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Friday, June 3, 2016

खुफिया एजेंसियों को मथुरा के आश्रम में हथियार क्यों नहीं दिखे...अदालत को गुलबर्ग सोसायटी में साजिश क्यों नहीं दिखती...



-यूसुफ किरमानी

दो घटनाएं...

1.मथुरा में सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे जयगुरुदेव के तथाकथित चेलों को हटाने के लिए फायरिंग होती है, जिसमें दो पुलिस अफसर शहीद हो जाते हैं। वहां से बड़े पैमाने पर हथियार और गोला-बारुद बरामद होता है। बीजेपी मामले की विशेष जांच की मांग करती है।

2. अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में अदालत का फैसला 14 साल बाद आता है, जिसमें अदालत कहती है कि इस घटना के पीछे कोई साजिश नहीं थी। अदालत 36 लोगों को बरी कर देती है और 24 को दोषी मानती है। गुलबर्ग सोसायटी में गोधरा दंगों के बाद 28 फरवरी 2002 को पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत 69 लोगों को जिंदा जलाकर मार दिया जाता है। 

दिल्ली से मथुरा बहुत दूर नहीं है। अगर आप किसी भी गाड़ी से चलेंगे तो ज्यादा से ज्यादा तीन घंटे में पहुंच जाएंगे। मथुरा में आश्रम-मंदिरों की भरमार है। जिनके मालिकाना हक को लेकर सैकड़ों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं। लेकिन सिर्फ दो साल पहले जयगुरुदेव के कुछ तथाकथित चेले निहायत ही वाहियात मांगों को लेकर आंदोलन छेड़ते हैं और जवाहरबाग जैसी जगह में सैकड़ों वर्गफुट जमीन पर कब्जा जमा लेते हैं। इनकी मांग है कि 1रुपये लीटर पेट्रोल दिया जाए, राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के चुनाव रद्द किए जाएं और इसके अलावा भी निहायत ही उलूलजुलूल मांगें हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक गुंडा इस आंदोलन की आड़ में होता है। पुलिस चुपचाप तमाशा देखती रही।



दिल्ली में एनआईए, आईबी, सीबीआई, दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल और न जाने क्या-क्या सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात आतंकवादी पकड़ने में जुटी रहती हैं। लेकिन उन्हें तीन घंटे की दूरी पर स्थित मथुरा में एके 47, रॉकेट लांचर, ग्रेनेड जैसे असलहे जमा होने की भनक तक नहीं लगी। दिल्ली पुलिस का वो स्पेशल सेल जिसने देश के कई गांवों और शहरों को आतंकवादियों की फर्जी शरणस्थली होने के नाम पर बदनाम कर दिया, उसे एक बाबा के तथाकथित चेलों के हथियारों के जखीरे का पता नहीं चला। वो एनआईए जो पठानकोट टेरर अटैक केस की जांच पाकिस्तान में जाकर करने का दमखम रखती है, उसे भी कुछ पता नहीं चला। इस मामले में मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव या यूपी के सीएम अखिलेश यादव के निकम्मे प्रशासन पर टिप्पणी करना तो वक्त बर्बाद करने जैसा है लेकिन जब राष्ट्रीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को संभल, भटकल, संजरपुर, औरंगाबाद, मालेगांव में छिपे आतंकियों का पता चल जाता है, जब उसे यह तक पता चल जाता है कि दाऊद कराची में कहां रहता है तो एक बाबा के चेलों के गतिविधियों की भनक तक नहीं मिलती है।

