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Friday, October 31, 2008

मुशीरुल हसन की आवाज सुनो


दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में 30 अक्टूबर को दीक्षांत समारोह था। प्रो. अनंतमूर्ति मुख्य अतिथि थे और दीक्षांत भाषण भी उन्ही का था। लेकिन जिस भाषण पर सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है वह है वहां के वीसी मुशीरुल हसन का। मुशीरुल हसन के भाषण में जामिया का दर्द बाहर निकल आया है।
उन्होंने अपने भाषण में कहा कि जामिया के छात्रों के लिए नौकरियां खत्म की जा रही हैं। उन्हें बाहर यह कहकर नौकरी देने से मना कर दिया जाता है कि जामिया यूनिवर्सिटी में तो आतंकवाद की ट्रेनिंग दी जाती है, इसलिए वहां के पढ़े छात्रों के लिए कोई नौकरी नहीं है। यहां पर प्राइवेट कंपनियों की कैब लाने से ड्राइवर यह कहकर मना कर देते हैं कि वहां तो आतंकवादी रहते हैं, इसलिए वे वहां नहीं जाएंगे।
सचमुच, यह बहुत भयावह हालात हैं। किसी देश की मशहूर यूनिवर्सिटी का वीसी अगर यह बात पूरे होशहवास में कह रहा है तो इस पर विचार किया जाना चाहिए। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब इसी जामिया नगर इलाके के बटला हाउस में एक विवादित एनकाउंटर हुआ, जिसमें दो युवक और एक पुलिस वाला मारे गए। इसके बाद वहां राजनीतिक पार्टियां अपने ढंग से राजनीति करते रहे। एनकाउंटर में मारे गए युवक और उनके पकड़े गए साथी जामिया यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। इनकी गिरफ्तारी पर मुशीरुल हसन ने सिर्फ यह कहा था कि अभी अदालत न उनको सजा नहीं सुनाई है इसलिए उनको आतंकवादी नहीं कहा जा सकता है और यूनिवर्सिटी उनकी कानूनी मदद करेगी।
लेकिन इसका नतीजा इस रूप में आएगा, यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा है। लेकिन यह बात एक जिम्मेदार यूनिवर्सिटी के वीसी ने कही है तो यकीन न कर पाने का सवाल ही नहीं पैदा होता। जामिया के प्रोफेशनल कोर्स काफी मशहूर हैं और कुछ कोर्स ऐसे हैं जो किसी और यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाए जाते। इनमें पढ़ रहे सारे छात्र न तो मुस्लिम हैं और न ही वे सिर्फ दिल्ली या यूपी के रहने वाले हैं। यहां पर सारे एडमिशन एंट्रेस के जरिए होते हैं। यूनिवर्सिटी का नाम और संविधान सिर्फ मुस्लिम चरित्र लिए हुए है, अन्यथा यहां मुस्लिम छात्रों का कोई कोटा नहीं है और न ही उन्हें इस आधार पर चयन में वरीयता मिलती है कि वे मुसलमान हैं। यहां से मॉस कम्युनिकेशन करके निकले छात्र (जो अब तमाम अखबारों व टीवी चैनलों में काम कर रहे हैं) अच्छी तरह जानते हैं कि उनके साथ कितने मुस्लिम लड़के पढ़ते थे।
अगर तमाम कंपनियां यहां से अभी-अभी पढ़कर निकले छात्रों से ऐसा बर्ताव कर रही हैं तो यह बेहद निदंनीय कृत्य है। देखना यह है कि देश के हुक्मरान और विपक्ष में बैठी सियासी पार्टियां इसे किस रूप में लेती हैं। खासकर बीजेपी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया किस रूप में सामने आती है, यह अध्ययन का विषय होगा।
दरअसल, दिल्ली में हुए ब्लास्ट और बटला हाउस की घटना के बाद जो माहौल बना है, वह इस देश को खतरनाक स्थिति की ओर ले जा रहा है। अगर समाज का कोई तबका अपने आप को इस तरह अलग-थलग महसूस करना शुरू कर देगा तो इसकी परिणति खतरनाक हो सकती है। यह आग से खेलने की तरह है। जिस देश में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच या बिहारी भैया और मराठी लोगों के बीच जंग लड़ी जा रही हो, वहां इस तरह की स्थिति पनपना और भी खतरनाक है। पंजाब में किसानों की समस्या से शुरू हुआ सिख आंदोलन कब खालिस्तानी आंदोलन में बदला, यह सब जानते हैं। उसके बाद पंजाब में जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है। जम्मू कश्मीर में स्वायतत्ता की मांग के साथ शुरू हुआ आंदोलन आज कहां है, सब जानते हैं। असम में अलग बोडोलैंड की मांग में कब हूजी जैसा आतंकवादी संगठन घुसा और अल्फा को अब वह िजस तरह नियंत्रित कर रहा है, नतीजे सामने आ रहे हैं। 30 अक्टूबर को असम में हुए विस्फोट इसी बात की गवाही देते हैं।
समस्या बढ़ती जा रही है। किस चीज की चुभन कब कौन कहां महसूस करेगा, कोई नहीं जानता लेकिन आम भारतीय तो उसमें पिसेगा ही। इसलिए मुशीरुल हसन की आवाज को सुनने की जरूरत है और अगर सियासी पार्टियों के पास अक्ल है तो वे कुछ उस पर करें भी। अगर इन आवाजों को दबाया गया तो इस मुल्क का भगवान ही मालिक है।

Thursday, October 30, 2008

हिंदुत्व...संस्कृति...कमेंट या बहसबाजी



संदर्भः मोहल्ला और हिंदीवाणी ब्लॉगों पर टिप्पणी के बहाने बहसबाजी
(मित्रों, आप हमारे ब्लॉग पर आते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं, मैं आपके ब्लॉग पर जाता हूं, प्रतिक्रिया देता हूं। यहां हम लोग विचारों की लड़ाई नहीं लड़ रहे। न तो मैं आपके ऊपर अपने विचार थोप सकता हूं और न ही आप मेरे ऊपर अपने विचार थोप सकते हैं। हम लोग एक दूसरे प्रभावित जरूर हो सकते हैं।)

मेरे नीचे वाले लेख पर कॉमनमैन ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी है।

हालांकि बेचारे अपने असली नाम से ब्लॉग की दुनिया में आने से शरमाते हैं। वह कहते हैं कि हिंदुओं को गलियाने का ठेका मेरे या मोहल्ला के अविनाश जैसे लोगों ने ले रखा है। शायद आप सभी ने एक-एक लाइन मेरे ब्लॉग पर पढ़ी होगी, कहीं भी किसी भी लाइन में ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई है। फिर भी साहब का गिला है कि ठेके हम लोगों के पास है। आप पंथ निरपेक्षता के नाम पर किसी को भी गाली दें लेकिन आप जैसे लोगों को पकड़ने या कहने वाला कोई नहीं है। अलबत्ता अगर कोई सेक्युलरिज्म की बात करता है तो आप जैसों को बुरा लगता है। अब तो बाबा साहब आंबेडकर को फिर से जन्म लेकर भारतीय संविधान का पुनर्लेखन करना पड़ेगा कि भाई हमारी संविधान सभा तो गलती से सेक्युलरिज्म की बात लिख गई थी।
रही बात यह कि हमारे जैसे लोग अन्य देशों में जाकर इसकी शुरुआत क्यों नहीं करते। आप अप्रत्यक्ष रूप से जो कहना चाहते हैं, वह हमें समझ में रहा है। भाई मेरे, यह देश तो अब नहीं छूटेगा। बल्कि मेरे बाद की पीढियों के लिए भी वसीयत है कि वे यहां से न जाएं। जब मेरे पिता और दादा जी उस वक्त पाकिस्तान नहीं गए जब इस देश को बांटा जा रहा था तो भला अब कौन जाए गालिब ये गलियां छोड़कर। हालांकि उस समय तमाम मीर साहबान (या सैयद साहबान-दो उन दिनों मेरे पिता औऱ दादा के बारे में बोला जाता था) के रास्ते पर जाकर वे ऐसा कर सकते थे। लेकिन वे लोग नैशनल शिब्ली कॉलेज में स्वतंत्रता आंदोलन की लौ जगमगाए हुए थे तो उन्हें पाकिस्तान जाने का होश कहां रहा होगा। अब आप बताइए कि क्या इस देश में सेक्युलरिज्म की बात करना गुनाह है? क्या दलितों को मंदिर में न घुसने देने पर उसका विरोध गुनाह है? क्या किसी बुखारी या प्रवीन तोगड़िया टाइप लोगों का विरोध नाजायज है? क्या हम जैसों को इस देश में तभी रहने को मिलेगा जब हम जैसे किसी भगवा पार्टी के मेंबर बन जाएंगे? बहरहाल, दोस्त हम तो यहीं रहेंगे और यहीं रहकर सेक्युलरिज्म की अलख जगाएंगे।
सुरेश चंद गुप्ता जी, आपकी टिप्पणी काफी वजनदार है। मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं। लेकिन आपका यह कहना कि मोहल्ला ब्लॉग गाली-गलौच का अड्डा बन गया है, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। मैंने तो खैर हिंदी में अभी-अभी ब्लॉगिंग (हालांकि अंग्रेजी में इससे ज्यादा सक्रिय था, लेकिन अपनी भाषा की बात ही अलग है) शुरू की है, मोहल्ला पुराना ब्लॉग है। उस ब्लॉग ने कई सार्थक बहस चलाई है। जिस पोस्ट की आपने चर्चा की है, उसमें भी कोई हिंदू विरोधी बात नहीं कही गई है। न ही अविनाश ने उसमें कोई एकतरफा बात कही है। उन्होंने तो वह लिखा जो उन पर बीता या जो उन्होंने महसूस किया। मैंने भी अपनी पोस्ट में किसी को भी कसूरवार नहीं ठहराया। बल्कि इसलिए लिखा कि जो लोग एकतरफा टिप्पणी वहां कर रहे थे, उनके सामने उस तस्वीर को साफ करके पेश करने की कोशिश भर थी।
हेमंत ने यहां अपनी टिप्पणी में सारी बात वाजिब कहीं लेकिन उनकी एक बात से मैं कम से कम सहमत नहीं हूं कि महाराष्ट्र में हिंदूत्व का असली चेहरा दिखाई दे रहा है। वहां राज ठाकरे या बाल ठाकरे जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे शेष हिंदुओं का कुछ भी लेना-देना नहीं है। इन दोनों चाचा-भतीजा की सोच राष्ट्र विरोधी है और ये दोनों ही न तो ठीक से महाराष्ट्र का ठीक से प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही मुंबई का। शिवसेना अखिल महाराष्ट्र की पार्टी आज तक नहीं बन सकी। मुंबई में जरूर इन दोनों की गुंडई चलती है।
रौशन साहब ने बहुत पते की बात कही है कि धर्म ऐसे लोगों की सोच से बहुत बड़ा है। अभी एक दिन ही गुजरा है जब आपने देखा होगा कि तमाम शहरों में हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान भी दीवाली मना रहा था। खुद मेरे घर पर रोशनी की गई थी और घर के लोगों ने पटाखे फोड़े थे। हालांकि इसके लिए मेरी ओर से ऐसा कोई निर्देश नहीं था कि ऐसा होना ही चाहिए। यह उनकी अपनी मर्जी थी और उनका उल्लास इसमें शामिल था। अभी नवरात्र के दिनों में ईद पड़ी थी, हमारे तमाम हिंदू मित्र उसी तरह आए जैसे वे बाकी वर्षों से आते रहे हैं। उसके इस इस त्योहार को मनाने में कोई धर्म तो आड़े नहीं आया। यह आपके ऊपर है कि आप अपनी सोच पर धर्म को किस कदर हावी होने देना चाहते हैं।
वाकई ये बहस लंबी हो सकती है। इसका कोई अंत नहीं है। हमें चीजों को सही संदर्भो में समझना पड़ेगा, तभी हम सहिष्णु कहलाएंगे। सिर्फ धर्म का सहिष्णु होना जरूरी नहीं है।

