कंपनी की दवा को अपनी पर्ची पर लिखेगा। चलिए अगर यह मामूली बात है तो इसे भी छोड़ देते हैं। आप दिल्ली या मुंबई में किसी भी बड़े सरकारी-गैर सरकारी अस्पताल चले जाइए। आपके जितने भी टेस्ट के लिए डॉक्टर लिखेगा, आपको वहीं सामने से ही कराना पड़ेगा। क्योंकि डॉक्टर को रिपोर्ट जल्दी चाहिए...आप सामने से कराने को मजबूर हैं। यह पूरा गोरखधंधा है, जो हमारी-आपकी और मीडिया की सहमति से चल रहा है। बराबर के गुनाहगार हैं हम सब।

...और यह सब क्या है। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में आए दिन डॉक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं। वजह यही कि किसी मरीज के तीमारदार ने डॉक्टर साहब को गाली दे दी है या थप्पड़ जड़ दिया। आखिर मरीज के घर वालों का गुस्सा क्यों फूट रहा है। क्या वे डॉक्टर को अनायास ही थप्पड़ मार देते हैं या गाली दे देते हैं। हालांकि मैं ऐसी हरकतों को जायज ठहराने और समर्थन करने के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन इसका विश्लेषण तो होना ही चाहिए कि आखिर लोगों को जिंदगी देने वाले डॉक्टरों को लेकर आम आदमी की नफरत क्यों बढ़ती जा रही है। आमिर खान ने डॉक्टरों की दुनिया का एक कोना ही अभी छुआ है, ऐसी तमाम बातें और घटनाएं देश के लाखों-करोड़ों लोगों के पास बताने के लिए हैं जिन्हें सुनकर कई सत्यमेव जयते बनाए जा सकते हैं।

यकीन मानिए आमिर के इस छोटे से मुद्दे पर लोगों को झकझोर दिया है। मुझे अपने घर में सबसे पहला रिएक्शन मिला। मेरी पत्नी और बेटी की आंखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बाद 6-7 लोगों से मेरी बात हुई, सभी आमिर के शो की चर्चा करते नजर आए और सभी की जबान पर एक ही बात थी कि आमिर ने सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है। शाम को हम लोग एक विवाह कार्यक्रम में शामिल हुए। शादी में खाने-पीने और चमक-दमक से ज्यादा आमिर के शो की चर्चा थी।

हालांकि मेरी कुछ ऐसे भी युवकों से बात हुई जिन्हें आमिर का शो रत्तीभर पसंद नहीं आया। उनका कहना था कि वो तो इस शो में कुछ नाच-गाने की उम्मीद लगाकर शो देखने बैठे लेकिन घोर निराशा हुई। फिर उन्होंने उलहना भी दिया कि आप जैसे लोग ही इन पर औऱ सचिन जैसे लोगों पर कागज काले कर इनकी स्टार वैल्यू बढ़ा देते हो, वरना यह लोग तो बस मनोरंजन करने के लिए हैं।...ऐसी सोच रखने वाले युवकों की संख्या थोड़ी ही है लेकिन इस सोच के बावजूद ऐसे मुद्दे संजीदा लोग उठाते रहेंगे, बेशक उसमें बाजारवाद का तड़का भी लगा होगा, खुद की पब्लिसिटी वाली बात भी शामिल हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह भी तो नहीं कि आमिर या बाकी लोग मुद्दे उठाना छोड़ दें...

अगर आप अब भी यह शो न देख पाए हों तो यहां मैं उसका विडियो दे रहा हूं...आप देख सकते हैं...