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Saturday, May 27, 2017

चुप रहिए न...विकास हो रहा

कहिए न कु
विकास हो रहा
बोलिए न कुछ
विकास हो रहा
टीवी-अखबार भी बता रहे विकास हो रहा

झूठी हैं तुम्हारी आलोचनाएं

हां, फर्जी हैं तुम्हारी सूचनाएं

जब हम कह रहे हैं 
तो विकास हो रहा
देशभक्त हैं वो जो 
कह रहे विकास हो रहा
गद्दार हैं वो जो 
कह रहे विनाश हो रहा

मक्कार हैं वो जो कर रहे
गरीबी की बातें
चमत्कार है, अब कितनी 
सुहानी हैं रातें

कमाल है, तीन साल के लेखे-जोखे पर
तुम्हें यकीन नहीं

इश्तेहार में इतने जुमले भरे हैं

फिर भी तुम्हें सुकून नहीं


अरे, सर्जिकल स्ट्राइक का 

कुछ इनाम तो दो

इसके गहरे हैं निहितार्थ

कुछ लगान तो दो

अरे भक्तों, अंधभक्तों, यूसुफ 
कैसे लिखेगा तुम्हारा यशोगान

हां, समय लिखेगा, उनका 
इतिहास जो चुप रहे और 
गाते रहे सिर्फ देशगान



कॉपीराइट यूसुफ किरमानी, नई दिल्ली
Copyright Yusuf Kirmani, New Delhi

Friday, April 21, 2017

लाल बत्ती से पब्लिक को क्या लेना - देना


वीआईपी गाड़ियों से लाल बत्ती वापस लेकर क्या केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है...दरअसल, यह शहरी मध्यम वर्गीय लोगों की एक पुरानी मांग थी, जिस पर सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। ...वरना गांव के किसानों...गरीबों...रोज की दिहाड़ी कमाने वाले मजदूरो...को इन लाल बत्तियों से लेना-देना नहीं था। उन्हें इस बात से रत्ती भर फर्क पड़ने वाला नहीं है कि उनके सामने या पास से कौन #लालबत्ती से गुजरा।

...नरेंद्र #मोदी समेत तमाम असंख्य मंत्रियों और उनकी पार्टी के नेताओं को अच्छी तरह मालूम है कि जब तक ये लोग सत्ता से बाहर रहे तो इन्होंने शहरी मध्यम वर्गीय लोगों के बीच एक माहौल बनाया कि लाल बत्ती एक #वीआईपी कल्चर है और इसे खत्म होना चाहिए। क्योंकि तब #कांग्रेस सत्ता में थी और उसका छुटभैया नेता भी लाल बत्ती लगाए घूमता था। मेरा खुद का अनुभव है कि शहरी मध्यम वर्ग लाल बत्ती को बहुत अच्छी निगाह से नहीं देखता। कई ऐसे मामले भी सामने आए, जब लाल बत्ती वाली गाड़ियां तमाम तरह के अपराधों में लिप्त पाई गईं।...#भारतीयजनतापार्टी अभी भी शहरी मध्यम वर्गीय लोगों की पार्टी है।...इसलिए इस वर्ग को खुश करने के लिए उसने यह कदम उठाया जिसे इतना बड़ा फैसला बता दिया गया, मानों किसानों की समस्याएं, गरीबों की गरीबी और दिहाड़ी मजदूरों को रोटी इस लाल बत्ती के खत्म होने पर मिलने लगेगी। ...लेकिन ऐसा न होना है न होगा।...ये लाल बत्तियां धीरे-धीरे फिर से किसी न किसी बहाने लौट आएंगी और शहरी मध्यम वर्ग के लोगों के सीने में तब तक पूरी तरह ठंडक पड़ चुकी होगी।

मंत्रियों और बाकी वीआईपी लोगों को लाल बत्ती की जरूरत तो पहले से ही नहीं थी। सोचिए प्रधानमंत्री सड़क पर चले और किसी को पता न चले या कोई रास्ता न दे...क्या यह संभव है। हर मंत्री के साथ पुलिस की एक गाड़ी चलती है...वही बताने के लिए काफी है कि कोई वीआईपी आ रहा है।...जिन लोगों को लाल बत्ती नहीं चाहिए थी वे तो जबरन लगाए घूमते थे। लेकिन छुटभैये नेता जो लाल बत्ती से अब वंचित हैं वे सिक्योरिटी के नाम पर पुलिस या होमगार्ड की सेवाएं लेंगे और जनता के बीच में जाकर पहले की ही तरह रौब दिखाते रहेंगे।...भारत में वीआईपी कल्चर कोई भी राजनीतिक दल या सरकार खत्म नहीं कर सकती।...

...#भाजपा अब वह सारे फैसले ले रही है जिस तरह कांग्रेस कभी शहरी मध्य वर्गीय लोगों को खुश करने के लिए लेती थी। लेकिन शहरी मध्य वर्गीय कभी भी कांग्रेस से खुश नहीं हो पाया।

भाजपा का अभी हनीमून पीरियड चल रहा है।...शहरी मध्यम वर्गीय आबादी उससे खुश नजर आ रही है। हो सकता है कि 2019 में यह तबका लाल बत्ती जैसे फैसलों से खुश होकर उसे वोट दे दे। लेकिन उसके मोह भंग होने की शुरुआत 2020 आते-आते शुरू हो जाएगी।

...यह शहरी मध्यम वर्गीय #वोटर बहुत चालाक है। ...वह हर वक्त इसी उम्मीद में रहता है कि कौन सी पार्टी उसे तत्कालिक लाभ दे सकती है, कौन सी पार्टी फेयरनेस क्रीम की तरह उसे गोराहोने के झांसे में रख सकती है। ...शहरी मध्यम वर्ग दरअसल उम्मीदों में ही जीने का आदी हो चुका है। ...यह उम्मीद आजकल दुनियाभर में सबसे पॉजिटिव चीज है। इसकी आड़ में अमेरिका से लेकर भारत तक में बड़े-बड़े गुल खिलाए जाते हैं। .

#भारत में भी नेताओं के पास किसानों, गरीबों,  मजदूरों के लिए कुछ करने की कोई कार्य योजना नहीं है। उनके पास कार्ययोजना है तो बड़े बड़े कॉरपोरेट्स के बैंक लोन माफ करने और माल्या जैसे लोगों को लंदन भगा देने की कार्य योजना है। किसानों का कर्ज माफ करने की लंबी चौड़ी घोषणा ढोल बजाकर की जाती है लेकिन उसे अमली जामा पहनाने के नाम पर एक इंच भी कदम नहीं बढ़ाया जाता है। किसानों को सस्ती खाद देने का वादा किया जाता है लेकिन उसे सस्ता करने का कोई उपाय नहीं किया जाता। किसानों की जमीन सस्ते दाम पर लेकर उस पर औद्योगिक घरानों के महल खड़े कर दिए जाते हैं।

गौर से सोचिए और तथ्यों को परखिए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी या भाजपा की सरकार केंद्र में आई। लेकिन अभी तक हमारे सामने सबसे बड़े मुद्दे क्या पेश किए गए हैं -

1. बीफ बैन और स्लाटर हाउसों पर पाबंदी

2. तीन तलाक

3. अज़ान


यह तीनों मुद्दे सीधे मुसलमानों से जुड़े हुए हैं। सरकार की नीयत कुछ और है। ...इसी से लगता है कि सरकार किसी अजेंडे पर काम कर रही है।...पूरे भारत में बीफ निर्यात में सबसे ज्यादा गैर मुसलमान लगे हुए हैं। ...खुद मुसलमानों ने मांग की गो हत्या पर पूरे देश में रोक लगाने का कानून पास किया जाए। लेकिन सरकार इस पर काम नहीं कर रही है।...सरकार की हिम्मत नहीं की वह अल कबीर जैसे मीट निर्यातक का लाइसेंस रद्द कर दे या सब्बरवाल की मीट फैक्ट्री पर ताला लगा दे। अलबत्ता उसने उन हजारों गरीब मुसलमानों के पेट पर लात मारने की कोशिश की है जो छोटी-मोटी दुकान खोलकर चिकन-मटन बेचते हैं। बीफ की आड़ में इन दुकानों को भी बंद कराया जा रहा है।

