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Sunday, July 31, 2016

एक महीने बाद फराज का बांग्लादेश

...मेरा ये लेख आज के नवभारत टाइम्स लखनऊ संस्करण में प्रकाशित हो चुका है। ईपेपर का लिंक लेख के अंत में है।...


बांग्लादेश में एक महीने बाद भी लोग ढाका के रेस्तरां में हुए हमले से उबर नहीं पाए हैं। 1 जुलाई 2016 को यहां आतंकवादियों के हमले में 28 लोग मारे गए थे। इन्हीं में था बांग्लादेशी स्टूडेंट फराज हुसैन, जिसने अपने साथ पढ़ने वाली भारतीय लड़की को बचाने के लिए जान दे दी। फराज का परिवार दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली आतंकी घटना पर अभी भी सिहर उठता है। फराज के बड़े भाई जरेफ हुसैन ने फोन पर ढाका से एनबीटी से कहा कि ...लगता है कि आईएस के आतंकियों ने इस्लाम का अपहरण कर लिया है और वो कोई पुराना बदला चुकाने के लिए लोगों को मार रहे हैं।

जरेफ हुसैन कहते हैं कि जब हमसे हमारी सबसे प्यारी चीज ही छीन ली गई तो बताइए ऐसे आतंकियों के लिए हम क्यों दिल में साफ्ट कॉर्नर रखें। इन आतंकियों ने सिर्फ हमारे परिवार को मुश्किल में नहीं डाला है बल्कि पूरे इस्लाम को ही खतरे में डाल दिया है। आईएस आतंकियों का मकसद लोगों को मार कर धर्म को मजबूत करना नहीं है बल्कि वो इसकी आड़ में इस्लाम को ही बर्बाद कर देना चाहते हैं।

उनका कहना है कि बांग्लादेश भी एक सेकुलर मुल्क है। हमारा कल्चर भारत के पश्चिम बंगाल से मिलता है। हम लोग बांग्ला बोलते हैं। बांग्लादेश में कितने ही भारतीय बिजनेसमैन आकर बिजनेस करते हैं। न उन्होंने कोई फर्क समझा न हमने कोई फर्क समझा। कट्टरपन किसी भी मुल्क को हर तरह से बर्बाद कर देता है। 1 जुलाई की घटना ने बांग्लादेश की छवि को धूमिल कर दिया है।

इस घटना के बाद बांग्लादेश के लोगों में एक बड़ा बदलाव आया है। यहां का पढ़ा-लिखा और मध्यवर्गीय तबका विदेशियों को हमदर्दी की नजर से देखता है। अमेरिकन इंटरनैशनल स्कूल ढाका के टीचर रसेल विलियम्स ने फराज हुसैन, तारिषी जैन और अंबिता कबीर को पढ़ाया है। वो बताते हैं कि घटना के दो दिन बाद जब वो अमेरिकन क्लब जा रहे थे तो रास्ते में एक एटीएम पर पैसा निकालने के लिए रुके। इतने में बगल की मशीन पर एक बांग्लादेशी युवक भी आकर पैसा निकालने लगा। हम दोनों साथ-साथ बाहर निकले। बाहर आकर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा कि आई एम सॉरी। ...लगा कि जैसे अभी रो देगा। फिर बोला, प्लीज हमें माफ कर देना। हमारा बांग्लादेश ऐसा नहीं है।...उस युवक को मैं नहीं जानता हूं। लेकिन लगता है कि वो शख्स आम बांग्लादेशी मुसलमान का प्रतिनिधित्व करता है।...वो जानता है कि आतंकवाद की एक आम इंसान को और उसके देश को क्या कीमत चुकानी पड़ती है।

