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Monday, May 13, 2013

मदर्स डे पर बहस


This article is also available on NavBharat Times newspaper's portal www.nbt.in in blog section. आज अपने एक दोस्त के घर गया तो वहां उनके बेटे और बेटी को मदर्स डे (Mother's Day) पर बहस करते पाया। उनकी बेटी ने मां के उठने से पहले किचन में एक बड़ा सा पोस्टर चिपका दिया था जिसमें मां को मदर्स डे की बधाई दी गई थी। उनके बेटे ने अपनी बहन का मजाक उड़ाया और कहा कि इस तरह की आर्टिफिशयल चीजों से मदर्स डे मनाना फिजूल है। यह दिखावा है और यह सब हमारी संवेदनाओं का बाजारीकरण है। मेरे पहुंचने पर दोनों ने मुझे पंच बनाकर अपने- अपने विचारों के हक में राय मांगी।...मेरी गत बन गई। एक तरफ मैं उस मीडिया का हिस्सा हूं जो इस बाजारीकरण या इसे इस मुकाम तक लाने में अपनी खास भूमिका निभा रहा है और आर्चीज वालों के साथ मिलकर 365 दिनों को किसी न किसी डे (दिवस) में बांट दिया है, दूसरी तरफ संवेदनशीलता यह कहती है कि अगर ऐसे दिवस मनाए जा रहे हैं तो भला इसमें बुराई क्या है, सोसायटी को कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। पता नहीं मौजूदा पीढ़ी को मक्सिम गोर्की के बारे में ठीक से पता भी है या नहीं या फिर अब वो जनरल नॉलेज के सवाल लायक भी नहीं समझे जाते, मुझे पता नहीं। रूस के इस महान लेखक ने 1906 में मां (The Mother) नामक उपन्यास लिखा था। मेरी लाइब्रेरी में यह किताब आज भी है। मेरे घर में अब इसे कोई नहीं पढ़ता। मेरे दोस्त के कॉलेज जाने वाले दोनों बच्चे भी गोर्की किस चिड़िया का नाम है, नहीं जानते। यहां तक कि इस महान किताब के बारे में भी कुछ नहीं जानते। गोर्की के इस उपन्यास को एक शताब्दी से ज्यादा समय बीत चुका है।...उस मां का या मौजूदा पीढ़ी की मां-ओं का संघर्ष जस का तस है। चाहे वह दिल्ली के आलीशान बंगले में रहने वाली मां हो या फिर तमिलनाडु के किसी गांव की मां – बच्चों को पालने और बड़ा करने, इस दौरान उनकी हर छोटी से छोटी चीज का ध्यान रखने के लिए जूझना बिल्कुल वैसा ही है। ...और यह कभी खत्म नहीं होगा। वर्किंग मां के बच्चे को चाहे आया पाले या बच्चा क्रेच में पले, मां का दुलार या जूझना कम नहीं होता। गोर्की को सौ साल पहले यह नहीं मालूम रहा होगा कि आगे ऐसा भी वक्त आएगा जब लोग किसी मां के संघर्ष और प्यार की संवेदनाओं को किसी आर्चीज (Archies) या अन्य कंपनियों के जरिए समझेंगे। या फेसबुक पर मेसेज पोस्ट करने भर से ही आप मदर्स डे की संवेदनशीलता को व्यक्त कर सकेंगे। बहरहाल, अपने-अपने तर्क हैं। कोई इसे इस तरह भी खारिज कर सकता है कि गोर्की या गुलजार ने मां पर कुछ लिखकर इतना बड़ा काम नहीं किया जितना बड़ा काम आज आर्चीज या फेसबुक (Facebook) ने हर यूथ को मां के प्रति संवेदनशील बनाकर किया है। पोथी पढ़ने से ही कोई पंडित नहीं हो जाता है। बल्कि आज का यूथ मां को लेकर ज्यादा जिम्मेदारी से पेश आ रहा है और टेक्नॉजी के इस्तेमाल से अगर यह संवेदना बाहर आ रही है तो इसमें बुराई क्या है। पर मेरी नजर में, संवेदनाओं पर असर पड़ा है। टेक्नॉलजी ने काफी हद तक जज्बातों को, संवेदनाओं को कुचला है। कुछ अन्य माध्यमों ने भी इस बदलाव में भूमिका निभाई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टीवी सीरियल हैं। पहले घर पर जो चिट्ठी आती थी, उसके पढ़ने में और आज के ईमेल पढ़ने या टेक्स्ट मेसेज पढ़ने में हम जिस संवेदना का अंतर समझते हैं, ठीक उसी तरह ऐसे दिवसों को मनाने में भी अंतर महसूस होता है। महिलाओं के खिलाफ जिस तरह अपराध बढ़े हैं या बढ़ रहे हैं, वह हमारी संवेदनाओं के मरने का ही नतीजा है। भारत से लेकर पश्चिमी देशों के समाजविज्ञानी मानने को मजबूर हैं कि संवेदनाएं मरने या उनमें अंतर आने से तमाम तरह के और खासकर महिला विरोधी अपराध बढ़े हैं। इस मुद्दे पर इस लेख को आगे और भी बढ़ाया जा सकता है लेकिन मुझे पता है कि लोग वैसे ही ऐसे विषयों पर पढ़ने का झेलना कहते हैं। इसलिए यहीं पर अपनी बात और अपने जज्बात को रोक रहा हूं। लेकिन गहराई ले सोच कर देखिएगा कि गोर्की की मां और आर्चीज की मां में कुछ अंतर है या नहीं। जल्द फिर मिलते हैं।