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Monday, September 27, 2010

राहत इंदौरी और जावेद अख्तरः दो रंग (ताजा शेर)

मौजूदा दौर में उर्दू के दो मशहूर शायरों की कलम अलग-अलग बातों और रुझानों को लेकर चलती रहती है। यह दोनों बॉलिवुड की फिल्मों के लिए गीत भी लिखते हैं। लेकिन इनका असली रंग झलकता है इनकी शायरी में। मुझे दोनों शायरों की गजल के कुछ ताजा शेर मिले हैं, जो आप लोगों के लिए भी पेश कर रहा हूं। हो सकता है कि बाद में यह शेर आपको सुधरे हुए या किसी बदलाव के साथ पढ़ने को मिले। फिलहाल तो दोनों शायरों ने जो बयान किया है, वह हाजिर है...

वह शख्स जालसाज लगता है




सफर की हद है वहां तक, की कुछ निशां रहे
चले चलो कि जहां तक ये आसमां रहे/

यह क्या, उठे कदम और आ गई मंजिल
मजा तो जब है कि पैरों में कुछ थकन रहे/

वह शख्स मुझको कोई जालसाज लगता है
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे/
-राहत इंदौरी (शनिवार, 25 सितंबर 2010)


तन्हा...तन्हा...तन्हा

इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में
ढूढ़ता फिरा उसको वो नगर नगर तन्हा

तुम फूजूल बातों का दिल पे बोझ मत लेना
हम तो खैर कर लेंगे जिंदगी बसर तन्हा

जिंदगी की मंडी में क्या खरीद पाएगी
इक गरीब गूंगी सी प्यार की नजर तन्हा
-जावेद अख्तर (24 सितंबर 2010)

Thursday, September 23, 2010

एक रुका हुआ फैसला...किसकी कामयाबी

सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद और रामजन्म भूमि विवाद में हाई कोर्ट का फैसला 24 सितंबर को सुनाए जाने पर रोक लगा दी है। यह आदेश आज (बृहस्पतिवार) ही आया है और जो भी सुन रहा है वह यही कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा नहीं करना चाहिए था। हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगवाने की जो कोशिश रमेश चंद्र त्रिपाठी नामक शख्स कर रहा था वह उसमें सफल हो गया। यही कोशिश उस आदमी ने हाई कोर्ट में की थी जिसमें उसे कामयाबी नहीं मिली थी।

अयोध्या विवाद इतने लंबे समय से पेंडिग है कि इससे जुड़ा कोई भी मसला आने पर देश में उत्तेजना का माहौल बन जाता है। इस बार उम्मीद बंधी थी कि अब हाई कोर्ट का फैसला साफ-साफ आएगा और जिसे मानना होगा मानेगा, जिसे नहीं मानना होगा वह आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने एक हफ्ते बाद इसकी सुनवाई का आदेश आज सुनाया है। अगर एक हफ्ते बाद सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट से कहता है कि वह अब फैसला सुना दे तो यह और भी घातक होगा क्योंकि अब दशहरा आने वाला है और जल्द ही रामलीलाओं का मंचन शुरू हो जाएगा। ऐसे में अगर फैसला आता है तो किसी भी एक पक्ष के लिए मुफीद नहीं है।

इस मसले को शुरू से ही लटका कर रखने की कोशिश की जाती रही है और अगर न्यायपालिका भी उस चीज में इस्तेमाल हो जाती है तो यह और भी गंभीर बात है। हाल के दिनों में जिस तरह से कुछ चर्चित मामलों में न्यायपालिका को इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे हैं, भारत का आम आदमी इस मामले में भी ऐसा ही मानने लगेगा। अभी तो इसी बात में आशंका है कि 29 सितंबर को भी सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई फैसला ले भी पाएगा या नहीं।

