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Saturday, December 10, 2016

कितनी महान शक्ति है भारत...जरा गौर फरमाइए...

सचमुच विश्व की कितनी महान शक्ति हैं हम...इसका अंदाजा अब होने लगा है...
- #मुंबई में समुद्र के किनारे हमारा एक सरकारी जहाज #आईएनएस बेतवा गिर गया...उसे उठाने के लिए हमारे देश में वैसी क्रेन नहीं है...यह हमको अब पता चला...सरकार हमारी सरकार चलाए या जहाज उठाए...
-इस बार #गेहूं की फसल अच्छी हुई है, कीमतें भी नियंत्रण में हैं....इसके बावजूद हमारी महान #सरकार गेहूं का आयात (इंपोर्ट) करने जा रही है...गेहूं आयात का यह सिलसिला पिछले साल से जारी है। पिछले साल भी हमारी महान सरकार ने गेहूं का आयात किया था...सरकार का कहना है कि देश ने 6 साल बाद गेहूं आयात किया है...जी तथ्य भी यही है...जुमला नहीं है...गेहूं आयात की मार किसान झेलेंगे...तो क्या हुआ...देश के किसान इतना कुर्बानी भी नहीं दे सकते। उन्हें #भारत-#पाकिस्तान सीमा पर कुर्बानी देने के लिए तो कहा नहीं जा रहा है...अरे किसान भाइयो अपने खेत में जाकर कुर्बानी दे दो...
-#नोटबंदी पर कुछ भी कहना बेकार है...गद्दार लोग 6 दिन...20 दिन...30 दिन से लाइन में लगे हैं...#देशभक्त बैंक मैनेजर गरीब अमीरों को, #बीजेपी नेताओं को नए नोट के ट्रक भिजवा रहे हैं...महान सरकार ही यह जानकारी दे रही है...हमे क्या पता...हमारे ईमानदार बैंकिंग सिस्टम की वजह से ही तो महान सरकार नोटबंदी लागू कर सकी है।
-आईआईटी में सिर्फ यही महान सरकार #संस्कृत पढ़ाने की जुर्रत कर सकती है। अप्रैल में सरकार ने खुद लोकसभा में यह बयान दिया था...पता नहीं उस पर कितना काम हुआ...लेकिन अद्भुत सोच है। सुना है शिक्षा के क्षेत्र में संघ की विचारधारा को फैलाने का जिम्मा संभालने वाले दीनानाथ बत्रा आइंस्टीन के फार्म्युले का संस्कृत में या तो खुद अनुवाद करेंगे या किसी से करवाएंगे...
-मोटा भाई और रेड्डी बंधुओं जैसे गरीबों के यहां अभी हाल ही में ढाई लाख में जो #शादी निपटाई गई है वो पूरे विश्व में एक मिसाल है...बीजेपी का मुखौटा लगाए इन गरीबों ने जितने कम पैसे में विवाह किया, उससे लाइन में लगे गद्दारों को कुछ सीखना चाहिए।
-हमारे #प्रधानमंत्री टाइम मैगजीन के आनलाइन सर्वे में जिस तरह ट्रंप को कड़ी टक्कर देकर विजयी होकर निकले हैं...उसने भारत को और मजबूत किया है।...ये वही टाइम मैगजीन है, जिसके कवर पेज पर विश्व के कई महान नेता पैसे देकर अपना फोटो व कवर स्टोरी करा चुके हैं...साइबर युग में आनलाइन सर्वे जीतना पीएम जी की इंटरनेट सेना के लिए चुटकियों का काम है... 2013 में ये सेना करिश्मा दिखा चुकी है...
-सुना है, ...साहब से प्रभावित होने की वजह से विश्व की सबसे बड़ी #चाय कंपनी एक ऐसे चाय के फ्लेवर पर काम कर रही है, जिसकी चुस्की लेते ही लोगों के तन-बदन में ऐसी आग लग जाए वो 2019 में ...दी...दी...दी....दी...कहकर सड़कों पर निकल आएंं और कहें कि भारत में अब चुनाव की जरूरत नहीं, देश को और महान बनाने के लिए हमने ...दी...दी... को अपना #पीएम डायरेक्ट चुन लिया है...


Sunday, December 4, 2016

मोटा भाई की बेटी की शादी...