Wednesday, October 29, 2008

भारतीय संस्कृति के ठेकेदार


कल मैं अविनाश के मोहल्ले (http://mohalla.blogspot.com)में गया था। वहां पर एक बढ़िया पोस्ट के साथ अविनाश हाजिर थे। उनके लेख का सार यह था कि किस तरह उनके मुस्लिम सहकर्मियों ने दीवाली की छुट्टी के दौरान काम करके अपने हिंदू सहकर्मियों को दीवाली मनाने का मौका दिया। यानी त्योहार पर हर कोई छुट्टी लेकर अपने घर चला जाता है तो ऐसे में अगर उस संस्थान में मुस्लिम कर्मचारी हैं तो वे अपना फर्ज निभाते हैं। यह पूरे भारत में होता है और अविनाश ने बहुत बारीकी से उसे पेश किया है।
लेकिन मुझे जो दुखद लगा वह यह कि कुछ लोगों ने अविनाश के इतने अच्छे लेख पर पर भी अपनी जली-कटी प्रतिक्रिया दी। उनमें से एक महानुभाव तो कुछ ऐसा आभास दे रहे हैं कि हिंदू महासभा जैसे साम्प्रदायिक संगठन से बढ़कर उनकी जिम्मेदारी है और भारतीय मुसलमानों को पानी पी-पीकर गाली देना उनकी ड्यूटी है। यह सज्जन कई बार मेरे ब्लॉग पर भी आ चुके हैं और तमाम उलूल-जुलूल प्रतिक्रिया दे चुके हैं। इन जैसे तमाम लोगों का कहना है कि मुसलमानों ने कभी भारतीय संस्कृति को नहीं अपनाया और न यहां के होकर रहे। मैं नहीं जानता कि यह सजज्न कौन हैं और कहां रहते हैं। लेकिन इन्हें न तो भारत के बारे में पूरी जानकारी है और न ही इन्होंने इस देश को किसी भी मौके पर घूमकर देखा है।
अगर मैं यहां पर बात सिर्फ भारतीय मुसलमानों द्वारा अपनाई जाने वाली संस्कृति की करूं तो काफी कुछ ऐसा है जिसका पालन दुनिया के किसी कोने में मुसलमान नहीं करते। मसलन पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के यहां होने वाले विवाह समारोह में तमाम रस्मे उसी ढंग की होती हैं जैसा हिंदुओं के यहां होने वाले विवाह समारोहों में होती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम महिलाएं गले में मंगलसूत्र पहनती हैं और मांग में सिंदूर लगाती हैं। हालांकि देश भर में ऐसा सिर्फ हिंदू महिलाएं करती हैं। इस संबंध में मैंने कई बार पूर्वी उत्तर प्रदेश में जानकारी जुटाने की कोशिश की तो पता चला कि उनके यहां सदियों से यह परंपरा निभाई जा रही है, इसलिए वे भी इसका पालन करती हैं। आपको यह कल्चर खासकर अवध के इलाके में ज्यादा मिलेगा।
इसी तरह शिया समुदाय के लोग मुहर्रम में जब मजलिस और मातम करते हैं तो वहां की हिंदू महिलाएं जहां ताजिया रखा जाता है वहां कर्बला में शहीद हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार के लिए रोती हैं। वहां की लोकल भाषा में इसे दाहा कहा जाता है, जो दाह से बिगड़कर दाहा हो गया है। हिंदी में दाह का मतलब क्या होता है, यह शायद यहां बताने की जरूरत नहीं है। हिंदू महिलाओं की ऐसी धारणा है कि वे उस जगह पर जो मनौती मानती हैं, वह पूरी होती है। किसी को अगर कर्बला के बारे में ज्यादा जानकारी हिंदी में चाहिए तो मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित नाटक कर्बला का संग्राम जरूर पढ़ ले। यह कुछ उदाहरण थे जो मैं भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में आपको दे रहा हूं और बारीकी से अगर इसका अध्ययन किया जाए तो काफी चीजें निकलकर आ सकती हैं। इसी तरह कश्मीर के मुसलमान या कश्मीरी पंडित से अगर आप बात कर लें तो आपको समझ में नहीं आएगा कि इसमें से कौन मुसलमान है, जब तक कि वह खुद न बताए। उनके यहां भी शादी-विवाह के रीति-रिवाज काफी मिलते हैं। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में भी आपको यही मिलेगा। महाराष्ट्र भी इससे अलग नहीं है। हां, पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं। लेकिन पूजा पद्धति किसी का भी नितांत व्यक्तिगत मामला होता है। भारत के सेक्युलर चरित्र को रात-दिन उठते-बैठते गाली देने वाले दूसरे धर्म के लोगों से और क्या आपेक्षा रखते हैं, यह समझ से बाहर है। अगर चंद गुमराह मुस्लिम युवकों के पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर आप सारे मुसलमानों को गद्दार समझने और बताने लगें तो अलग बात है, साथ ही उसे इस्लामी आतंकवाद का नाम भी दे दें। हद यह है कि आर्थिक और सामाजिक विषमता के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे माओवादियों को भी अब ईसाई और मुस्लिम माओवादी के चश्मे से देखा जाने लगा है। उड़ीसा में जब एक हिंदू पुजारी की हत्या हुई तो बीजेपी के नेताओं ने इसे फौरन ईसाई माओवादियों की करतूत बता डाली।
देश में अच्छी सोच रखने वालों के साथ मेरा भी यही कहना है कि यह देश को एक बड़े कुचक्र में धकेलने की साजिश है। जिसमें जाति, धर्म और उत्तर–दक्षिण के नाम पर बांटने की साजिश की जा रही है। देश का इस तरह साम्प्रदायिकरण बहुत घातक साबित होगा। कुछ राजनीतिक दल जिस तरह की धार्मिक उन्माद की राजनीति कर रहे हैं वह सभी को गर्त में डुबो देगा, अगर कोई सोचता है कि इसकी अकेले की फसल सिर्फ वही काटेगा तो उसे बड़ी गलतफहमी है।

Monday, October 27, 2008

हम सभी को रोशनी की जरूरत है...



आप सभी बलॉगर्स को दीपावली की
हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
उनका भी शुक्रिया जिन्होंने मेरे
लेखों को पढ़ने के बाद यहां पर
या ई-मेल के जरिए प्रतिक्रिया
के बहाने दीपावली की शुभकामना
दी। उम्मीद है हम लोगों का यह
कारवां इसी तरह
आगे बढ़ता रहेगा। (आमीन)

Ek ziddi dhun: सड़ांध मार रहे हैं तालाब

मेरे ही साथी भाई, धीरेश सैनी ने अपने ब्लॉग पर एक गांधीवादी अनुपम मिश्र के सेक्युलरिज्म का भंडाफोड़ किया है। उस पर काफी तीखी प्रतिक्रियाएं भी उन्हें मिली हैं। क्यों न आप लोग भी उस लेख को पढ़ें। ब्लॉग का लिंक मैं यहां दे रहा हूं।

Ek ziddi dhun: सड़ांध मार रहे हैं तालाब

Saturday, October 25, 2008

प्लीज, उन्हें हिंदू आतंकवादी न कहें


कुछ जगहों पर हुए ब्लास्ट के सिलसिले में इंदौर से हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर बहुत सख्त प्रतिक्रिया (tough reaction) देखने को मिली। इनकी गिरफ्तारी से बीजेपी और आरएसएस के लोगों ने एक बहुत वाजिब सवाल उठाया है और उस पर देशव्यापी बहस बहुत जरूरी है। हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद न्यूज चैनलों और कुछ अखबारों ने जो खबर दिखाई और पढ़ाई, इनके लिए hindu terrorist यानी हिंदू आतंकवादी शब्द का इस्तेमाल किया। यह ठीक वही पैटर्न था जब कुछ मुस्लिम आतंकवादियों के पकड़े जाने पर पहले अमेरिका परस्त पश्चिमी मीडिया (western media) ने और फिर भारतीय मीडिया ने उनको इस्लामी आतंकवादी (islamic terrorist) लिखना शुरू कर दिया।
बीजेपी के बड़े नेता यशवंत सिन्हा ने 24 अक्टूबर को एक बयान जारी कर इस बात पर सख्त आपत्ति जताई कि हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं को हिंदू आतंकवादी क्यों बताया जा रहा है। सिन्हा ने अपने बयान में यह भी कहा कि बीजेपी के प्राइम मिनिस्ट इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी यह कई बार कह चुके हैं कि आतंकवादी का कोई धर्म या जाति नहीं होती।
अब देखिए, सिन्हा साहब का बयान कितना अच्छा और साफ-सुथरा है। लेकिन या तो सिन्हा साहब के पास या फिर उनकी अपनी पार्टी के पास आरएसएस का मुखपत्र पान्चजन्य (अंग्रेजी में organizer) पढ़ने की फुरसत नहीं है जिसके हर अंक में इस्लाम (islam) को आतंकवादी धर्म बताने की कोशिश जारी है। इस मुहिम अकेले वह समाचारपत्र शामिल नहीं है।
अंकल सैम के भतीजे जॉर्ज डब्ल्यू बुश जब आतंकवाद की लड़ाई को चरम पर ले गए तो अमेरिका का वह मीडिया जो बुश का अंध समर्थक बन चुका था, उसके रणनीतिकारों ने सबसे पहले इस्लाम को आतंकवादी धर्म लिखना शुरू किया। हालांकि अमेरिका में तब भी और आज भी एक बहुत बड़े वर्ग (अब तो यह तादाद और बढ़ गई है खासकर आर्थिक मंदी के कारण, अमेरिकी लोगों का कहना है कि बुश के इस्लाम विरोधी रवैए और मिडिल ईस्ट पर युद्ध थोपने के कारण ये हालात बने ) ने इसका सख्ती से विरोध किया। वहां पर ऐसे अखबार और वेबसाइट हैं जो रोजाना यह आंकड़ा छापते हैं कि आज अमेरिकी हमले में दुनिया के किस कोने में कितने बेगुनाह लोग मारे गए।
भारत में हिंदू उन्माद को चरम पर ले जाने की आरोपी बीजेपी और काफी हद तक कांग्रेस को लगा कि क्यों न हम भी इस शब्द को अपना लें और रातोरात भारतीय मीडिया और नेताओं के मुखारबिंद से इस्लामी आतंकवाद शब्द फूटने लगे। लेकिन जिस मीडिया ने अमेरिका और भारत में बीजेपी के इशारे पर इस शब्द को जन-जन तक पहुंचाया, उसे अब ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। हिंदू आतंकवादी शब्द लिखे जाने पर मुझे सख्त आपत्ति है। चंद लोगों के पकड़े जाने से आप पूरे हिंदू धर्म को गाली नहीं दे सकते। सही मायने में हिंदू धर्म इस्लाम की ही तरह बहुत सहिष्णु है, तभी तो यहां सभी धर्मों को फैलने का मौका मिला।
यह सही है कि हिंदू धर्म के कतिपय गुमराह लोगों ने कई जगह बम ब्लास्ट किए, उड़ीसा, कर्नाटक व कुछ अन्य स्थानों पर ईसाई महिलाओं (christian women ) से रेप किए, उनकी संपत्ति को लूटा, गुजरात में जो कुछ हुआ उसे बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं। लेकिन इन सबके बावजूद हिंदू धर्म बहुत सहिष्णु है। उस धर्म में अच्छे लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है। अगर हिंदू कट्टर होते तो बीजेपी न जाने कब की अखिल भारतीय पार्टी बन गई होती और कश्मीर से कन्याकुमारी तक सिर्फ कमल खिल रहा होता। यह ठीक उसी तरह है कि मेरे जैसा मुसलमान अगर मुस्लिम लीग को वोट देता फिरता तो मुस्लिम लीग इस देश की सबसे बड़ी पार्टी होती और अनपढ़ व गरीब मुसलमानों को मौकापरस्त मुलायम सिंह यादव व मायावती जैसों का मुंह नहीं देखना पड़ता। भारत की बुनियाद में ये बातें बहुत मजबूती से डाल दी गई हैं। इसलिए आने वाले वक्त में ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा बढ़ेगी। कुछ राज्यों में जल्द ही और देश भर में लोकसभा चुनाव अगले साल होना तय है। नतीजे आने पर खुद ही पता चल जाएगा कि बीजेपी क्या वाकई उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनके उन्माद को वह चरम पर ले गई है? जवाब नहीं में आएगा, इसका मुझे यकीन है। इसलिए यशवंत सिन्हा की इस बात में मैं पूर्ण सहमत हूं कि बम ब्लास्ट के सिलसिले में पकड़े गए उन गुमराह लोगों को कतई हिंदू आतंकवादी न कहा जाए और न लिखा जाए।

Friday, October 24, 2008

जिंदगी क्‍यों अधूरी हैं

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि-

हम दुनिया में क्‍यों आये


अपने साथ ऐसा क्‍या लायें


जिसके लिए घुट-घुट कर जीते हैं

दिन रात कडवा घूँट पीते हैं


क्‍या दुनिया में आना जरूरी हैं

अगर हैं,तो फिर जिंदगी क्‍यों अधूरी हैं।




कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि,

बच्‍चे पैदा क्‍यों किये जाते हैं,


पैदा होते ही क्‍यों छोड दिये जाते हैं,


मॉं की गोद बच्‍चे को क्‍यों नहीं मिलती


ये बात उसे दिन रात क्‍यों खलती


क्‍या पैदा होना जरूरी हैं


अगर हैं,तो फिर जिंदगी क्‍यों अधूरी हैं।




कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि,

हम सपने क्‍यों देखते हैं


सपनों से हमारा क्‍या रिश्‍ता हैं

जिन्‍हे देख आदमी अंदर ही अंदर पिसता हैं


क्‍या सपने देखना जरूरी हैं


अगर हैं,तो फिर जिंदगी क्‍यों अधूरी हैं।




कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि,

इंसान-इंसान के पीछे क्‍यों पडा हैं


जिसे समझों अपना पही छुरा लिए खडा हैं


अपने पन की नौटंकी क्‍यों करता हैं इंसान


इंसानियत का कत्‍ल खुद करता हैं इंसान


क्‍या इंसानिसत जरूरी हैं


अगर हैं,तो फिर जिंदगी क्‍यों अधूरी हैं।



(इस सोच का अभी अंत नही हैं)