इससे नीचे लेख में दिए गए विडियो से पता चलता है कि यह मामला कितना पुराना है और भारत की न्यापालिका इस बारे में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है कि जमीन का वह एक छोटा सा टुकड़ा किसका है। अगर फैसला जल्द आता है तो इससे कई बातों के तय होने में मदद मिलेगी। इससे उन लोगों के चेहरे बेनकाब होंगे जिनका विश्वास भारत के संविधान और न्यायपालिका में नहीं है। इससे उन लोगों को भी धक्का लगेगा जिन्होंने इस एक मुद्दे के दम पर अब तक राजनीति की है और सत्ता के करीब पहुंचे हैं। इससे उन कट्टरपंथियों को भी धक्का लगेगा जो किसी एक कौम को ऐसे उलूल-जुलूल मुद्दों की तरफ लगा देते हैं।

आप लोगों ने भी शायद तमाम अखबारों और टीवी चैनलों पर वह बहस सुनी होगी कि देश की युवा पीढ़ी का ऐसे मुद्दों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वे वह बात कर रहे हैं जिसे सेक्युलर इंडिया कहता है, जिसे देश के संविधान में बाबा साहब आंबेडकर दर्ज कर गए हैं। जबकि इस मुद्दे को गरमाने वाले वे हैं जो बूढ़े हो चुके हैं या जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अभी भी जोर मार रही हैं।

इस जमीन के टुकड़े के लिए अब तक देश भर में जितने लोगों का खून बहा है चाहे वह दंगे की आड़ में और चाहे वह कारसेवा की आड़ में, इससे उनके घर वालों को क्या हासिल हुआ होगा, यह जानने की कोशिश न कभी की गई और कभी की जाएगी। अलबत्ता लोगों ने इसके दम पर सत्ता हासिल कर ली या अकूत संपत्ति बना ली। हाशिम अंसारी आज भी गरीब है और राम खेलावन के घर में मुश्किल से चूल्हा जलता है जो कभी कार सेवा करने अयोध्या गया था।


सुप्रीम कोर्ट के पूरे आदेश को आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं

Wednesday, September 22, 2010

अयोध्याः तथ्य और इतिहास कैसे बदलोगे

बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमि टाइटल पर अदालत का फैसला आने में अब महज कुछ घंटे बचे हैं। तमाम तरह के सांप्रदायिक, कट्टरपंथी और लंपट किस्म के लोग सक्रिय हो गए हैं। माहौल में उत्तेजना का एहसास कराने की कोशिश तमाम तरह के लोग कर रहे हैं।

अयोध्या का फैसला जो भी आए लेकिन उसके संदर्भ में जो बयान और बातें अब तक कही गई हैं, उनके मद्देनजर लोग अपना फैसला अदालत के फैसले के बाद देना शुरू कर देंगे। यह तय है। इस मुकदमे में 1949 से पक्षकार हाशिम अंसारी अयोध्या के रहने वाले हैं और उन्होंने यहां सब कुछ अपनी आंखों के सामने देखा है। उनकी उम्र इस वक्त 91-92 साल है।
एक साल पहले उन्होंने एक टु सर्कल डॉट नेट को हिंदी में दिए गए इंटरव्यू में बहुत कुछ कहा था। वह बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। इंटरव्यू सुनकर लगता है कि अभी यह बात जैसे उन्होंने आज ही कही है।

इस मुद्दे पर मैं अपनी ओर से कोई टिप्पणी न करते हुए हाशिम अंसारी का वह विडियो और उसके नीचे सुप्रसिद्ध मुस्लिम बुद्धिजीवी असगर अली इंजीनियर के भाषण का एक अंश दे रहा हूं जिसमें उन्होंने कहा है कि कैसे सांझी विरासत वाले इस देश को तोड़ने की कोशिश की जाती रही है। उन्होंने अयोध्या के संदर्भ में इतिहास का भी जिक्र किया है। माफ कीजिएगा वह पूरा भाषण अंग्रेजी में है और मुझे उसे हिंदी में अनुवाद करने का समय नहीं मिल पाया है।

हाशिम अंसारी का विडियो


इतिहास को फिर से टटोलोः असगर अली इंजीनियर
Ashgar Ali Engineer spoke at a 3-day long international conference on “Armed Conflcit and Peace Prospect’ at Guwahati, Assam. The conference was organized by Omeo Kumar Das Institute of Social Change and Development. He delivered a lecture on ‘Re-reading through History of Communal Harmony’.