रसेल ने फराज हुसैन को याद करते हुए कहा कि वह सही मायने में एक अच्छा मुसलमान लड़का था। उसने तारिषी और अंबिता को बचाने के लिए वही किया जो एक अच्छे मुसलमान को करना चाहिए था। उसके एक्शन से पता चलता है कि वो एक अच्छे कल्चर और एक अच्छी फैमिली से आया हुआ मुसलमान लड़का था। मुझे यकीन नहीं होता कि कैसे लोग आम मुसलमानों के बारे में गलत धारणा बना लेते हैं। आतंकवादियों के साथ इस्लाम या हर मुसलमान को जोड़ना न सिर्फ गलत है बल्कि बेवकूफी भी है। रसेल कहते हैं कि ढाका के उस रेस्टोरेंट में जब आतंकवादी अल्लाह-ओ-अकबर कहते हुए सबको मार रहे थे और कुरान की आय़त सुनाने को कहते थे तो फराज ने भी आयत सुनाई। आतंकियों ने उसे जाने को कहा लेकिन उसने साफ कहा कि वो तारिषी और अंबिता को छोड़कर नहीं जा सकता। उन्होंने तीनों का मार दिया। ...सोचकर देखिए। अपनी जान किसको नहीं प्यारी होती। वो चाहता तो खुद को बचा लेता। उसे पता था कि कोई उसे उन दोनों की मौत का जिम्मेदार नहीं ठहराएगा। लेकिन उसके धर्म ने उसे बताया था कि किसके साथ खड़े होना है और वो इंसानियत के साथ खड़ा रहा।

फराज को हाल ही में मिलान (इटली) की एक संस्था गार्डेन आफ राइटियस ने मरणोपरांत सम्मानित किया है। फराज की मां सिमीन हुसैन ने उस संस्था को लिखे पत्र में खुद को प्राउड मदर आफ फराज लिखा है। सिमीन हुसैन बांग्लादेश की सबसे बड़ी दवा कंपनी इस्कायफ (Eskayef) की एमडी व सीईओ हैं। वह कहती हैं कि मैं प्राउड इसलिए महसूस करती हैं कि मेरा बेटा दूसरों के लिए जीया, अपने लिए। वो बहादुरी से शहीद हुआ। वो धर्म की आड़ में वहां से मुंह छिपाकर भागा नहीं। ऐसे बहादुर बेटे की मां को न सिर्फ प्राउड है, बल्कि मैं दुनिया की ऐसी सबसे खुशनसीब मां हूं, जिसने उसे जन्म दिया।...जिंदगी तो चलती रहेगी लेकिन मेरा फराज उन अमानवीय आतंकियों के मुंह पर तमाचा मारकर चला गया।

बता दें कि फराज के नाना का बांग्लादेश का सबसे बड़ा बिजनेस एंपायर ट्रांसकॉम ग्रुप (Transcom Group) के नाम से जाना जाता है। जिसके तहत 30 कंपनियां आती हैं, जिनमें करीब दस हजार लोग काम करते हैं। इन कंपनियों को फराज का परिवार भी संभालता है।


नोट ः ये लेख नवभारत टाइम्स लखनऊ संस्करण में आज प्रकाशित हुआ है..वहां पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं...




Sunday, July 17, 2016

सोशल मीडिया का अनसोशल खेल


जिस सोशल मीडिया (Social Media) की बदौलत सरकारें गिराने और बदलने के दावे कल तक किए जा रहे थे, वो दावे अब खाक होते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म की लगभग सारी साइटों को चूंकि बिजनेस करना है, इसलिए उन्हें अलग-अलग देशों में वहां की सरकार के सामने घुटने टेकने पड़ रहे हैं। हाल ही में फेसबुक (Facebook) और ट्विटर ने अपनी साइट से 70 फीसदी ऐसा कंटेंट हटाया है जो इस्राइल के खिलाफ फलस्तीन के संघर्ष को बताता है। इस्राइल (Twitter) की कानून मंत्री आयलेट शाकेड ने वहां की संसद में हाल ही में घोषणा की कि आखिरकार हम अपने मकसद में कामयाब हो गए। फेसबुक और ट्विटर 70 फीसदी फलस्तीनी कंटेंट हटाने को राजी हो गए हैं।