-जतिन, बी.ए.(आनर्स) प्रथम वर्ष
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, भीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्‍ली विश्विद्यालय

Thursday, October 23, 2008

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

जिनकी दिलचस्पी साहित्य में है और जिन्हें महाभारत सीरियल के कुछ संवाद अब तक याद होंगे, उन्होंने राही मासूम रजा का नाम जरूर सुना होगा। राही साहब की एक नज्म – मेरा नाम मुसलमानों जैसा है - के बारे में मैं कई लोगों से अक्सर सुना करता था लेकिन किसी ने न तो वह पूरी नज्म सुनाई और न हीं कोशिश की कि मैं उसे पूरा पढ़ सकूं। अलीगढ़ से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका वाड्मय ने अभी राही साहब पर पूरा अंक निकाला है। जहां यह पूरी नज्म मौजूद है। मैं उस पत्रिका के संपादक डॉ. फीरोज अहमद का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने उस नज्म को तलाशा और छापा। वह पत्रिका ब्लॉग स्पॉट पर भी है। आप खुद भी वहां जाकर पूरा अंक पढ़ सकते हैं। उसी अंक में कैफी आजमी साहब की मकान के नाम से मशहूर नज्म दी गई है। वह भी मौजूदा हालात के मद्देनजर बहुत सटीक है। इसलिए उसे भी दे रहा हूं। इसके अलावा सीमा गुप्ता की भी दो रचनाएं हैं, जिन्हें आप जरूर पढ़ना चाहेंगे।

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
- राही मासूम रजा

मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।



राही मासूम रजा की एक और नज्म – लेकिन मेरा लावारिस दिल – पर भी गैर फरमाएं।

लेकिन मेरा लावारिस दिल
-राही मासूम रज़ा

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।


मकान

- कैफ़ी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
ये ज़मीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाख़ों से उतारे हम ने
इन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हम ने
हाथ ढलते गये साँचे में तो थकते कैसे
नक़्श के बाद नये नक़्श निखारे हम ने
की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द
बाम-ओ-दर और ज़रा, और सँवारे हम ने
आँधियाँ तोड़ लिया करती थीं शमों की लौएं
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने
बन गया क़स्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये
अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पैहम की थकन
बंद आँखों में इसी क़स्र की तस्वीर लिये
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
रात आँखों में ख़टकती है स्याह तीर लिये
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आयेगी
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी



इन्हें भी जरूर पढ़ें

मौत की रफ़्तार
-सीमा गुप्ता

आज कुछ गिर के टूट के चटक गया शायद ..

एहसास की खामोशी ऐसे क्यूँ कम्पकपाने लगी ..

ऑंखें बोजिल , रूह तन्हा , बेजान सा जिस्म ..

वीरानो की दरारों से कैसी आवाजें लगी...

दीवारों दर के जरोखे मे कोई दबिश हुई ...

यूँ लगा मौत की रफ़्तार दबे पावँ आने लगी...



विरह का रंग

-सीमा गुप्ता

आँखों मे तपीश और रूह की जलन,

बोजिल आहें , खामोशी की चुभन ,

सिमटी ख्वाईश , सांसों से घुटन ,

जिन्दा लाशों पे वक्त का कफ़न,

कितना सुंदर ये विरह का रंग

(विरह का क्या रंग होता है यह मैं नही जानती . लेकिन इतना ज़रूर है की यह रंग -हीन भी नही होता और यह रंग आँखें नही दिल देखता है)

Wednesday, October 22, 2008

आतंकवादियों को पहचानो


मुंबई (Mumbai) जल रही है और तमाम राजनीतिक दल राज ठाकरे को हीरो बनाने में लगे हुए हैं। वह पार्टियां जो ठाकरे के खिलाफ आवाज उठा रही हैं उनके स्वर भी इतने मुखर नहीं है। पिछले एक साल से यह शख्स अपनी राजनीतिक दुकानदारी चमकाने के लिए मुंबई सिर्फ मराठियों का राग छेड़े हुए है। इस बार इसकी शुरुआत फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के घर पर पथराव करके और फिर उनकी पत्नी जया बचच्न के खिलाफ घटिया बयानबाजी से हुई। उन्हें चूंकि अभी मुंबई में अभिषेक बच्चन को स्टैंड कराना है तो वे ठाकरे खानदान से बैर मोल नहीं ले सकते, इसलिए माफी-तलाफी के बाद बात खत्म हो गई। लेकिन इसके बाद से ठाकरे खानदान की बदमाशी बढ़ गई। ठाकरे खानदान के लिए अलगाववादी आंदोलन (separatist movement )चलाना नया नहीं है। उन्हें ऐसे आंदोलनों की खेती करना आता है। बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे और बीच में उद्धव ठाकरे तक इतिहास गवाह है कि इस खानदान ने मुंबई को बांटने के अलावा कुछ नहीं किया। इस बात पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है कि मुंबई सबकी है। उसकी तरक्की में यूपी-बिहार से गए लोगों का उतना ही हाथ है जितना वहां के मराठियों का। यह इसी तरह की बयानबाजी है कि यह देश मुसलमानों का भी है और उन्होंने भी इसे बनाने-संवारने में अपनी भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक। पर सुन कौन रहा है।
बहरहाल, वापस अपनी बात पर आते हैं...
सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह का आज एक बयान मीडिया में देखने को मिला। वह कहते हैं कि राज ठाकरे महाराष्ट्र का भिंडरावाला है। सभी को याद होगा कि किस तरह पंजाब को भिंडरावाला ने आतंकवाद के गर्त में ढकेल दिया था। उसके नतीजे क्या निकले, सभी को मालूम है। यहां हम रुककर कश्मीर की ही बात कर लें। कश्मीर का आंदोलन जब तक वहां के लोगों के हाथों में रहा तब तक उसकी शक्ल कुछ और थी और जैसे ही उसे पाकिस्तानी मदद मिली, उसकी शक्ल और हो गई। आज कश्मीर के लोगों से बात करिए तो कहानी कुछ और मिलेगी। ठाकरे खानदान की हिम्मत को किसने बढाया, किसने पाला-पोसा, यह मुंबई के लोग जानते हैं। अभी लंबा अर्सा नहीं गुजरा जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी उसके प्रधानमंत्री थे। शिवसेना यानी राज ठाकरे के चाचा बाल ठाकरे की पार्टी ने महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। नतीजा कुछ नहीं आया। बाल ठाकरे लंबे वक्त से अपने परचे सामना में उत्तर भारतीय लोगों (north indians) के खिलाफ लिखते आ रहे हैं। उन्होंने कोई ऐसा मौका नहीं छोड़ा जब उन्होंने उत्तर भारतीय और मुसलमानों के खिलाफ जहर न उगला हो। जिस इंसान पर मुंबई दंगों में श्रीकृष्णा आयोग ने उंगली उठाई हो, उसके साथ बीजेपी क्यों चलती रही, यह समझ से बाहर है। बीजेपी का मोह ठाकरे खानदान को लेकर आज भी है और महाराष्ट्र में जब चुनाव होंगे तो हर आदमी देखेगा और सुनेगा कि किस तरह दोनों पार्टियां कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती हैं। दरअसल, शिवसेना और बीजेपी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का एक जैसी राजनीति में विश्वास है। मैं यह बात बहुत छोटी सी खबर के जरिए पुष्ट करना चाहता हूं।
दिल्ली (delhi) में चुनाव 29 नवंबर को है। बीजेपी ने अपने सांसद विजय कुमार मल्होत्रा के बारे में घोषणा की है कि पार्टी सत्ता में आई तो वह मुख्यमंत्री होंगे।
मल्होत्रा ने २१ अक्टूबर को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा है कि वह सीएम बने तो दिल्ली में बाहर से पढ़ने आने वाले दूसरे राज्यों के छात्रों को कॉलेज में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा देने पर बाध्य करेंगे। क्योंकि दूसरे राज्यों (यूपी-बिहार) में बहुत नकल होती है, वहां के बोर्ड अपने छात्रों को ज्यादा नंबर देते हैं और उन्हें आसानी से दिल्ली में एडमिशन मिल जाता है।
मल्होत्रा की यह सोच राज ठाकरे के सोच से मेल खाती है। क्योंकि शुरुआत इसी तरह होती है। ऐसे ही संकेत दिया जाता है। दिल्ली के किसी आम आदमी ने अभी तक नहीं कहा कि उसे यूपी-बिहार के छात्रों के यहां पढ़ने से कोई परेशानी है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कितने छात्र दिल्ली के होते हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिल्ली के छात्रों को दाखिला लेने से कौन रोक रहा है, मल्होत्रा इसका जवाब नहीं देना चाहेंगे। यूपी-बिहार के जो लोग पिछले ३० साल से यहां रह रहे हैं क्या दिल्ली उनकी नहीं है औऱ क्या उनके बच्चे को यहां पढ़ने का मौका नहीं मिलना चाहिए? और सुनिए, यह अकेले मल्होत्रा की बात नहीं है। कांग्रेस पार्टी द्वारा नियुक्त दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना का कहना है कि दिल्ली में हर आदमी के पास आई-कार्ड होना चाहिए, क्योंकि यहां दूसरे राज्यों के लोग रहते हैं औऱ इससे दिल्ली में एक तरह का असंतुलन पैदा हो गया है। बहुत लानत भेजने के बाद खन्ना ने अपने बयान से मुकर गए। इसी तरह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी दिल्ली में बाहरी लोगों के आने पर नाक-भौं सिकोड़ी थी। लानत मिलने के बाद उन्होने भी बयान बदल दिया।
अभी बीजेपी ने हरियाणा की जिस क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नैशनल लोकदल से गठबंधन किया है, उसके अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला तक हरियाणा में बाहरी लोगों के खिलाफ बोल चुके हैं। हरियाणा के ही एक और क्षेत्रीय दल जनहित कांग्रेस ने भी यही राग अलापा कि हरियाणा सिर्फ हरियाणवी लोगों का। जनहित कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की पार्टी है जो अब कांग्रेस में नहीं हैं।
इन सारे नेताओं के सुर एक जैसे ही हैं। पार्टी और झंडे बदले हुए हैं। पुरानी दिल्ली का कोई आदमी (जिसमें मुसलमान और वैश्य समुदाय के लोग मूल बाशिंदे हैं) तो आज तक यह कहता नहीं सुना गया कि लालकृष्ण आडवाणी सिंधी हैं, पाकिस्तान से आए थे, वापस भेज दो। मल्होत्रा और खन्ना के दादा-परदादा का भी यही इतिहास है। अब बेचारे पुरानी दिल्ली वाले क्या करें, जिनकी शानदार हवेलियों पर आज इन लोगों का कब्जा है और वे दड़बेनुमा मकानों में रह रहे हैं। कई टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने राज ठाकरे की गुंडई पर आम लोगों के बीच सर्वे कराया है। जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि उत्तर भारतीयों के खिलाफ यह आंदोलन अलगाववादी सोच को दर्शाता है। यानी आतंकवादियों और इस आंदोलन के चलाने वालों में रत्ती भर फर्क नहीं है। पढ़े-लिखे मराठी लोग कम से कम यही सोचते हैं। बहरहाल, ऐसी ताकतो के खिलाफ आज आवाज न उठी तो कल बहुत देर हो जाएगी।