History is not history in the long run. History can be reconstructed, can be used or misused, history is the only social science that can be reconstructed as it deals with the past. It is a powerful tool which strongly appealed to our emotion. It can be used for controlling power to make or unmake society by reconstructing the past.

Because, it is all about our past. We tend to glorify our past. Muslims glorify their past and Hindus glorify Hindu period. We always take refuge in the past if there is anything wrong in the present. It is related with our culture and identity. Hindus says, before Muslims came it was all peace, prosperity, and everything started once Muslims came to India. Muslims will say, Muslim period was a glorious period. Muslims rulers were more tolerant towards others. In this way we reconstruct our history.

Text book in history – our heroes are their villains and there villains are our heroes. We give selective glorification of our past. It is a part of human behavior, we suppress our bad aspects. Same thing we do with our history. So that past appears to be real and ideal.

One must think about human behavior in mind while interpreting history. Everyone thinks that his religion is great. The dynamics of human behavior is important. For rulers, their interest is more important than anything else in the world. If a ruler belongs to my religion we would shape according to my religion. If a ruler belongs to other religion we may focus his bad aspects. So, we need to understand human mind.

Our history was written from British period. It was written chronologically. We don’t have analytical analysis of our history. British had their own interest keeping in mind their political goals. They saw unity among the Hindus and Muslims here and wanted to destroy that. They wrote history in a way to create tension between Hindus and Muslims. Whole Babari Masjid Ram Janambhoomi, the way the British translated Babar Nama. Babar never visited Ayodhya. He passed through. It was six month period in the diary is missing. So it was interpreted that in this period ram janambhoomi was destroyed in order to construct Babri Masjid. There was absolutely no evidence. He wrote it in a foot note and it was repeatedly used when the ram janambhoomi controversy started.

We can write history which will be very helpful in creating harmony in the society. Ayodhya has been a city of composite culture. There are so many Sufi establishments, masjids and temples. It was a great place of Muslim culture. It is also a city of Tulsi Das who translated Ramayana. In this conflict thousands died along with the harmony.

History of India is a culture of composite heritage. I don’t believe is periodisation as Hindu period, Muslims period, etc. it is very wrong. When we use the term Hindu or Muslim it becomes problematic. All rulers are homogenized as Hindus or Muslims. There is nothing like Hindu past or Muslims past. Various Hindu rulers fought among themselves and Muslims among themselves. Babar defeated Ibrahim Lodhi to come to India. It was between two Muslim dynasties. How can we say that Muslims killed Hindus to reign over India. Except Babar, Akbar or Humayun, all Mughals fought among themselves for power.

Culture of India is a composite culture, even before the Muslims came. It was diversity. Diversity is a part of the history of the India. It was always a composite culture. In Hindi, we called sanjhi virasat.

Today Indian Muslims don’t follow Ram, but in their language, they are very Indian. Once I went to Saudi Arabia in my childhood. They addressed me as ‘Hindi kaafir’. They think Arab Muslims is the true Muslim. Indian Islam is different and divers. Islam in Kashmir and Kerala are different. Indian Muslims, sect wise, are culturally linguistically different. Say for example, Assamese Muslims are different from me. I am a Guajarati Muslim. In fact al communities are diverse.

Different communities co-existed in India for a long time. Kabir panth is a result of marriage between Hindus and Muslims. Kabir would criticize both Hindus and Muslims. Arya samaj is another example of marriage between Hindus and Muslims.