उन्होंने संसद में जो लाइन पढ़ी, उसमें कहा इस्राइल को फेसबुक, ट्विटर और गूगल (Google) से काफी सहयोग मिला है और हमें ये कहते हुए खुशी हो रही है कि तमाम सोशल मीडिया साइटों से इस्राइल विरोधी लाखों पोस्ट, अकाउंट, विडियो हटा दिए गए हैं। आयलेट की घोषणा से पहले ये आऱोप लगते रहे हैं कि फेसबुक, ट्विटर के अलावा गूगल पर इस बात का दबाव है कि वो अपने-अपने प्लैटफॉर्म औऱ सर्च इंजन (Search Engine) से उस कंटेंट को हटाए जिनसे लोगों को फलस्तीनी संघर्ष को लेकर सहानुभूति न पैदा हो। ज्यादातर कंटेंट का संबंध इस्राइली सेना का फलस्तीनियों पर किए जा रहे जुल्म से संबंध था। फलस्तीनी बच्चों की बेरहमी से पिटाई, उनको गोली मारने जैसे विडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध थे। हालांकि फेसबुक, ट्विटर बीच-बीच में घोषणा करते रहे कि वे किसी भी सरकार के आगे नहीं झुकते हैं। लेकिन इस्राइली कानून मंत्री की घोषणा का खंडन अभी तक इन साइटों ने नहीं किया है।

 इस घटनाक्रम से पहले इस्राइल ने सैकड़ों की तादाद में ऐसे फलस्तीनियों की गिरफ्तारी की, जिनका फेसबुक या ट्विटर अकाउंट था। ये लोग इस्राइली कब्जे वाले फलस्तीनी इलाके में रहते हैं। बेथलहम जिले में इस्राइली कब्जे वाले वेस्ट बैंक की माजिद यूसिफ अटवन (22) को उसके फेसबुक पोस्टों की वजह से 45 दिन जेल की सजा सुनाई गई और 794 यूएस डॉलर का जुर्माना लगाया गया। अटवन को 19 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था। अटवन मूलतः स्वतंत्र फोटोग्राफर हैं और उन्हें फोटो खींचने के दौरान इस्राइली सेना की जो बेरहम नजर आती थी, वे बहुत आसानी से उसको फेसबुक पर बयान कर देती थीं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक इस्राइल ने सैकड़ों की तादाद में इंटरनेट (Internet) मॉनिटर करने वाले कर्मचारियों को रखा हुआ है जो इस तरह की सूचनाएं जमा करते हैं या उसे काउंटर करते हैं। फेसबुक, ट्विटर, गूगल ने बिना किसी पड़ताल के इन्हीं कर्मचारियों की सूचना पर ऐसे सारे कंटेंट हटाए। फलस्तीन के स्वतंत्र फोटो जनर्लिस्ट निहाद तवील का फेसबुक अकाउंट देखेंगे तो पाएंगे कि उनके फेसबुक अकाउंट से काफी तस्वीरें गायब हो गई हैं। देश-विदेश के तमाम पत्रकार निहाद की फेसबुक वॉल पर जाकर उन तस्वीरों के माध्यम से फलस्तीन की असली तस्वीर देखते थे। हम उस फलस्तीन को जान लेते थे जिसे पश्चिमी मीडिया इस्राइल के प्रभाव में दुनिया को बताना नहीं चाहता। लेकिन अब सोशल मीडिया का प्लैटफॉर्म भी कुंद कर दिया गया है।

 

फेसबुक, ट्विटर सिर्फ इस्राइल के ही दबाव में नहीं आए हैं। वे भारत में भी अक्सर दबाव में आ जाते हैं।

स्क्रिट राइटर. प्रोड्यूर और स्टैंडअप कॉमिडियन तन्यमय भट का लता मंगेशकर का मजाक उड़ाने वाला विडियो जब एआईबी ने मई में जारी किया तो मुंबई पुलिस ने फेसबुक, गूगल और यूट्यूब से आग्रह किया कि इस विडियो को हटा दिया जाए। इससे करोड़ों भारतीयों की भावनाएं आहत हो रही हैं। यह तो पता नहीं कि फेसबुक, गूगल और यूट्यूब ने इस पर क्या स्टैंड लिया लेकिन वो विडियो गायब हो गया। पता नहीं इसे फेसबुक और यूट्यूब ने खुद हटाया या फिर एआईबी ने हटाया लेकिन इस पर फेसबुक ने कभी जबान नहीं खोली।