मथुरा में और क्या-क्या होता है, उसकी गहराई में जाने का वक्त अभी नहीं है। लेकिन इतना बता दें कि यहां पर कई साध्वियों ने कौड़ी के दाम पर जमीन लेकर अपने आश्रम बना रखे हैं। दिल्ली और देश के बहुत सारी जगहों से तमाम लोग सप्ताह के अंत में यहां आराम फरमाने जाते हैं। यहां पर उन लोगों की बात नहीं हो रही है जो मथुरा के प्राचीन मंदिरों में आस्था के तहत दर्शन करने जाते हैं। बात उन आश्रमों की हो रही है, जिनमें ऐशोआराम की हर सुविधा मौजूद है। विदेशियों की भी इन आश्रमों में भरमार रहती है। ड्रग्स की बिक्री यहां पर सामान्य सी बात है। विदेशों से यहां के आश्रमों में जो फंडिंग हो रही है, उसकी तरफ आजतक किसी भी खुफिया एजेंसी का ध्यान नहीं गया। आखिर विदेशियों की इन आश्रमों में क्यों दिलचस्पी है...अगर किसी धर्म में विदेशियों की आस्था है तो उसका पालन उसी रूप में होना चाहिए न कि किसी सहिष्णु धर्म और अपनी संस्कृति के घालमेल के साथ ड्रग्स के इस्तेमाल को आप नए धर्म का नाम दे दें। कुल मिलाकर यहां पर धर्म की आड़ में तमाम तरह की अनैतिक गतिविधियां चलाकर एक सहिष्णु धर्म को बदनाम किया जा रहा है। क्या आप यकीन करेंगे कि मथुरा में कुछ आश्रम ऐसे हैं, जिनमें जाने के लिए आईकार्ड जारी किए गए हैं। मेन गेट पर बैठा गार्ड हर किसी को जाने की अनुमति नहीं देता है। पुलिस अधिकारियों तक की हिम्मत नहीं होती है कि वे किसी आश्रम में सीधे घुस जाएं। 

अब आप कहेंगे कि मथुरा की घटना और गुलबर्ग सोसायटी के फैसले को आपस में कैसे जोड़ा जा सकता है और क्यों जोड़ा जा रहा है...गुजरात के दंगे भी धर्म के नाम पर शुरु हुए थे। जब-जब धर्म में राजनीति घुसती है या राजनीति धर्म को अपने लिए इस्तेमाल करती है, तब-तब कत्ल-ए-आम होते हैं। पाकिस्तान अगर आज बर्बाद है तो वहां राजनीति धर्म को अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रही है। वहां की सेना भी उसका हिस्सा है। पाकिस्तान की सेना द्वारा खड़े किए गए मुल्ला-मौलवी वहां के राजनीतिज्ञों को खुलेआम गालियां देते हैं। वहां की सेना उनको शह देती है और संरक्षण देती है। 

भारत को उसी तरफ तेजी से ढकेलने की साजिश हो रही है। यहां भी राजनीतिक दल धर्म की ढाल बनाकर समुदायों को बांटने में लगे हुए हैं। इन राजनीतिक दलों ने तमाम बाबाओं को संरक्षण दे ऱखा है। कई राजनीतिक दलों ने धर्म के आधार पर अलग-अलग फ्रंटल संगठन बना रखे हैं जो सिर्फ उसी समुदाय के बीच काम करके अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं।

गुजरात नामकर प्रयोगशाला से इसकी शुरुआत हुई। जहां साफ-साफ दो धार्मिक समुदायों को बांट दिया गया और फिर कत्ल-ए-आम हुआ। ...भारत में अदालतों का बहुत सम्मान है। आज भी अदालतों ने इस जर्जर लोकतंत्र को किसी तरह बचा रखा है। ये ठीक है कि अदालतें सबूतों के आधार पर चलती हैं। लेकिन गुजरात में जो जनसंहार हुआ क्या जज साहिबान उससे नावाकिफ थे...क्यों जज साहिबान इतने भी संवेदनशील नहीं थे कि उन्हें सही-गलत का फर्क न नजर आया हो...लेकिन हैरानी तब होती है जब उसी अदालत को एक सोसायटी में 69 लोगों को जिंदा जलाकर मार दिए जाने की घटना के पीछे कोई साजिश नहीं दिखती। 