#मोटाभाई उर्फ नितिन गडकरी जी, बेटी की #शादी मुबारक। भौंकने वालों को भौंकने दीजिए। …#देशकतारमें है, उसे आपकी बेटी की शादी से कुछ लेना देना नहीं।….भौंकने वालों को जब कुछ नहीं मिला तो आपके ऊपर झूठा इलजाम लगा रहे हैं कि 50 चार्टर्ड प्लेन #नागपुर पहुंचे, 10 हजार मेहमान पहुंचे। ये हुआ-वो हुआ..…कितने नासमझ लोग हैं…किसी #भिखारी के बेटे या बेटी की शादी नहीं है, जो इतने लोग भी न पहुंचें…और शादी में #ब्लैकमनी की बात कहां आती है…भिखारी भी अपने बच्चों की शादी के लिए मेहनत की कमाई का बचा कर रखते हैं…मोटा भाई ने कुछ तो बचाया होगा जो इतनी शान से शादी कर सकें।

मूरख लोग जानते नहीं कि #देश का #गृहमंत्री वहां पहुंचा…पार्टी अध्यक्ष पहुंचा…अब ये लोग पैदल चलकर जाने से रहे…इन लोगों का उड़कर पहुंचना लाजिमी है। मोटा भाई पुराने #रईस घराने से हैं…उनको #छोटेनोट थोड़े ही गिनने हैं…

 …और अभी तो अपना #फकीर नहीं पहुंचा है।…वो #सर्जिकलस्ट्राइक पर निकला है…एक फकीर की आमद पर इतना स्वागत तो बनता ही है...


#नागपुरपाठशाला वाले तो खैर वहीं रहते हैं…वो पैदल पहुंच सकते हैं…मोटा भाई आप भौंकने वालों…की परवाह न करें…शादी पूरी शानौशौकत से करें। देश कतार में है।…उसे ये सब जानने की फुरसत नहीं है।…कतार में लगने वालों के चमचों को तो बस भौंकना आता है…कभी किसी फकीर पर तो कभी किसी #वजीर पर….

#पत्रकार लोग जबरन अपने आपको आम लोगों का #प्रवक्ता समझने लगे हैं  तभी तो कभी मोटा भाई की बेटी की शादी की तो कभी फकीर बेचारे की बेसिर पैर की #खबरें चलाते रहते हैं...पत्रकार नहीं भौंकने वाले बन गए हैं...अपनी औकात में रहो...#खानदानीअमीर लोगों के खिलाफ दो कौड़ी के पत्रकारों का लिखना #शोभा नहीं देता है...मोटा भाई मैं आपके साथ हूं...


#NitinGadkari #Nagpur #BJP #RSS

Sunday, November 20, 2016

हिजबुल्लाह की परेड से कई देश पानी-पानी

मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स लखनऊ में 20 नवंबर 2017 को प्रकाशित हो चुका है...हिंदीवाणी के पाठकों के लिए यहां पेश किया जा रहा है...-यूसुफ किरमानी





इसी हफ्ते सोमवार को सीरिया के अल कौसर शहर में हिजबुल्लाह ने अपने हथियारों की एक परेड निकाली। लेकिन इस परेड ने दुनिया की जानी-मनी शक्तियों को शर्मसार कर दिया। इस परेड में अमेरिकी और रूसी हथियार थे। मंगलवार को परेड के फोटो ट्वीट हुए तो दुनियाभऱ में हलचल मच गई। अमेरिकी हथियारों पर सभी की नजर पड़ी। इनमें यूएस के सबसे शक्तिशाली टैंक M113 की कई यूनिट शामिल थीं। 
अमेरिका रक्षा विभाग ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और कहा कि हम इसकी जांच करने जा रहे हैं कि आखिर हिजबुल्लाह तक ये हथियार कैसे पहुंचे। यूएस स्टेट डिपार्टमेंट की प्रवक्ता एलिजाबेथ ट्रूडेयू ने कहा कि हिजबुल्लाह के पास M113 का पहुंचना हमारे लिए चिंता की बात है। एलिजाबेथ ने यह भी कहा कि हम बेरूत स्थित अपने दूतावास के संपर्क में हैं और उससे भी जांच में मदद ले रहे हैं। लेकिन अमेरिका के बाद जो देश चिंतित नजर आया वो इस्राइल था। लेबनान ने अपने तरीके से प्रतिक्रिया दी।