पिछली कांग्रेस सरकार के समय जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह औऱ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के फोटोशॉप से बनाए गए चित्र, विडियो और कॉर्टून फेसबुक पर ज्यादा आए, उस वक्त भी भारत सरकार ने फेसबुक से शिकायत की थी। उसके बाद उनमें कमी आ गई थी। उस वक्त मौजूदा बीजेपी विपक्ष में थी और उसने सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत बेहतर ढंग से किया था। आज भी यह कहा जाता है कि बीजेपी की जीत में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी अमेरिका यात्रा के दौरान सिलकॉन वैली में फेसबुक के मुख्यालय भी जा पहुंचे थे। यह मुलाकात तो एक बहाना थी, फेसबुक ने नेट न्यूट्रिलिटी का अभियान छेड़ा हुआ था। भारत में लोग मान चुके थे कि फेसबुक अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा लेकिन भारत में इस अभियान के विरोध में चले अभियान के बाद फेसबुक को झुकना पड़ा।

खतरे और भी हैं

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अगर भारत में विदेशी सोशल मीडिया के जवाब में यहां का सोशल मीडिया खड़ा करने की कोशिश होगी, तो भी उसकी वो धार नहीं रहेगी जो फेसबुक, ट्विटर और दूसरे साइट्स की हैं। सर्च इंजन की ताकत गूगल, माइक्रोसाफ्ट और याहू के पास है। अगर आपकी साइट इन तीनों सर्च इंजन में नहीं है को आप कहीं नहीं हैं। आप चाहे जितनी टॉप क्लास साइट बना लें। कुल मिलाकर सोशल मीडिया के गेम बड़े खिलाड़ी खेलेंगे। इसमें कभी समझौते होंगे तो कभी धमकी भी दी जाएगी। आप फेसबुक, ट्विटर पर कुछ भी पोस्ट करके भले ही मुगालता पाले रहें।

Tuesday, July 12, 2016

पैकेज किसी और का, जाकिर नायक सिर्फ सेल्स एजेंट

नोट ः मेरा यह लेख आज (12 जुलाई 2016) नवभारत टाइम्स के सभी संस्करणों में प्रकाशित हो चुका है। हिंदीवाणी के पाठकों के लिए इसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है...

कुछ आतंकवादी घटनाओं के बाद सरकारी एजेंसियों और मीडिया की नजर इस्लाम की वहाबी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने वाले कथावाचक टाइप शख्स जाकिर नायक की तरफ गई है। उनके खिलाफ जांच भी शुरू हो चुकी है, जिसका नतीजा आना बाकी है। हालांकि जाकिर नायक ने ढाका की आतंकी घटना के कई दिन बाद मक्का में उसकी निंदा की और कहा कि इस्लाम किसी की जान लेने की इजाजत नहीं देता है।

जाकिर नायक ने अपने बचाव में उसी इस्लाम और धार्मिक पुस्तक कुरान का सहारा लिया जिसकी आयतों की मीमांसा (तफसीर) को वो अभी तक तोड़ मरोड़कर पेश करते रहे और तमाम युवक-युवतियां उसे सुन-सुनकर उसी को असली इस्लाम मान लेने में यकीन करते रहे। हर धर्म के युवक-युवतियों के साथ ऐसा छल उस धर्म के कथावाचक पिछले कई दशक से कर रहे हैं, जिसमें धर्म तो कहीं पीछे छूट गया लेकिन खुद के बनाए सिद्धांत को आगे रखकर किसी खास विचारधारा का प्रचार प्रसार करना उसका मुख्य मकसद हो गया।

कुरान अरबी में है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश की मूल भाषा और जबान अरबी नहीं है। बहुत सारे लोग कुरान पढ़ लेते हैं और उसकी मीमांसा की जानकारी भी अनुवादों के जरिए पा लेते हैं लेकिन गहराई से उसके अर्थ और संदर्भ को पकड़ पाने में असमर्थ रहते हैं। इस्लाम के विभिन्न फिरकों के कुछ उलेमा कुरान की आयत पढ़कर उसे अपने सिद्धांत से जोड़ते हैं और फिर उनकी अपनी विचारधारा का अजेंडा शुरू हो जाता है।