Monday, October 20, 2008

मुसलमान को उसके हाल पर छोड़ दीजिए


दिल्ली के जामिया नगर इलाके में बटला हाउस एनकाउंटर (batla house encounter) को लेकर राजनीतिक दल सक्रिय हो गए हैं। एनकाउंटर के कुछ दिनों तक तो राजनीतिक दल खामोश रहे और इस दौरान बटला हाउस और आजमगढ़ के तमाम मुसलमान आतंकवादी (muslim terrorist) और पाकिस्तानी करार दे दिए गए। अभी जब दिल्ली समेत कुछ राज्यों में चुनाव की घोषणा हुई और जिसे लोकसभा से पहले मिनी आम चुनाव कहा जा रहा है, राजनीतिक दलों ने मुसलमानों का दिल जीतने के लिए इस मुद्दे को उठा दिया। कांग्रेस और बीजेपी को छोड़कर सभी ने एनकाउंटर की न्यायिक जांच की मांग कर डाली। सबसे मुखर समाजवादी पार्टी नजर आई। इसके नेता अमर सिंह ने पहले तो एनकाउंटर में मारे गए या शहीद हुए (आप जो भी कहना चाहें) दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के परिवार को दस लाख रुपये का चेक देने में अपनी फजीहत कराई। मैं समझता हूं कि समाजवादी पार्टी औऱ अमर सिंह की ओर से यह विवाद जानबूझकर पैदा किया गया, जिससे यूपी के मुसलमानों को संदेश दिया जा सके। इसके बाद अमर सिंह तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी को लेकर बटला हाउस इलाके में पहुंचे और रात को एक रैली कर घटना की न्यायिक जांच की मांग कर डाली। इस रैली के बाद अमर सिंह के समर्थकों ने स्टार न्यूज चैनल के पत्रकारों के साथ मारपीट की। बहरहाल, मीडिया पर यह गुस्सा जायज था या नाजायज, यह हमारे लेख का विषय नहीं है।
इसके बाद सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस घटना की न्यायिक जांत की मांग कर डाली।
समझ में नहीं आ रहा है कि एनकाउंटर के बाद 15 दिन तक किसी नेता ने बटला हाउस इलाके में फटकने की हिम्मत नहीं जुटाई। जामिया यूनिवर्सिटी के वीसी मुशीरुल हसन ने जब अपना विरोध अपनी तरह दर्ज कराया तो बीजेपी ने उनको फौरन राष्ट्रविरोधी (antinational) घोषित कर दिया। किसी भी पार्टी ने इस बात के लिए बीजेपी को खुलकर नहीं कोसा कि मुशीरुल हसन किस तरह देशद्रोही हैं। (यह वही मुशीरुल हसन हैं जिन्होंने सलमान रुश्दी की विवादास्पद किताब सैटनिक वर्सेज यानी शैतान की आयतें के खिलाफ फतवा जारी होने के बाद उसका खुलकर विरोध किया था। उस वक्त बीजेपी उनकी सबसे बड़ी हिमायती थी।) जामिया नगर और तमाम मुसलमानों को समझना होगा कि मुलायम सिंह या अमर सिंह जैसे लोग इस मुद्दे को गरमा कर उनका भला नहीं करने जा रहे हैं। क्योंकि न्यायिक जांच की मांग जाने माने बुद्धिजीवियों ने सबसे पहले की थी। जिसमें मशहूर लेखिका अरुंधति राय और कई वकील भी शामिल हैं। अगर केंद्र सरकार में जरा भी दमखम होता तो वह यह घोषणा पहले ही कर सकती थी। लेकिन केंद्र इस घटना को लेकर अपनी खुद की कोई दिशा तय नहीं कर पाई है। उसने दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि जो कुछ वह कह रही है, सही है।
अगर कांग्रेस, बीजेपी और समाजवादी पार्टी मिलकर इस देश के सेक्युलर नेचर (secular nature) को खत्म करना चाहती हैं तो यही सही। मुसलमान ऐसा होने दें। इसका नतीजा अकेले इस देश का मुसलमान नहीं भुगतेगा, सभी को जलना पड़ेगा। इन पार्टियों की जो चाल है, उसे समझना होगा। कांग्रेस चाहती है कि मुसलमान उसकी स्थिति को लेकर पसोपेश में रहे और चुनाव में उसे जिताकर लाए तो वह उसके बारे में सोचेगी। बीजेपी चाहती है कि मुसलमान विरोध को वह इतने चरम पर ले जाए कि यह देश सीधे-सीधे हिंदू-मुसलमान में बंट जाए। याद रखिए कि यही लाइन मोहम्मद अली जिन्ना की भी थी जिसके टाइप राइटर पाकिस्तान नामक देश पैदा हुआ था। उस वक्त उस आदमी ने यही काम किया था। आज बीजेपी उसी लाइन को पकड़े हुए है। मैं तो यही मानता हूं कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी जान-अनजाने उसी की मदद में जुटी हुई हैं।
बेहतर होगा कि ये सारी पार्टियां जामिया नगर ही नहीं देश के बाकी हिस्सों को भी उसके हाल पर छोड़ दें। इन तमाम जगहों का मुसलमान खुद तय कर लेगा कि उसे किस पार्टी को वोट देना है और किसे नहीं।

Saturday, October 18, 2008

नीलम तिवारी की खुदकुशी के बहाने



यह पोस्ट जब मैं आज लिखने बैठा हूं तो माहौल बहुत गमगीन है। इसलिए नहीं कि मेरे साथ, मेरे परिवार, मेरे मित्रों या सहयोगियों के साथ कोई ऐसी-वैसी बात हुई है। दरअसल, कायदे से इसे तो मुझे कल ही लिखना चाहिए था लेकिन कल मैं इतने रंजो-गम (grief and sorrow)में था कि लिखने की ताकत न जुटा पाया। नीलम तिवारी, यही नाम था उसका। राजधानी दिल्ली के द्वारका इलाके में नीलम ने दो दिन पहले खुदकुशी (suicide)कर ली। अखबारों में खुदकुशी की खबरें कितनी जगह पाती हैं, यह आप लोगों को मालूम है। लेकिन यह खुदकुशी की खबर अलग थी और सिर्फ नवभारत टाइम्स में इसे पहले पेज पर जगह मिली थी। नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर पंकज त्यागी ने इस खबर को फाइल करते हुए लिखा था कि आर्थिक मंदी (recession) से जुड़ी राजधानी दिल्ली में खुदकुशी की यह पहली खबर है। पंकज की खबर में कहा गया था कि आईसीआईसीआई बैंक में काम करने वाली नीलम तिवारी लोन दिलाने का काम करती थीं लेकिन आर्थिक मंदी की वजह से उनका यह काम बंद हो चुका था। लोग लोन नहीं ले रहे थे। नीलम द्वारका के एक प्लैट में अपनी बूढ़ी मां और १३ साल की बेटी नेहा के साथ रह रही थीं। उनके पति की काफी पहले एक ट्रेन हादसे में मौत हो चुकी थी। अपने सुसाइड नोट में अपनी बेटी को संबोधित करते हुए नीलम ने लिखा था, बेटी मैं अब हिम्मंत हार चुकी हूं। अब तुमको अकेले ही संघर्ष करना है।
यह खबर यहीं खत्म नहीं हुई। पंकज त्यागी काफी संवेदनशील रिपोर्टर हैं। हुआ यह कि वह कल द्वारका में वहां जा पहुंचे जहां नीलम तिवारी रह रही थीं। वहां पर अत्यंत दयनीय हालत में नीलम की मां और उनकी बेटी मिलीं। न वहां कोई मदद करने वाले थे न कोई हाल-चाल लेने वाला था। पंकज ने मुझे व्यक्तिगत बातचीत में बताया कि कुछ देर तो उन्हें समझ में ही नहीं आया कि वह करें तो क्या करें। अंततः उनकी जेब में जितने भी पैसे थे, वह उन्होंने उस बूढ़ी महिला को सौंप दिए। नीलम की मां का कहना था कि खुदकुशी से पहले दो दिन से उनकी बेटी ने कुछ खाया नहीं था और घर में फाके के हालात थे।
दिल्ली इस घटना के अलावा देश के बाकी हिस्सों से भी इस तरह की खबरें पढ़ने और देखने को मिल रही हैं। लेकिन इस आर्थिक मंदी पर ठीक तरह से बहस न होकर तमाम दूसरी तरफ की बातों पर ध्यान बंटाने की कोशिश एक वर्ग द्वारा जारी है। हाल ही में बीजेपी के प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी के केल दौरे के समय कुछ मुस्लिम पुलिस वालों को उनकी सुरक्षा से हटाने का मुद्दा बीजेपी और बाकी दूसरी पार्टियों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। खुद आडवाणी सफाई भी देते घूम रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा है, साथ ही एक पार्टी पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का भी आरोप लगा रहे हैं। इन नेताओं के लिए आर्थिक हालात कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।
यहां मैं अमेररिका में कराए गए एक सर्वे का उल्लेख करना चाहूंगा। इस सर्वे की रिपोर्ट भारत के सभी अंग्रेजी और कुछ हिंदी अखबारों ने प्रकाशित की है। इस सर्वे को न्यू यॉर्क टाइम्स ने कराया था। सर्वे का विषय था कि अमेरिकी जनता के सामने आज सबसे बड़ा मुद्दा क्या है, आतंकवाद या फिर रोटी-रोजी का सवाल। आतंकवाद को इसलिए सवाल बनाया गया था कि ९-११ की घटना के बाद से राष्ट्रपति ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया था। वह अब तक चुप नहीं बैठे हैं और अब ईरान को सबसे बड़ा आतंकवादी देश और अहमदीनिजाद को लादेन से भी बड़ा आतंकवादी साबित करने जुटे हुए हैं। लेकिन सर्वे में अमेरिकी जनता ने कहा कि बुश की वजह से आतंकवाद हमे ओढ़ना पड़ा और उसकी कीमत हमें भारी टैक्सों के रूप में चुकानी पड़ रही है। इराक में जिस तरह बुश ने सेना भेजी और वह अब तक वहां मौजूद है, उससे अमेरिकी जनता की जेब ढीली हुई है। इसी सर्वे के साथ एक और रिपोर्ट भी सामने आई है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध शुरू होने के बाद हथियार बनाने वाली तमाम अमेरिकी कंपनियों का मुनाफा बढ़ गया है। बहरहाल, आर्थिक मंदी ने अब पूरी दुनिया में लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। देरसवेर अपने देश में भी लोग समझेंगे कि आतंकवाद के खिलाफ छद्म युद्ध बड़ा मुद्दा है या फिर रोटी-रोजी का मसला बड़ा है? पाकिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है, जो आर्थिक मंदी में दिवालिया हो चुका है, अमेरिका की वजह से ही वहां भी आंतरिक आतंकवाद (internal terror)की समस्या पैदा हो गई है। भारत से बदतरीन हालात वहां पर हैं और अमेरिका एशियाई देशों को आतंकवाद से बचाने में अब भी जुटा है। बीजेपी जैसी पार्टियां उसके सुर में सुर मिलाकर चल रही है तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। कांग्रेस जाएगी तो बीजेपी आएगी, अमेरिकी इजारेदारी और दुकानदारी हमेशा फलती-फूलती रहेगी।

