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Thursday, November 13, 2008

जिंदगी की दास्तां कैसे लिखें



इधर कई दिनों से लिखने की बजाय मैं पढ़ रहा था। खासकर गजलें और कविताएं। यहीं आपके तमाम ब्लॉगों पर। मैं मानता हूं कि तमाम बड़े-बड़े लेख वह काम नहीं कर पाते जो किसी शायर या कवि की चार लाइनें कर देती हैं। समसामयिक विषयों पर कलम चलाने वाले कृपया मेरी इस बात से नाराज न हों। क्योंकि इससे उनकी लेखनी का महत्व कम नहीं हो जाता। लेकिन यकीन मानिए की गजल या कविता से आप सीधे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। आपको लगता है कि यह शायर की यह बात आपकी गजल को कहीं छू गई।
गजल और कविता के ब्लॉगों की सर्फिंग के दौरान एक बात जो मैंने खासतौर से महसूस की कि शायरों की एक बड़ी जमात मौजूदा दौर के हालात पर बेबाकी से अपनी कलम चला रही लेकिन उसकी तुलना में हिंदी में यह काम जरा कम ही हो रहा है। मैं यहां हास्य के नाम पर मंच पर फूहड़ कविताई करने वालों की बात नहीं कर रहा जो दिहाड़ी के हिसाब से किसी भी विषय पर कुछ भी लिख मारते हैं।
उम्मीद है कि इससे अगली पोस्ट में मैं दो ऐसे शायरों से आपका परिचय कराऊं जो बेहद खामोशी से अपने रचना संसार में लगे हुए हैं। हाल ही में इनकी दो पुस्तकों का विमोचन भी हुआ, जिसके बहाने मुझे इनके बारे में और जानने का मौका मिला। लेकिन आज यहां जिन लोगों की गजल और कवितो को मैं आपके लिए पेश करना चाहता हूं, उन्हें पढ़ने के बाद आप कहेंगे कि ऐसे शायरों और कवियों तक सभी को पहुंचना चाहिए।
जिन शायरों या कवियों को मैंने ब्लॉगों पर पढ़ा है, हो सकता है कि उनमें से बहुतों की रचनाएं आपकी नजर से गुजरी हुई हों। लेकिन यहां मैं उनको दोबारा से इसलिए पेश करना चाहता हूं कि वे लोग जो उन शायरों या कवियों के ब्लॉगों पर नहीं गए हैं, वे वहां जाएं। मेरा खासकर निवेदन उन साथियों से है जो भारत से बाहर रह रहे हैं और उनमें अपने वतन के लिए कुछ जज्बात बाकी हैं।
जिनसे आजकल मैं बहुत ज्यादा प्रभावित हूं, उनका नाम है – डॉ. अमर ज्योति। इससे ज्यादा मैं उनके बारे में और नहीं जानते। उनके ब्लॉग तक पहुंचा भी अपने ही ब्लॉग के जरिए और जब उनकी रचनाएं पढ़ीं तो लगा कि बस पढ़ते ही जाएं...



डॉ. अमर ज्योति की कलम से

दास्तां कैसे लिखें

धूल को चंदन, ज़मीं को आसमाँ कैसे लिखें?
मरघटों में ज़िंदगी की दास्तां कैसे लिखें?


खेत में बचपन से खुरपी फावड़े से खेलती,
उँगलियों से खू़न छलके तो हिना कैसे लिखें?


हर गली से आ रही हो जब धमाकों की सदा,
बाँसुरी कैसे लिखें; शहनाइयां कैसे लिखें?

कुछ मेहरबानों के हाथों कल ये बस्ती जल गई;
इस धुएँ को घर के चूल्हे का धुआँ कैसे लिखें?

रहज़नों से तेरी हमदर्दी का चरचा आम है;
मीर जाफर! तुझको मीर-ऐ-कारवाँ कैसे लिखें?