इस्राइल क्यों चिंतित है
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अमेरिका ने अपने इस शक्तिशाली टैंक को सबसे पहले इस्राइल को 1988 में बेचा था। इस्राइल ने साउथ लेबनान के नाम से साउथ लेबनान आर्मी (SLA) बना रखी थी और ये टैंक उसके इस्तेमाल के लिए आए थे। 1999 में साउथ लेबनान पर कब्जे के लिए जब इस्राइल ने हमला किया तो इसी टैंक का इस्तेमाल किया था। यहां हिजबुल्लाह से उसका टकराव हुआ। बुरी तरह पराजित होने के बाद इस्राइल ने सन् 2000 में साउथ लेबनान से पीछे हटने की घोषणा कर दी। इस्राइल की चिंता यह है कि इन्हीं टैंकों को उसने एसएलए को इस्तेमाल के लिए दिया था तो वो हिजबुल्लाह के पास कैसे पहुंच गए। इस्राइल अपने स्तर पर भी इसकी जांच में जुट गया है। हिजबुल्लाह से इस्राइल का दूसरा युद्ध 2006 में हुआ। इस्राइल के मुताबिक इस युद्ध में न कोई हारा न जीता। लेकिन नुकसान बहुत हुआ। हिजबुल्लाह से उसकी हल्की-फुल्की झड़प अब भी चल रही है। इस्राइल यह मानता है कि जब भी उसे कभी फिर से लेबनान या ईरान से लड़ना पड़ा तो हिजबुल्लाह से उसका सामना फिर होगा। ऐसे में हिजबुल्लाह की मजबूती उसके लिए परेशानी का सबब है।

लेबनान भी परेशान
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परेड में अमेरिकी टैंकों को देखकर लेबनान भी परेशान हुआ। लेबनान ने फौरन खंडन जारी किया कि सहयोगी और दोस्ती होने के बावजूद हमने ये टैंक कभी भी हिजबुल्लाह को नहीं बेचे और न ही साउथ लेबनान में इस्राइल से जब्त हथियार कभी हिजबुल्लाह को सौंपे गए। न ही हमारे यहां से इसकी स्मगलिंग हुई।





तो आखिर असलियत क्या है
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ब्रिटेन के डिफेंस एक्सपर्ट चार्ल्स शूब्रिज का कहना है कि हिजबुल्लाह को अमेरिकी हथियार मिलने का विश्लेषण कई तरह से हो सकता है। उनके मुताबिक सीरिया में बशर अल असद की हुकूमत को गिराने के लिए अमेरिका ने सीरिया में उस रिबेल ग्रुप यानी अल कायदा (जो बाद में अल नुसरा फ्रंट भी बना) की पैसे और हथियार से पूरी मदद की। अमेरिका ने अपने कीमती हथियार अल कायदा को सौंप दिए। जो बाद में आईएसआईएस (दाइश) के हाथ भी लगे क्योंकि दाइश भी अल कायदा से अलग होकर बना था। सभी जानते हैं कि असद की मदद में ईरान और हिजबुल्लाह सामने आए। हिजबुल्लाह ने सीरिया पहुंचकर असद की भरोसेमंद सेना के साथ अल कायदा के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। आसमान से रूस की मदद मिलने के बावजूद जमीन की लड़ाई जीतना सीरिया में आसान नहीं था। हिजबुल्लाह को इसमें महारथ हासिल है। उसने न सिर्फ अल कायदा को धूल चटाई बल्कि दाइश को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। इस दौरान अलकायदा और दाइश के आतंकी बड़े पैमाने पर हथियार छोड़कर भागे। यही हथियार हिजबुल्लाह के हाथ लगे हैं। दूसरी संभावना ये है कि इस्राइल के पीछे हटने के बाद हो सकता है कि उसके समर्थक संगठन एसएलए ने ये हथियार बाजार में स्मगलरों को बेच दिए हों और उसे हिजबुल्लाह ने खरीद लिया हो।
चार्ल्स ने कहा कि अमेरिकन टैंकों की परेड कराकर हिजबुल्लाह ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक तो यह पता लग रहा है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका आतंकी संगठनों या उन देशों की सरकारों को चाहे जितना हथियार सप्लाई करे, जमीनी लड़ाई में वो हिजबुल्लाह सामना नहीं कर पाएगा। अभी इराक के मोसूल में दाइश के खिलाफ जो लड़ाई चल रही है, उसमें हश्द अल शब्बी को बड़ी कामयाबी मिली है। कहा जाता है कि हश्द अल शब्बी को भी हिजबुल्लाह ने ही ट्रेनिंग दी है। हश्द इराक सरकार के तहत काम करता है और इसे सिर्फ दाइश से लड़ने के लिए ही तैयार किया गया है।




क्या है M113 टैंक
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अमेरिका को अपने M113 टैंक पर बहुत नाज है। इसकी चेसिस इतनी मजबूत है कि इसे न्यूक्लियर मिसाइल कैरियर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिका इसका इस्तेमाल 1960 से कर रहा है और जहां-जहां युद्ध होता है, यह दिखाई दे जाता है। वियतनाम वॉर में भी इसका इस्तेमाल हो चुका है। आरोप है कि सीरिया सरकार के खिलाफ इस्तेमाल के लिए वहां के आतंकी संगठनों को इसे दिया गया।