Thursday, October 16, 2008

यह संकट और आज के सवाल


अमेरिकी आर्थिक मंदी (US recession) का जिक्र इस ब्लॉग पर पहले किया जा चुका और उससे जुड़ी भारतीय कंपनियों (Indian companies) के प्रभावित होने की बात उसमें कही गई थी। जब मैं यह पोस्ट लिखने बैठा तो तस्वीर पर छाई धुंध धीरे-धीरे साफ होने लगी है और तमाम बुरी खबरों से आपका सामना भी हुआ होगा।
भारत में आई आर्थिक मंदी की सबसे पहली मार उड्डयन उद्योग (aviation idustry) पर पड़ी है यानी वो कंपनियां जो हवाई जहाज उड़ाने के लिए अभी दो-चार साल पहले ही मैदान में उतरी थीं। शराब का कारखाना चलाने वाले, चिटफंड कंपनियां चलाने वाले अचानक हवाई जहाज में यात्रियों को ढोने वाली कंपनी खोलकर बैठ गए। जनता का पैसा था। इनके काम आ गया। प्राइवेट बैंक लोन देने के लिए तैयार बैठे थे। किसान को बिना घूस दिए लोन नहीं मिलता औऱ यहां प्राइवेट बैंक के ceo नई खुली कंपनियों के सीईओ को घूस खिलाने को तैयार थे कि लोन ले ले, हवाई जहाज खरीद लो। भारत के लोगों को सपने बेचो। फिर एक दिन उसको तहस-नहस कर डालो।
भारत को मुट्ठी में बंद करने की जो हसीन शुरुआत देश के कुछ बड़े औद्योगिक घरानों (big industrial houses) ने की थी, उससे अंधो को भी चारो तरफ हरियाली नजर आने लगी थी। लेकिन सपना धूलधूसरित हो चुका है।
यह बात यहां लिखना और कहना सचमुच बहुत आसान है। लेकिन इस मंदी के नतीजे चौतरफा असर डालने जा रहे हैं हमारे-आपके जीवन में। दरअसल, जेट एयरवेज या किंगफिशर ने अपने कर्मचारियों को जो हटाने की शुरूआत की है, वह और भी चीजों पर प्रभाव डालने वाली है।
मैं जौनपुर (यूपी) शहर के एक ऐसे परिवार को जानता हूं, जिसने अपने बेटे को हवाई जहाज में केबिन क्रू की नौकरी के लिए उसकी जो पढ़ाई कराई, उसके लिए बैंक से लोन लिया। एडमिशन लखनऊ में हुआ। जिस कंपनी ने अपना दफ्तर इस काम के लिए खोला था, उसने चमकीले विज्ञापनों से प्रचार किया था कि उसके पास अपना हवाई जहाज है। कई कंपनियों से करार है, नौकरी मिलना तो तय समझो। उस परिवार को लगा कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है। उन्होंने बड़ा कर्ज लेकर अपने बेटे को भेज दिया। बीच में पढ़ाई के दौरान जब उनके बेटे को दिल्ली में किसी flight से ट्रेनिंग के लिए भेजा गया तो उन्हें अपना सपना साकार होता लगा। मुझे भी फोन आया कि जरा दिल्ली में उसको देख लेना। अब इस खबर के बाद जब कल मैंने फोन पर उस लड़के से और उसके परिवार वालों से बात की तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे क्योंकि अगले महीने उसको सर्टिफिकेट मिलना था औऱ एक अच्छी नौकरी। रास्ते बंद हो चुके हैं। कपूरथला (पंजाब) के के मेरे जानने वाले एक सिख परिवार ने अपनी खूबसूरत बेटी को बहुत महंगी फीस भरकर चंडीगढ़ से air hostess की ट्रेनिंग कराई। लड़की को जेट एयरवेज में नौकरी भी मिल गई। वह उन 1900 लोगों में शामिल है जिसे टर्मिनेट किए जाने का लेटर मिल चुका है। कपूरथला के उस सिख परिवार की माली हालत जौनपुर के उस मुस्लिम परिवार से थोड़ा बेहतर है। सिख परिवार से मेरी बात हुई, वे भी स्तब्ध हैं लेकिन उनका कहना है कि वो किसी NRI लड़के से अपनी लड़की की शादी कर देंगे। नौकरी न सही। अब आगे लड़की की किस्मत है।
देश का विकास होना बहुत अच्छी बात है। उस विकास के जरिए अगर तरक्की के रास्ते खुलते हैं तो भी बुरा नहीं है। लेकिन अगर तरक्की की बुनियाद खोखली है, जडों को सींचा नहीं गया है तो वह तरक्की भारी पड़ने लगती है। एविएशन इंडस्ट्री के डूबने का सबसे ज्यादा असर इससे जुड़े बाकी रोजगारों पर पड़ने वाला है। भारत का पर्यटन उद्योग (tourism industry)जो अपने बूते खड़े होने की कोशिश में था, उस पर भी मार पड़ेगी। टूरिज्म इंडस्ट्री से जुड़े बाकी उद्योग जिसमें होटल इंडस्ट्री भी शामिल है, प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगी। यानी यह एक लंबी कड़ी है।
बाजार के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अगला नंबर आईटी इंडस्ट्री का है। हालांकि वहां भी टाटा घराने की कंपनी टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज (tcs) ने 900 लोगों को कई महीने पहले ही बाहर का रास्ता दिखाकर यह शुरुआत कर दी थी। अब इन्फोसिस जैसी बड़ी आईटी कंपनी में पे पैकेट घटाने की बात सोची जा रही है। आईटी कंपनियों का बाजार भी अमेरिका से संचालित होता है। कहीं से कोई उम्मीद की किरण नजर आ रही है। चारों तरफ भयावह हालात हैं। पर, हम लोगों के लिए रोटी-रोजगार अब भी कोई बड़ा मसला नहीं है, हमारे लिए बड़ा मसला धर्म है। बुखारी अच्छा है कि मोदी? हरभजन रावण बने तो उनके साथ मोना सिंह सीता बनकर क्यों नाची? बटला हाउस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के सब इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा शहीद हुए या उनको मारा गया? ये सब सवाल हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि हमे हिंदू-मुसलमान में बांट दिया गया है औऱ हम भी उसी नजरिए से ही एक-दूसरे को देखेंगे। कर लो भाई अपनी-अपनी।

Wednesday, October 15, 2008

तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं


वैसे तो नीचे वाला लेख मैंने यह सोचकर लिखा था कि इसकी भावनाओं को आप लोग अच्छी तरह समंझेंगे। पर कुछ साथी कमेंट देने के दौरान भटक गए या उन्हें बात समझ में नहीं आई। इस लेख पर आए सभी कमेंट में से दो लोगों के कमेंट पर मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। हालांकि इन दोनों लोगों ने अपनी असल पहचान छिपा रखी है और कोई इनका असली नाम नहीं जानता। एक साहब कॉमन मैन बनकर और एक साहब ने नटखट बच्चा के नाम से यहां कमेंट करके गए हैं।
इनका कहना है कि मुसलमान लोग सिमी की निंदा नहीं कर रहे हैं। यह अत्यंत ही सफेद झूठ है। तमाम मुस्लिम नेताओं ने और आम मुसलमानों ने ऐसे तमाम संगठनों की निंदा की है जो आतंकवाद के पोषक हैं। दिल्ली से लेकर मुंबई में प्रदर्शन हुए हैं। शायद इन दोनों भाइयों ने भी वो खबरें चैनलों और अखबारों में फोटो देखेंगे जिसमें आम मुसलमान अपने दो खास ट्रेडमार्क दाढ़ी और टोपी के साथ नजर आ रहा है। आतंकवाद किसी भी रूप में और किसी भी धर्म का निंदनीय है। सिमी के घटनाक्रम पर अगर इन दोनों महानुभावों ने नजर डाली होगी। बैन तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) पर भी लग चुका है लेकिन कोई आज तक साबित नहीं कर पाया कि यह संगठन भी आतंकवाद को बढ़ावा देता है। अदालत में जब मामला चलता है तो वहां सबूत मांगे जाते हैं और महज सतही बातों पर अदालतें फैसला नहीं लिया करतीं। सिमी का मामला भी अदालत में है और अगर सिमी आतंकवाद का पोषक है तो उस पर भला बैन क्यों नहीं लगना चाहिए? जरूर लगना चाहिए। उड़ीसा के संदर्भ में नटखट बच्चा ने अपने कमेंट में मेरा ज्ञान बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने वही बात दोहराई है जो उड़ीसा के सीएम नवीन पटनायक ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में कही थी कि यह दो जनजातियों की लड़ाई है। नटखट बच्चा को शायद यह नहीं मालूम कि मैं उड़ीसा के लोगों और वहां की संस्कृति से बहुत अच्छी तरह वाकिफ हूं। दैनिक जागरण ने पता नहीं कहां से और किस हवाले से वह रिपोर्ट छापी है लेकिन अगर नटखट बच्चा कुछ अंग्रेजी और हिंदी के दूसरे अखबारों (जिसमें द हिंदू अखबार भी शामिल है) को पढ़ ले तो उन्हें सचाई समझ में आ जाएगी। उन अखबारों में लिखने वाले पत्रकार उड़ीसा के ही हैं और उनकी विश्वसनीयता को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। वैसे भी उन लोगों ने अपने असली नाम से वे खबरें लिखी हैं न कि नटखट बच्चा और कॉमन मैन के फर्जी नामों से। फर्जी नामों से आप किसी को भी भी गाली दे सकते हैं। आपको इस लोकतंत्र में पूरा अधिकार है। लेकिन अगर इस लोकतंत्र में पूरी आस्था है तो सामने आकर अपनी बात रखिए, मेरी तरह से। क्योंकि मेरी आस्था किसी राजनीतिक दल या संगठन में न होकर इस पवित्र देश, यहां के लोगों और यहां के संविधान में है। कॉमन मैन ने अपने कमेंट में मेरी सोच पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि बड़े अखबार में काम करने भर से किसी की सोच बड़ी नहीं हो जाती। मैं अब इसका क्या जवाब दूं, यह हमारे पाठक ही तय करें। न तो मैं अपने अखबार को लेकर इतरा रहा हूं और न अपनी सोच को लेकर। मैंने तो आपकी सोच गलत नहीं बताई भाई साहब। न मैं उसको नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा हूं। अब मैं किसी अखबार में अगर नौकरी कर रहा हूं तो भला इसमें बड़ी सोच या बड़ा अखबार कहां से आ जाता है। देश में तमाम ऐसे लोग हैं जो छोटे अखबारों और पत्रिकाओं में हैं और राजधानी दिल्ली के पत्रकार से कम सोच नहीं रखते, शायद उनसे ज्यादा प्रखर हैं। पर, कॉमन मैन जी आप भी तो अपनी सोच बड़ी रखें। आपके ब्लॉग को मैंने देखा, लोगों ने कितनी अच्छी टिप्पणियां कर रखी थीं लेकिन आप अपने फर्जी नाम से ब्लॉग न चलाते होते तो आपका कद और भी बड़ा होता। मेरी भी मैंने आपकी शान में कोई गुस्ताखी की हो तो माफ कीजिएगा।
यह विचारों का प्रवाह है। न तो आप और न हम यहां किसी धर्म या समुदाय की वकालत करने आए हैं। हमारे आसपास जो चल रहा है, अगर आपको लगता है कि वह गलत है तो अपनी बात कहने का हक सभी को है। वही बातें अब लोग ब्लॉग के जरिए कहते हैं। वरना जो बातें आप कॉमन मैन या नटखट बच्चा नाम से लिख रहे हैं क्या कोई अखबार उसको उसी नाम से छापने की हिम्मत जुटा पाता? जीवन में सत्यता और पारदर्शिता लाओ मेरे भाई।

Tuesday, October 14, 2008

धर्म किसका है


अगर इधर आपने अखबारों को गौर से पढ़ा होगा तो यकीनन कुछ सुर्खियां आपकी नजरों से गुजरी होंगी, हालांकि वे बड़ी खबरें नहीं थीं लेकिन कुछ अखबारों में उनको जगह मिली। क्या थी वें खबरें - बिहार में एक मंदिर में प्रसाद चढ़ाने की कोशिश करने वाले एक दलित की हत्या कर दी गई। कई लोग घायल हो गए।
आंध्र प्रदेश का अदिलाबाद इलाका भयानक सांप्रदायिक हिंसा (communal violence) से झुलस रहा है। यहां दो दिनों में 15 लोगों को जिंदा जला दिया गया। मरने वाले सभी लोग मुसलमान थे। इसमें सबसे लोमहर्षक कांड जो हुआ है वह है एक ही परिवार के नौ लोगों को जिंदा जलाने का मामला। ये सारी घटनाएं दुर्गा पूजा से जुड़ी हुई हैं। बिहार की घटना नालंदा जिले में हुई। वही नालंदा जहां कभी ज्ञान की गंगा बहती थी और दुनिया को रास्ता दिखाने वाले विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। वहां के एक मंदिर में प्रसाद चढ़ाने वालों की लाइन लगी हुई थी। लाइन में दलित लोग भी लगे हुए थे। लेकिन उनका नंबर नहीं आ रहा था। लाइन में लगे कारू पासवान ने इस पर पुजारी से आपत्ति दर्ज कराई और कहा कि हमने भी मंदिर में चंदा दिया है। पुजारी ने उसे धमकाया कि पहला हक सवर्णो का प्रसाद चढ़ाने का है। अन्य दलितों ने इस पर घोर आपत्ति जताई। इतने में वहा मौजूद रतन सिंह नामक व्यक्ति ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस गोलीबारी में कारू पासवान मारा गया और कई दलित घायल हो गए। अंततः दलित अपनी देवी दुर्गा को वहां प्रसाद न चढ़ा सके। नालंदा के एसपी विनीत विनायक का कहना है कि रतन सिंह फिलहाल फरार है। रतन का संबंध कथित तौर पर एक भगवा पार्टी से बताया जाता है। किसी अखबार में इस घटना का फॉलोअप नहीं आया कि वहां आगे क्या हालात हैं और रतन सिंह अब भी फरार है या पकड़ा गया।

आंध्र प्रदेश की घटना भी दुर्गा पूजा के आसपास हुई और एक खास इलाके में अब तक सांप्रदायिक हिंसा जारी है। सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाली घटना एक दिन पहले बैंसा कस्बे में हुई जिसमें एक ही परिवार के नौ लोगों को मिट्टी का तेल छिड़ककर जिंदा जला दिया गया। मरने वालों में महिलाएं और बच्चे भी है। प्रशासन का कहना है कि इस घटना के लिए एक भगवाधारी संगठन जिम्मेदार है। बैंसा में यह घटना ठीक उसी तरह की है कि जब उड़ीसा में कई साल पहले एक ईसाई मिशनरी (christian missioneries) ग्राहम स्टेंस को उनके दो छोटे बच्चों के साथ एक वाहन में जिंदा जला जला दिया गया था। उस घटना का दोषी उस भगवाधारी संगठन का नेता अब जेल में उम्रकैद काट रहा है। यहां हम आंघ्र प्रदेश में घटी घटनाओं को एक तरफ रख दें और सिर्फ बिहार में घटी घटना पर ही बात करें तो यह ट्रेंड में हमें किस तरफ इशारा करता है। क्या हम लोग धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ रहे हैं जब धर्म को संचालित करने वाले लोग राजनीतिक पार्टियों या उनके बनाए फ्रंटल संगठनों के होंगे। यानी बीजेपी या प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता जैसा कहेंगे वैसा ही धर्म हर हिंदू को मानना पड़ेगा या मुस्लिम लीग अथवा तालिबान जैसा कहेंगे वैसा ही धर्म मुसलमानों को मानना पड़ेगा।
मेरे इस लिखने का मकसद यह बिल्कुल नहीं है कि मैं यहां कोई दलित अथवा मुस्लिम चेतना जगाने की कोशिश कर रहा हूं। मैं यह सवाल हर उस इंसान से पूछना चाहता हूं कि धर्म का संचालन क्या राजनीतिक दल या उनके बड़बोले नेताओं को करने दिया जाए। आप मुसलमानों से तो उम्मीद करते हैं कि वे बुखारी जैसे मौलानाओं को हाशिए पर भेज दें फिर बाकी नेताओं को हाशिए पर भेजने की अपील क्यों नहीं की जाती। यह पहल तो उसी बहुसंख्यक समाज को करनी होगी जो इस तरह का वातावरण बनते देखना चाहता है। आखिर अगर कोई दलित मंदिर में प्रसाद चढ़ाना चाहता है तो आप उसे क्यों रोकना चाहते हैं। क्या यही आपकी धार्मिक सहिष्णुता (religious tolrance) है?