सचमुच कुरान एक ऐसी किताब है जिसकी सही तफसीर अगर आप पढ़ लें और संदर्भ को जान लें तो आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे। लेकिन जब उसे आप किसी सलाफी, किसी बरेलवी, किसी देवबंदी, किसी शिया, किसी इस्माइली, किसी अहमदिया, किसी सूफी आलिम से सुनेंगे तो वो अपने सिद्धांत की चाशनी में उस मीमांसा को पेश करता नजर आएगा।

सऊदी अरब के बाद सलाफी विचारधारा को फैलाने का सबसे बड़ा केंद्र पाकिस्तान है। जाकिर नायक का तो बस छोटा सा रोल है जो उन्हें करने के लिए दिया गया है। पाकिस्तान में जनरल जियाउल हक के वक्त में सलाफी विचारधारा को सरकारी संरक्षण भी मिल गया। जो जुल्फिकार अली भुट्टो के रहते नहीं मिल सका था। इसके बाद सलामी विचारधारा के मौलवियों ने पाकिस्तान में शिया, अहमदिया, इस्माइली, सूफियों को काफिर करार दे दिया और इनके खिलाफ फतवे जारी कर दिए। इसके बाद इन धार्मिक अल्पसंख्यकों का पाकिस्तान में कत्लेआम शुरू हो गया।

आप जाकिर नायक सरीखों का प्रवचन उनके टीवी पर सुनिए या कोई विडियो देखिए। आप कहीं से उनको आतंकी समर्थक साबित नहीं कर पाएंगे लेकिन वो भाई साहब जो संदेश देते हैं, उनके जो संदर्भ या छिपे हुए निहातार्थ होते हैं, उनके टारगेट आडियंस तक पहुंच जाते हैं।

इस कथावाचक की हिप्पोक्रेसी देखिए। जिस शख्स ने ओसामा बिन लादेन को हीरो बताया हो, वो अब ढाका हमले पर घड़ियाली आंसू बहा रहा है। कई साल पहले जाकिर नायक को संचालित करने वालों ने काफी पैसा खर्च कर मुंबई में एक आयोजन किया। इस आयोजन में जाकिर नायक ने यज़ीद को रजी अल्लाहताला बता डाला। ये यज़ीद वही है जिसकी वजह से करबला का संघर्ष हुआ। जिसमें पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हुसैन इब्ने अली और उनके साथ 71 अन्य निर्दोष लोगों को शहीद कर दिया गया। पैगंबर के परिवार के साथ हुई इस नाइंसाफी पर शिया-सुन्नी आलिम और इतिहासकार एकमत हैं। करबला का संग्राम इस्लाम का टर्निंग पॉइंट है। यजीद की प्रशंसा में जाकिर के उस बयान पर पूरे विश्व में सुन्नी, शिया और सूफियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।

 इसके बाद ब्रिटेन, कनाडा औऱ मलयेशिया में उनके जाने पर रोक लग गई। शिकायत के बावजूद मुंबई पुलिस जाकिर के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मुकदमा आज तक दर्ज नहीं कर सकी। जाकिर को सऊदी अरब के राजघराने ने सबसे बड़ा सम्मान प्रदान कर रखा है और वो जब भी रियाध या मक्का समेत सऊदी अरब के किसी भी शहर में जाते हैं तो शाही मेहमान बनते हैं। यह जुगलबंदी अपने आप में काफी कुछ बताती है।

सवाल यह है कि भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में रहने वाले मुसलमानों का एक खास तबका आखिर जाकिर नायक टाइप कथावाचकों के प्रभाव में कैसे आ रहा है। इसकी वजह यह है कि मुसलमान मस्जिदों में या घरों में नमाज तो पढ़ लेता है लेकिन जिन मौलाना लोगों पर जिम्मेदारी है कि वे इन मुसलमानों को यूनिवर्सल या ग्लोबल मुसलमान बनने के लिए तैयार करें...प्रगतिशील इस्लाम के बारे में बताएं। इस्लाम के इतिहास की सही जानकारी दें। इसके बजाय वे मुसलमानों के ही दूसरे फिरकों की बुराई करते नजर आते हैं। उनकी कमियां गिनाते हैं। इसके बाद वही युवक जब थ्री पीस और टाई लगाए जाकिर नायक से दुनियावी बातें सुनता है तो फौरन उनसे प्रभावित हो जाता है। जाकिर नायक की महीन बातों में आप आतंकवाद कभी तलाश नहीं कर पाएंगे।  