क्या है हिजबुल्लाह
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हिजबुल्लाह यूएन और अमेरिका के मुताबिक ईरान समर्थित एक आतंकवादी और राजनीतिक संगठन है लेकिन यह संगठन सीरिया में आईएस, अल नुसरा, अल कायदा व अन्य वहाबी आतंकवादियों के खिलाफ लड़ रहा है। इसकी स्थापना 1985 में हुई। इसके महासचिव हसन नसरल्लाह हैं, जो कई देशों में मुस्लिम युवकों के यूथ आइकन भी हैं। लेबनान में ईसाई राष्टट्रपति औन को सत्ता हाल ही में हिजबुल्लाह की मदद से मिली है। यानी हिजबुल्लाह वहां की सरकार में शामिल है। लेबनान और इस्राइल में कई बार संघर्ष हो चुका है। लेबनान का वजूद बचाने के लिए हिजबुल्लाह रक्षा कवच की तरह काम करता है। लेबनान खुद अपनी सेना से ज्यादा हिजबुल्लाह को ताकतवर मानता है और सहयोग लेता है। साल 2000 के युद्ध में इस्राइल को हिजबुल्लाह की वजह से लेबनान से हारना पड़ा। हिजबुल्लाह का शाब्दिक अर्थ है अल्लाह की पार्टी। इस संगठन को ईरान की पूरी मदद है। कहा जाता है कि इसे गुरिल्ला वॉर की ट्रेनिंग ईरानी आर्मी से मिलती है। मिडिल ईस्ट में चलने वाली जमीनी लड़ाई में गुरिल्ला वॉर की बहुत अहमियत है।



   

Tuesday, November 8, 2016

एक बेबस मां और हमारी एक्सक्लूसिव खबर

...उम्मीद है कि जेएनयू के गायब छात्र नजीब की बेबस मां को सड़क पर घसीटे जाने और हिरासत में लिए जाने की तस्वीर आप भूले नहीं होंगे।...लेकिन अब तमाशा देखिए....जो दिल्ली पुलिस नजीब को 26 दिन से नहीं तलाश कर पाई अब वो नजीब को इमोशनली डिस्टर्ब बता रही है। यानी वो अंदर ही अंदर ही किसी बात को लेकर परेशान था, इसलिए खुद ही गायब हो गया। ...यह महान खबर दिल्ली पुलिस के सूत्रों के हवाले से कुछ अखबारों ने छापी है। ऐसे भी कह सकते हैं कि इस मामले में चारों तरफ से फजीहत की शिकार पुलिस ने यह खबर अखबारों में प्लांट करा दी। 


एक्सक्लूसिव की तलाश में भटकने वाले रिपोर्टर साथियों ने तह में जाने की कोशिश नहीं की कि इस खबर का मकसद क्या हो सकता है। दिल्ली पुलिस उन तथ्यों पर पर्दा डाल रही है कि नजीब के हॉस्टल में जाकर जिन स्टूडेंट्स या तत्वों ने मारपीट की थी, वो कौन लोग थे। नजीब उस घटना के फौरन बाद से गायब है।


इस मामले में सवाल न पूछने वाले पत्रकार मित्र लगातार गलतियां कर रहे हैं। एक दिन पहले दिल्ली पुलिस खबर छपवाती है कि अब वो नजीब को तलाशने के लिए विदेशों की तर्ज पर सारी घटनाओं को रिकंस्ट्रक्ट करेगी, नजीब के साथियों से जानकारी लेगी कि कहीं वो इमोशनली डिस्टर्ब तो नहीं था।...यह एक्सक्लूसिव खबर अखबारों में छप जाती है, टीवी पर चल जाती है। अगले दिन ही इसका अगला भाग आ जाता है कि हां, वो इमोशनली डिस्टर्ब था। अगर कोई पत्रकार नजीब को खोजने के काम पर या पुलिस से सवाल पूछने के काम पर नहीं जुटना चाहता है तो कम से कम वो पुलिस की फर्जी और काल्पनिक सूचनाओं को खबर तो न बनाए।


मीडिया ने यही काम भोपाल जेल से कथित तौर पर भागने वाले सिमी के आरोपियों के मामले में किया था। सभी को आतंकी बता डाला। कुछ पत्रकारों ने अपने फेसबुक स्टेटस और ट्विटर पर इस एनकाउंटर का स्वागत कर डाला। राष्ट्रभक्ति का झंडा बुलंद करने वाले चैनलों तक ने उस एनकाउंटर का विडियो सामने आने के बाद अपना रुख बदला। लेकिन नहीं बदले तो राजधानी दिल्ली में बैठे वे पत्रकार जो अनजाने में एक राजनीतिक दल के साइबर एजेंट बनकर रह गए हैं। एनडीटीवी इंडिया चैनल के मामले से यह साफ हो गया कि एक राजनीतिक दल और उसकी सरकार की मंशा क्या है...