Parinam Panthi from Gujarat believe in both Prophet Mohammed and Krishna. They also believe in idol worshipping. They consider prophet as an avatar of Krishna. In earlier days those who adopt Parinam Panthi would follow both religions. One brother would go to temple and another one will go to masjid.

These things are not known. We don’t teach history in a way that fosters communal harmony. We teach only those that create communal conflict.

Sufis contributed a lot for communal harmony. Kaafir means ‘someone who hides’ in Arabic. A famous Sufi leader opposed the use of the term of kaafir.

Communalism will be a thing of the past if we teach out history in a way to create communal harmony. Our education system is a powerful tool for strengthening communal harmony in the country. There should free debate among the historians on multiple interpretations in the country. Let us rediscover our past of composite culture. We should not let our rules use history in a way to satisfy their interests.

Monday, September 20, 2010

पाकिस्तान को चांद चाहिए

अब मुस्लिम त्योहारों को लेकर भी प्राय: मतभेद उजागर होने लगे हैं। इस बार भारत में दो दिन ईद मनाई गई। पाकिस्तान में तो पिछले कई सालों से ऐसा हो रहा है। वहां कई त्योहार राजनेताओं और धर्मगुरुओं के लिए मूंछ की लड़ाई बन गए हैं।

इस बार वहां अचानक ईद के चांद पर बहस शुरू हो गई। इसमें सरकारी तौर पर भी बयानबाजी और बहस अब तक जारी है। इस विवाद का सिलसिला रमजान का चांद देखने के समय 11 अगस्त से शुरू हो गया था। सऊदी अरब में 11 अगस्त को पहला रोजा था। पाकिस्तान के खैबर पख्तून और पेशावर इलाके में लोगों ने सऊदी अरब का अनुसरण करते हुए उस दिन पहला रोजा रख लिया। इस पहल में उस सूबे की सरकार भी शामिल रही।

इससे उलट चांद देखे जाने पर मुहर लगाने वाली पाकिस्तान की सबसे सुप्रीम बॉडी रुयते हिलाल कमिटी ने 11 अगस्त को चांद देखे जाने की घोषणा की और 12 अगस्त को पहला रोजा घोषित किया। पाकिस्तान के अधिकांश इलाकों में इसी पर अमल हुआ। भारत में भी पहला रोजा 12 अगस्त को ही रखा गया था। लेकिन पाकिस्तान में रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा के बाद विवाद शुरू हो गया।

इसका क्लाइमैक्स 11 सितंबर को दिखाई पड़ा। एक बार फिर खैबर पख्तून और पेशावर इलाके के मौलानाओं ने 11 सितंबर को ही ईद मनाए जाने की घोषणा कर दी क्योंकि सऊदी अरब में भी इसी दिन ईद मनाने का फैसला हुआ था। लेकिन रुयते हिलाल कमिटी के चेयरमैन मुफ्ती मुनीब उर रहमान ने घोषणा की कि 12 सितंबर को ईद होगी।

पाकिस्तान में इस रस्साकशी के पीछे एक राजनीतिक अंधविश्वास है। वहां शुक्रवार (जुमा) के दिन पड़ने वाली ईद पाक शासकों के लिए अपशकुन साबित होती रही है। जिसके भी कार्यकाल में ईद जुमे को पड़ी, उस शासक को अगली ईद से पहले सत्ता से हाथ धोना पड़ा। हालांकि इस्लामिक विद्वानों की राय इससे भिन्न है। उनका मानना है कि जुमे के दिन पड़ने वाली ईद बहुत खास होती है।

लेकिन पाकिस्तान में तानाशाह अयूब खान के समय से ही ईद का चांद देखने को लेकर राजनीति होती रही है। वहां के लगभग हर शासक ने कोशिश की कि किसी साल ईद जुमे को न पड़े। इसलिए शासक वर्ग किसी भी तरह रुयते हिलाल कमिटी को प्रभावित करके इसकी घोषणा आगे-पीछे करा देता है। यही खेल इस बार भी दोहराया गया।

