हिंदी वाणी...यानी हम सब की बात
मंजिल मिले...न मिले, मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है। तो, आइए शुरू करें यह सिलसिला और बनाएं अपना कारवां...
Monday, May 13, 2013
मदर्स डे पर बहस
Thursday, March 7, 2013
गुंडे कैसे बन जाते हैं राजा
मेरे मोबाइल पर यूपी से कॉल आमतौर पर दोस्तों या रिश्तेदारों की ही आती है लेकिन इधर दो दिनों से कुंडा (प्रतापगढ़) में डीएसपी जिया-उल-हक की हत्या के बाद ऐसे लोगों की कॉल आई जो या तो सियासी लोग हैं या ऐसे मुसलमान जिनका किसी संगठन या पॉलिटिक्स (Politics) से कोई मतलब नहीं है। ये लोग यूपी के सीएम अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव को जी भरकर गालियां दे रहे थे। मैं हैरान था कि ये वे लोग हैं जो समाजवादी पार्टी को भारी बहुमत से जिताकर लाए थे और अखिलेश के चुनावी वादे लैपटॉप-टैबलेट (Laptop-Tablate) और बेरोजगारी भत्ते के हसीन सपनों में खोए हुए थे। मैं जब पिछली बार फैजाबाद में था तो इनमें से कुछ लोग मोहल्ले और पड़ोस की लिस्ट बनाने में जुटे थे और हिसाब लगा रहे थे कि किसको नेताजी से लैपटॉप दिलवाना है और किसको मुफ्त का भत्ता दिलाना है।
...लेकिन भत्ता तो नहीं लेकिन अखिलेश और उनके प्रशासन ने
यूपी के मुसलमानों को ऐसी टैबलेट दी है कि जिसे वे न तो निगल पा रहे हैं और
न उगल पा रहे हैं। कुंडा में डीएसपी की हत्या के बाद टांडा में
हिंदू-मुस्लिम दंगे के बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा। बरेली के लोगों का ऐसा कोई
दिन गुजरता जब वहां किसी तरह की टेंशन न होती हो, यही हाल मुरादाबाद,
रामपुर, मेरठ वगैरह का है। पुलिस को पूरी छूट है और समाजवादी पार्टी के
नेता मरहम लगाने के नाम पर भय फैलाते हैं। अभी तक अखिलेश के लगभग एक साल के कार्यकाल में एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर दंगे हो चुके हैं। राज्य के 16-17 जिले इतने संवेदनशील हैं कि हर समय हाई अलर्ट पर रहते हैं।
ऐसा यूपी में पहली बार नहीं हुआ। यूपी के मुसलमानों ने
जब-जब मुलायम को आंख बंद करके वोट डाला, उसे उनकी पार्टी ने टेकन फॉर
ग्रांटेड लिया। मेरे एक पूर्व सपाई मित्र ने फोन पर लगभग चिल्लाने की आवाज
में कहा कि आप मायावती जी के पिछले 5 साल का शासन देख लें, रिपोर्ट मंगा
लें कहीं न तो दंगा हुआ और न ही पुलिस या लोकल गुंडों ने किसी भी शहर में
मुसलमानों को दबाने की कोशिश की। लेकिन मुलायम ने तो हमें कहीं का नहीं
छोड़ा। हमें तो मायावती की वही सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) वापस चाहिए। मैंने उन्हें
2014 के लोकसभा चुनाव तक फिर से इस बात पर विचार करने को कहा...हो सकता है
कि तब तक उन जैसे मुसलमानों का दिल मुलायम को लेकर फिर से पिघल जाए।
दरअसल, यूपी के मुसलमानों की हताशा का सबब कुछ और है। फैजाबाद,
बरेली, टांडा, मुरादाबाद, मेरठ, रामपुर या कहीं और हो रहे दंगों या मुसलमान
बनाम पुलिस के आपसी संघर्ष के बाद उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस और बीएसपी