क्या वाकई देश गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है...क्या वाकई आपातकाल से भी बुरे हालात हैं...
एक घटना खत्म नहीं होती कि दूसरे की जमीन तैयार हो जाती है...एक फितना शांत नहीं होता है कि दूसरा सिर उठा लेता है। लीजिए फिर एक और खबर आ पहुंची। छत्तीसगढ़ में दिल्ली की दो प्रोफेसरों नंदिनी सुंदर (दिल्ली यूनिवर्सिटी) और अर्चना प्रसाद (जेएनयू) समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ रायपुर में हत्या का केस दर्ज कर लिया गया है। इनके साथ अज्ञात माओवादियों को भी जोड़ दिया जाता है कि इन सारे लोगों ने मिलकर सुकमा जिले में एक आदिवासी की हत्या कर दी है। लेकिन असलियत क्या है। नंदिनी सुंदर ने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के संघर्ष पर एक किताब लिखी है कि किस तरह उन्हें उनकी जमीन, उनके अधिकार से बेदखल कर मारा जा रहा है, उजाड़ा जा रहा है। अर्चना प्रसाद वहां दस साल से काम कर रही हैं। इन सारे लोगों ने पिछले पांच महीने से छत्तीसगढ़ की धरती पर कदम तक नहीं ऱखा लेकिन 4 नवंबर को एक आदिवासी की कथित हत्या में इन्हें नामजद कर दिया गया। ...सरकार और पुलिस इसी चालाकी से उन तमाम लोगों को नियंत्रित करती है जो आदिवासियों, किसानों, मजदूरों, अल्पसंख्यकों, दलितों, स्टूडेंट्स की आवाज बनते हैं। पिछले दो साल से ऐसी घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। देशद्रोही बता डालो, हत्यारा बता डालो, आतंकी बता डालो...जेल भेज दो, अखबार बंद करा दो, चैनल बंद करा दो।


छत्तीसगढ़ की जिस कथित हत्या में इन दो प्रोफेसरों व अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का नाम पुलिस में डाला गया है वो उन सारे मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं के लिए एक चुनौती है। जिस तरह एनडीटीवी के मामले में तमाम पत्रकारों ने समझदारी दिखाते हुए एकजुटता प्रदर्शित की और सरकार को अपना फैसला रोकना पड़ा। वही चुनौती फिर से दरपेश है। एऩडीटीवी के पास तो एक मंच भी है अपनी बात कहने का लेकिन इन लोगों के पास नहीं है। मानवाधिकार संगठनों, कार्यकर्ताओं, अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों को सड़क पर आकर अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। 
    

अब क्यों शहीद हो रहे हैं हमारे सैनिक
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...उम्मीद है कि पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक को भी आप नहीं भूले होंगे। तब चिल्लाकर कुछ लोगों ने बताया था कि देश ने बदला ले लिया...ऐसा सबक सिखाया कि दुश्मन अब भारत की ओर आंख उठाकर देख भी नहीं सकेगा।...लेकिन हुआ क्या...सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सीमा पर हमारे सैनिक लगातार शहीद हो रहे हैं। आए दिन सीज फायर टूटने की सामान्य सी खबर बताई जाती है और धीरे से उसी में यह भी जोड़ दिया जाता है कि हमारा एक सैनिक भी शहीद हो गया। शहीद का शव घर आता है, सेना के कुछ अधिकारी, फोटो खिंचवाने वाले नेता और मंत्री आते हैं, तिरंगे में अंतिम संस्कार होता है, सैल्यूट होता है...लोग घरों को वापस लौट आते हैं। पीछे रह जाता है उस सैनिक की विधवा, उसके बच्चे, बूढ़े मां-बाप। ....दानिश खान जैसे शहीद को तो यह भी नसीब नहीं होता, उसे सलामी देने न कोई मंत्री आता है और न मीडिया का जमावड़ा होता है।


कुछ अन्य घटनाओं का जिक्र इस छोटे से लेख में मुमकिन नहीं है लेकिन अगर कोई खुद को इंसान मानता है और उसमें जरा भी इंसानियत बची है, उसे उन लोगों का सहारा बनना पड़ेगा, जिनके सरोकारों व सवालों को मीडिया लगातार नजरन्दाज कर रहा है।