#तीनतलाक गलत है। ...यह घोषित रूप से सारे मुस्लिम उलेमा कह रहे हैं। आपके पास बहुमत है, आप कानून बनाइए। आपको कौन रोक रहा है। लेकिन आपका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना है।

#अज़ान का मुद्दा खुद न उठाकर #बॉलिवुड के एक छुटभैये गवैए #सोनूनिगम से उठवाया गया है। #रमजान का महीना मई के अंत में शुरू होगा। इस मुद्दे को जानबूझकर रमजान से पहले ही उठा दिया गया है। ..ठीक है आप लाउडस्पीकर पर बैन लगाना चाहते हैं, लगा दीजिए। ध्वनि प्रदूषण बुरी चीज है। लेकिन काशी में बाबा विश्वनाथ #मंदिर में लगे लाउडस्पीकर को क्या बंद कराने की हिम्मत है...#अयोध्या के किसी मंदिर में लाउडस्पीकर बंद कराकर दिखाइए।...जो लोग अयोध्या गए होंगे, वहां उन्हें शाम को मंदिरों से आरती और घंटे की आने वाली आवाज का पता है...क्या उन्हें बंद कराया जा सकता है।....

....इन तीनों ही मुद्दों को इसलिए उठाया गया है ताकि कट्टर हिंदुओं को संतुष्ट  किया जा सके और पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। इन तीनों मुद्दों को उठाने से पब्लिक का ध्यान असली मुद्दों से हटा रहेगा।...उसे साफ और अच्छी सड़कें नहीं चाहिए...नालियां गंदगी से भरी होनी चाहिए....रोजगार नहीं चाहिए...क्योंकि उसे तो बीफ पर बैन लगवाना है...उसे तो #मुसलमानों में तीन तलाक बंद कराना है....क्योंकि उसे तो अजान में लाउडस्पीकर बंद कराना है।....सरकार के पास करने को कुछ नहीं....पब्लिक को अपने मुद्दों का पता नहीं....उसे एक उम्मीद में जिंदा रखा जा रहा है कि एक दिन भारत विश्व की महाशक्ति बन जाएगा...बेशक किसान भूखा रहकर आत्महत्या कर लेगा....हम पाकिस्तान से एक जंग करेंगे....बेशक हमारे युवकों को रोजगार मिले या न मिले...जंग होगी तभी हथियार बिकेंगे और तभी कमीशन मिलेगा। ...#राष्ट्रवाद को इसीलिए खाद-पानी दे देकर सींचा जा रहा है।...राष्ट्रवाद से ही वोटों की फसल काटी जा सकती है। मकसद अंध राष्ट्रवाद को फैलाना है, जो बिना लाल बत्ती के भी फलफूल सकता है।...

...आप लोग ऐसे ही मुद्दों से खुश होते रहें...जैसे लाल बत्ती खत्म होने से 1000-2000 लोगों को रोजगार मिल जाएगा...किसान आत्महत्या करना बंद कर देंगे...एमसीडी चुनाव में यह लाल बत्ती इमोशनल वोट जरूर दिला जाएगी।...भाटिया जी, बत्रा जी, शर्मा जी, वर्मा जी को इस बात से मतलब नहीं कि इन लाल बत्ती हटाने वालों ने किस कदर उनके मुहल्ले की नालियों को गंदा रखा...मच्छर पनपते रहे पर उफ न किया...बस खुश हैं कि लाल बत्ती हट गई...जीवन तर गया...



मेरे नादान दोस्तों...लाल बत्ती हटना समस्या का हल नहीं है...

Wednesday, April 19, 2017

बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेजबहादुर यादव की पत्नी का दर्द कौन जाने...







क्या #करप्शन के खिलाफ आवाजा उठाना गलत है...लेकिन #बीएसएफ जवान तेजबहादुर यादव को बर्खास्त करने से तो यही साबित होता है कि बीएसएफ में खाने की खराब क्वॉलिटी पर सवाल उठाने पर यही नतीजा होगा...

#तेजबहादुरयादव का एक #विडियो वायरल हुआ था, जिसमें बताया गया था कि किस तरह वह #सियाचिन मोर्चे पर तैनात हैं और किस तरह पानी वाली दाल और जली हुई रोटियां उन लोगों को खिलाई जा रही हैं।

बीएसएफ ने तेजबहादुर का कोर्टमार्शल करने के बाद यह सजा बुधवार को सुनाई। अगर उनकी पत्नी अपने विडियो संदेश के जरिए दुनिया को यह न बताती कि उनके पति को बर्खास्त कर दिया गया है तो हम लोगों को यह पता भी न चलता।



...हैरानी की बात है कि तेजबहादुर यादव के परिवार को उन #राष्ट्रवादियों का भी साथ नहीं मिला जो रातदिन भारत माता की जय बोलकर #राष्ट्रीयता की अलख जलाए रखते हैं। हमने आपने इन राष्ट्रवादियों को सत्ता इस उम्मीद से सौंपी थी कि चलो अब हर तरह के करप्शन खत्म हो जाएंगे।...



हमें अपने देश की सेना पर बड़ा मान है।...कितनी दुर्गम जगहों पर हमारे जवान मोर्चे पर तैनात रहते हैं। अगर इन जवानों को कुछ शिकायत है तो उसे दूर किया जाना चाहिए न कि उन्हें उसके बदले डराया जाए, सस्पेंड किया जाए और फिर बर्खास्त किया जाए...अदालत का फैसला इतनी जल्दी नहीं आता, जितनी जल्दी बीएसएफ ने इस जवान का कोर्टमार्शल खत्म करने में लगाया।



#प्रधानमंत्री को इस मामले में सीधा दखल देना चाहिए। तेजबहादुर यादव ने बीएसएफ में संस्थागत करप्शन का मुद्दा उठाया है। उन्होंने किसी अफसर विशेष या किसी यूनिट विशेष में परोसे जाने वाले खाने की क्वॉलिटी में घटियापन का मुद्दा नहीं उठाया है।...प्रधानमंत्री अगर इस मामले में सीधा दखल नहीं देते तो पब्लिक में यह संदेश जाएगा कि सरकार संस्थागत करप्शन को और बढ़ाना चाहती है। उसकी मंशा इसे खत्म करने की नहीं है।



माना कि बीएसएफ या सेना में करप्शन नहीं है। वहां का खाना बहुत अच्छा और शानदार है।...लेकिन तेजबहादुर यादव और कुछ अन्य जवानों ने जो कुछ कहा है, उससे तो पता यही चलता है कि दाल में कुछ काला जरूर है, हो सकता है कि पूरी दाल काली न हो।



...तेजबहादुर यादव की पत्नी ने अपने विडियो मैसेज में कहा है कि अब कौन मां अपने बच्चे को फौज में लड़ने के लिए भेजना चाहेगी, जिसे दो वक्त की रोटी भी सुकून से नहीं मिलती।...बात में दम है। यादव परिवार हरियाणा के रेवाड़ी जिले का रहने वाला है। रेवाड़ी से सबसे ज्यादा लोग सेना में भर्ती होते हैं। करगिल युद्ध में सबसे ज्यादा सेना के लोग रेवाड़ी जिले से ही शहीद हुए थे। रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ ऐसे जिले हैं, जहां अगर किसी घर से कोई फौज में नहीं है तो उसे इलाके में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता है।...ऐसे में तेज बहादुर यादव की पत्नी का मार्मिक बयान देश न सही रेवाड़ी के लोगों को तो झकझोर कर रख ही देगा...



बहरहाल, उन जवानों को सलाम जो हमारे देश की सीमा की रखवाली करते हैं लेकिन उससे ज्यादा उन जवानों के जज्बे, हिम्मत और उन हालात को सलाम, जिनमें उन्हें जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।...तेज बहादुर यादव ने कारनामा तो अंजाम दे ही दिया है, चाहे आप और हम उसे माने या नहीं मानें...








Thursday, April 13, 2017

हिंदी कविता : सन्नाटा और गीतफरोश : Sannata and GeetFarosh : Bhawani Prasad Mishr















भवानी प्रसाद मिश्र की एक और मशहूर कविता- गीतफरोश





Sunday, April 2, 2017

ईवीएम मशीनों से कराए गए चुनाव का काला सच....