अपनी जिम्मेदारी समझते हुए समाजवादी पार्टी के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ देंगे
और मुलायम व अखिलेश घुटने टेकते हुए दोबारा उनके पास आएंगे। लेकिन ऐसा हो
नहीं सका। कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही है कि यूपी में वह अपनी सियासत को
किस डिटर्जेंट पाउडर से धोकर चमकाए। बीएसपी सुप्रीमो मायावती का गिला यह
है कि इतना सब करने के बावजूद पिछले चुनाव में मुसलमानों ने उन्हें खुलकर
वोट नहीं दिया। इसलिए वह चाहती हैं कि यूपी के मुसलमान थोड़ा और पिट-पिटा
लें तो वो सड़कों पर आकर आंदोलन छेड़ेंगी। यह हकीकत है कि यूपी का मुसलमान
दोराहे पर खड़ा है, मुलायम से उसका मोह भंग होना शुरू हो चुका है, कांग्रेस
अकेले दम पर बीजेपी को हरा नहीं पाएगी, बीएसपी फिलहाल बहुत आक्रामक मुद्रा
में नजर नहीं आ रही है। बीएसपी के एक बड़े मुस्लिम नेता से जब मैंने लखनऊ
फोन कर इस हिचकिचाहट का राज जानना चाहा तो उसने कहा कि हम इन पर भरोसा नहीं
कर सकते। पिछली बार इनके पास दलित-मुस्लिम गठजोड़ का विकल्प था लेकिन इन
लोगों ने खुलकर साथ नहीं दिया। हम इनके लिए क्यों सड़कों पर आएं। अगले
लोकसभा चुनाव की गारंटी में भी इनका हमारे साथ आने का भरोसा नहीं है।
...और वो मुलायम सिंह यादव की छाया में बाबरी मस्जिद
आंदोलन चलाने वाले आजम खान कहां गए। खबर मिल रही है कि ये मुस्लिम नेता जी
रामपुर में सरकार की मदद से कोई यूनिवर्सिटी खड़ी कर रहे हैं और आजकल उनका
अंदाजा गोया इस तरह का है जैसे वो ही भारत के अगले सर सैयद अहमद हैं।
अखिलेश की कृपा तले दबे चल रहे इस कथित मुस्लिम नेता फिर कोई कैसे उनके
पुराने बयानों की तर्ज पर नए बयानों की उम्मीद कर सकता है। हैरानी है कि
अखिलेश यादव के सीएम बनने के बाद इस शख्स ने जो नाराजगी दिखाई वो यह थी कि
उन्हें अच्छा विभाग क्यों नहीं दिया। लेकिन यह साहब उस आदमी (रघुराज प्रताप
सिंह उर्फ राजा भैया) का विरोध नहीं कर सके जो निर्दलीय चुनाव जीतकर आया
था, समाजवादी पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलने के बावजूद उसे मंत्री बनाया
गया। आखिर ऐसा क्या था कि इस तथाकथित राजा को मंत्री बनाना जरूरी था। यह
वही राजा है जिसे मायावती ने पूरे शासनकाल के दौरान जेल में रखा और इसकी
हवेली को जहन्नुम बना दिया। शायद कुछ लोगों को याद होगा कि कुंडा में इसके
तालाब से नरकंकाल बरामद हुआ था। बॉलिवुड फिल्मों में जिस तरह किसी डॉन का
ठिकाना दिखाया जाता है, कुछ उसी अंदाज में रहता है यह राजा।
आईपीएस अरुण कुमार को मैं तब से जानता हूं जब उन्होंने
पश्चिमी यूपी के कई शहरों में रहते हुए अपनी जांबाजी के जौहर दिखाए, टास्क
फोर्स में नाम कमाया, सीबीआई में अच्छी सफलताएं हासिल कीं लेकिन अभी दो
दिन पहले इन महोदय ने लखनऊ में प्रेसकॉन्फ्रेंस में अपनी जो बेबसी दिखाई,
उससे मुझे बड़ा झटका लगा। बतौर अडिशनल डीजी (कानून व्यवस्था) इन्होंने
पत्रकारों से कहा कि राजा भैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है, कैसे
गिरफ्तार किया जा सकता है। कोई चश्मदीद तक नहीं मिल रहा।...आप अंदाजा लगा