Friday, October 14, 2016

मोहर्रम और आज का मुसलमान

इस बार मोहर्रम और दशहरा साथ-साथ पड़े। यानी बुराई के खिलाफ दो पर्व। संस्कृतियों का अंतर होने के बावजूद दोनों पर्वों का मकसद एक ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मोहर्रम बुराई पर अच्छाई की जीत के बावजूद दुख का प्रतीक है, जबकि दशहरा बुराई के प्रतीक रावण को नेस्तोनाबूद किए जाने की वजह से खुशी का प्रतीक है।  

कुछ साल पहले ईद और दीवाली आसपास पड़े थे। उसकी सबसे ज्यादा खुशी बाजार ने मनाई थी। कनॉट प्लेस में मेरी जान पहचान वाले एक दुकानदार ने कहा था कि काश, ये त्यौहार हमेशा आसपास पड़ते। मैंने उसकी वजह पूछी तो उसने कहा कि पता नहीं क्यों अच्छा लगता है। बिजनेस तो अच्छा होता ही है लेकिन देश भी एक ही रंग में नजर आता है। ...मैंने दोनों त्यौहारों पर इतना कमा लिया है, जितना मैं सालभर भी नहीं कमा पाता।

इस बार दोनों पर्व इस बार ऐसे वक्त में साथ-साथ आए जब पूरी दुनिया हर तरह की बुराई से लड़ने के लिए नया औजार खोज रही है। पुराने कारगर औजार पर या तो उसका यकीन नहीं है या उसकी नजर नहीं है। दशहरा और मोहर्रम धार्मिक होने के बावजूद सांस्कृतिक रंग से सराबोर हैं। दशहरा पर लगने वाले मेलों में जाइए तो आपको वहां हर समुदाय के लोग मिलेंगे।

इस्लाम में सलाफी यानी वहाबी विचारधारा की समस्या से जूझ रहे सऊदी अरब समेत कई देशों में मोहर्रम पर पाबंदी है। इसके ठीक उलट भारत, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्वीडन, रूस जैसे गैर इस्लामी देशों में मोहर्रम वहां की संस्कृति का हिस्सा बन गया है। पाकिस्तान में मोहर्रम मनाने वालों की टारगेट किलिंग के बावजूद वहां अलम-ताजिए का जुलूस, मजलिसों का सिलसिला नहीं रुका। बलूचिस्तान में मोहर्रम करने वाले हजारा समुदाय बर्रबादी के कगार पर है लेकिन उसने मोहर्रम करना नहीं छोड़ा। भारत की संस्कृति में मोहर्रम के रचने बसने के ऐतिहासिक कारण रहे हैं।     

मोहर्रम हमें बताता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब जिस दीन यानी जिस मजहब को मुसलमानों के लिए छोड़कर गए थे, उसे तत्कालीन शासक वर्ग ने किस तरह बर्बाद कर दिया था, किस तरह उसके उसूलों को ताक पर रख दिया गया था।
उन उसूलों और मूल्यों को फिर से स्थापित करने के लिए जब शासक वर्ग को पैगंबर के नवासे इमाम हुसैन से चुनौती मिली तो उसने पैंतरा बदला और संदेश भेजा कि आप मेरी अधीनता स्वीकार करें। हुसैन ने प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। शासक ने माहौल बिगाड़ा तो हुसैन ने अपने 72 लोगों के दल के साथ उस मदीना शहर को छोड़ दिया, जो उनके नाना यानी पैगंबर का घर था। हुसैन ने वहां से चलते वक्त इच्छा जताई थी कि वो भारत की ओर कूच जाएंगे, जहां उस समय की मान्यता के अनुसार बहुत ही सहिष्णु लोग रहते हैं। यानी धार्मिक रूप से सहिष्णु भारत की छवि 1400 साल पहले भी थी। लेकिन अगर सहिष्णु नहीं था तो वहां का शासक वर्ग।
इराक में कर्बला नामक जगह पर हुसैन को रोक लिया गया। उनका खाना-पानी रोक दिया गया। यजीद की हजारों लोगों की सेना ने 72 लोगों को युद्ध के लिए ललकारा। हुसैन को पहले से ही आदेश था कि इस्लाम को बचाने के लिए उन्हें अपने पूरे कुनबे, जिसमें उनका छह महीने का छोटा बेटा भी शामिल था, की कुर्बानी देनी होगी।

मुंशी प्रेमचंद ने कर्बला में उस वक्त का मंजर बताया है कि एक तरफ इस्लाम के पैगंबर का अपना परिवार शहादत के लिए तैयार था तो दूसरी तरफ वो मुसलमान उन्हें शहीद करने के लिए तलवार और तीर कमान चला रहा था, जो कल तक पैगंबर का बोसा लेता था, उनके लिए मर मिटने की कसमें खाता था। बहरहाल, कर्बला हुई, यजीद वो युद्ध जीतने के बावजूद हार गया। विश्व इतिहास में इस सच्ची घटना को मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए शहादत देने वाले हुसैन की विजय के रूप में ही दर्ज किया गया है।