28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद शहर में हालात बदतर थे। जिसको जहां जगह मिल रही थी, वहीं शरण ले रहा था। एहसान जाफरी चूंकि एक राजनीतिक दल से जुड़े थे, सांसद रह चुके थे, उनके घर में गुलबर्ग सोसायटी के 68 लोगों ने शरण ली। शायद ये समझकर कि यहां तो दंगाई हाथ डालने से रहे। लेकिन दंगाई वहां पहुंचे और उन्होंने बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से घटना को अंजाम दिया। यह क्षणिक आवेश में किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया नरसंहार नहीं था। इसके पीछे बाकायदा साजिश थी। हां, अगर इस घटना में अकेला कोई शख्स शामिल होता तो लगता कि साजिश नहीं थी लेकिन इतनी बड़ी घटना बिना ज्यादा लोगों के आपस में जुड़े और तैयारी के अंजाम दी ही नहीं जा सकती। साजिश तो वहीं होती है जहां किसी घटना को तैयारी के साथ अंजाम दिया जाए। मेरा ही नहीं इस देश के करोड़ों लोगों का मानना है कि गुलबर्ग सोसायटी की घटना के पीछे सौ फीसदी साजिश थी। भले किसी को दिखे या न दिखे। 





खतरनाक खेल
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जैसा कि मैंने अपने पहले के लेखों में जिक्र किया है, भारत को बर्बाद करने के लिए कुछ लोग साजिश रच रहे हैं। जिनमें राजनीतिक दलों की भूमिका ज्यादा है। खुद को राष्ट्रवादी या देशभक्त कहने वाला शख्स या दल अगर दो समुदायों को आपस में लड़ाकर अगर शासन करना चाहता है तो उससे बड़ा देशद्रोही कोई नहीं है। आप किसी एक समुदाय को खुश करने के लिए दूसरे समुदाय को दबाकर या उसके लोगों को आतंकवादी करार देकर भारत पर निष्कंटक राज नहीं कर सकते। अगर किसी की आबादी 100 है और उसके सामने दूसरे समुदाय की आबादी 10 है तो भी निष्कंटक राज मुश्किल है। क्योंकि 10 लोग किसी न किसी रूप में अपनी आवाज तो उठाएंगे ही। बेहतर तो यह है कि कोई भी राजनीतिक दल 110 लोगों को साथ लेकर भारत पर राज करे और इसे फिर से सोने की चिड़िया बनाए। 


चलते-चलते
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पत्रकार राना अयूब ने गुजरात के दंगों पर एक किताब लिखी है – गुजरात डायरी। इस किताब के बारे में देश के किसी मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) ने कोई खबर नहीं छापी। फ्लिपकार्ट ने इस किताब को आनलाइन बेचने में आनाकानी की। आमेजन बेचने को तैयार हुआ लेकिन अचानक आउट आफ स्टाक बता दिया। सोशल मीडिया के दबाव में किताब आमेजन पर बिकने के लिए वापस लौटी। गुजरात दंगों का सच जानने के लिए ये किताब पढ़ना चाहिए। खासकर उन लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए जिनके लिए उनका अपना धर्म अफीम नहीं है। उन लोगों को भी पढ़ना चाहिए जो जज या पत्रकार बनना चाहते हैं ताकि वे कमजोर लोगों के दर्द को समझने और सच्चाई को अपनी कसौटी पर कसने का माद्दा रख सकें। 


khuphiya ejensiyon ko mathura ke aashram mein hathiyaar nahin kyon nahin dikhate...adaalat ko gulabarg sosaayatee mein saajish kyon nahin dikhatee...

-Yusuf Kirmani

do ghatanaen...
1.mathura mein sarakaaree jameen par kabja jamae baithe jayagurudev ke tathaakathit chelon ko hataane ke lie phaayaring hotee hai, jisamen do pulis aphasar shaheed ho jaate hain. vahaan se bade paimaane par hathiyaar aur gola-baarud baraamad hota hai. beejepee maamale kee vishesh jaanch kee maang karatee hai.