सकते हैं कि नेताओं की नकेल कसने के लिए सचमुच बड़ी हिम्मत की जरूरत होती
है, और जब कोई कसता है तो वह जिया-उल-हक की तरह शहीद हो जाता है।
बहरहाल, चुनाव 2014 आते-आते कुंडा के जख्म नहीं भरेंगे।
अखिलेश और मुलायम कोशिश में जुटे हैं लेकिन इस बार यह कोशिश कामयाब नहीं
होगी। कहते हैं कि भारत में जनता की याददाश्त कमजोर होती है और वह भूल जाया
करती है। नेता इसी का फायदा उठाते आए हैं लेकिन मेरी समझ कहती है कि ऐसा
नहीं है। कुछ न कुछ नतीजा जरूर निकलेगा। चाहे वो चुनाव के मद्देनजर नए
समीकरण के रूप में ही क्यों न निकले। अगले लेख में हम लोग इस समीकरण पर बात
कर सकते हैं।
कौन है राजा भैया - इस शख्स पर लगभग 50 क्रिमिनल केस हैं। मायावती के 5 साल के कार्यकाल में यह शख्स लगभग जेल में रहा। मायावती ने ही इस पर पोटा लगाया था। इसके तालाब से नरकंकाल बरामद हुआ था। 2007 में यूपी पुलिस के डीएसपी रामशिरोमणि पांडे की संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। उसमें भी साजिश का आरोप इसी पर है। बीजेपी के शासनकाल में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से भी इस शख्स के मधुर संबंध रहे हैं।
मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स के पोर्टल http://nbt.in के ब्लॉग सेक्शन में भी उपलब्ध है।
Monday, May 7, 2012
आमिर खान और सत्यमेव जयते…क्या सच की जीत होगी
मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट nbt.in पर भी उपलब्ध है।
थोड़ी देर के लिए बॉलिवुड
स्टार आमिर खान (Bollywood Star Aamir Khan) के टीवी प्रोग्राम सत्यमेव जयते (Satyamev Jayate) को अलग रखकर डॉक्टरों की दुनिया पर बात करते हैं। तमाम
मुद्दे...सरोकार...हमारे आसपास हैं और उनसे पूरा देश और समाज हर वक्त रूबरू होता
रहता है। पर कितने हैं जो इनसे वास्ता रखते हैं या इनका खुलकर प्रतिकार करते हैं।
आमिर खान बॉलिवुड के बड़े स्टार हैं, उनकी एक मॉस अपील है। आप लोगों में से
जिन्होंने 6 मई को उनका टीवी शो सत्यमेव जयते देखा होगा, या तो बहुत पसंद आया होगा
या फिर एकदम से खारिज कर दिया होगा।
फेसबुक (Facebook)
हर बार की तरह ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया
का पसंदीदा अड्डा है। शो खत्म होने के बाद प्रतिक्रियाएं आने लगीं। हमारे कुछ
मित्रों ने कन्या भ्रूण हत्या (Female Foeticide) को धर्म और वर्ण में बांटने की कोशिश भी की। फेसबुक से
पता चल रहा है कि वे इसे सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की समस्या मानते हैं। उनका यह भी
कहना है कि मुसलमान और दलित अपनी बेटियों को नहीं मारते। उन्होंने आंकड़े भी पेश
किए हैं। मैं कम से कम इस समस्या को इस तरह देखे जाने के खिलाफ हूं। यह समस्या
बड़ी है। न तो इसे धर्म के आइने में देखा जाना चाहिए और न ही शहरी और ग्रामीण के
बीच लकीर खींच कर। मैं ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी सोच वालों से भी सहमत नहीं हूं कि
आमिर खान को प्रति एपिसोड इतने करोड़ मिलेंगे और इसे देखने वाले गरीब को क्या