अब इस्लामिक देशों में हो रही घटनाओं पर नजर डालिए। आपको इन देशों में पैगंबर का इस्लाम कहीं नजर आता है। हद तो यह है कि मुसलमानों का एक गिरोह जो खुद को खलीफा भी बताता है, नया इस्लाम लेकर आ गया है। पता ये चलता है कि खुद को मक्का-मदीना का असली पैरोकार बताने वाले नए इस्लाम को हवा देने में हर पैंतरेबाजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन यही गिरोह है। 1400 साल पहले पैगंबर के नवासे ने जिन मुसलमानों के कारण मदीना छोड़ा था, आज उन्हीं मुसलमानों के स्वयंभू पैरोकार फिर से वही हालात पैदा करते दिखाई दे रहे हैं। इस्लाम एक है, कुरान एक है लेकिन इस्लाम के नए पैरोकारों और स्वयंभू खलीफा ने हालात को बदतर बना दिया है। ऐसे में हम लोग पैगंबर और उनके परिवार की कुर्बानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। 

Sunday, October 2, 2016

पाकिस्तान में ऐसे लोग भी हैं

मानवाधिकार आय़ोग पाकिस्तान के डायरेक्टर आई. ए. रहमान का लेख वहां चर्चा में है

नोट ः मेरा यह लेख आज नवभारत टाइम्स, लखनऊ में ग्लोबल पेज पर छप चुका है। जिसका हेडिंग है - लीक से हट कर बोलते हैं रहमान



भारत-पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों में मीडिया की भूमिका अहम हो गई है। पाकिस्तान के आग उगलते न्यूज चैनल और रक्त रंजित हेडिंग से भरे हुए वहां के अखबारों के बीच पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के डायरेक्टर आई.ए. रहमान का लेख चर्चा का विषय बन गया है। रहमान के लेख को पाकिस्तान के लोकप्रिय अखबार डान ने अंग्रेजी और उर्दू में पहले पेज पर एंकर प्रकाशित किया है। बता दें कि डान अखबार की स्थापना पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी।

ऐसे वक्त में जो उम्मीद भारत सरकार यहां के मीडिया से लगाए बैठी है, वही उम्मीद पाकिस्तान सरकार वहां की मीडिया से लगाए बैठी है। लेकिन डान ने कई मायने में कमाल कर दिया है। डान टीवी ने भारत के रक्षा विश्लेषक सी. उदय भास्कर को पैनल में लाकर और उनकी बात बिना किसी काट-छांट के अपने दर्शकों को दिखा देना, निश्चित रूप से पाकिस्तान सरकार और वहां की आर्मी को पसंद नहीं आया होगा। ये बात उसी रात यानी 29 सितंबर की है, जब दोनों देशों के चैनलों में एक शोर सा मचा हुआ था और लग रहा था कि असली युद्ध इन चैनलों पर लड़ा जा रहा है। पाकिस्तान के और भी बहुत से संजीदा पैनलिस्ट इस बात पर चिंतित नजर आ रहे थे कि भारतीय कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान आखिर कब तक कट्टर मौलवियों को बढ़ावा देता रहेगा। इन मौलवियों की वजह से कश्मीर की असली बात पीछे छूट गई है और ये लोग चंदा जमाकर मलाई उड़ा रहे हैं।


टीवी पर खबरें आती हैं और वो बाद में हटा ली जाती हैं। उन्हें कोई याद नहीं रख पाता लेकिन रहमान का लेख डान के पहले पेज पर हमेशा के लिए महफूज हो गया है। उन्होंने पाकिस्तान की नई पीढ़ी के लिए लिखा है कि उसके लिए भारत-पाक के पुराने रिश्तों को जानना क्यों जरूरी है और जो आज हालात हैं, वैसे पहले कभी नहीं रहे। जबकि हम दो युद्ध भी लड़ चुके हैं। वो लिखते हैं कि एक वक्त था जब 1971 में दोनों देशों में युद्ध होने के बाद जब पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया तो एक भारतीय ब्रिगेडियर जो पाकिस्तानी ब्रिगेडियर के साथ पढ़ा होने की वजह से जानता था, उसे अलग ले गया। उसे ड्रिंक की आफर की और कहा कि आप लोगों ने ये क्या कर डाला...भारतीय ब्रिगेडियर चाहता तो बहुत खुशी मना सकता था लेकिन उसके चार लफ्जों ने बताया कि जीतने के बावजूद वो ब्रिगेडियर और उसकी यूनिट के हालात पर दुखी था।