2. ahamadaabaad kee gulabarg sosaayatee mein adaalat ka phaisala 14 saal baad aata hai, jisamen adaalat kahatee hai ki is ghatana ke peechhe koee saajish nahin thee. adaalat 36 logon ko baree kar detee hai aur 24 ko doshee maanatee hai. gulabarg sosaayatee mein godhara dangon ke baad 28 pharavaree 2002 ko poorv saansad ehasaan jaapharee samet 69 logon ko jinda jalaakar maar diya jaata hai. 

dillee se mathura bahut door nahin hai. agar aap kisee bhee gaadee se chalenge to jyaada se jyaada teen ghante mein pahunch jaenge. mathura mein aashram-mandiron kee bharamaar hai. jinake maalikaana hak ko lekar saikadon mukadame adaalaton mein chal rahe hain. lekin sirph do saal pahale jayagurudev ke kuchh tathaakathit chele nihaayat hee vaahiyaat maangon ko lekar aandolan chhedate hain aur javaaharabaag jaisee jagah mein saikadon vargaphut jameen par kabja jama lete hain. inakee maang hai ki 1rupaye mein 100 leetar petrol diya jae, raashtrapati-pradhaanamantree ke chunaav radd kie jaen aur isake alaava bhee nihaayat hee uloolajulool maangen hain. poorvee uttar pradesh ka ek gunda is aandolan kee aad mein hota hai. pulis chupachaap tamaasha dekhatee rahee.

dillee mein enaeee, aaeebee, seebeeaee, dillee pulis ka speshal sel aur na jaane kya-kya suraksha ejensiyaan din-raat aatankavaadee pakadane mein jutee rahatee hain. lekin unhen teen ghante kee dooree par sthit mathura mein eke 47, roket laanchar, grened jaise asalahe jama hone kee bhanak tak nahin lagee. dillee pulis ka vo speshal sel jisane desh ke kaee gaanvon aur shaharon ko aatankavaadiyon kee pharjee sharanasthalee hone ke naam par badanaam kar diya, use ek baaba ke tathaakathit chelon ke hathiyaaron ke jakheere ka pata nahin chala. vo enaeee jo pathaanakot terar ataik kes kee jaanch paakistaan mein jaakar karane ka damakham rakhatee hai, use bhee kuchh pata nahin chala. is maamale mein mulaayam sinh yaadav, shivapaal yaadav ya yoopee ke seeem akhilesh yaadav ke nikamme prashaasan par tippanee karana to vakt barbaad karane jaisa hai lekin jab raashtreey khuphiya aur suraksha ejensiyon ko sambhal, bhatakal, sanjarapur, aurangaabaad, maalegaanv mein chhipe aatankiyon ka pata chal jaata hai, jab use yah tak pata chal jaata hai ki daood karaachee mein kahaan rahata hai to ek baaba ke chelon ke gatividhiyon kee bhanak tak nahin milatee hai.

mathura mein aur kya-kya hota hai, usakee gaharaee mein jaane ka vakt abhee nahin hai. lekin itana bata den ki yahaan par kaee saadhviyon ne kaudee ke daam par jameen lekar apane aashram bana rakhe hain. dillee aur desh ke bahut saaree jagahon se tamaam log saptaah ke ant mein yahaan aaraam pharamaane jaate hain. yahaan par un logon kee baat nahin ho rahee hai jo mathura ke praacheen mandiron mein aastha ke tahat darshan karane jaate hain. baat un aashramon kee ho rahee hai, jinamen aishoaaraam kee har suvidha maujood hai. videshiyon kee bhee in aashramon mein bharamaar rahatee hai. drags kee bikree yahaan par saamaany see baat hai. videshon se yahaan ke aashramon mein jo phanding ho rahee hai, usakee taraph aajatak kisee bhee khuphiya ejensee ka dhyaan nahin gaya.