मिलेगा...मेरा ऐसे तथाकथित फेंकू बुद्धिजीवियों से निवेदन है कि अभी वे जो
नौकरियां कर रहे हैं, उसे छोड़कर जाएं और जाकर गरीबों के बीच काम करें। दिल्ली में
अपने दफ्तर के एसी हॉल या केबिन में लफ्फाजी करने से कुछ नहीं हासिल होने वाला।
आमतौर पर बातचीत में
कन्या भ्रूण हत्या पर हम लोग बहुत खुलकर बात नहीं करते या करते भी हैं तो बहुत
सतही बातें। बुद्धिजीवी और खासकर महानगरों में सड़क-नाली, फैशन शो या नेताओं की
खबर लिखने वाले पत्रकारों की नजर में तो यह कोई बड़ा मुद्दा ही नहीं है। लेकिन इसी
छोटे से मुद्दे से आमिर खान ने अपने शो की शुरुआत की है।
शो में ऐसी कुछ भी
नई बात नहीं थी जिसे हम-आप न जानते हों।
अब मैं अपने
इर्द-गिर्द नजर दौड़ाता हूं कि तमाम डॉक्टर एक छोटा सा क्लिनिक खोलने के बाद इतने
बड़े डॉक्टर कैसे बन गए। आमिर खान के शो से यह तथ्य सामने आया कि मेडिकल काउंसिल
आफ इंडिया आजतक किसी भी डॉक्टर को कन्या भ्रूण हत्या के जुर्म में सजा नहीं दे
पाई। स्लम एरिया में सेवाभाव से डॉक्टरी कर पैसा कमाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों के
खिलाफ डॉक्टरों की संस्था इंडियन मेडिकल असोसिएशन (आईएमए) आए दिन झंडा बुलंद करती
नजर आती है लेकिन कभी इस मुद्दे पर अपने डॉक्टर मेंबरों को समझाती नजर नहीं आती
है।
एक मिनट के लिए आप
आमिर के शो और क्या भ्रूण हत्या के तमाम आंकड़ों को ताक पर रख दें...क्या आपका
पाला ऐसे डॉक्टर से नहीं पड़ा जो यह कहता है कि मैं जो दवा लिख रहा हूं वह फलां
दवा की दुकान से ही खरीदें। आमतौर पर ज्यादातर लोग अपने घर के आसपास ही रहने वाले
या क्लिनिक चलाने वाले डॉक्टर के पास जाते हैं। दवा की दुकाने भी आसपास ही होती
हैं। आप अगर डॉक्टर की पंसद की केमिस्ट शॉप पर न भी जाएं और अगर दूसरी शॉप पर भी
जाएंगे तो भी डॉक्टर को फायदा होगा। क्योंकि जिस कंपनी की दवा डॉक्टर ने लिखी है,
वह पहले से ही डॉक्टर को अपने एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) के जरिए गिफ्ट भेजकर
या विदेश यात्रा का लालच देकर प्रभावित कर चुकी है। वह डॉक्टर या अस्पताल सिर्फ
उसी दवा कंपनी की दवा को अपनी पर्ची पर लिखेगा। चलिए अगर यह मामूली बात है तो इसे
भी छोड़ देते हैं। आप दिल्ली या मुंबई में किसी भी बड़े सरकारी-गैर सरकारी अस्पताल
चले जाइए। आपके जितने भी टेस्ट के लिए डॉक्टर लिखेगा, आपको वहीं सामने से ही कराना
पड़ेगा। क्योंकि डॉक्टर को रिपोर्ट जल्दी चाहिए...आप सामने से कराने को मजबूर हैं।
यह पूरा गोरखधंधा है, जो हमारी-आपकी और मीडिया की सहमति से चल रहा है। बराबर के
गुनाहगार हैं हम सब।
...और यह सब क्या
है। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में आए दिन डॉक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं। वजह
यही कि किसी मरीज के तीमारदार ने डॉक्टर साहब को गाली दे दी है या थप्पड़ जड़
दिया। आखिर मरीज के घर वालों का गुस्सा क्यों फूट रहा है। क्या वे डॉक्टर को
अनायास ही थप्पड़ मार देते हैं या गाली दे देते हैं। हालांकि मैं ऐसी हरकतों को