अपनी बात को मैं प्रो. मुशीर-उल-हक के शब्दों में कहना चाहूंगा। वो कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर मुसलमान मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटे हैं। एक छोटा तबका है जिसे तिरस्कार से धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है, जिनका मानना है कि एक आस्था के रूप में मजहब का सेक्यूलरिज्म के साथ सहअस्तित्व संभव है। दूसरे समूह का नेतृत्व ऐसे उलेमा करते हैं जिनका दृढ़ विश्वास है कि मजहब सिर्फ आस्था ही नहीं, शरीयत भी है और शरीयत का सेक्यूलरिज्म के साथ सह-अस्तित्व नामुमकिन है।

पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश में फैल रही किसी भी धर्म की धार्मिक कट्टरता पर नजर दौड़ाइए तो प्रोफेसर साहब की यह बात तीनों ही देशों के मामले में पूरी तरह फिट बैठती है। शरीयत की जगह आप दूसरे धर्मों की कट्टरता, खानपान-पहनावे को लेकर तरह-तरह के आग्रह, पूजा स्थलों का इस्तेमाल आदि को शामिल कर सकते हैं। मेरा मानना है कि इन्हीं आग्रहों ने तीनों ही देशों में तमाम लोगों के विचारों को आक्रामक बना दिया है। 

धार्मिक रूप से आक्रामक बना दिए गए लोग एक डिब्बाबंद आस्था या पैकेज्ड आस्था में विश्वास करने लगते हैं। उस पैकेज को कोई और तैयार करता है। एक धर्म का इस्तेमाल दूसरे धर्म के विरोध के लिए किया जाता है। मानों दूसरा धर्म बना ही विरोध के लिए है। हकीकत ये है कि हर धर्म की उदारता का उसके कथावाचक टाइप लोगों ने अपहरण कर लिया है और इसकी जगह वे पैकेज्ड आस्था की मार्केटिंग कर रहे हैं। मार्केंटिंग के स्टेक होल्डर पर्दे के पीछे हैं।


--यूसुफ किरमानी

Sunday, July 3, 2016

जिहाद का गेटवे

नोट ः नवभारत टाइम्स, दिल्ली में  03 जून 2016 के अंक में प्रकाशित मेरा आलेख

अमेरिका के अरलैंडों, फ्लोरिडा से लेकर इस्तांबुल के अतातुर्क एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले के पीछे इस्लामिक स्टेट का नाम सामने बार-बार आया है। अमेरिका में 9/11 के बाद वहां के बारे में दावा किया गया था कि अमेरिका ने अपनी सुरक्षा इतनी मजबूत कर ली है कि वहां अब कुछ भी होना नामुमकिन है। लेकिन हाल ही में हुई घटनाओं ने इस सुरक्षा कवच की धज्जियां उड़ा दीं। आखिर कैसे आईएस इतना मजबूत होता जा रहा है और दुनिया की सारी सुरक्षा एजेंसियां उसके सामने बौनी साबित हो रही हैं।   

अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इंस्टिट्यूट फॉर द स्टडी आफ ह्यूमन राइट्स के डायरेक्टर डेविड एल. फिलिप्स ने एक रिसर्च पेपर जारी किया है, जिसमें कुछ कड़ियों को जोड़ते हुए जवाब तलाशने की कोशिश की गई है। डेविड अमेरिकी विदेश मंत्रालय में बतौर विदेशी मामलों के विशेषज्ञ के रूप में नौकरी भी कर चुके हैं। वह कई थिंक टैंक से भी जुड़े हुए हैं।
उनके रिसर्च पेपर के मुताबिक तुर्की का बॉर्डर आईएस और दूसरे आतंकी संगठनों के बीच जिहाद का गेटवे के रूप में जाना जाता है। 