 aakhir videshiyon kee in aashramon mein kyon dilachaspee hai...agar kisee dharm mein videshiyon kee aastha hai to usaka paalan usee roop mein hona chaahie na ki kisee sahishnu dharm aur apanee sanskrti ke ghaalamel ke saath drags ke istemaal ko aap nae dharm ka naam de den. kul milaakar yahaan par dharm kee aad mein tamaam tarah kee anaitik gatividhiyaan chalaakar ek sahishnu dharm ko badanaam kiya ja raha hai. kya aap yakeen karenge ki mathura mein kuchh aashram aise hain, jinamen jaane ke lie aaeekaard jaaree kie gae hain. men get par baitha gaard har kisee ko jaane kee anumati nahin deta hai. pulis adhikaariyon tak kee himmat nahin hotee hai ki ve kisee aashram mein seedhe ghus jaen. 

ab aap kahenge ki mathura kee ghatana aur gulabarg sosaayatee ke phaisale ko aapas mein kaise joda ja sakata hai aur kyon joda ja raha hai...gujaraat ke dange bhee dharm ke naam par shuru hue the. jab-jab dharm mein raajaneeti ghusatee hai ya raajaneeti dharm ko apane lie istemaal karatee hai, tab-tab katl-e-aam hote hain. paakistaan agar aaj barbaad hai to vahaan raajaneeti dharm ko apane hisaab se istemaal kar rahee hai. vahaan kee sena bhee usaka hissa hai. paakistaan kee sena dvaara khade kie gae mulla-maulavee vahaan ke raajaneetigyon ko khuleaam gaaliyaan dete hain. vahaan kee sena unako shah detee hai aur sanrakshan detee hai. 

bhaarat ko usee taraph tejee se dhakelane kee saajish ho rahee hai. yahaan bhee raajaneetik dal dharm kee dhaal banaakar samudaayon ko baantane mein lage hue hain. in raajaneetik dalon ne tamaam baabaon ko sanrakshan de rakha hai. kaee raajaneetik dalon ne dharm ke aadhaar par alag-alag phrantal sangathan bana rakhe hain jo sirph usee samudaay ke beech kaam karake apane raajaneetik ejende ko aage badhaate hain.
gujaraat naamakar prayogashaala se isakee shuruaat huee. jahaan saaph-saaph do dhaarmik samudaayon ko baant diya gaya aur phir katl-e-aam hua. ...bhaarat mein adaalaton ka bahut sammaan hai. aaj bhee adaalaton ne is jarjar lokatantr ko kisee tarah bacha rakha hai. ye theek hai ki adaalaten sabooton ke aadhaar par chalatee hain. lekin gujaraat mein jo janasanhaar hua kya jaj saahibaan usase naavaakiph the...kyon jaj saahibaan itane bhee sanvedanasheel nahin the ki unhen sahee-galat ka phark na najar aaya ho...lekin hairaanee tab hotee hai jab usee adaalat ko ek sosaayatee mein 69 logon ko jinda jalaakar maar die jaane kee ghatana ke peechhe koee saajish nahin dikhatee. 

28 pharavaree 2002 ko ahamadaabaad shahar mein haalaat badatar the. jisako jahaan jagah mil rahee thee, vaheen sharan le raha tha. ehasaan jaapharee choonki ek raajaneetik dal se jude the, saansad rah chuke the, unake ghar mein gulabarg sosaayatee ke 68 logon ne sharan lee. shaayad ye samajhakar ki yahaan to dangaee haath daalane se rahe. lekin dangaee vahaan pahunche aur unhonne baakaayada yojanaabaddh tareeke se ghatana ko anjaam diya. yah kshanik aavesh mein kisee ek vyakti dvaara kiya gaya narasanhaar nahin tha. isake peechhe baakaayada saajish thee. haan, agar is ghatana mein akela koee shakhs shaamil hota to lagata ki saajish nahin thee lekin itanee badee ghatana bina jyaada logon ke aapas mein jude aur taiyaaree ke anjaam dee hee nahin ja sakatee. saajish to vaheen hotee hai jahaan kisee ghatana ko taiyaaree ke saath anjaam diya jae. mera hee nahin is desh ke karodon logon ka maanana hai ki gulabarg sosaayatee kee ghatana ke peechhe sau pheesadee saajish thee. bhale kisee ko dikhe ya na dikhe. 