यह वायरल विडियो बताता है कि ईवीएम मशीनों का काला सच क्या है...

देश को ईवीएम मशीनों के जरिए लाया गया लोकतंत्र नहीं चाहिए....

ऐसे मतदान पर कैसे भरोसा हो, जिसमें सत्ताधीशों की नीयत खराब हो...

ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करके भारतीय लोकतंत्र के साथ साजिश की जा रही है....

आखिर जनता कब जागेगी और इस नाजायज हरकत का विरोध कब करेगी...

भारतीय लोकतंत्र में ऐसे बुरे दिन कभी नहीं आए...यह इमरजेंसी से भी बुरा दौर है...

जिन राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना चाहिए था...वे घरों में सो रहे हैं....यहां तक कि जिस पार्टी ने सबसे पहले ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करके चुनाव जीतने का आरोप लगाया था, उस पार्टी के नेता व वर्कर भी सो रहे हैं...उनमें जरा भी साहस नहीं है कि वे सड़कों पर आकर इसका खुला विरोध करें...

चुनाव में ईवीएम मशीनों के दुरुपयोग की कहानी सामने आने लगी है। यूपी चुनाव नतीजों के बाद जब भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले बाकी राजनीतिक दलों की सीटें बहुत कम आईं तो इन मशीनों पर सवाल उठे। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया...तब सहसा मुझे और मेरे जैसे तमाम लोगों को मायावती के आरोप पर विश्वास नहीं हुआ ...लेकिन जिस तरह से महाराष्ट्र और अब मध्य प्रदेश में यह गड़बड़ी पकड़ी गई है, उससे यह शक विश्नवास में बदल गया कि ईवीएम के जरिए यूपी चुनाव में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई।

आखिर ऐसा कैसे हुआ कि मध्यप्रदेश की ईवीएम मशीनों में किसी भी बटन को दबाने पर भाजपा की पर्ची निकलती थी। इन मशीनों को वीवीपीटी मशीन से जोड़ कर ऐसा किया गया। चुनाव आयोग ने 19 अफसरों पर एक्शन लिया है और कई मध्य प्रदेश के कई आईएएस अफसरों के खिलाफ जांच शुरू हो गई है लेकिन यह सवाल रहस्य ही रहेगा कि आखिर किन लोगों के कहने पर ये गड़बड़ियां की गईं।








Wednesday, March 29, 2017

महिलाओं पर अत्याचार को बतातीं 4 कविताएं



ये हैं परितोष कुमार  'पीयूष' जो बिहार में जिला मुंगेर के जमालपुर निवासी है। हिंदीवाणी पर पहली बार पेश उनकी कविताएं नारीवाद से ओतप्रोत हैं। ...लेकिन उनका नारीवाद किसी रोमांस या महिला के नख-शिख का वर्णन नहीं है।...बल्कि समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर उनकी पैनी नजर है। गांव के पंचायत से लेकर शहरों में महिला अपराध की कहानियां या समाचार उनकी कविता की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं।...उनकी चार कविताओं में ...आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी...मुझे बेहद पसंद है।

बीएससी (फिजिक्स) तक पढ़े परितोष की रचनाएं तमाम साहित्य पत्र-पत्रिकाओं में, काव्य संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। वह फिलहाल अध्ययन व स्वतंत्र लेखन में जुटे हुए हैं।




ठगी जाती हो तुम !

पहले वे परखते हैं
तुम्हारे भोलेपन को
तौलते हैं तुम्हारी अल्हड़ता
नांपते हैं तुम्हारे भीतर
संवेदनाओं की गहराई

फिर रचते हैं प्रेम का ढोंग
फेंकते है पासा साजिश का
दिखाते हैं तुम्हें
आसमानी सुनहरे सपने

जबतक तुम जान पाती हो
उनका सच उनकी साजिश
वहशी नीयत के बारे में
वे तुम्हारी इजाजत से
टटोलते हुए
तुम्हारे वक्षों की उभारें
रौंद चुके होते हैं
तुम्हारी देह

उतार चुके होते हैं
अपने जिस्म की गर्मी
अपने यौवन का खुमार
मिटा चुके होते हैं
अपने गुप्तांगों की भूख

और इस प्रकार तुम
हर बार ठगी जाती हो
अपने ही समाज में
अपनी ही संस्कृति में
अपने ही प्रेम में
अपने ही जैसे
तमाम शक्लों के बीच





खर-पतवारों के बीच!
                                
                                                                                    

बदहाली की मात्रक
फटेहाली की पैदाइश
वो नन्हें कदमों से
परचून की दूकान जाते वक्त

जब खींच ली गई होगी
सड़क किनारे से
खर-पतवारों के बीच
सुनसान जंगली खेतों में

कितनी
छटपटायी होगी
कितनी
मिन्नतें मांगी होंगी
आबरू बचा लेने की खातिर

कैसा लगा होगा उसे
जब उसकी सुनने वाला
कोई नहीं होगा
उसकी अपनी ही आवाज
डरावनी चीखों में तब्दील हो
लौटती होगी कानों में

उसका हर एक विरोध
जब उत्तेजित करता होगा
मानवी गिद्धों के झुंड को
उसके सारे सपने
सारी आकांक्षाओं ने
दम तोड़ दिये होंगे

और वह ढ़ीली,
निढाल पड़ गयी होगी
मानवी गिद्धों की पकड़ में
जिस्म पर बचे कपड़ों के
चंद फटे टुकड़ों के साथ

उसकी खुली आँखों के सामने
हो रहा था
उसके अंगों का बँटवारा
आपस में गिद्धों के बीच

शायद उसे पता चल चुका था
परसों रात भी यही हुआ होगा
नीम के पेड़ से लटकी
रज्जो की लाश के साथ

जिसे आत्महत्या
साबित कर दिया था
समाज के कद्दावर लोगों ने
पंचायत की चौकी पर


सुनवायी के दौरान !
                                                                                                        
                                                                                     

                        
हमारे देश की
लोकतांत्रिक कचहरी में
काले लबादों के बीच
जब भी/प्रायः मुकदमों में
बलात्कार की सुनवायी होनी होती है
बहुत ही भद्दे, बेहूदे
और वाहयात किस्म के
प्रश्न पूछे जाते हैं।

क्रमानुसार देने होते हैं
पीड़िता को सारे जवाब
प्रदर्शित करने होतें हैं
हर एक जख्मी अंगों को
दिलाने होते हैं एहसास सिहरनों के
दर्ज करानी होती है
सिसकियों की गिनतियाँ
रेपिस्टों की संख्या
और वस्त्रों की बारीकियां

इस प्रकार
फिर एक बार किया जाता है
आभासी बलात्कार
पीड़िता के साथ
न्याय की काली कोठरी में

फिर सुनवायी की
अगली तारीख पर
रिहा कर दिया जाता है
बलात्कारियों को
चश्मदीद के अभाव में।

और वो चल पड़ते हैं
स्वच्छंद वा उन्मुक्त
नये शिकार की खोज में


आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी!                                                                             


                                                                                                       
                                            

                                                                                                     
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।

एम०ए० की कक्षा में
जिस प्रोफेसर ने
मेरी फेक आईडी
फेसबुक पर बनाई
उन्हीं के पल्ले मैं
पीएचडी में आई।

शोध के मेरे टॉपिक
'फेमीनिज्म' पर
डिस्कशन क्लास के नाम
उस गाइड ने
खूब आभासी मस्तियाँ लूटीं।

अन्य शोधार्थियों ने भी
कमरतोड़ मेहनत की
कुछ ने मालिश किए
कुछ ने जूते पॉलिश किए
किसी ने बनियान धोये
किसी ने गेहूँ पिसाए।

थीसिस पास करने के
अश्वासन दे-देकर
उस गाइड ने आये दिन
अपनी बीवी के
पेटीकोट सिलवाये
पीएचडी की लालच में
मैंने भी अपने अत्याधुनिक
कौशल खूब दिखलाए
और फेलोशिप के पैसे भी
बीवी की चकमक
साड़ियों में जगमगाए।