पिछले साल अवामी नैशनल पार्टी (एएनपी) के नेताओं और उनकी सरकार ने खैबर पख्तून में ईद मनाने की घोषणा रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा से एक दिन पहले कर दी और कमिटी से कहा कि वह इसे पूरे पाकिस्तान में लागू कर दे। कमिटी ने वहां के सरकार के इस अनुरोध को मानने से मना कर दिया तो एएनपी नेताओं ने मांग की कि कमिटी के चेयरमैन मुनीब फौरन इस्तीफा दें। लेकिन चेयरमैन ने इसे एएनपी नेताओं द्वारा कमिटी के काम में और अल्लाह की इच्छा में दखलंदाजी करने वाला कदम बताया और इस्तीफा देने से मना कर दिया।

कई बार यह मांग भी उठी कि रुयते हिलाल कमिटी की घोषणा पर बैन लगाकर चांद के हिसाब से बने कैलंडर को मान्यता दी जाए लेकिन पाकिस्तानी शासक वर्ग में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह धर्मगुरुओं की इस कमिटी के खिलाफ जा सके।

दरअसल, ईद का कुछ संबंध बाजार से भी है। भारत-पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में अरबों रुपये का कारोबार इस त्योहार से जुड़ा है। आमतौर पर लोग चांद रात से पहले यानी ईद से एक दिन पहले खरीदारी के लिए निकलते हैं। अगर बाजार को ऐसा एक और दिन मिल जाए तो कारोबारियों को कितना लाभ होगा, इसका सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। पाकिस्तान जैसे देश में जहां मुसलमानों की आबादी तकरीबन शत-प्रतिशत है, रुयते हिलाल कमिटी को अगर बिजनेस समूह नियंत्रित कर रहे हों तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। बेचारे चांद को क्या मालूम कि उसे कौन किस वजह से चाहता है।

साभारः नवभारत टाइम्स 20 सितंबर 2010
Courtesy: Nav Bharat Times September 20, 2010

Saturday, September 18, 2010

वह सपनों में भी बोलती हैं हिंदी

उनका नाम है मार्ग्ड ट्रम्पर, जन्म ब्रिटिश-इटली परिवार में हुआ, जिसमें विद्वानों और भाषा विज्ञानियों की भरमार है। इस परिवार का हर कोई किसी न किसी भाषा या संस्कृति से जुड़ा हुआ है। मार्ग्ड ने खुद हिंदी आनर्स की डिग्री वेनिस यूनिवर्सिटी से हासिल की है और वह अब खुद मिलान यूनिवर्सिटी में हिंदी टीचर हैं। हिंदी के अलावा उनका दूसरा प्यार भारतीय संगीत और तीसरा प्यार मेंहदी (हिना) है। बनारस घराने की वह फैन है। वह खुद भी ठुमरी गाती हैं। उन्होंने पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी, सुनंदा शर्मा से काफी कुछ सीखा है। इसके अलावा प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित राजन-साजन मिश्रा, पंडित ऋत्विक सान्याल और बीरेश्वर गौतम से टिप्स हासिल किए हैं।

इटली में हिंदी से जुड़ी हर गतिविधि में वह आगे-आगे रहती हैं। इटली में तो लोग उन्हें भारत का सांस्कृति दूत तक कहते हैं। मार्ग्ड के बारे में यह संक्षिप्त सी जानकारी है, पूरा बायोडेटा लंबा है। मैंने मार्ग्ड ट्रम्पर से उनके हिंदी प्रेम पर बात की हैः