जायज ठहराने और समर्थन करने के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन इसका विश्लेषण तो होना ही
चाहिए कि आखिर लोगों को जिंदगी देने वाले डॉक्टरों को लेकर आम आदमी की नफरत क्यों
बढ़ती जा रही है। आमिर खान ने डॉक्टरों की दुनिया का एक कोना ही अभी छुआ है, ऐसी
तमाम बातें और घटनाएं देश के लाखों-करोड़ों लोगों के पास बताने के लिए हैं जिन्हें
सुनकर कई सत्यमेव जयते बनाए जा सकते हैं।
यकीन मानिए आमिर के
इस छोटे से मुद्दे पर लोगों को झकझोर दिया है। मुझे अपने घर में सबसे पहला रिएक्शन
मिला। मेरी पत्नी और बेटी की आंखों से आंसू निकल रहे थे। उसके बाद 6-7 लोगों से
मेरी बात हुई, सभी आमिर के शो की चर्चा करते नजर आए और सभी की जबान पर एक ही बात
थी कि आमिर ने सोचने पर मजबूर तो कर ही दिया है। शाम को हम लोग एक विवाह कार्यक्रम
में शामिल हुए। शादी में खाने-पीने और चमक-दमक से ज्यादा आमिर के शो की चर्चा थी।
हालांकि मेरी कुछ
ऐसे भी युवकों से बात हुई जिन्हें आमिर का शो रत्तीभर पसंद नहीं आया। उनका कहना था
कि वो तो इस शो में कुछ नाच-गाने की उम्मीद लगाकर शो देखने बैठे लेकिन घोर निराशा
हुई। फिर उन्होंने उलहना भी दिया कि आप जैसे लोग ही इन पर औऱ सचिन जैसे लोगों पर कागज
काले कर इनकी स्टार वैल्यू बढ़ा देते हो, वरना यह लोग तो बस मनोरंजन करने के लिए हैं।...ऐसी
सोच रखने वाले युवकों की संख्या थोड़ी ही है लेकिन इस सोच के बावजूद ऐसे मुद्दे
संजीदा लोग उठाते रहेंगे, बेशक उसमें बाजारवाद का तड़का भी लगा होगा, खुद की
पब्लिसिटी वाली बात भी शामिल हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह भी तो नहीं कि आमिर या
बाकी लोग मुद्दे उठाना छोड़ दें...
अगर आप अब भी यह शो न देख पाए हों तो यहां मैं उसका विडियो दे रहा हूं...आप देख सकते हैं...
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Saturday, April 28, 2012
कवि-कथाकार संजय कुंदन क्या वाकई ब्राह्मणवादी हैं
अविनाश के मोहल्ला ब्लॉग पर फॉरवर्ड प्रेस में प्रकाशित प्रमोद
रंजन की संपादकीय टिप्पणी, मॉडरेटर
का वक्तव्य और इन सब पर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं तो मन में कुछ सवाल उठे, बातें उभरीं, जिन्हें आप लोगों से शेयर करना चाहता हूं।
पहली बार बहुजन आलोचना की अवधारणा का पता चला। अगर इस संदर्भ को समझने में परेशानी हो तो पहले प्रमोद रंजन की टिप्पणी मोहल्ला लाइव ब्लॉग पर पढ़ें, इस लिंक पर जाएं http://mohallalive.com/2012/04/24/bahujan-sahitya-varshiki-editorial-of-forward-press
- यूसुफ किरमानी
साहित्य एक जनतांत्रिक माध्यम है। हर किसी को हक है कि वह नई-नई
अïवधारणा लेकर आए। वैसे बहुजन का फॉर्मूला
यूपी और बिहार की राजनीति में पिट चुका है। राजनेता अब इससे आगे निकल चुके हैं। लेकिन
अब साहित्य में इसे चलाने की कोशिश की जा रही है।
सच्चाई यह है कि सामाजिक संरचना को बौद्धिकों से बेहतर राजनेता
ही समझते हैं। (क्या इसीलिए अब भी हिंदीभाषी क्षेत्र की जनता पर साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों
से ज्यादा राजनेताओं की बात का असर होता है?)