अभी-अभी
दो साल बीते ही थे कि
देर रात गाइड के
स्वीटहार्ट
और जानू वाले
मैसेज आने लगे।

अपनी थीसिस की खातिर
मैंने उसे भी
नजरअंदाज किया
लेकिन बात यहाँ
रुकी कहां।

अगली ही शाम
उस गाइड के
बुढ़ापे की डूबती जवानी ने
अपना परचम लहराया।

फिर क्या था
मैंने अपनी थीसिस फाड़
गाइड के मुंह पर लहराया
घर की ओर
कदम बढ़ाया।

और
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।
                                                                                                                                                                                                                         


-परितोष कुमार 'पीयूष'
ईमेल- piyuparitosh@gmail.com

Monday, March 27, 2017

आरती तिवारी की चार कविताएं

आरती तिवारी मध्य प्रदेश के मंदसौर से हैं। हिंदीवाणी पर उनकी कविताएं पहली बार पेश की जा रही हैं। आरती किसी परिचय की मोहताज नहीं है। तमाम जानी-मानी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी असंख्य रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ से भी वह जुड़ी हुई हैं।...हालांकि ये कविताएं हिंदीवाणी ब्लॉग के तेवर के थोड़ा सा विपरीत हैं...लेकिन उम्मीद है कि पाठकों को यह बदलाव पसंद आएगा...


तेरे-मेरे वो पल

प्रेम के वे पल
जिन्हें लाइब्रेरी की सीढ़ियों पे बैठ हमने बो दिए थे 
बंद आंखों की नम ज़मीन पर उनका प्रस्फुटन 
महसूस होता रहा 
कॉलेज छोड़ने तक
संघर्ष की आपाधापी में 
फिर जाने कैसे विस्मृत हो गए 
रेशमी लिफाफों में तह किये वादे जिन्हें न बनाये रखने की 
तुम नही थीं दोषी प्रिये 
मैं ही कहां दे पाया
भावनाओं की थपकी 
तुम्हारी उजली सुआपंखी आकांक्षाओं को 
जो गुम हो गया
कैरियर के आकाश में
लापता विमान सा
तुम्हारी प्रतीक्षा की आँख
क्यों न बदलती आखिर 
प्रतियोगी परीक्षाओं में 
तुम्हें तो जीतना ही था!
हां, तुम डिज़र्व जो करती थीं !

हम मिले क्षितिज पे 
अपना अपना आकाश 
हमने सहेज लिया
उपेक्षित कोंपलों को 
वफ़ा के पानी का छिड़काव कर 
हम दोनों उड़ेलने लगे
अंजुरियों भर भर कर
मोहब्बत की गुनगुनी धूप
अभी उस अलसाये पौधे ने 
आंखे खोली ही थीं कि 
हमें फिर याद आ गए 
गन्तव्य अपने अपने ! 

हम दौड़ते ही रहे
सुबह की चाय से 
रात की नींद तक
पसरे ही रहे हमारे बीच काम
घर बाहर मोबाइल लैपटॉप
फिट रहना
सुंदर दिखना 
अपडेट रहने की दौड़ 
आखिर हम जीत ही गए 
बस मुरझा गया 
पर्याप्त प्रेम के अभाव में 
लाल- लाल कोंपलों वाला 
हमारे प्यार का पौधा
जो हमने रोपा था 
लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर बैठ




 कुछ लम्हे फुरसत के 

जैसे पहाड़ पे
उतर आती है धूप
चुरा के रेशमी गुच्छे
कोमल किरणों के
जैसे एक नदी
मुस्कुरा उठती है, अनायास
किसी अजनबी कंकड़ के
परदेसी स्पर्श से
जैसे गायों के झुंड से
तहसनहस हुए बगीचे में
किसी टहनी पर
फूटती एक कली
बची रहने की
ख़ुशी मना रही हो
वैसे ही तुम भी
कामों के इस ढेर से
गर्दन झटक कर
मुट्ठी में क़ैद कर लो
फुरसत के कुछ लम्हे
कभी जीकर देखो ऐसे भी




कभी यूं भी


ज़ेहन में कौंध गईं स्मृतियां
  वही सोलहवें साल वाली
     जब तुम, एक चित्रलिपि सी
            एक बीजक मंत्र सी
            अबूझ पहेली थीं

जब पत्तियां थीं, फूल थे
पर सिर्फ मैं नही था
तुम्हारी नोटबुक में
चकित, विस्मित दरीचों की ओट से
    पढ़ता तुम्हारा लिखा 
     इतिहास बनाती तुम
     विस्फारित नेत्रों से तलाशता अपना नाम
        जो कहीं न था नोटबुक में
          उसे ही पढ़ने की जिद
          ...कभी यूं भी
 
मेरे अवचेतन में प्रतिध्वनि थी
    मेरी ही आवाज़ की
     नदारद था तुम्हारा उच्चारा
       मेरा नाम
ऐसी कैसी कोयल, कूकने को
राजी न थी जो
  मुझे लगा तुम्हारा अनिंद्य सौंदर्य
    रुग्ण हो जैसे
   जैसे पानी में उतरी परछाईं
     जो डूब गई हो
    मुझे बिठा कर किनारे पे
      लौट जाने के लिए
 
 कभी यूं भी   
सिर्फ फूल ही नहीं
गमले भी गुनहगार थे
मेरी उदासी के
आहें, चाहें, उमंगें, तरंगे
बेगानी  हुई
इन्हीं की नसीहतों से




फिक्र

वो एक मासूम फिक्र है
  अन्यास पैदा हुई
  लाभ हानि के गणित से जुदा
मन की दुर्गम घाटियों से
संभल संभल के गुज़रती
हौले से खोल सीमाओं की सांकलें
उतर आई प्रार्थनाओं के स्वर में
व्यक्त हुई दफ़्न होने के पहले
मिलने बिछुड़ने की रीत से
अनभिज्ञ रहकर
सिर्फ कुशल चाहने तक


@copyrights Arti Tiwari











Thursday, March 16, 2017

मुस्लिम वोट बैंक किसे डराने के लिए खड़ा किया गया ?

मेरा यह लेख आज (16 मार्च 2017)  नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है। अखबार में आपको इस लेख का संपादित अंश मिलेगा, लेकिन सिर्फ हिंदीवाणी पाठकों के लिए उस लेख का असंपादित अंश यहां पेश किया जा रहा है...वही लेख नवभारत टाइम्स की अॉनलाइन साइट एनबीटी डॉट इन पर भी उपलब्ध है। कृपया तीनों जगह में से कहीं भी पढ़ें और मुमकिन हो तो अन्य लोगों को भी पढ़ाएं...



यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जिस तरह मुस्लिम राजनीति को हाशिए पर खड़ा कर दिया है, उसने कई सवालों को जन्म दिया है। इन सवालों पर गंभीरता से विचार के बाद संबंधित स्टेकहोल्डर्स को तुरंत एक्टिव मोड में आना होगा, अन्यथा अगर इलाज न किया गया तो उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए मुस्लिम राजनीति पर चंद बातें करना जरूरी हो गया है। एक लंबे वक्त से लोकसभा, राज्यसभा और तमाम राज्यों की विधानसभाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगातार गिरता जा रहा है। तमाम राष्ट्रीय और रीजनल पार्टियों में फैले बहुसंख्यक नेतृत्वकर्ताओं ने आजम खान, शाहनवाज खान तो पैदा किए और ओवैसी जैसों को पैदा कराया लेकिन एक साजिश के तहत कानून बनाने वाली संस्थाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को वंचित रखा गया। आजम खान और शाहनवाज हुसैन एक प्रतीक या मुखौटा बनकर रह गए। ओवैसी जैसे चेहरे इसलिए खड़े किए गए कि वह लगातार मांग करते रहें कि देखिए मुसलमानों के साथ कितनी नाइंसाफी हो रही है, हम उनकी आवाज बनकर आए हैं।