हिंदी से लगाव कब हुआ ?
वैसे यह कहना मुश्किल है कि हिंदी से मेरा लगाव कब हुआ क्योंकि इसमें कई संयोग जुड़े हुए हैं। मेरे परिवार में सब लोग अनुवादक या लिंग्विस्टिक के जानकार हैं और अलग-अलग देशों से हैं इसलिए बचपन से ही भाषाओ का बहुत शौक रहा है। भारत के बारे में बहुत कम जानती थी पर यूनिर्वसिटी में पढ़ाई शुरू करने के समय पर सोचा था कि कोई ओरिएंटल भाषा सीखना चाहती हूं। अंत में मैंने हिंदी चुनी क्योंकि सब ओरिएंटल भाषाओं में से यह यूरोपीय भाषाओं के बहुत समान थी। मुझे भारतीय संस्कृति भी आकर्षित करती थी। उस वक्त से मेरी रूचि इतना बढ़ती गई कि आजकल इटैलियन व अंग्रेजी के बाद हिंदी मेरी तीसरी भाषा हो गयी। कभी-कभी तो मैं सपनों में भी हिंदी बोलती हूं।
आखिर इस लगाव की वजह क्या थी ?
यह भी कहना मुश्किल है क्योंकि ऐसे प्यार की कोई वजह नहीं होती...पर सच पूछें तो बहुत-सी वजहें थीं। जैसे मैं कह चुकी हूं कि यूरोपीय भाषाओं और हिंदी में बहुत सी समानताएं हैं और अवश्य ही हिन्दुस्तानी संस्कृति में भी मेरी बहुत रूचि रही है। शुरू में कोई ऐसी भाषा सीखना चाहती थी जो मेरे देश में बहुत कम लोगों को आए पर उसे भाषा के मामले में भी रोचक होना चाहिए। इसलिए यह लगाव हुआ।

हिंदी की ऐसी कौन सी विशेषता है जिसकी वजह से आप इसकी तरफ आकर्षित हुईं ?
ऐसे लगता है कि हिंदी काफी स्वाभाविक भाषा है।... मेरा मतलब है कि जाने क्यों कुछ शब्दों का अर्थ बहुत साफ़ सुनाई देता है। यह भी हिंदी की एक और विशेषता है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है कि इसमें बहुत समानार्थक शब्द प्रयोग किये जा सकते हैं।

दूसरी भाषाओं के मुकाबले आप हिंदी को आज कहां पाती हैं?
दुनिया में सब भाषाओं में से हिंदी आज तीसरी सबसे प्रचलित भाषा है पर इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हिंदी बोलनेवाले लोगों का ही अपनी भाषा से काफी लगाव नहीं है। मेरे ख्याल से इस समस्या की वजह भारतीय उपनिवेशन का इतिहास है। इस कारण बहुत कम विदेशी लोग हिंदी सीखने में रुचि लेते हैं।

अगर हिंदी और उर्दू को मिलाकर इस भाषा को बढ़ावा दिया जाए तो आपकी नजर में ऐसा करना ठीक होगा?
मेरे ख्याल से हिंदी और उर्दू में जो सब से बड़ा अंतर है वह तो भाषा का नहीं, संस्कृति का है। उन दोनों की बहुमूल्य संस्कृति है और इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि उर्दू भारत में पैदा हुई किसी और देश में नहीं । मैं नहीं चाहती की राजनीति की वजह से उन दोनों में से एक को चुनना पड़े। वैसे तो सबको पता ही है कि दोनों बोलचाल की भाषाएं हैं और बोलने में कई बार जरा भी अंतर महसूस नहीं होता।