Monday, October 13, 2008

आखिर ख्वाब का दर बंद क्यों है?



मशहूर शायर शहरयार की यह रचना मुझे इतनी पसंद है कि मैं जब भी इसे पढ़ता हूं, बेहद इमोशनल हो जाता हूं। यहां मैं अपने ब्लॉग पर उस रचना को उन लोगों के लिए पेश करना चाहता हूं जिनकी नजरों से यह नहीं गुजरी है। शहरयार साहब की शायरी मौजूदा वक्त की हकीकत को बयान करती नजर आती है, आप अपने तरीके से इसके बारे में सोच सकते हैं। इस रचना का महत्व इसलिए भी ज्यादा है कि मौजूदा हालात में तमाम शायर और अदीब के लोगों को जो आवाज उठानी चाहिए, वह नहीं उठा रहे हैं। हिंदी और उर्दू में साहित्यकारों की एक लंबी फेहरिस्त है, इनमें से कोई रोमांटिक शायरी में डूबा हुआ है तो कोई इस कदर संवेदनशील हो गया है कि उसको आम आदमी के सरोकार नहीं दिखाई दे रहे हैं। वह अपनी मां, बहन और भाई में अपनी संवेदना के बिम्ब तलाश रहा है। कई लोग तरक्की पसंद होने का दंभ भर रहे हैं लेकिन बड़े मुशायरों और कवि सम्मेलनों में शिरकत से ही फुरसत नहीं है। बहरहाल, शहरयार की कलम न रूकी है न रूकेगी...मुझे तो ऐसा ही लगता है। और हां, शहरयार की यह रचना मैं वाङमय पत्रिका से साभार सहित ले रहा हूं, जहां मूल रूप से इसका प्रकाशन हुआ है। देखिए वो क्या कह रहे हैं...

ख़्वाब का दर बंद है

-शहरयार


मेरे लिए रात ने
आज फ़राहम किया
एक नया मर्हला
नींदों ने ख़ाली किया
अश्कों से फ़िर भर दिया
कासा मेरी आँख का
और कहा कान में
मैंने हर एक जुर्म से
तुमको बरी कर दिया
मैंने सदा के लिए
तुमको रिहा कर दिया
जाओ जिधर चाहो तुम
जागो कि सो जाओ तुम
ख़्वाब का दर बंद है


.............
about this picture:
"Sad Eyes "

This image is derived from a TV documentary called "Beneath the Veil." The reporter was Saira Shah and it has been shown on CNN. This is one of three sisters whose mother was killed before their eyes.

Sunday, October 12, 2008

बोलो, अंकल सैम, पूंजीवाद जिंदाबाद या मुर्दाबाद


एक कम्युनिस्ट देश (communist countries) के रूप में जब रूस टूट रहा था तो उस वक्त अति उत्साही लोगों ने लहगभग घोषणा कर दी थी कि पूंजीवादी देश (capitalist countries) ही लोगों को तरक्की के रास्ते पर ले जा सकते हैं। अमेरिका को इस पूंजीवादी व्यवस्था (capitalism) का सबसे बड़ा रोल मॉडल बताया गया। रूस से टूटकर जो देश अलग हुए और उन्होंने कम्युनिज्म मॉडल को नहीं अपनाया, उन देशों ने कितनी तरक्की की या आगे बढ़े, इस पर कोई चर्चा नहीं की जाती। लेकिन अब अमेरिकी पूंजीवाद के खिलाफ अमेरिका में ही आवाज उठने लगी है। वहां के प्रमुख अखबार वॉशिंगटन पोस्ट में इस सिलसिले में कई लेख प्रकाशित हुए जिसमें मौजूदा आर्थिक मंदी, वहां के बैंको के डूबने की वजह, इराक में जबरन दादागीरी के मद्देनजर पूंजीवादी व्यवस्था को जमकर कोसा गया है। इसके लिए जॉर्ज डबल्यू बुश की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। इतना ही नहीं उसमें कहा गया है कि कहां तो हम रोल मॉडल बनने चले थे और कहां अब हमारा अपना तानाबाना ही बिखर रहा है। हमारी नीतियों की वजह से कुछ अन्य देश भी मंदी (recession) का शिकार हो रहे हैं। कल तक जो देश हमारे लिए एक आकर्षक बाजार (attractive markets) थे, वहां भी लेने के देने पड़ रहे हैं।

अब आइए भारत की बात करते हैं। भारत ने अमेरिका का मॉडल अपनाया या नहीं अपनाया। इस पर हर कोई सहमत नहीं है। काफी सारे लोग इसे मनमोहनॉमिक्स बताते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह व्यवस्था भी पूंजीवाद के इर्द-गिर्द ही है। यहां भी प्राइवेट बैंकों को बढ़ाया गया, रीयल एस्टेट (real estate) का बूम और रीटेल सेक्टर (retail sector) का गुŽबारा इतना फुलाया गया कि कुल मिलाकर इंडिया शाइनिंग और भारत के इकनॉमिक पॉवर (economic power) बनने की बातें की जाने लगीं। प्राइवेट बैंकों की सांसे फूल रही हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है। आईसीआईसीआई बैंक के शेयर कहां पहुंच चुके हैं, यह सामने आ चुका है। इस बैंक को बार-बार बयान देकर अपनी स्थिति साफ करनी पड़ रही है। आज इस बैंक ने अपने कस्टमरों को एसएमएस कर बताया कि आप के डिपाजिट इस बैंक में सेफ हैं, हमारे पास बहुत पैसा है, आप लोग चिंता न करें। रीयल स्टेट को तो जैसे सांप सूघ गया है। मकानों की कीमतें इस ऊंचे दर्जे तक पहुंचाई गईं कि आम लोगों की पहुंच से फ्लैट दूर हो गए। जिन लोगों ने बैंकों से कर्ज लेकर फ्लैट खरीदे थे, उनको किस्तें भारी पड़ रही हैं। रीटेल सेक्टर के जरिए हर छोटे-बड़े शहरों में जो मॉल कल्चर (mall culture) फैलाया गया, वहां अब ग्राहक नहीं हैं। एक कृषि प्रधान देश में एग्रीकल्चर के बजाय मॉल कल्चर का स्तुतिगान होने लगा और सावन के अंधों को चारों तरफ हरियाली नजर आने लगी।

मैं यह नहीं कह रहा कि यह सब अच्छा नहीं था या आगे यह सब चीजें हुईं तो अ'छा नहीं होगा। अब देखिए कि इंदिरा गांधी ने अपने समय में कुछ प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके उन्हें राष्ट्रीयकृत कर दिया। अब अमेरिका वही करने जा रहा है। उसने अपने यहां के कई प्राइवेट बैंकों की सूची बनाई है जिनका अधिग्रहण वहां की सरकार कर लेगी। दरअसल, अपने यहां जो काम पहले किया जाना चाहिए था, वह नहीं हुआ। सबसे पहले अपने देश में इन्फफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की जरूरत थी और उसके बाद हम लोग बाकी चीजों की तरफ बढ़ते। आपने फ्लैट खड़े करवा दिए लेकिन वहां न तो सड़क है और न पीने का पानी। आपने बड़े-बड़े मॉल खुलवाकर अरमानी जैसे ब्रैंड को आने की दावत दे दी लेकिन भारत के जो ब्रैंड अरमानी बन सकते थे, उन्हें आपने आगे नहीं बढऩे दिया। अपने यहां के राष्ट्रीयकृत बैंको को और बढ़ावा देने की जरूरत थी लेकिन आपने ऐसे बैंकों को बढ़ावा दिया, जिनके मालिक साल में एक बार जेल की हवा खा लेते हैं, जिन पर शेयर बाजार को ऊपर नीचे करने का खेल आता है। ऐसे लोगों के बैंक कितने विश्वसनीय हैं, यह इनकी मार झेल रहे कस्टमरों से पूछा जा सकता है। हालांकि इसके साथ यह भी सही है कि प्राइवेट बैंक इसलिए भी तेजी से फैले कि सरकारी बैंकों का रवैया सरकार जैसा ही था। लेकिन ऐसे बैंकों को ठीक करने के लिए आप कानून बना सकते थे। आपने सरकारी बैंकों की नेटवर्किंग देर से शुरू की और प्राइवेट बैंक इसमें बाजी मारते हुए आगे निकल गए। और भी कई ऐसे मोर्चे हैं जहां आपने समाज को अमीर-गरीब में बांटने का काम किया। शिक्षा का क्षेत्र इसमें सबसे प्रमुख है। आज हालात ये हैं कि जिनके पास पैसा होगा, उनके बच्चे ही अच्छी शिक्षा और हायर स्टडी कर पाएंगे। नौकरीपेशा या लोअर मिडिल क्लास (lower middle ) अपने बच्चों को जैसे-तैसे पढ़ा लेंगे लेकिन अच्छी हायर स्टडी उनके लिए भी सपना होगी।
बहरहाल, इन हालात से क्या सबक लिया जा सकता है, यह तो हर एक का व्यक्तिगत मामला है। लेकिन पूंजीवाद की माला जपने वाले और कम्युनिज्म को कोसने वाले इन हालात का विश्लेषण किस प्रकार करेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल तो पूंजीवाद तो हार ही रहा है। बाजार पर नजर रखिए, अभी पूंजीवाद का भांडा अच्छी तरह फूटना बाकी है।

Saturday, October 11, 2008

इस ब्लॉग पर ताजा खबरें भी

आप कुछ सोच रहे होंगे, हम जानते हैं। ब्लॉग पर ताजा खबरें (latest news) आखिर क्यों? मैं आपसे ही पूछना चाहता हूं क्यों नहीं? यह ठीक है कि ब्लॉग पर अपने विचार और यहां आने वाली टिप्पणियों का ही महत्व है तो बाकी ताम-झाम क्यों? दरअसल, मेरी कोशिश है कि आपका ब्लॉग हर नजरिए से परिपूर्ण हो, अगर कुछ पढ़ते-पढ़ते आपको ताजा खबरों की जरूरत महसूस हो तो कहीं और जाने की जरूरत नहीं है, ताजा खबरें वह भी live यहां हाजिर हैं। तमाम अंग्रेजी ब्लॉगों में इस तरह की कोशिश की गई है और उसका feedback भी बहुत बेहतर मिला है। इन खबरों को लेकर अपना कोई नजरिया (opinion)न बनाएं क्योंकि वह सिर्फ सूचना (information) भर हैं, जाहिर है कि इस तरह का डिजिटल मीडिया (digital media)अमेरिका (US) के ही साये में पल और बढ़ रहा है तो हो सकता है कि वह खबर आपके नजरिए से तालमेल न खाए। इसलिए उसे सूचना की ही नजर से देखें। उम्मीद है कि यह डिजिटल कोशिश पसंद आएगी।
क्या करना हैः बस ब्लॉग के दाहिने तरफ देखिए, मेरे प्रोफाइल के ठीक नीचे तमाम विडियो दिखाई देंगे, किसी पर भी क्लिक करके आप अपनी मनपसंद खबर (या सूचना) जान सकते हैं।

Friday, October 10, 2008

...शुक्रिया...

आखिरकार काफी जांच-पड़ताल के बाद 10 अक्टूबर 2008 को blogspot.com ने मेरे ब्लॉग का ताला खोल दिया गया। मैं यही कह सकता हूं कि शुक्रिया। हालांकि उनका यह कदम एकदम फिजूल था, जिसके लिए उन्होंने माफी भी मांगी है लेकिन माफ तो आप लोग ही करेंगे, जिन्हें इसके चलते असुविधा हुई। बहरहाल, सभी का शुक्रिया। तो, फिर एक बार जुटते हैं अपने काम में...