इसके पीछे तमाम बहुसंख्यक नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों की साजिश यह है कि इस तरह भारतीय समाज में धुर्वीकरण आसानी से होता रहेगा औऱ उसका मीठा फल वो खुद खाते रहेंगे। एकाध टुकड़ा मुखौटों को भी फेंक दिया जाएगा। अगर इन दलों की नीयत आजादी के वक्त ही साफ होती तो मुसलमानों को नौकरी में न सही लेकिन लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में दलितों की तरह रिजर्वेशन तो मिल ही सकता था। जिस रिजर्वेशन की मजबूरी में भाजपा को दलितों को भी टिकट देना पड़ता है, ठीक उसी तरह मुसलमान भी भाजपा टिकट पर लड़ते। अगर शुरू से यह स्थिति होती को भारत में ध्रुवीकरण की जो गंदी राजनीति अब देखी जा रही है वो पनपने न पाती। हम उन मतदाताओं को क्यों दोष दें या कोसें जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को वोट दिया। उन्होंने वही किया, जिसकी तरफ बहुसंख्यक नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों ने उन्हें धकेला। वो खुद वोट बैंक नहीं बना, बहुसंख्यक नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों ने उसे साजिशन वोट बैंक बनाया।

दरअसल, हमें तत्काल जिस चुनाव सुधार की जरूरत है वह यही है कि सभी राजनीतिक दल एक होकर दलितों की तरह मुसलमानों और खासकर पासमंदा मुसलमानों को विधायिका में प्रतिनिधित्व देने के लिए रिजर्वेशन कानून पास कराएं। हालांकि बहुसंख्यक नेतृत्व वाले तमाम दल इस मांग को पसंद नहीं करेंगे लेकिन समस्या का समाधान और कोई नजर नहीं आ रहा है। इसके लिए समाज के हर वर्ग को ऐसे प्रेशर ग्रुप तैयार करने होंगे जो राजनीतिक दलों पर इसके लिए दबाव बनाएं। ऐसा होते ही ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति, मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम वोट बैंक जैसी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। ऐसा कानून भाजपा के लिए भी मुफीद रहेगा, इसी बहाने कम से कम उस पर से यह धब्बा हटेगा कि वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है या मुसलमान उससे दूरी बनाकर किसी दल के वोट बैंक बने रहते हैं। मुसलमानों को विधायिका में रिजर्वेशन मिलने से तमाम दलों को बैठे-बिठाए प्रतिबद्ध काडर भी मिल जाएगा।

अच्छा, मान लीजिए, अगर राजनीतिक दल इस मांग पर राजी नहीं होते हैं तो मुसलमानों को क्या करना चाहिए। ऐसे में एक चारा तो यह है कि रीजनल पार्टियों को छोड़कर बड़ी तादाद में राष्ट्रीय दलों के काडर में शामिल हो जाएं। इन दलों के अंदर घुसकर इनकी सदस्यता लेकर इन्हें चुनौती दी जाए। इसके लिए बायें किनारे की पगडंडी छोड़कर अपने स्वार्थ के लिए दायें तरफ की पगडंडी पर चलने में हर्ज क्या है। लेकिन फिर यह ध्यान भी रखना है कि वहां जाकर फिर आजम खान या शाहनवाज खान जैसा मुखौटा नहीं बनना है। पूरी शिद्दत से उन पार्टियों की विचारधारा अपनाएं और फिर अंदर ही चुनौती दें। यह प्रक्रिया थोड़ी लंबी है और नतीजा आने में वक्त लगेगा लेकिन धीरज रखना होगा। मुसलमानों का राष्ट्रीय पार्टियों के फोल्ड में लौटना उनके लिए हितकारी होगा।

यूपी चुनाव से कुछ सबक मुसलमानों को भी सीखना होगा। उन्हें यह बात गांठ बांध लेनी होगी कि मौलवी-मौलाना उन्हें सिर्फ बर्बाद कर रहे हैं। उनके नाम पर वह दरअसल अपनी दुकान चला रहे हैं। समाजवादी पार्टी के हक में वोट देने के लिए एक बहुत बड़े सुन्नी मौलाना के होर्डिंग लखनऊ से लेकर गोरखपुर और मुजफ्फरनगर तक में नजर आए। बहुजनसमाज पार्टी के हक में वोट देने के लिए एक बहुत बड़े शिया मौलाना के विडियो संदेश वाट्सऐप पर पूरे यूपी में फैलाए गए। दरअसल, दोनों ही अपने फायदे के लिए मुस्लिम वोटों को बांटकर भाजपा के लिए धुर्वीकरण करा रहे थे। दोनों ही मौलानाओं के संबंध भाजपा के नेताओं से हैं। जिसने चुनाव से छह महीने पहले इन दोनों की प्रधानमंत्री से मुलाकात कराई। वहां इन दोनों ने चंद मांगें रखीं। फोटो खिंचवाया और चलते बने। यह भाजपा की चुनावी तैयारी थी। आप यकीन मानिए अखिलेश यादव और मायावती ने इन दोनों मौलानाओं से उनकी बिरादरी का समर्थन नहीं मांगा था। ये लोग खुद कौम के सिपहसालार बनकर वहां पहुंचे थे।

पढ़े लिखे मुस्लिम युवकों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने समाज को अब तमाम मुद्दों पर जागरूक करने की जिम्मेदारी संभालें। महिलाओं के तीन तलाक का मुद्दा जैसे ही उठा था, मुस्लिम संगठनों को मजहब को ताक पर रखकर इसे गलत बताना था। क्योंकि मौलवी के लिए यही मुफीद है कि वो तीन तलाक पर कट्टरता का मुलम्मा चढ़ाकर पेश करता रहे और अपनी फसल काटता रहे, जबकि उसे खुद भी यह मालूम है कि तीन तलाक कितना अमानवीय और गलत है। अगर यह सही होता तो क्यों नहीं मुसलमानों का हर मसलक एक ही तरह के तलाक पर अमल करता। जाहिर है कि इसमें झोल है। कुल मिलाकर आपकी सामाजिक कट्टरता से आपके जन्नत में जाने का रास्ता तय नहीं होगा। जन्नत का संबंध आपके आमाल (कर्म) से है। मौलवी आपको दीन बताने के अलावा कट्टर होने के नुस्खे मुफ्त में देता है। आप उससे दीन लीजिए। कट्टरता वहीं छोड़कर आ जाइए। मेहरबानी करके दूसरों के दीन के बारे में भी जानें। दूसरों की मजलिस में भी बैठने का तरीका सीख लेंगे तो असली सलीका खुद ब खुद आ जाएगा।  

मुसलमानों को चाहिए कि वो तालीम हासिल करने पर जोर देने के अलावा आपस में मेलजोल बढ़ाकर शहर से गांवों तक एक बड़ा नेटवर्क तैयार करें। इस काम में पढ़े-लिखे युवा टेक्नॉलजी के जरिए मदद करें। ध्यान रहे कि यह काम विशुद्ध रूप से नए सामाजिक चिंतन का आधार तैयार करने, नईृ-नई जानकारियां हासिल करने और जागरूक होने के लिए किया जाए। आप चाहे शिया हों, सुन्नी हों, अहमदिया हों, अपना मसलक अपने घर के अंदर और अपनी मस्जिद-इमामबाड़ों में रखें। याद रखें जब हाशिए पर नहीं रहेंगे तो दीन भी महफूज रहेगा। 

#यूपीचुनाव2017  #मुस्लिमराजनीति  #राजनीति  #मुस्लिमवोटबैंक #भाजपा #आरएसएस #संघ #कांग्रेस #सपा #बसपा


Tuesday, February 28, 2017

...क्योंकि गुरमेहर कौर के विचारों से तुम डरते हो

(This article first appeared in Nav Bharat Times online Blog Hindivani)

किसी को अगर अभी मुगालता है कि भगवा ब्रिगेड से जुड़े संगठन, केंद्रीय मंत्री, पार्टी नेता देश की राष्ट्रीय अस्मिता बचाने के लिए जेएनयू (JNU) के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में भी कोई महान काम कर रहे हैं तो उन्हें अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए। ...लेडी श्रीराम (LSR) कॉलेज की छात्रा गुरमेहर कौर (#GurmeharKaur) ने अब खुद को सारे प्रदर्शनों से अलग कर लिया है। उसने कहा है कि वो अपने कैंपेन से पीछे हट रही है और जिसका जो भी मन आए करे। ....आप लोगों के लिए यह एक वाक्य हो सकता है लेकिन इसके पीछे छिपी टीस को अपने क्या महसूस किया।