हिंदी जहां पैदा हुई, वहां उसकी हालत का आपको क्या कुछ अंदाजा है ?
मुझे पता है। विशेष रूप से बड़े शहरों में भारतीय युवकों की हिंदी बहुत घटिया हो गई है। कारण यह है कि वे बहुत ज्यादा अंग्रेजी शब्द मिलाकर हिंदी बोलते हैं। मिश्रण तो स्वाभाविक रीति है, पर बिगाड़ कर बोलना बिल्कुल दूसरी बात होती है... अगर अंग्रेजी के साथ हिंदी को मिलाकर इसी तरह बोला जाता रहा तो संस्कृति का मनोभाव खो जाएगा । मेरी माता जी प्रकाशकों के लिए अनुवाद का काम करती हैं और अक्सर एंग्लो-इंडियन लेखकों का अनुवाद भी करती हैं । इसीलिए मैं काफी अच्छी तरह जानती हूं कि भारत में और दुनिया में आजकल हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की रचनाएं बहुत प्रचलित नहीं हैं क्योंकि उनसे ज्यादा पैसे नहीं मिलते और नाम भी नहीं होता। वैसे ही पश्चिमी देशों में आजकल भारतीय साहित्य से जुड़ने का फैशन चल पड़ा है। पर यह सब अंग्रेजी में है। मौजूदा दौर के बड़े हिंदी लेखकों का तो दुनिया में कहीं नाम नहीं है।

आप भारत अक्सर आती रहती हैं, यहां की और कौन सी चीज आपको प्रभावित करती है?
हिन्दुस्तानी संस्कृति के मुझे अलग-अलग शौक हैं। इनमें से शास्त्रीय संगीत प्रमुख है। मैं लगभग 10 साल से हिन्दुस्तानी संगीत सीख रही हूं और आजकल पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी और उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा जी से सीखती हूं। मुझे बनारस घराने की परंपरा बहुत पसंद है और संगीत सीखने और सुनने के लिए भारत आती रहती हूं। वैसे मैं अच्छी पर्यटक नहीं हूं, मैंने ताजमहल अभी तक नहीं देखा है क्योंकि मैं ज्यादा से ज्यादा दो-तीन जगहों में रहना, लोगों से परिचय करना, उनसे बात करना आदि पसंद करती हूं। अगर किसी जगह की सैर करने का मौका मिले तो अच्छी बात है, पर यह मेरी वरीयता नहीं।
हिंदी की कोई किताब जो आपने पढ़ी हो और पसंदीदा लेखक?
यूनिवर्सिटी के समय मैंने बहुत हिंदी उपन्यास पढ़े थे। कुछ हिंदी में, कुछ अनुवाद से। दो-तीन उपन्यास जो सबसे अच्छे लगे अभी याद आ रहे हैं, जैसे प्रेमचंद का लिखा हुआ गोदान,रेणु का लिखा हुआ मैला आंचल’ और एक उपन्यास जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, रूद्र का लिखा हुआ 'बहती गंगा'।

कोई बॉलिवुड मूवी जो हाल ही में आपने देखी हो और उससे खूब मनोरंजन हुआ हो?
इटली के सिनेमघरों में बॉलिवुड मूवी का प्रचलन पहले नहीं था।मगर अभी दो-तीन साल से बॉलिवुड सिनेमा भी पसंद किया जाने लगा है। इटैलियन टेलिविज़न पर भी हिंदी मूवी अब कभी-कभी पेश की जाती हैं । इसलिए हाल में ‘कभी अलविदा न कहना’, ‘स्वदेश’ आदि देखी हैं। पता चला है की अक्टूबर में इटली में भी ‘माई नेम इज खान’
पेश की जाएगी। वैसे ही अभी मैं रावण मूवी देखना चाहती हूं।

क्या अपनी ओर से कुछ कहना चाहेंगी ?
जी, आजकल भारत अर्थव्यवस्था में काफी ज़ोरदार जा रहा है और सब लोग अंग्रेजी बोलना और टेक्नॉलजी का प्रयोग करना चाहते हैं, फिर भी याद रखना पड़ेगा कि किसी देश का जोर उसकी सांस्कृतिक पहचान में भी होता है। अपनी संस्कृति और भाषा बनाए रखना अपने भविष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है।

साभार - नवभारत टाइम्स, 18 सितंबर 2010, नई दिल्ली