Pages

Monday, February 23, 2009

स्लमडॉग मिलियनेयर : इन खुशियों को साझा करें


-अलीका
स्लम डॉग मिलियनेयर को 8 आस्कर पुरस्कार मिलने की खुशी कम से कम प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जबर्दस्त ढंग से दिखाई दे रही है। हालांकि यह मूल रूप से ब्रिटिश फिल्म है लेकिन हम भारतीयों को ऐसी खुशियां साझा करते देर नहीं लगती जिसमें भारत के लोगों का कुछ न कुछ योगदान रहता हो। रिचर्ड एडनबरो की फिल्म गांधी से लेकर स्लम डॉग... तक मिले पुरस्कारों से तो यही बात साबित होती है। लेकिन स्लम डॉग कई मायने में कुछ अलग हटकर है। जैसे इसके सारे पात्रों में भारतीय छाए हुए हैं और इस फिल्म की जान इसका संगीत तो बहरहाल खालिस देसी ही है। मुझे अच्छी तरह याद है कि इस फिल्म में ए. आर. रहमान के म्यूजिक को जब जारी किया गया था और गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतने के बाद तो लोगों ने मुंह बना लिया था और स्लम डॉग... के म्यूजिक को पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया था। लोग आपसी बातचीत में कहते थे कि रहमान ने इससे बेहतर म्यूजिक कई फिल्मों में दिया है। यह उनका बेस्ट म्यूजिक नहीं है।

बहरहाल, अपनी-अपनी सोच है। देश का एक बड़ा हिस्सा इस फिल्म को मिले आस्कर पुरस्कार से उत्साहित है लेकिन अब भी इस बात की चर्चा तो हो ही रही है कि इस फिल्म के बहाने भारत की गरीबी को बेचा गया है। हालांकि इस पर इस फिल्म के रिलीज होने के साथ काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन अब आस्कर मिलने के बाद इस चर्चा का फिर से उठना स्वाभाविक है। लेकिन भारत की गरीबी को बेचने के नाम पर इस फिल्म का विरोध करना नितांत गलत है। इससे पहले कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली ढेरों डॉक्युमेंटरी फिल्मों में भारत की गरीबी का चित्रण किया गया है। भारत की गरीबी या यहां धर्म के नाम पर दंगा-फसाद होना एक कड़वी सच्चाई है, आखिर फिर हम लोग क्यों और दुनिया में किन लोगों से अपनी गरीबी छिपाना चाहते हैं। माफ कीजिएगा शाहरूख खान या आमिर खान भारत की जो रूपहली तस्वीर अपनी फिल्मों में दिखाते हैं क्या वही सच्चाई है। करण जौहर की जिस सुपरहिट फिल्म कभी खुशी कभी गम में भारत की जिस रईसी को दिखाया गया है, क्या वह आम भारतीय की हकीकत है। दरअसल, हम लोग अपने देश में चाहे जितनी वीभत्स फिल्म बनाकर यहां की भाषा और संस्कृति का मजाक उड़ाएं तो कोई बात नहीं लेकिन अगर वही काम कोई विदेशी करता है तो हमारी अस्मिता फौरन जाग जाती है और हमें तमाम राष्ट्रहित दिखाई देने लगते हैं।
मुद्दा तो यह उठना चाहिए कि इससे पहले मदर इंडिया जैसी फिल्म या बॉलिवुड की किसी भी फिल्म को आस्कर की जूरी ने पुरस्कार लायक क्यों नहीं माना। आमिर खान की बच्चों के मनोविज्ञान पर बनी सशक्त फिल्म तारे जमीन पर कम से कम एकाध आस्कर पुरस्कार लायक तो है ही लेकिन उसकी अनदेखी क्यों की गई। दरअसल, हम भारतीयों की पुरानी आदत रही है लकीर पीटने की और हम लोग भी उसी सिलसिले को आगे बढ़ाए चले जा रहे हैं। खुद नया करने की बजाय सारा वक्त दूसरों को कोसने में लगाते हैं।

3 comments:

हरि said...

हर संस्‍था का अपना क्राइटेरिया होता है और उसी के तहत पुरस्‍कारों की घोषणा होती है। ऑस्‍कर में युरोपीय नजरिया और वहीं की प्राथमिकताएं होती हैं इसलिए मदर इंडिया को पुरस्‍कार क्‍यों मिलता।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हम स्लम डॉग इंडियन जब ओबामा की जेब मे हनुमान ? देख कर उसके फ़िदा हो गए . इसमे तो अपने बहुत से देसी है इसलिए जय हो जय हो जयजय हो

अंशुमाली रस्तोगी said...

आपकी टिप्पणी से कुछ हद तक सहमति बनती है।