....गुरमेहर ने भगवा ब्रिगेड (SaffronBrigade) की गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज उठाई और चंद ट्वीट किए...सिर्फ इतनी ही बात पर उसे रेप की धमकी दी गई...इतनी ही नहीं देश का जिम्मेदार गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू बयान देता है कि आखिर ऐसे लोगों को सिखाता कौन है यानी गुरमेहर ने कुछ लोगों के सिखाने में आकर गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज उठाई। कुछ और मंत्री भी गुरमेहर की निंदा करने से पीछे नहीं रहे...। क्या राष्ट्रवादियों की मानसिकता ऐसी ही होती है कि किसी लड़की को रेप की धमकी दी जाए और आप उसकी ही निंदा करते रहें, आप उसके ही सवालों पर सवाल उठाते रहें।...आखिर तुम लोगों को गुरमेहर जैसी लड़कियों और लड़कों के विचारों से इतनी नफरत क्यों हैं...तुम में दम है तो उनके विचारों की काट करो लेकिन जब तुमसे नहीं हो पाता तो तुम पत्थर उठा लेते हो...रेप की धमकी देते हैं। ...इतने कायर हो, और कर भी क्या सकते हो।

...तुम लोग विचारों से डरते हो।...

...लेकिन अब तुम लोग चैन की सांस ले सकते हो। गुरमेहर ने तुम्हारी गुंडागर्दी के खिलाफ अपना कैंपेन वापस ले लिया है।...तुम खुश हो सकते हो...जोर से खिलखिला सकते हो।...लेकिन गुरमेहर कौर के विचार तो नहीं मरे।...तुम उसके विचारों की हत्या तो नहीं कर सके...ठीक उसी तरह कि जैसे गांधी (Gandhi) की हत्या की गई थी लेकिन उनके विचारों की हत्या नाथूराम गोडसे (Godse) की औलादें भी न कर सकीं। ...तो गुरमेहर कौर के विचारों की हत्या यह देश नहीं होने देगा।...कितने गिर गए हो तुम लोग....गुरमेहर के पिता शहीद हुए थे....लेकिन तुम लोगों ने ढूंढ कर निकाला कि वो कूपवाड़ा में एक अभियान के दौरान मारे गए थे....अरे यही वो मानसिकता है जो सियाचिन की बर्फ में दब कर शहीद होने वाले जवानों को शहीद नहीं मानती है।...हद तो यह है कि कुछ गधों ने गुरमेहर के बयान को सेना के सभी शहीदों का अपमान बता डाला....यही वह मानसिकता थी जो उस सैनिक (तेज बहादुर यादव) की पानी वाली दाल में बागवत के बीज खोज रही थी। यही वह मानसिकता थी जो उस सैनिक की फेसबुक (Facebook) प्रोफाइल में धर्म विशेष के नामों को खोज रही थी।

...कितना गिरोगे यार...

...गुरमेहर कौर के विचारों को काटने के लिए...उस सैनिक की पानी वाली दाल में बगावत खोजने के लिए...
...ऐसे विचार गुंडागर्दी के दम पर कुछ देर के लिए चुप्पी लगा जाएंगे लेकिन खत्म नहीं हो पाएंगे।...तुम्हारी गुंडागर्दी से रामजस कॉलेज (#RamjasCollege) के प्रोफेसर प्रशांत चक्रवर्ती के रीढ़ की हड्डी टूट गई। ....लेकिन क्या प्रशांत के विचारों को तुम लोग काट पाओगे....क्या शाहला राशिद को खामोश कर सकोगे। ....ऐसे विचार किसी दीनानाथ की दुकान पर नहीं मिलते और न किसी पुरातन काल में मिलते हैं कि जब कभी हाथी के नाक की सर्जरी की गई होगी। ...ऐसे विचार नॉर्थ कैंपस (#NorthCampus) या जेएनयू के क्लासरूम में पनपते हैं और फिजा में बिखर जाते हैं। ऐसे विचार हैदराबाद यूनिवर्सिटी (HU) या कोलकाता यूनिवर्सिटी से निकलकर देशभर में फैल जाते हैं। ऐसे विचार बीएचयू और एएमयू से भी आते हैं...उनकी रफ्तार तुमसे रोकी न जाएगी।...

...लेकिन तुम लोग विचारों से कंगाल हो...तभी काट भी नहीं कर पाते।...इतने कंगाल हो कि कभी शहीद-ए-आजम भगत सिंह में तो कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस में तो कभी राम प्रसाद बिस्मिल में अपने तथाकथित विचारों की समानता खोजते हो।...फिर भी खोज नहीं पाते।...अरे, बेवकूफो ये लोग गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं।....इन्हीं किसी सरकारी योजना का नाम देकर जिंदा नहीं रखा गया है।...ये देश के प्रतीक हैं किसी राजनीतिक पार्टी के नहीं... इनके विचार हमारी धरोहर हैं...तुम बीच में कहां से टपक पड़े। ...तुम इनसे तालमेल करके अपना भगवा चोला नहीं बदल सकते। वो तो भगवा ही रहेगा।...उसके अंदर का तथाकथित विचार भी भगवा रहेगा। ...ऐसे ही तथाकथित विचार तो वीर अब्दुल हमीद को बाकी शहीदों के मुकाबले कमतर आंकते हैं....ऐसे ही तथाकथित विचार तो बाकी अब्दुल हमीदों को अपनी पार्टी का टिकट देते हुए राष्ट्रवादी (Nationalist) हो जाते हैं।...ऐसे ही विचार तो किसी करीम-रहीम के पकड़े जाने पर उन्हें आतंकवादी करार दे देते हैं।...ऐसे ही विचार तो मध्यप्रदेश में जासूसी का नेटवर्क चलाने वालों को आरोपी मान लेते हैं।

...रोहित वेमुला ने तो विचार फैलाने के बाद खुदकुशी कर ली थी....लेकिन तुम उसके विचारों से इतना डरे कि उसके दलित होने पर ही सवाल उठा डाला।....इतने डरे कि उनके परिवार का दलित (Dalit) स्टेटस तक छिनवा डाला।...तुम्हारे जज...फैसला भी तुम्हारा।...तुम्हारी नजर में रोहित वेमुला कल भी अपराधी था, आज भी है। ...लेकिन रोहित ने जिन बातों को उठाया, क्या उसके विचारों को तुम लोग दफन कर पाए।...रोहित के विचारों का सामना करने की हिम्मत-ताकत तुम लोगों में नहीं है। ...देखों न ....एक रोहित वेमुला जाता है तो कोई गुरमेहर कौर आ जाती है...आज गुरमेहर कौर को चुप कराया है तो कल कोई और आएगा....विचारों का ऐसा सैलाब आएगा कि तुम लोग तिनके की तरह उड़ जाओगे।...
इतिहास गवाह है कि उसने न जाने कितने चे ग्वेरा, सकुरात, अरस्तू और काफ्का के विचारों को जिंदा रखा।...क्योंकि ये लोग भी गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ...इसलिए गुरमेहर कौर के विचार... प्रशांत चक्रवर्ती और रोहित वेमुला के विचार भी जिंदा रहेंगे....

...और देखो, जब विचारों से कंगाल हो तो दूसरे विचारों से मत टकराओ, उनसे कुछ सीखो।...गुरमेहर कौर जैसी बहादुरों का सम्मान करना सीखो...अबदुल हमीदों को भी जगह दो।...बरेली जाने वाला हर कोई नावेल्टी चौराहे पर दीनानाथ की लस्सी जरूर पीता है। पूरा बरेली शहर दीनानाथ की लस्सी पीता है। क्योंकि दीनानाथ की उस लस्सी जैसी मिठास कहीं नहीं और उसके साथ प्यार मुफ्त मिलता है। लेकिन तुम्हारे तथाकथित विचार किसी और दीनानाथ की दुकान से निकल कर आए हैं, जिनसे देश को खतरा है। उसमें मिठास नहीं जहरीलापन है।

 ...क्या देश तुमको इसी तरह बर्दाश्त कर लेगा...


