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Tuesday, January 25, 2011

उत्सव शर्मा...हर शहर से निकल कर आएंगे

उत्सव शर्मा का यह दूसरा हमला है ऐसे लोगों पर, जिन पर आरोप है कि उन्होंने बेटियों को मरने पर मजबूर किया या फिर उन्हें मार दिया। मैं यहां उत्सव के समर्थन में खड़ा हूं। मैं जानता हूं कि ऐसा कह कर मैं भारतीय संविधान और यहां की अदालतों की तौहीन कर रहा हूं लेकिन अगर अब उत्सव के लिए लोग न उठ खड़े हुए तो आगे स्थितियां और भयावह होने वाली हैं। अभी बिनायक सेन को अदालत द्वारा सजा सुनाने के बाद भारतीय मीडिया और यहां के तथाकथित बुद्धिजीवियों की जो सांप-छछूंदर वाली स्थिति रही है, उसे देखते हुए बहुत जल्द बड़ी तादाद में उत्सव और बिनायक पैदा होंगे। इस समर्थन को इस नजरिए से न देखा जाए कि मेरे जैसे लोग हिंसा को अब कारगर हथियार मानने लगे हैं। नहीं, ऐसा नहीं है। यह हिंसा नहीं, उन असंख्य भारतीय के जज्बातों का समर्थन है जो इन दिनों तमाम वजहों से बहुत आहत महसूस कर रहा है।

इधर आप लोग इस तरह की खबरें भी पढ़ रहे होंगे कि काफी संख्या में पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक अपराध की तरफ मुड़ रहे हैं। ऐसे युवक जब खद्दरधारी नेताओं और उनसे जुड़े बेईमान अफसरों को जनता के पैसे को लूटते हुए देखते हैं तो इस व्यवस्था से उनका मोह भंग होने लगता है। वे सोचते हैं कि जब यह लोग शॉर्टकट मनी बना सकते हैं तो हम ही क्यों पीछे रहें। यहां पर उत्सव शर्मा को ऐसे युवकों की कतार में नहीं खड़ा किया जा रहा है। दोनों में महीन सा फर्क है – वह है व्यवस्था के प्रति विद्रोह।

आरुषि तलवार के पिता डॉ. राजेश तलवार ने मंगलवार को गाजियाबाद की एक अदालत में अर्जी लगाई कि उनकी बेटी की हत्या की जांच फिर से कराई जाए। यानी फिर से वही लकीर पीटने की कहानी और कई साल तक फैसले के इंतजार में केस को उलझाने की कोशिश। आरुषि और डॉ. तलवार के नौकर हेमराज की हत्या के फौरन बाद नोएडा पुलिस ने डॉ. राजेश तलवार को बतौर मुलजिम गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन अचानक नोएडा पुलिस खलनायक साबित हो गई। केस सीबीआई को सौंपा गया। अब सीबीआई की चार्जशीट कह रही है कि नोएडा पुलिस के जांच की दशा सही थी। डॉ. तलवार पर शक पैदा होता है।

अदालत का जो भी फैसला आए या फिर जांच एजेंसियां कुछ भी कहें समाज ने इस केस में डॉ. राजेश तलवार के प्रति जो धारणा बना ली है उसे अदालत और जांच एजेंसियां बदल नहीं सकतीं। उत्सव शर्मा जैसे लोगों का गुस्सा इन धारणाओं की वजह से ही भड़का है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों के प्रति पैदा होती नफरत का भी नतीजा है।

उत्सव शर्मा (Utsav Sharma) ने हरियाणा के पूर्व डीजी पुलिस एस. पी. एस. राठौर पर हमला कर इसी तरह अपने गुस्से का इजहार किया था। राठौर को अदालत सजा सुना चुकी है। यह बूढ़ा शख्स एक किशोरवय की लड़की के यौन उत्पीड़न का दोषी है। उस लड़की के पिता ने जब पुलिस में एफआईआर करानी चाही तो राठौर ने पुलिस की वर्दी के जोर उसके पूरे घर को बर्बाद कर दिया। लड़की को चंडीगढ़ के स्कूल ने राठौर के दबाव पर स्कूल से निकाल दिया। लड़की ने खुदकुशी कर ली। भाई पर इतने मुकदमे पुलिस ने दर्ज किए कि उसे जेल जाना पड़ा। पिता को बेइज्जत होना पड़ा।

उस डीजी को हरियाणा में मेडल पर मेडल मिलते रहे। नेता अपनी सभाओं में उसका गुणगान करते रहे और पंचकूला का एक परिवार इंसाफ के लिए भटकता रहा। हालांकि उसे कोर्ट से ही इंसाफ मिला लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राठौर ससम्मान नौकरी से रिटायर हो चुका था। पैसे और रसूख के दम पर अदालत की सजा महज एक रस्म अदायगी बनकर रह गई। ऐसे में उत्सव शर्मा जैसे लोगों को अगर खून नहीं खौलेगा तो क्या होगा। उसने जो कुछ किया वह ठीक ही था। उसे आप चाहे ताजा घटना के बाद सनकी या पागल करार दे दें तो भी राठौर या डॉ. तलवार जैसे लोगों के प्रति पैदा हो रही नफरतों को रोका नहीं जा सकेगा।

अब ऐसा ही कुछ भ्रष्टाचार के मामलों में भी होने वाला है। नेताओं को सुनने तो खैर अब भी लोग नहीं पहुंच रहे हैं लेकिन यह बहुत जल्द होगा कि लोग इनकी सरेआम बेइज्जती भी करेंगे। भारत में असंख्य उत्सव शर्मा गांव से लेकर शहर के हर चौराहे पर ऐसे नेताओं का इंतजार करते नजर आएंगे। करप्शन के मामलों को लेकर भारतीय जनमानस की धारणा कुछ ऐसी ही बनती जा रही है। बेशक खादी वाले या उनके जैसे अन्य इस पब्लिक को कभी तो लाल चौक पर तिरंगे फहराने की आड़ में उसका ध्यान ऐसे मुद्दों से मोड़ने की कोशिश में जुटे रहें लेकिन लोगों की सोच में बदलाव साफ नजर आ रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला हो या फिर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, तमाम खद्दरधारियों, भगवाधारियों और जाति आधारित राजनीति करने वालों का आपसी गठबंधन साफ नजर आता है। चोर-चोर मौसेरे भाई। इन से उत्सव शर्मा एक नायक बनकर आया है। जरूरत है हर शहर में ऐसे उत्सव शर्मा को आगे लाने की। भारत के लिए अभी जो सबसे लड़ाई है वह यहां के भ्रष्ट हो चुकी व्यवस्था को बदलने की है, लोगों को इंसाफ दिलाने की है। लाल चौक तो हमारा अपना है, वहां हमें झंडा फहराने से कौन रोकेगा। लेकिन मुद्दों से भटकाने वालों को सबक सिखाने की जरूरत जरूर है।

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