...पाकिस्तान के शायरों, लेखकों, एक्टरों, एक्ट्रेसेज को जो प्यार-मोहब्बत भारत में मिलती है, वो पाकिस्तान में दुर्लभ है। पाकिस्तान के शायर भारत में मुशायरों में जाते हैं तो उनके लिए वहां पलकें बिछा दी जाती हैं। नुसरत फतेह अली खान कैसे करोड़ों भारतीयों के दिलो-दिमाग में छाए हुए हैं....कैसे आबिदा परवीन को सुनने के लिए दिल्ली के कनॉट प्लेस में भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। ...कैसे राजा गजनफर अली ने पाकिस्तान-भारत की सरकारों को बाध्य किया कि एक क्रिकेट मैच अमृतसर में कराया जाए, जिसे दोनों देशों के लोग एकसाथ देखें। वो मैच हुआ और लाहौरी युवक अमृतसर में उन अनजान सिख परिवारों में मेहमान बने, जिनसे कभी पहले वो मिले ही नहीं थे। सिख परिवारों ने पाकिस्तान से आए लोगों की मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी।...कैसे अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान के काफी पत्रकार उनको कवर करने के लिए दिल्ली पहुंचे। ऐसे कई उदाहरण उन्होंने दोनों तरफ के गिनाए हैं। भारत के कुछ मौजूदा पत्रकारों का जिक्र करते हुए उनकी तारीफ भी की गई है। 



रहमान मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि आज हालात ये हैं कि पाकिस्तान में कोई युवक अगर क्रिकेटर विराट कोहली की तारीफ करता है तो हुकूमत कट्टरपंथियों के दबाव में उसे जेल भेज देती है। वो लिखते हैं कि ऐसे हालात दोनों तरफ अचानक नहीं बने हैं। इसके लिए सरकारी एजेंसियों ने दिन-रात मेहनत की है। दोनों तरफ के मीडिया की गलती ये है कि वो ऐसी सरकारी एजेंसियों का बिना सोचे समझे खिलौना बन गए। उनका कहना है कि दोनों तरफ का मीडिया इन हालात को और बिगाड़ सकता है और सुधार भी सकता है। खासतौर पर उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संदर्भ में ये बात कही है।   




Thursday, September 8, 2016

नागपुर फिसल रहा है...

जरा सा #रेलकिराया क्या बढ़ा दिया...पों-पों करके चिल्लाने लगे...
जरा सी #दालमहंगी हो गई तो नाबदान के कीड़े बिलबिलाने लगे...
जीवन में थोड़ा फेलेक्सी होना सीखिए...देश बदल रहा है
अब छाती पर कोल्हू चलाएंगे...क्योंकि #नागपुर फिसल रहा है
...वोट जो तुमने दिया है, उस #इश्क के इम्तेहां तो अभी बाकी है...
....तीन साल और रगड़ेंगे, भर दे पैमाना तू ही तो मेरा साकी है
टूटी सड़कों पर #स्मार्टसिटी खड़े कर दिए...
रेगिस्तान में भी #हवामहल खड़े कर दिए...
#जातिवाद के मुकाबले को #गऊमाता लाए...
मुफ्त सिम के लिए #डिजिटलइंडिया लाए...
पूंजीवादी #राष्ट्रवाद की नई परिभाषा गढ़ी
मैंने लिखी वो ग़ज़ल जो #गुलज़ार ने भी पढ़ी
तेरे पास अगर बलूचिस्तान और #पाकिस्तान है
झांक गिरेबां में अपने, मेरे पास पूरा #हिंदुस्तान है


नोट - गंभीर हिंदी साहित्य पढ़ने वाले कृपया इसमें कविता न तलाशेंः यूसुफ किरमानी


Tuesday, September 6, 2016

सनसनीखेज विडियो, ...महाराष्ट्र के नांदेड़ में डिप्टी कलेक्टर की सरेआम पिटाई

लोगों का गुस्सा...अगर इसी तरह बढ़ता रहा और वे सड़कों पर कानून हाथ में लेकर ऐसा करते रहे तो हम लोग एक खतरनाक स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं...इस #विडियो में दिखाया गया है कि कैसे #नांदेड़ के डिप्टी कलेक्टर को लोग सरेआम पीट रहे हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने अपनी सहकर्मी से अवांछित व्यवहार किया और स्टाफ के साथ छुआछूत भी करते हैं।...आरोप कितने सच्चे हैं ये पता नहीं लेकिन ऐसे आरोपों पर किसी की ऐसी पिटाई और फिर उसे नंगा किए जाने को सही नहीं ठहराया जा सकता...