Saturday, February 25, 2017

उस दिन जो रामजस कालेज में हुआ...एक स्टूडेंट का पत्र....

देश के गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू का कहना है कि केंद्र सरकार किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी को राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों का अड्डा नहीं बनने देगी लेकिन यह मंत्री रामजस कॉलेज के उन सैकड़ों स्टूडेंस की आवाज सुनने को राजी नहीं है कि आखिर 22 फरवरी को उनके साथ क्या हुआ था...हिंसा करने वाले कौन थे। दिलीप सॉइमन के ब्लॉग पर मुझे रामजस कॉलेज के ही एक स्टूडेंट का पत्र मिला, जिससे सारी असलियत सामने आई है। मुख्यधारा की मीडिया में जो दिखाया गया और छापा गया, उससे भी ज्यादा बदमाशी उस दिन रामजस कॉलेज में हुई...कैसे पुलिस ने हिंसा करने वालों का साथ दिया कैसे एक गुंडागर्दी को अब देशभक्ति और गलत राष्ट्रवाद से जोड़ा जा रहा है, रामजस की घटना उसका जीता जागता उदाहरण है।...आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं बढ़ने वाली हैं और उसके नतीजे उन लोगों को भी भुगतने होंगे जिन्हें इस तरह के राष्ट्रवाद पर अभी बहुत प्रेम उमड़ रहा है...

अगर मिल सके तो 23 फरवरी को अमर उजाला ने पहले पेज पर एक फोटो छापा है जो बताता है कि पुलिस ने किस तरह इस घटना में हरकत की। आपको एक पुलिस वाला एक छात्रा को आपत्तिजनक से ढंग से छूता हुआ दिखाई देगा। यह फोटो फेसबुक पर वायरल हो चुका है। इसी पेज पर नीचे भी वो फोटो मौजूद है।


हो सकता है आप लोगों में बहुत सारे लोग किसी भी विचारधारा से न जुड़े न हों लेकिन आप अपने दिमाग से यह तो जरूर सोचें कि जिससे आपका मतभेद है, क्या आप उसे बोलने भी नहीं देंगे...आप पहले सुनते कि रामजस कॉलेज के सेमिनार में उमर खालिद और अन्य वक्ता क्या बोलने वाले हैं। आप उसकी विडियो रेकॉर्डिंग करते और उसके बाद वहां अगर वाकई कुछ राष्ट्रविरोधी बोला गया हो तो आपको भी विरोध करने का अधिकार है...लेकिन आप किसी को पहले ही न बोलने देने के लिए हिंसा करेंगे...

नीचे एक विडियो का लिंक है, जो पत्रकार रवीश कुमार के प्राइम टाइम का है। उसके जरिए आप जान सकते हैं कि दरअसल उस सेमिनार में तमाम वक्ता क्या बोलने वाले थे, जिसका एबीवीपी ने विरोध किया और उस सेमिनार को होने नहीं दिया। यह जानना महत्वपूर्ण है कि दरअसल एबीवीपी किन चीजों का विरोध कर रहा है।....

बहरहाल, नीचे पढ़िए दिलीप सॉइमन के ब्लॉग पर रामजस कॉलेज के स्टूडेंट का पत्र, जिसे मैं यहां लगा रहा हूं...

A letter by a Ramjas student to a teacher: Date: Thursday, February 23, 2017, 10:07 AM 
I have not been able to sleep at night... The incidents, the violent scenes in the college were on a loop in my mind. They have all videographed us and hv given us rape threats and acid attack threats. They are constantly trying to instill fear in us... But we will not back down! We'll be out on the streets... protesting today as well...amidst their violence..their abuses..their threats! We won't let this fire to die down. 

The beauty of this movement of resistance by Ramjas was that neutral students who dont associate with any student organization or political ideology ave also joined in numbers against the ABVP hooliganism. And they were able to rationally engage with what was going around in the campus. And they were with us...And they became "US".. And it was not a left vs right struggle...as was out in the media.. It was Ramjas against ABVP goondaism. It was silence doing it's magic against violence.  We were peacefully sitting near canteen...fearful of the uncertainty looming around...




Questions of what next and who next...terrified us...traumatised us....as we saw friends getting beaten up...thrashed and manhandled by ABVP goondas..Our silence was hurting them...Our songs of resistance were pricking them.. They came up with the national flag...and hurled abuses...Chanted Bharat Mata ki Jai. We were silent. Although we were numerically less...Our silent mode of protest affected them so badly that they sporadically attacked us from different sides...trying to batter our strength. 

Although it was disappointing for a lot of us to silently sit there while they provoked us and we couldn't hit them back... But still from the way we've carried out our protest yesterday..I've  realized that sometimes silence works wonders! And it hit them at the right spot. As we were struggling inside ...Our friends outside the gate were carrying out the protest that we were not allowed to carry out... They were beaten up... But they didn't back down! We will not back down...The social media is flooded with their violence...first hand accounts of what happened. We are brutally exposing abvp...And will continue to do so. And hopefully this is the beginning of something DU has never seen or felt before! 

Some relevant news reports:
'They Tried To Strangle Me With My Muffler': A Day After, Shock And Anger At Ramjas College  All of last evening there was shock and anger surrounding a particular image that social media users kept sharing - that of Delhi University professor Prasanta Chakravarty, half-lying on the ground, dazed and disoriented, his shirt torn, and a patch of dirt on his face, as mayhem continued all around him on the campus of Ramjas college in the northern part of the national capital. An attempt was allegedly made by suspected members of the Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) to strangle Chakravarty with his own muffler. He was attacked from behind, pushed to the ground, kicked and beaten up.

साभार....
Dilip Simeon's blog: State protected hooliganism in Ramjas College


पत्रकार रवीश कुमार के प्राइम टाइम शो को देखने के लिए इस विडियो लिंक पर जाएं... https://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/prime-time-question-raised-on-freedom-of-speech-due-to-ruckus-in-ramjas-college-450195?pfrom=home-khabar

Tuesday, February 21, 2017

ग़ालिब तेरे फरेब में ...ये किस मुकाम तक आ गए

मुझे एक विडियो मिला है। भारतीय राजनीति के मुश्किल दौर में यह विडियो हम लोगों को नया रास्ता दिखाता है। लेकिन ऐसे विडियो से कितनी बात बनेगी, खासकर जब भारतीय #राजनीति के मुश्किल दौर का अंत भयावह नजर आ रहा है। चुनाव तो फिर आएंगे, 11 मार्च के बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता कोई न कोई दल या मिलाजुला गठबंधन संभाल ही लेगा लेकिन #हिंदूमुसलमान की जिस खाई को चौड़ा करके इस चुनाव में खाद-पानी दिया जा रहा है। वो एक खतरनाक खेल है। इस खेल के नतीजे अच्छे नहीं आने वाले यह तय है। आइए, पहले ये जानें कि उस विडियो में है क्या...

#मुस्लिम #उलेमा मौलाना कल्बे सादिक उस विडियो में बता रहे हैं। ...मैं हज पर जाने के लिए तैयार हूं, पासपोर्ट भी तैयार है। टिकट जेब में है। फिर मैंने एक रोजा भी रख लिया कि अल्लाह का शुक्र अदा करुं कि मुझे हज पर जाना नसीब हो रहा है। इसके बाद मैंने सोचा कि क्यों न #गोमतीनदी (#लखनऊ) के किनारे थोड़ा सा टहल लूं। फिर नमाज का वक्त हो गया। मैंने सोचा गोमती के किनारे पढ़ लूं।...यानि मैं एकसाथ तीन इबादत कर रहा हूं – हज पर जाने की तैयारी, मेरा एक दिन का रोजा और गोमती के किनारे नमाज। ....वो आगे बताते हैं कि नमाज की नीयत बांधी ही थी कि इतने में एक आवाज सुनाई दी...हाय राम मुझे बचाओ।...नजर उधर गई तो देखा नदी में पानी के बाहर दो हाथ दिख रहे हैं और आवाज वहीं से आ रही है।...जाहिर है कि वो आवाज एक हिंदू की थी। यानी गैर मुस्लिम की। जिसके मुंह से हाय राम निकला था। ...इधर मेरे #अल्लाह और #कुरान का आदेश है कि अगर किसी की जान इस तरह जा रही है तो तुम उसे बचाने की पहल करो। चाहे वो काफिर (नास्तिक) ही क्यों न हो। चाहे तुम नमाज पढ़ रहे हो या रोजा रखा है या हज पर जा रहे हो। अल्लाह और कुरान की नजर में पहले यह काम जरूरी है कि उस आदमी की जान बचाई जाए...चाहे वो किसी भी #मजहब, #जाति या #समुदाय का हो। 

....कल्बे सादिक कहते हैं कि गैर मजहब का होने के बावजूद #इस्लाम की नजर में सबसे पहले उस इंसान की जान बचाया जाना जरूरी है। ...उस वक्त उससे बड़ा कोई काम नहीं। बेशक आपकी #नमाज टूट जाए। बेशक आपका #रोजा टूट जाए। बेशक आपका #हज पर जाना रह जाए।...