आतंकवादियों का यह कोर्ड वर्ड बताता है कि तुर्की के बॉर्डर का नियंत्रण किस तरह किया जा रहा है। जिहाद की आड़ लिए हुए आतंकी जब तुर्की का बॉर्डर पार करते हैं तो या तो तुर्की सेना के जवान अपनी नजरें फेर लेते हैं या फिर बॉर्डर गार्ड 10 यूएस डॉलर लेकर उन्हें सीमा पार करा देते हैं। ऐसा नहीं हो सकता है कि तुर्की सरकार की जानाकारी के बिना इतने बड़े पैमाने पर ये खेल खेला जा रहा है। 2011 में लीबिया में गद्दाफी की सरकार का खात्मा करने के बाद बड़े पैमाने लीबियाई सेना के हथियार लूट लिए लिए गए थे। यही हथियार तुर्की के रास्ते सीरिया पहुंचाए गए। यही गेटवे पूरी दुनिया में आईएस के आतंकवादियों के भेजने का रास्ता भी है। तुर्की जब चाहे इस गेटवे को बंद करके आईएस की कमर तोड़ सकता है लेकिन उसने अभी तक ऐसा नहीं किया। तुर्की एक नाटो देश है। यूरोपियन यूनियन में है। क्या नाटो देश जिनकी सेना अफगानिस्तान में आतंकवादियों को खत्म करने के लिए तैनात हैं, वो इस गेटवे से अनजान हैं। यह कोई बड़ी साजिश लगती है।

....और वो रैट लाइन
लीबिया में गद्दाफी के तख्ता पलट में सीआईए का हाथ रहा है। पुल्तिजर पुरस्कार से सम्मानित खोजी पत्रकार सैमूर हर्श ने भी लिखा है कि सीआईए के दस्तावेजों में इस गेटवे का जिक्र रैट लाइन के रूप में किया गया है। सीआईए ने जिस ट्रांसपोर्ट रूट का इस्तेमाल किया था वो यही रैट लाइन यानी जिहाद का गेटवे है। यानी एक ऐसा रास्ता जहां आतंकी चूहे की तरह रास्ता पार करते हैं।
तुर्की विश्व मीडिया की आलोचना से बचने के लिए जब-तब आतंकियों के छोटे-मोटे समूहों पर कार्रवाई करता नजर आता है। एक रोचक तथ्य जानिए। पिछले दिनों तुर्की ने कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके) के लोगों को आतंकवादी बताते हुए जबरदस्त बमबारी की। वही पीकेके जिनके बारे में यूएस राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि आईएस से जमीनी लड़ाई में पीकेके सबसे प्रभावशाली लड़ाकू फोर्स है, जिसकी मदद की जानी चाहिए।

कहां होता है आतंकियों का इलाज
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अच्छा ये बताइए कि आईएस के जो बड़े आतंकी घायल होते हैं, उनको बेहतरीन इलाज कहां और कैसे मिलता है। उसी गेटवे से उनको टर्की लाया जाता है और वहां उन्हें बेहतरीन मेडिसल सुविधा मिलती है। पिछले दिनों जब रूस के राष्ट्रपति ने जब आरोप लगाया था कि कैसे आईएस सीरिया और इराक के तेल ठिकानों पर कब्जा करके तेल का अंतरराष्ट्रीय धंधा कर रहा है...और कैसे कुछ देश इसमें शामिल हैं। पुतिन की उस सूची में सबसे पहले नाम तुर्की का था। हुआ यह था कि आईएस के ठिकानों पर बमबारी करते हुए रूसी लड़ाकू विमानों ने कुछ तेल टैंकर उसी रैट लाइन या गेटवे से तुर्की में दाखिल होते देखे तो सारा माजरा समझ में आ गया।
पुतिन के आरोप के बाद तुर्की ने रूस के एक लड़ाकू विमान को अपनी सीमा के उल्लंघन के आरोप में मार गिराया लेकिन तुर्की ने रैट लाइन के जरिए अपनी सीमा में दाखिल होने वाले आईएस के टैंकरों पर एक भी बम नहीं गिराया। इस वक्त आईएस को इस गेटवे के जरिए तेल की स्मगलिंग से हर महीने 50 मिलियन यूएस डॉलर की आमदनी होती है।