खैर, प्रमोद रंजन ने जो बहुजन आलोचना पेश की है उसके मानदंड बड़े दिलचस्प हैं।
इसके मुताबिक एक कहानी के पात्रों की सूची तैयार करें। उनके सरनेम पर नजर डालिए। ज्यों
ही कोई सवर्ण सरनेम नजर आए उसे खारिज कर दीजिए ब्राह्मणवादी कह कर। अगर सरनेम दलित-ओबीसी
वगैरह का है तो कहानी बहुत अच्छी होगी। कोई सरनेम न हो तो उस पर मनमुताबिक सरनेम लगा
दीजिए। कितना आसान है यह प्रतिमान। कहानी पढऩे की कोई जरूरत नहीं। कहानी की कथावस्तु
क्या है, वह क्या कहती है, कहां ले जाती है, इस पर ज्यादा दिमाग खपाने की कोई जरूरत नहीं।
कहानी वाकई कहानी है भी या नहीं। उसमें पठनीयता है या नहीं, वह पाठकों को अपने साथ जोड़ पाती है या नहीं-ये
सब कोई मुद्दा ही नहीं है।
सचमुच आलोचना लिखने का एक नया शॉटकर्ट निकाला है प्रमोद रंजन
ने। कहने को तो वह खुद को ब्राह्मणवाद विरोधी कहते हैं पर वह खुद नायक की पंडिताऊ परिभाषा
से बाहर नहीं निकल सके हैं। वह नायक की परंपरागत परिभाषा (जो भरत मुनि और दूसरे कुछ
आचार्यों ने दी है) में फंसे हुए हैं जो यह कहती है कि नायक को धीरोदात्त होना चाहिए।
महान आदर्शों से युक्त होना चाहिए। साहित्य के पंडितों की तरह प्रमोद भी चरित्रों को
ब्लैक एंड व्हाइट में देखते हैं यानी या तो व्यक्ति बहुत अच्छा होगा या बहुत बुरा।
अगर विश्व साहित्य, नाटक या कुछ बेहतर
फिल्मों की ओर उन्होंने नजरें डाली होतीं तो उन्हें पता चलता कि नायक का रूप कितना
बदल चुका है। सच तो यह है कि सिनेमा के दर्शक ज्यादा परिपक्व हैं जो एंटी हीरो के कॉन्सेप्ट
को आत्मसात कर चुके हैं। बड़ा और प्रामाणिक चरित्र वह होता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा
शेड्स होते हैं, जो अपनी पूरी मानवीय
अच्छाइयों और बुराइयों के साथ आता है। अगर इस रोशनी में खुले मन से उन्होंने बॉस की
पार्टी के करैक्टर्स को देखा होता तो शायद उनकी राय कुछ और होती। वे ब्राह्मण होने
और ब्राह्मणवादी होने में फर्क नहीं कर पाते।
जैसे कोई धार्मिक हिंदू या धार्मिक मुसलमान होने भर से ही सांप्रदायिक
नहीं हो जाता, उसी तरह ब्राह्मण
होने से ही कोई ब्राह्मणवादी नहीं हो जाता। जबकि दूसरी तरफ कोई गैर ब्राह्मण भी घोर
ब्राह्मणवादी हो सकता है। ब्राह्मणवाद तो एक प्रवृत्ति है जिसका मतलब है हर तरह के
परिवर्तनों का विरोध, यथास्थितिवाद का
समर्थन और जातीय आत्ममुग्धता और अहंकार। प्रमोद सिर्फ इसलिए संजय कुंदन को ब्राह्मणवादी
कहते हैं क्योंकि उनके कुछ पात्र ब्राह्मण हैं। अब केएनटी की कार कहानी पर गौर करें।
अगर उसके पात्र का नाम कमल नारायण तिवारी न होकर कमल नारायण यादव होता तो क्या कोई
फर्क पड़ता? वह कहानी तो हिंदी
पत्रकारिता में आ रही गिरावट पर लिखी गई है जिससे प्रमोद भी भलीभांति परिचित हैं।