...इस संदेश के आगे कुछ और नहीं है। ...लेकिन इसके आगे बहुत कुछ है।...इसके आगे #भारत है...#पाकिस्तान है। हिंदू-मुसलमान है। ...यह संदेश जितना मुसलमानों के लिए जरूरी है उतना ही हिंदुओं के लिए भी जरूरी है।...लेकिन हम लोग कहां उलझे हैं या उलझा दिए गए हैं... कि अगर #कब्रिस्तान हो तो #श्मशानघाट भी होना चाहिए। #रमजान में बिजली आए तो दिवाली पर भी #बिजली आनी चाहिए।...क्या किसी आम भारतीय ने या यूपी वालों ने इस हद तक गिरकर कभी सोचा था। ...नहीं...कभी नहीं। लेकिन एक नेता ने याद दिलाया और एक #टीवी चैनल ने लोगों के मुंह में माइक ठूंस-ठूंस कर पूछा कि आपकी गली में श्मशान घाट है...आपके मुहल्ले में कब्रिस्तान है।... वो यह नहीं पूछ रहे हैं कि स्कूल-कॉलेज-सड़क-अस्पताल-कारखाना है या नहीं ...क्योंकि ये सवाल अब अपना महत्व खो चुके हैं। जनता को कंडीशन्ड किया जा रहा है। पब्लिक के लिए श्मशान और कब्रिस्तान उसकी मूलभूत आवश्यकताएं बना दिए गए हैं। जब वो रोटी मांगे तो उसे गाय की सेवा के काम पर लगा दो। जब वो रोजगार मांगे तो #मंदिरमस्जिद में उलझा दो।  

आमिर किरमानी (हरदोई) के जरिए पहुंचा यह शेर इस वक्त मौजूं हो चला है...

#गालिब तेरे फ़रेब में ये किस मुक़ाम तक आ गये !

घुट घुट के जिये ऐसे कि "श्मशान" तक आ गये !

...यकीन मानिए...हमें इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि हम अपने मूलभूत अधिकार और मूलभूत आवश्यकताएं भूल जाएं और उसकी जगह कब्रिस्तान, श्मशान, #डिजिटल मनी, #एटीएम कार्ड, ई-वैलेट याद रखें। जैसे जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरत यही चीजें हैं। दिल्ली के #अपोलो अस्पताल में हर नेता इलाज के लिए पहुंचता है लेकिन उस अस्पताल के सामने बने फ्लाईओवर की सड़क टूटी-फूटी है...उसकी मरम्मत हमारी जरूरत नहीं है। क्योंकि नेताजी इस तरह की कार में वहां से आते-जाते हैं, उन्हें उस कार में झटके नहीं लगते। उस सड़क की जरूरत बाइक वाले को, साइकल वाले को, सार्वजनिक परिवहन की बसों को, सामान ढोने वाले ट्रकों को है लेकिन अगर उन्हें रोजाना झटके लगेंगे तो इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि उसकी मूलभूत आवश्यकताओं को नेताजी पहले ही बदल चुके हैं। नेताजी ने उसे सड़क की जगह डिजिटल मनी का झुनझुना पकड़ा दिया है।

#यूपी का चुनाव...भारतीय राजनीति के उसी मुश्किल दौर की तस्वीर दिखा रहा है। वो शख्स तो खैर कब्रिस्तान और श्मशान की बात कर रहा है लेकिन इस युवा नेता को देखिए...उनकी बातों की गिरावट उससे भी कई गुना ज्यादा है।...वे सदी के तथाकथित महानायक से फरियाद कर रहे हैं कि वो #गुजरात के गधों का प्रचार न करें।...अरे साहब ये क्या बात हुई।...आप #चुनाव #रैली में ऐसा क्यों बोल रहे हैं...क्या आपके पास कोई मुद्दा नहीं है। ....क्योंकि आप भी उसी नेता की तरह सोचते हैं कि अगर मूलभूत मुद्दों के बारे में जनता को बताया तो वो रोजाना डिमांड रखेगी। बेहतर है कि उसे गधों तक ही सीमित रखा जाए। ...इसमें सबसे आपत्तिजनक बात यह है कि क्या आपको सारे गुजराती ऐसे ही नजर आते हैं।...भले ही आप सफाई दें कि आपका संदर्भ अलग था लेकिन सवाल यह है कि आपने किसी चुनावी रैली में ही यह बात कहने के लिए क्यों चुना।

 ...जाहिर है कि सामने वाला नेता जनता को मुद्दों से भटकाकर हिंदू-मुसलमान में उलझा रहा है तो आप भी गधे की बात कहकर एक वर्ग की सहानुभूति का वोट बटोरना चाहते हैं।...क्योंकि वह वर्ग फिलहाल गधे को अपना दुश्मन नंबर 1 मान बैठा है तो वो आपकी ताली बजाकर वोट डालेगा। ...आप तो जीतने के बाद गधे की सवारी फिर से कर लेंगे...भले ही वो आपको दुलत्ती मारे।...लेकिन गधे की दुलत्ती खाकर माल मिलता रहे तो क्या हर्ज है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 50 फीसदी आबादी अभी भी खुले में शौच के लिए जाती है। लेकिन उसे #शौचालय देने की बजाय आप या तो श्मशान देना चाहते हैं या फिर कब्रिस्तान। #संयुक्तराष्ट्र की रिपोर्ट में इस आबादी को हिंदू-मुसलमान में नहीं बांटा गया है, क्योंकि गरीबी का कोई धर्म तो होता नहीं है।

...तो पता यह चलता है कि किसी की नीयत साफ नहीं है। ...लेकिन जनता की नीयत साफ लग रही है। उम्मीद है कि उसे अपने मूलभूत आवश्यकताओं की जानकारी जरूर होगी और इस चुनाव से यह पता चलेगा कि वो कितनी समझदार या बेवकूफ है। वो नेताओं की बातों में आकर कंडीशन्ड नहीं होगी यानी उनके हिसाब से वोट नहीं करेगी। लेकिन अगर उसने वाकई नेताओं के कहने के मुताबिक श्मशान-कब्रिस्तान या गधों में बंटकर वोट दिया तो यही नेता इसी जनता को हमेशा के लिए बेवकूफ मान लेंगे और उसी के अनुसार व्यवहार करेंगे। इसीलिए मैं इसे भारतीय राजनीति का सबसे मुश्किल दौर मान रहा हूं। #यूपीकाचुनाव कई चीजों को तय करेगा। इसमें नेताओं या राजनीतिक दलों से ज्यादा जनता की इज्जत दांव पर लगी है। 20 दिन और...बहुत कुछ बदल जाएगा।...

विडियो के बारे में – इस लेख की शुरुआत में मैने जिस #विडियो का जिक्र किया है, अगर आप उसे देखने की ख्वाहिश रखते हैं तो मेरी फेसबुक वॉल पर जाकर उसे देख और सुन सकते हैं। आप वहां से शेयर भी कर सकते हैं...क्या पता आपके शेयर करने से ही कुछ लोग समय रहते सजग हो जाएं और यूपी की इज्जत को बचा लें। मेरी फेसबुक वॉलका लिंक - https://www.facebook.com/yusuf.kirmaninbt