khataranaak khel
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jaisa ki mainne apane pahale ke lekhon mein jikr kiya hai, bhaarat ko barbaad karane ke lie kuchh log saajish rach rahe hain. jinamen raajaneetik dalon kee bhoomika jyaada hai. khud ko raashtravaadee ya deshabhakt kahane vaala shakhs ya dal agar do samudaayon ko aapas mein ladaakar agar shaasan karana chaahata hai to usase bada deshadrohee koee nahin hai. aap kisee ek samudaay ko khush karane ke lie doosare samudaay ko dabaakar ya usake logon ko aatankavaadee karaar dekar bhaarat par nishkantak raaj nahin kar sakate. agar kisee kee aabaadee 100 hai aur usake saamane doosare samudaay kee aabaadee 10 hai to bhee nishkantak raaj mushkil hai. kyonki 10 log kisee na kisee roop mein apanee aavaaj to uthaenge hee. behatar to yah hai ki koee bhee raajaneetik dal 110 logon ko saath lekar bhaarat par raaj kare aur ise phir se sone kee chidiya banae. 

chalate-chalate
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patrakaar raana ayoob ne gujaraat ke dangon par ek kitaab likhee hai – gujaraat daayaree. is kitaab ke baare mein desh ke kisee meediya (print va ilektronik) ne koee khabar nahin chhaapee. phlipakaart ne is kitaab ko aanalain bechane mein aanaakaanee kee. aamejan bechane ko taiyaar hua lekin achaanak aaut aaph staak bata diya. soshal meediya ke dabaav mein kitaab aamejan par bikane ke lie vaapas lautee. gujaraat dangon ka sach jaanane ke lie ye kitaab padhana chaahie. khaasakar un logon ko jaroor padhana chaahie jinake lie unaka apana dharm apheem nahin hai. un logon ko bhee padhana chaahie jo jaj ya patrakaar banana chaahate hain taaki ve kamajor logon ke dard ko samajhane aur sachchaee ko apanee kasautee 




Why Intelligence agencies blind in Mathura Ashram weapons ... why Court does not see any Conspiracy  in Gulberg Society ...


-Yusuf Kirmani


Two Incidents ...
Sitting on government land occupied in mthura Jaygurudev firing to remove the so-called disciples, in which two police officers are killed. The arms and ammunition recovered from the mass. BJP demands special investigation of the case.

2. The decision of the court in Ahmedabad's Gulberg Society comes after 14 years in which the court said that there was a conspiracy behind the incident. Court clears 36 people and 24 blame. Godhra riots in Gulberg Society February 28, 2002, including former MP Ehsan Jafri killed 69 people burned alive.

Mathura from Delhi is not far away. If you have any more than three hours by car will take you to run. There is an abundance of temples in Mathura Ashram. Whose ownership of hundreds of cases are pending in courts. But just two years ago, some of the so-called disciples Jaygurudev grossly absurd wage demands movement and in a place like Jwahrbag take control of hundreds of square feet of land. Rs 1 100 liters of petrol in demand that may be given to canceling the presidential election of Prime Minister and also grossly Ululjulul demands. Eastern Uttar Pradesh, in the guise of this movement is a punk. Police quietly bystanders.