क्या
मुख्यधारा की पत्रकारिता का आम जनता के सरोकारों से कटने पर लिखना ब्राह्मणवाद है? इस कहानी में केएनटी भ्रष्ट लोगों की करतूतों
को उजागर करने के लिए अखबार निकालते हैं। क्या यह ब्राह्मणवादी कार्य है? प्रमोद को यह बात अटपटी लगती है कि एक सवर्ण
पात्र आखिर क्यों पिछड़ी जाति की सरकार आने पर चिढ़ रहा है? प्रमोद तो बिहार के हैं। वहां की सत्ता से
बाहर होने पर सवर्णों के भीतर जो छटपटाहट पैदा हुई है, वह वहां का एक सामाजिक यथार्थ है। किसी भी
सवर्ण परिवार में ऐसी बातें होना स्वाभाविक है। अगर संजय कुंदन ब्राह्मणवादी होते तो
वह बड़ी चालाकी से इस तथ्य को छुपा ले जाते। पर उन्होंने इसे छुपाया नहीं बल्कि उजागर
किया।
मुझे अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास झीनी झीनी बीनी चदरिया याद
आता है जिसमें उन्होंने बुनकरों के जीवन का चित्रण करते हुए उनके भीतर के सांप्रदायिक
रुझानों को भी साफ-साफ व्यक्त किया है। कुंदन ने भी ऐसा ही किया है। वह चाहते तो ब्राह्मण
पात्रों को महान आदर्शवादी गरीब-पिछड़ा समर्थक,
क्रांतिकारी साबित कर प्रगतिशील होने का तमगा हासिल कर सकते थे( ऐसा हाल में एक
फैशन के तहत कई सवर्ण लेखकों ने किया है) पर उन्होंने लेखकीय ईमानदारी को नहीं छोड़ा।
फिर केंद्रीय पात्र को अनिवार्य रूप से लेखक का प्रतिनिधि मानना भी बहुत बड़ी भूल है।
जैसे मुक्तिबोध की अंधेरे में कविता के ‘मैं’ को बहुत से आलोचकों ने कवि का प्रतिरूप बताकर
उसकी अनर्थकारी आलोचना की है। कुंदन जैसे लेखक दरअसल हिंदी कहानी में चरित्रों के बने-बनाए
ढांचे को तोड़ रहे हैं। ऐसा करने में गलत समझे जाने का जोखिम तो है ही।
प्रमोद रंजन को लगता है कि हिंदी साहित्य में सिर्फ जाति, पैसे और ताकत से ही जगह बनाई जाती है। अगर
ऐसा होता तो आज सभी आईएएस-आईपीएस लेखक हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित रचनाकार
होते। पर ऐसा नहीं है। दरअसल प्रमोद इस बात को भूल रहे हैं कि साहित्य में सबसे बड़ी
सत्ता है- पाठक वर्ग। हिंदी का पाठक समुदाय बहुत मौन होकर पर्दे के पीछे से फैसले करता
है। वह जिसे महत्व देता है वही प्रतिष्ठित होता है। वह सवर्ण-अवर्ण से ऊपर उठकर सोचता
है। नामवर सिंह आज अगर इस ऊंचाई पर हैं तो यह जगह उन्हें पाठकों ने ही सौंपी है। वरना
जोड़तोड़ करने वाले तो बहुत आए और गए। अगर साहित्य में जाति विशेष का ही वर्चस्व होता
तो रेणु आज कथा साहित्य के शिखर पर नहीं होते। पुरस्कारों और संस्थानों में जरूर घटिया
राजनीति होती है पर साहित्य का भविष्य इन सब से निर्धारित नहीं होता। अंतत: वही चलता
है वही टिकता है जिस पर पाठक अपनी मुहर लगाता है।
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