Wednesday, October 8, 2008

क्षमा चाहता हूं


पता नहीं ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम (BLOGSPOT.COM) वालों को क्या लगा कि उन्होंने मेरे ब्लॉग को लॉक कर दिया है। इस दौरान कई लोग आए और यूं ही लौट गए, कुछ ने वहां संदेश पढ़ने के बाद ब्लॉग को explore किया।
माजरा क्या है – ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम को लग रहा है कि इस ब्लॉग पर spaming करने के लिए लिंक दिए गए हैं, क्योंकि सारे लिंक एक ही साइट पर जा रहे थे। दरअसल, यह चिट्ठाजगत की वजह से हुआ, जिसके कई सारे लिंक मेंने यहां अलग-अलग वजहों से दिए थे लेकिन अब एक लिंक को छोड़कर बाकी सब हटा लिया है। ब्लॉग स्पॉट को भी इस बारे में सूचित किया गया है, अब देखना है कि भाई लोग कब ताला खोलते हैं जिससे आपको यहां आने में हो रही असुविधा खत्म हो। बहरहाल, मैं उन तमाम मित्रों का आभारी हूं जिन्होंने मुझे इसके लिए ईमेल किए और रजिया राज़ ने तो असुविधा के बाद भी टिप्पणी लिखी। कृपया सहयोग बनाए रखें।
एक और बात – इस ब्लॉग पर अगर कोई कुछ लिखना चाहता है तो उसका स्वागत है। आप मुझे अपना लेख ईमेल के जरिए भेज सकते हैं। लेख के लिए कोई नीति तय नहीं की गई है लेकिन एक बात जो मैं साफ करना चाहूंगा कि कृपया सामाजिक सरोकार (social concerns)को अगर अपने लेख में जगह देंगे तो मैं आपका एहसानमंद रहूंगा। मैं चाहता हूं कि हम सब लोग मिलकर एक-दूसरे के ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिखें, यकीन मानिए इससे आपके क्षितिज का विस्तार होगा। मसलन, डॉ. अनुराग, प्रदीप मानोरिया, शहरोज और फिरदौस के ब्लॉग पर आने वाले विजिटर अलग-अलग हैं, आपकी बात उनके विजिटर तक पहुंचेगी और आपकी बात उनके विजिटर तक। मेरे इस ब्लॉग के लेखों को लेने का सिलसिला एक वेबसाइट http://medianowonline.com ने शुरू किया है। अभी उन्होंने कंझावला के किसान वाला लेख लिया गया है। वहां से भी लोग बाकी लेख पढ़ने के लिए मेरे इस ब्लॉग पर आ रहे हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि हम सभी Hindi Bloggers के क्षितिज का विस्तार हो। तय आपको करना है।

Monday, October 6, 2008

बच्चे और दम तोड़ती संवेदनहीनता


बच्चों को लेकर समाज संवेदनहीन (Emotionless)होता जा रहा है। बच्चे घर से निकलते हैं स्कूल जाने के लिए और बुरी संगत में पडक़र या तो नशा (Drug Addict) करने लगते हैं या फिर अपराधी गिरोहों के हत्थे चढ़ जाते हैं। शहरों में मां-बाप पैसा कमाने के चक्कर में बच्चों पर नजर नहीं रख पाते जबकि वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन समय नहीं है। दफ्तर से घर और घर से दफ्तर, बीच में कुछ देर के लिए टीवी पर थर्ड क्लास खबरों और प्रोग्राम से समय काटना, बस यही रोजमर्रा की जिंदगी हो गई है। पत्नी अगर वर्किंग नहीं है तो घर के तमाम काम के अलावा बच्चों को संभालना सिर्फ उसके अकेले की जिम्मेदारी है। पिछले दिनों इस तरह की कुछ समस्याओं पर एक समाजशास्त्री (Sociologist) से बात होने लगी। उसका कहना था कि अगर आपकी लाइफ में आटा-दाल-चावल और नौकरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है तो भूल जाइए कि आप अपने बच्चे को किसी मुकाम तक पहुंचा सकेंगे। परिवार नामक संस्था को जिंदा रखना है तो बच्चे का ध्यान रखा जाना सभी की पहली प्राथमिकता होना चाहिए। बच्चा स्कूल जाता है, वहां कभी उसके चेहरे को लेकर तो कभी उसके बाल को लेकर, कभी धर्म और भाषा को लेकर दूसरे बच्चे भद्दा मजाक करते हैं। बच्चे ने घर आकर एकाध बार शिकायत की और आपने अनसुना कर दिया। उसके बाद आपका बच्चा तो स्कूल में तरह-तरह के दबाव में रहता है और आपको पता भी नहीं लगता। उन्होंने एक खास बात यह भी कही कि अगर बच्चे की रुचि किसी खेल (Sports) में नहीं है तो समझिए कुछ गड़बड़ है। कोशिश यह हो कि कम से कम खेल की किसी एक विधा से वह रूबरू जरूर हो। बेशक आप उसे सचिन तेंदुलकर या सुशील कुमार न बना सकें लेकिन ऐसी चीजों की तरफ उसका ध्यान बंटाना जरूरी है।
ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होंगी जो अब आपको अपने खुद के संदर्भ या अपने बच्चे के संदर्भ में जरूर याद आ रही होंगी।
जिस कहानी के लिए मैंने यह पोस्ट लिखी, आइए उसे पढ़ते हैं। नवभारत टाइम्स के रिपोर्टर राजेश सरोहा की सोमवार 6 अक्टूबर को इसी अखबार में एक खबर छपी है जो काफी दहलाने वाली है, उन्हीं की जबानी जानिए उस बच्चे की कहानी...

राजेश सरोहा 12
साल के ढोलू उर्फ मशीन की इन दिनों जेबकतरों के गिरोहों को बड़ी शिद्दत से तलाश है। त्योहारों और शादी-ब्याह का सीजन आते ही मोबाइल चुराने वाले गैंग उसे मुंहमांगे दामों में खरीदते-बेचते थे। ढोलू का स्टाइल भी बड़ा निराला था। वह पूजा या शादी के पंडाल में चकाचक कपड़े पहनकर घुसता और दर्जनभर मोबाइल जेब में लेकर मिनटों में बाहर निकल आता। हाल ही में पुलिस उसे अमरोहा से पकडक़र लाई। इन दिनों वह अपने माता-पिता के पास है। घरवाले परेशान
हैं, क्योंकि उसे गैंग में शामिल करने वाले बदमाशों ने उसके घर के बाहर लाइन लगा रखी है।
ढोलू अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ राजधानी के प्रीत विहार इलाके में रहता है। वह सरकारी स्कूल में सेकंड क्लास में पढ़ता था। बिगड़ैल बच्चों की संगत में उसे फ्लूड का नशा करने की लत लग गई। सात साल की उम्र में पहली बार उसने घर छोड़ा था। शुरू-शुरू में कुछ महीने बाहर रहने के बाद वह घर लौट आता था। ढोलू बताता है कि लत पूरी करने के लिए पहले उसने छोटी-मोटी चोरी शुरू की।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि करीब ढाई साल पहले ढोलू सत्ते और रंजीत नामक जेबकतरों के साथ रहा। इन दोनों बदमाशों ने उससे जमकर जेबतराशी कराई। जनवरी-फरवरी 2007 में उन्होंने ढोलू को एक लाख रुपये में एक अन्य जेबतराश अरविंद उर्फ लंबू को बेच दिया। ढोलू को इस काम में महारत हासिल होती गई। अब सोभी और सिब्बू नाम के दो बदमाश ढोलू को अपने साथ रखना चाहते थे, लेकिन लंबू उसे छोडऩा नहीं चाहता था। इन दोनों ने लंबू की पिटाई की और ढोलू को अपने साथ ले गए। बच्चे का आरोप है कि इन दोनों बदमाशों ने उसे नशा कराकर उसके साथ गलत काम किया। इसके बाद मोबाइल से उसकी फिल्म भी बनाई। बाद में बच्चे को ब्लैकमेल कर जेबतराशी कराई। कुछ समय बाद ढोलू भागकर आलम के पास चला गया। आलम ने 14 अगस्त 2008 को उसे राशिद के हवाले कर दिया। राशिद उसकी खूबियों से अच्छी तरह से वाकिफ था इसलिए उसने दिल्ली में जगह-जगह जेबतराशी कराई। राशिद ने अन्य बदमाशों के साथ मिलकर मंडावली इलाके में दो करोड़ रुपये की डकैती डाली। इस डकैती से उसे20 लाख रुपये मिले थे। वह नकदी और ढोलू को साथ लेकर अमरोहा चला गया। यहां पर ढोलू ने डेढ़ महीने के अंदर 100 से ज्यादा मोबाइल फोन चुराए। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली पुलिस की टीम जब राशिद की तलाश में अमरोहा गई तो वहां उन्हें ढोलू मिला।
ढोलू के पिता जयकिशन भट्ट (बदला हुआ नाम) मूलत: अल्मोड़ा के है। पिछले 12 साल से वह जगतपुरी इलाके में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। वह रिक्शे पर सामान ढोकर गुजारा करते हैं। उनके चार बच्चों में ढोलू दूसरे नंबर का है। इन दिनों वह बदमाशों से परेशान हैं जो आए दिन ढोलू की तलाश में उनके घर के चक्कर काटते हैं। उन्होंने बताया कि दो दिन पहले कुछ बदमाशों ने उसे जबरदस्ती अपने साथ ले जाने की कोशिश भी की थी। लेकिन ठीक वक्त पर पुलिस के आ जाने से बदमाशों को भागना पड़ा था।
मैंने इस खबर (News) को जब पढ़ा तो मेरे होश उड़ गए। आप पता नहीं क्यो सोच रहे होंगे। आपकी आप जाने..

Sunday, October 5, 2008

कंझावला के किसान


राजधानी दिल्ली में एक गांव है जिसका नाम कंझावला है। यहां के किसनों की जमीन (Farmers Land) काफी पहले डीडीए ने अपनी विभिन्न योजनाओं के लिए Aquire कर ली थी। उस समय के मूल्य के हिसाब से किसानों को उसका मुआवजा भी दे दिया गया था। अब दिल्ली सरकार जब उसी जमीन पर कई योजनाएं लेकर आई और जमीन का रेट मौजूदा बाजार भाव से तय कर कई अरब रुपये खजाने में डाला लिए तो किसानों की नींद खुली और उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया।
पहले तो ये जानिए कि दिल्ली के किसान (नाम के लिए ही सही) की स्थिति बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा के किसान जैसी नहीं है, जहां के किसान पर काफी कर्ज है और उसे मौत को गले लगाना पड़ता है। दो जून की रोटी का जुगाड़ वहां का किसान मुश्किल से कर पाता है और धन के अभाव में उसके फसल की पैदावार भी अच्छी नहीं होती है। दिल्ली के किसान तो आयकर देने की स्थिति में हैं, यह अलग बात है कि देते नहीं। आप दिल्ली के किसी भी गांव में चले जाइए, आपको जो ठाठ-बाट वहां दिखेगा, वैसा तो यूपी-बिहार से यहां आकर कई हजार कमाने वालों को भी नसीब नहीं है। सरकार से अपनी जमीन का मुआवजा लेने के बाद दिल्ली के किसान ने जहां-तहां अपनी अन्य जमीन पर या तो दुकानें बना लीं या फिर कई मकान बनाकर उन्हें किराये पर चढ़ा दिया। लेकिन ऐसा वही किसान कर सका जो इस भविष्य पहचानता था। लेकिन बहुत सारे किसान परिवारों ने मुआवजे के पैसे से या तो पजेरो, स्कॉर्पियो जैसी गाडिया खरीद लीं या पैसे को दारू के नशे में बहा दिया। यह तबाही का आलम एक नहीं दो नहीं कई-कई घरों में देखा जा सकता है। कंझावला के किसानों की आवाज को ग्लैमर देने के लिए Bollywood के एक अभिनेता प्रवीण डबास भी आए। डबास ने खोसला का घोसला फिल्म में काम किया है और वह अपनी इमेज भुनाने के लिए इस आंदोलन में शामिल हो गए। आप पूछेंगे प्रवीण का इस गांव से रिश्ता? है न, उनके पिता जी का यह पुश्तैनी गांव है। पिता टीचर थे लेकिन जमीन का मुआवजा मिलने के बाद उन्होंने टीचरी छोड़कर कपड़े की फैक्ट्री खोल ली। इस वक्त वह साउथ दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में रहते हैं जो दिल्ली का अत्यंत पॉश इलाका माना जाता है। लेकिन बेचारे प्रवीण डबास के दिल में किसानों के लिए कितनी हमदर्दी है कि वे मुंबई से भागकर यहां समर्थन करने पहुंचे। मीडिया ने इतनी कवरेज दादरी के किसान आंदोलन को नहीं दी, जितनी कंझावला के किसानों को दे डाली। प्रवीण दिल्ली के मीडिया से वादा करके गए हैं कि मुंबई के बड़े से बड़े स्टार को वह किसानों के बीच ले आएंगे और मुआवजा दिलवाकर रहेंगे।
कंझावला के किसान आंदोलन में इतनी हवा भर दी गई कि वहां के किसान ४ अक्टूबर को सोनिया गांधी की रैली में जा पहुंचे और रैली में अव्यवस्था फैला दी। आंदोलनकारियों ने इस रैली में बुजुर्गों और महिलाओं को इसलिए भेजा था कि पुलिस अगर उन पर डंडा बरसाएगी तो मीडिया सामने होगा और सोनिया की रैली की जगह लीड खबर कंझावला के किसान बनेंगे।
इन बातों को लिखने का आशय यह कतई नहीं है कि मेरी हमदर्दी कंझावला के किसानों के साथ नहीं है या उनका फिर से मुआवजा मांगना गलत है। सिर्फ एक ही बात का मलाल है कि दूर-दराज के किसानों को वह आवाज नहीं मिल पाती जो दिल्ली या आसपास के किसानों को मिल जाती है। दादरी में तो पूर्व प्रधानमंत्री, एक्टर और तमाम नेता तक पहुंच जाते हैं लेकिन अकबरपुर या बेगूसराय के किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