नाटो का स्टैंड
सीरिया में कई देशों की दिलचस्पी है। कुछ देश बशर अल असद की सरकार को हटाना चाहते हैं, कुछ उसे रखना चाहते हैं। कुल मिलाकर नाटो देश बशर के खिलाफ हैं। सीरिया में बशर के खिलाफ अकेले आईएस ही मैदान में नहीं है। वहां अल-शाम, अल-नुसरा, अल-कायदा सीरिया ब्रांच भी लड़ रहे हैं लेकिन इनका मकसद बशर को अपदस्थ करना है। लेकिन नाटो देश इन तीनों आतंकी संगठनों को आतंकी नहीं मानते। बता दें कि नाटों देशों में यूएस, यूके, फ्रांस, डेनमार्क, नार्वे सहित 28 देश हैं। नाटो के दो-चार देशों को छोड़कर कोई ऐसा देश नहीं बचा जहां आईएस का जाल नहीं फैला है। वजह यही है कि तुर्की के रास्ते आईएस आतंकियों का इन देशों में आना-जाना है। कुछ रिफ्यूजी कैंपों में शरण लेकर भी पहुंचे थे।     

पत्रकार की रहस्यमय मौत
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अमेरिकी पत्रकार सेरेना शिम की मौत रहस्यमय परिस्थितयों में 19 अक्टूबर 2014 को हुई थी। उन पर तुर्की ने जासूस होने का आरोप लगाया और उसके दो दिन बाद एक कथित कार हादसे में उनकी मौत हो गई। उनके चैनल और अखबार ने इस मौत पर तमाम तरह के शक जाहिर किए। वह वॉर रिपोर्टर थी और कोबान शहर पर जब आईएस ने कब्जा किया तो उस वक्त वो वहां मौजूद थीं। उन्होंने अपनी कई रिपोर्ट में लाइव दिखाया था कि कैसे जिहादी गेटवे या रैट लाइन से आईएस आतंकवादी तुर्की में बेरोकटोक आते हैं। उन्हें वहां हथियार मिलते हैं। इन रिपोर्टों के बाद सेरेना को तुर्की अधिकारियों ने कथित तौर पर धमकियां दी थीं। इसी साल मार्च में तुर्की के अति लोकप्रिय अखबार ज़मन को सरकार ने बंद करवा दिया। यह अखबार स्वतंत्र रिपोर्टिंग करता था। इसने भी गेटवे पर कई खबरें तस्वीरों के साथ छाप दी थीं।

सभी का घर झुलसेगा
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तुर्की खुद को एक लोकतांत्रिक, शांतिप्रिय देश बताता है। वहां की कला, संस्कृति इसके बारे में कुछ-कुछ पुष्टि भी करती नजर आती है लेकिन उसके जिस गेटवे से आतंकवादी निकलकर दुनिया के दूसरे देशों में फैल रहे हैं, अब उसकी आग में तुर्की भी झुलस रहा है। अता तुर्क एयरपोर्ट पर हुई घटना और इससे पहले की कुछ घटनाएं यही बता रही हैं कि अगर दूसरे का घर फूंकोगे तो अपने भी हाथ तो जरूर झुलसेंगे। लगता यही है कि आईएस के भीतर ही कोई गुट तुर्की की किसी बात या नीति से अचानक नाराज होकर तुर्की को भी झुलसाना चाहते हैं। अता तुर्क एयरपोर्ट पर आतंकी हमले के बाद वहां के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdogan ने भी हमले के पीछे आईएस का इशारा किया था लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि आईएस के किस गुट का ये काम था। अमेरिका और फ्रांस में आतंकियों ने अपनी पैठ बना ही ली है। तस्वीर यही उभर रही है कि जिन-जिन देशों ने किसी न किसी रूप में आतंकी संगठनों को खड़ा किया या मदद की, उनके हाथ भी इस आग में झुलसेंगे।