मीडिया को तो कहानी चाहिए
राम जी से लौ लगानी चाहिए;
और फिर बस्ती जलानी चाहिए।

उसकी हमदर्दी के झांसे में न आ;
मीडिया को तो कहानी चाहिए।

तू अधर की प्यास चुम्बन से बुझा;
मेरे खेतों को तो पानी चाहिए।

काफिला भटका है रेगिस्तान में;
उनको दरिया की रवानी चाहिए।

लंपटों के दूत हैं सारे कहार,
अब तो डोली ख़ुद उठानी चाहिए।

कैसा सन्नाटा है जिंदान की तन्हाई में

टूटते सपनों की ताबीर से बातें करिये,
जिंदगी भर उसी तसवीर से बातें करिये।
कैसा सन्नाटा है ज़िन्दान की तनहाई में,
तौक़ से, पाँव की ज़न्जीर से बातें करिये।


सर उठाने लगे हिटलर के नवासों के गिरोह,
अब कलम से नहीं, शमशीर से बातें करिये।


दिल के बहलाने को तिनकों से उलझते रहिये,
बात करनी है तो शहतीर से बातें करिये।


पाँव के छाले मुक़द्दर को सदा देते हैं;
हौसला कहता है तदबीर से बातें करिये।

नीरज गोस्वामी की कलम से

खौफ का खंजर

ख़ौफ़ का ख़ंज़र जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आजकल इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ

साथियो ! गर चाहते हैं आप ख़ुश रहना सदा
लीजिए फिर हाथ में जो काम है छूटा हुआ

दीन की , ईमान की बातें न समझाओ उसे
रोटियों में यारो ! जिसका ध्यान है अटका हुआ

फूल ही बिकता हैं यारो हाट में बाजार में
क्या कभी तुमने सुना है ख़ार का सौदा हुआ

झूठ सीना तान कर चलता हुआ मिलता है अब
हाँ, यहाँ सच दिख रहा है काँपता-डरता हुआ

अपनी बद-हाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िये
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ

तजरिबों से जो मिला हमने लिखा ‘नीरज’ वही
आप की बातें कहाँ हैं, आप को धोखा हुआ


लेकिन नीरज की इस गजल को उनके ब्लॉग पर टिप्पणीकार अल्तमश ने कुछ सुधार कर पेश किया है, जिसे आप भी पढ़ें। अल्तमश आपके इस ब्लॉग पर भी विभिन्न विषयों पर टिप्पणी कर चुके हैं। पेश है अल्तमश की कलम से नीरज गोस्वामी की सुधरी हुई गजल-

खौफ का खंजर जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आजका इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ।
चाहते हैं आप खुश रहना अगर, तो लीजिये,
हाथ में वो काम जो मुद्दत से है छूटा हुआ।
दीनो-ईमाँ की नसीहत उस से है करना फुजूल,
जिसका दिल दो वक़्त की रोटी में है अटका हुआ।
फूल की खुशबू ही तय करती है उसकी कीमतें,
क्या कभी तुमने सुना है, खार का सौदा हुआ।
झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब,
सच तो बेचारा है दुबका, कांपता डरता हुआ।
तजरबों से जो मिला हमने लिखा नीरज वही,
हम-ज़बां हैं आप मेरे, ये बहुत अच्छा हुआ।


बाकी शायरों व कवियों के बारे में जल्द ही।

6 comments:

Udan Tashtari said...

अमर ज्योति जी बेहतरीन रच गई हैं..आभार यहाँ पेश करने का.

अल्पना वर्मा said...

Amar jyoti ji ki rachnayen padhin --bahut hi achchee hain--un sey parichay karaane ke liye dhnywaad-
-neeraj ji ko hum padhtey rahtey hain ve bahut hi saral aur sundar likhtey hain---abhaar sahit-

"अर्श" said...

खेत में बचपन से खुरपी फावड़े से खेलती,
उँगलियों से खू़न छलके तो हिना कैसे लिखें?

amar ji ki rachana ke kya kahane ,,bahot khub..anand aagaya..

neeraj ji ki lekhani ki apni alag hi shaili hai


apka bahot bahot abhar..

adil farsi said...

यूसुफ किरमानी जी, जो काम आप ने किया वो सराहनीय है बहर में ही कर देना लफ्जों को क्या शायरी है...

रौशन said...

बेहद संजीदा और सामयिक लेखनी है इन पंक्तियों से रु-ब-रु कराने के लिए शुक्रिया

shan said...

उम्मीद है एक आस जगी