Delhi NIA, IB, CBI, Delhi Police Special Cell and not what the security agencies are working day and night to catch terrorists. But three hours away in Mathura AK-47, rocket launchers, grenades were invisible to be stored, such as fireworks. Delhi Police's Special Cell of the villages and cities of the country in the name of the infamous haven for terrorists was fake, a so-called followers of Baba did not find weapons stockpile. NIA which they terror attack case probe Pathankot holds the potential to go to Pakistan, he also did not know anything. In this case, Mulayam Singh Yadav, Shivpal Yadav and Uttar Pradesh Chief Minister Akhilesh Yadav Scraps administration time to waste, so as to comment on the national intelligence and security agencies, but steady, Bhatkal, Sanjrpur, Aurangabad, Malegaon militants hiding out in that is, when it becomes known that Dawood in Karachi, where the remains of a Baba's disciples does not clue activities.

What else happens in Mathura, is not it time to go into details. But tell that to the many nuns who have made his ashram on the ground at throwaway prices. Delhi and many other places of the country, all the people are relaxing weekend here. We are not talking here of those who believe in the philosophy of the ancient temples of Mathura go. Getting to the point, ashrams, which has every comfort of luxury. There is a glut of foreigners in these ashrams. The sale of drugs is common here. The ashrams are getting funding from abroad who, on his side to date have not noticed any intelligence agency.Please. Overall, he can get here in the guise of religion immoral activities being disgraced by running a tolerant religion. Do you believe that there are ashram in Mathura, which are issued to Aikard. Sitting at the main gate guard does not allow everyone to go. Police officers that they would not dare to penetrate directly into the grotto.

Whenever religion or politics, religion in politics Gusati is used each time are decapitation-e-Aam. Pakistan today is doomed if there is using its own politics, religion. There is a part of the army. Pakistan army set up by the mullahs openly abusing the politicians. And ensure the protection of the army, he is fueled.

India on the same side of the plot is fast-pusher. The shield of faith with a political party are engaged in sharing communities. Rhkha all the political parties give protection to these babas. Several political parties based on religion are kept separate frontal organization which only the community by working to further their political agenda.

Namkr laboratory originated from Gujarat. Clearly the two religious communities were divided and re-e-Aam, was killed. ... Is very respectful of the courts in India. The courts still have kept some kind of shabby democracy. It is precisely on the basis of evidence that courts are run. But what happened in Gujarat massacres Sahibaan judges were ignorant of him ... Why not judge Sahibaan were so sensitive that they saw no difference between right and wrong ... but surprising in a society occurs when the same court 69 people burnt alive to death do not see a conspiracy behind the incident.

February 28, 2002, things were worse in the city of Ahmedabad. Which was the place where the mill, was taking refuge there. Ehsan Jafri, were linked to a political party because, being a former MP, Gulberg Society, 68 people took refuge in his house. Maybe they are thinking that to get involved even if marauders. But the mob had arrived and been done with proper planning. The massacre was carried out by a single person impulsively did. Behind it was a regular conspiracy. Then there is the plot where the preparation for an event to be executed with. I do not believe that the country's millions of Gulberg Society hundred percent behind the event was a conspiracy. Or even if you do not see anyone.

extreme sports
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As I mentioned in my previous articles, some people in India are conspiring to ruin. Much of which is the role of political parties. Nationalist or patriotic person or party asking themselves if the government wants to Ldhakr two communities together, then it's no big traitor. You press a community to appease the community or its people by terrorists can not rule India Nishkantk. If someone has a population of 100 and 10 in front of him, even if the population of the community is difficult to rule Nishkantk. 10 people in one way or another because it will raise your voice only. Better so that no political party to rule over India with 110 people and made it again the golden bird.

...and in Last
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Ayub Rana journalist has written a book on the Gujarat riots - people Gu. This book about the country any media (print and electronic) has published no news. Flipkart's reluctance to sell the book online. Amazon was willing to sell out-of-stocks suddenly told. Social media pressure returned to selling the book on Amazon. Gujarat riots should read this book to learn the truth. Should read especially those for whom their religion is opium. Journalists should also read those who want to be a judge or vulnerable people so that they understand the pain and reality can have the courage to tighten their criteria.







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