Friday, October 3, 2008

कैसे कहें खुशियों वाली ईद


इस बार की ईद (Eid) कुछ खास थी, इस मायने में नहीं कि इस बार किसी मुल्ला-मौलवी (Clergy) ने इसे खास ढंग से मनाने का कोई फतवा जारी किया था। खास बात जो तमाम लोगों ने महसूस की कि लोग ईद की मुबारकबाद देने के बाद यह पूछना नहीं भूलते थे कि खैरियत से गुजर गई न? पिछले साल की ईद में यह बात नहीं थी। इस बार मस्जिद में ईद की नमाज पढ़ने गए लोग इस जल्दी में थे कि किस तरह जल्द से जल्द घर पहुंच जाएं, दिल्ली की जामा मस्जिद (Jama Masjid) में पहले के मुकाबले ज्यादा भीड़ नहीं थी। जामा मस्जिद, चांदनी चौक, दरियागंज इलाके के व्यापारियों का कहना था कि ईद से तीन दिन पहले वे जो Business करते थे, वह इस बार नहीं हुआ। यानी बिजनेस के नजरिए से नुकसान सिर्फ मुसलमानों का ही नहीं बल्कि हिंदू व्यापारियों का भी हुआ है। साजिश रचने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि एसी घटनाएं किसी एक समुदाय की खुशी या नाखुशी का बायस नहीं बनतीं बल्कि उसकी मार चौतरफा होती है और उस आग में सभी को जलना पड़ता है। कुछ नतीजे जरा देर से आते हैं। बहरहाल, दोपहर होते-होते तमाम गैर मुस्लिम मित्र घर पर ईद की मुबारकबाद देने आए। ये तमाम मित्र जो विचारधारा से कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी थे, इस एक बात पर सहमत थे कि यह कोई बड़ी साजिश है और हो न हो इसका कोई संबंध आने वाले लोकसभा चुनाव से जरूर है। हर कोई अपने ढंग से रिएक्ट कर रहा था। इस दौरान फोन भी आते रहे और हर फोन पर वही बात, सब ठीक है न? कैसी जा रही है ईद? फोन करने वाले तमाम लोगों को लग रहा था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों में कोई ईद मना ही नहीं पा रहा हो। इस बार सीरियल ब्लॉस्ट (Serial Blast) और दिल्ली के जामिया नगर इलाके में हुए विवादास्पद एनकाउंटर ने पूरा माहौल बदल दिया। सीरियल ब्लास्ट से दिल्ली तो खैर सहमी ही हुई है, देश के बाकी हिस्सों में भी लोग डरे हुए हैं। मुस्लिम समुदाय (Muslim Community) के बाकी लोगों ने भी इसका एहसास किया होगा लेकिन यह हालात बने क्यों इस पर विचार करने के लिए कोई तैयार नहीं है। जिन लोगों ने १३ सितंबर शनिवार को दिल्ली के कई इलाकों में बम ब्लॉस्ट कर २४ निर्दोष लोगों की जान ली औऱ इसके बाद दिल्ली के ही एक और इलाके में एक ब्लॉस्ट कर दहशत (Terror) को आगे बढ़ाने की नाकाम कोशिश की गई। उनका मकसद क्या था यह कोई नहीं जानता। मुसलमानों की इमेज पर चोट पहुंचाने की कोशिश में जुटे एसे गुमराह लोगों को क्या इस बात का इल्म है कि इस बार की ईद खुशियों वाली नहीं थी। आखिर वे तमाम लोग किस बात की लड़ाई लड़ रहे हैं और किसके हक की बात कह रहे हैं।

नई दुनिया का शुरू होना

देश में चुनावी माहौल धीरे-धीरे अपने रंग में आ रहा है। कई शहरों में serial blast हो चुके हैं और हिंदू-मुसलमानों के बीच गलतफहमी पैदा करने की कोशिशें परवान चढ़ने लगी हैं। यह सब voting के वक्त फसल काटने की तैयारी का ही हिस्सा है। कुछ इन्हीं हालात में नई दिल्ली New Delhi से एक नए newspaper नई दुनिया का शुरू होना कुछ सुखद अहसास करा गया है। मैं नवभारत टाइम्स में काम करता हूं और आमतौर पर journalism के मक्का दिल्ली में इसका चलन कम ही है कि किसी दूसरे तारीफ की जाए।
मैं अपने hawker को बहुत पहले ही कह चुका था कि मुझे २ अक्टूबर से ही नई दुनिया अखबार चाहिए। eid का त्यौहार होने के बावजूद सुबह सबसे पहले अखबार पढ़ने से ही की। हॉकर ने अपना वादा पूरा किया था।
सबसे पहले नई दुनिया ही उठाया। पहले ही पेज पर प्रधान संपादक आलोक मेहता देश के कुछ अन्य जानी-मानी शख्सियतों के साथ अखबार के पत्रिका की प्रति हाथ में लिए हुए खड़े नजर आए। साथ में गुलजार, जावेद अख्तर, राजेंद्र यादव भी थे। मुझे लगा कि लगता है किसी मंत्री वगैरह ने टाइम नहीं दिया इसलिए किसी बड़े नेता की तस्वीर नहीं लगी है। लेकिन जैसे-जैसे बाकी पन्ने पलटे तो देखा कि सभी आए थे, चाहे वह कांग्रेस, बीजेपी या किसी अन्य पार्टी का हो, जिसमें अर्जुन सिंह, शिवराज पाटिल, मुलायम सिंह यादव, इंद्र कुमार गुजराल, राजनाथ सिंह, कई राज्यों के सीएम वगैरह शामिल थे।
मैंने जिस सुखद अहसास का जिक्र किया, वह यही था कि पहले पेज की तस्वीर में कोई नेता जगह नहीं बना पाया था। उसकी जगह नामी बुद्धजीवियों () ने ली, मेरे जैसे शायद और लोग भी होंगे जो इस बात को पसंद करेंगे लेकिन corporate culture कारपोरेट कल्चर में इन बातों की वैल्यू नहीं है। अब कुछ बात अखबार के कंटेंट content पर। नई दुनिया पर पूरी छाप हमारे नवभारत टाइम्स की ही दिखाई दी लेकिन अखबार के प्रोडक्शन, लेआउट पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया। पहले दिन एकाध तेवर वाली जिन news की तलाश नए पाठकों को रहती है, वह भी नजर नहीं आई। इस लिहाज से कहना यही पड़ेगा कि बाजार में टिकने और जगह बनाने में इसे काफी मेहनत करनी पड़ेगी। हालांकि मध्य प्रदेश, जहां से इस अखबार की शुरुआत हुई, वहां यह काफी सम्मानित नाम है और स्व. राजेंद्र माथुर जी से कई बार इस अखबार के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। लेकिन दिल्ली big market है और यहां टिके रहने की अपनी शर्ते हैं। बहरहाल, आलोक मेहता जी के पास जरूर कोई न कोई योजना होगी, जिसका खुलासा उन्होंने सार्वजनिक रूप से तो नहीं किया है। लेकिन हम जैसे जिज्ञासु लोगों को उसका इंतजार तो जरूर रहेगा।

हम हिंदी ब्लॉगर्स







हिंदी में ब्लॉगिंग (blogging in hindi) न करने का अफसोस मुझे लंबे अरसे से रहा है। तमाम मित्रों ने मेरे कहने पर ब्लॉग शुरू किए और काफी बेहतर ढंग से अब भी कर रहे हैं लेकिन मैं उनसे किए गए वायदे के बावजूद इसके लिए वक्त नहीं निकल पा रहा था। बहरहाल, अब किसी लापरवाही की आड़ न लेते हुए मैंने फैसला किया कि अपनी मातृभाषा में तो ब्लॉगिंग करना ही पड़ेगी। हिंदी में जिस तरह से रोजाना नए-नए ब्लॉग आ रहे हैं, उससे हिंदी काफी समृद्ध हो रही है और मेरी कोशिश भी उसमें कुछ योगदान करने है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हिंदी के ब्लॉगों में लिखा क्या जाए? कुछ बहुत बेहतर ब्लॉग हैं जहां तमाम राजनीतिक.सामाजिक और धार्मिक विषयों पर बहस होती है लेकिन कतिपय पत्रकारों द्वारा चलाए जा रहे हैं इन ब्लॉगों का क्या कुल मकसद यही है। आखिर English में विभिन्न विषयों में जो ब्लॉग हैं और जिनको खूब पढ़ा भी जाता है, वैसा कुछ हिंदी में क्यों नहीं है? हालांकि हिंदी में कुछ अच्छी पहल हुई है जिसमें आर. अनुराधा (लिंक – http://ranuradha.blogspot.com) का कैंसर पर पहला एसा ब्लॉग है जो हिंदी में है और कैंसर के मरीजों को संघर्ष की प्रेरणा देता है। लेकिन हिंदी में इस तरह के प्रयोग ऊंगलियों पर ही गिनने लायक हैं। आप यकीन करेंगे कि अंग्रेजी में एसे भी ब्लॉग हैं जहां बच्चों को आर्ट वर्क करने के लिए प्रेरित किया जाता है। एक ब्लॉग मुझे एसा भी मिला जिसमें बच्चे के स्कूल से आने के बाद मां उससे पूरी जानकारी लेती जैसे teacher ने कोई खास comment तो नहीं किया, किसी बच्चे ने उसके लंच पर टिप्पणी तो नहीं की वगैरह और अगर नई स्थिति सामने आने के बाद उस पर अपना observation देते हुए टिप्पणी। एक रोचक घटना का जिक्र यहां करना चाहूंगा। जिसमें एक भारतीय बच्चे का उल्लेख था कि उसने अपनी भारत यात्रा में कहीं देखा था कि जब fire brigade की गाड़ी का सायरन वहां गूंजता है तो समझो कि फायरमैन उस गाड़ी में खाना खा रहे हैं जबकि उसके क्लासमेट ने यूएस के फायर ब्रिगेड का जिक्र करते हुए वहां की गौरवगाथा सुना डाली। उस महिला ने इस बात को गंभीरता से लिया और बच्चे का brainwash करने में पूरा समय दिया कि भारतीय फायर ब्रिगेड के लोग भी उतने ही बहादुर होते हैं और भारत में फायर ब्रिगेड की गाड़ी का सायरन बजने का मतलब यह नहीं है कि फायरमैन खाना खा रहे हैं और आराम फरमा रहे हैं। उसके बाद वह मां बच्चे को खासकर वैकेशन प्लान करके भारत ले आई और फायरब्रिगेड की पूरी working समझाई। बच्चे को भी कुछ समझ में आया और उसने बिना मौका गंवाए अपने स्कूल में जाकर छोटी-मोटी स्पीच दे डाली। आप जानते हैं कि उस पोस्टिंग के कारण ब्लागर में उसे Blog of the note का दर्जा दिया। कहने का आशय यह है कि Hindi Bloggers को भी कुछ इसी तरह की कोशिश करनी पड़ेगी, नए-नए विषयों को सामने रखना होगा, तब हिंदी को और आगे बढ़ाया जा सकेगा। मेरी भी कोशिश रहेगी कि पोस्टिंग का सिलसिला बराबर जारी रहे और तमाम बहस-मुबाहिसों को जगह देने के बावजूद नए विषयों को touch किया जाए। देखते हैं कोशिश कितनी कामयाब रहती है...