हर मसजिद के नीचे तहख़ाना ........................................... -यूसुफ किरमानी हर मसजिद के नीचे खोदो, मिल जाएगा तहख़ाना मालूम है, नफ़रत के ढेर पर है तुम्हारा तोपख़ाना। रोज़ाना आता है वो, नया हंगामा ओ दहशत लेकर मुल्क के एंकर बनाते हैं, स्टूडियो में नया बुतखाना। सियासत का हर दांव मुल्क की मिल्लत पर भारी है नहीं आती कोई आवाज़, ख़ामोश है नक्कारखाना। ये ज़हरीली फिज़ा महज़ मौसमी नहीं है जनाबे आला अहले सियासत ही चला रहे हैं, हर घर में कारख़ाना। मत करो इंसाफ की ढोंगी बातें, उसकी बातों का क्या मालूम है कहाँ से चलता है सरमायेदार का छापाखाना। टीवी चैनल कर नहीं सकते अपने मुल्क की सच बातें बताते हैं पाकिस्तान को शरीफ़ों ने बनाया कबाड़ख़ाना। यूसुफ ए किरमानी हिला दो राजा का सिंहासन जनता भूखी है, जला दो अब उसका नेमतखाना। - यूसुफ किरमानी copyright2024@YusufKirmani
A delicate love story from Gaza by Yusuf Kirmani रमल्लाह , फिलिस्तीन के एक छोटे से घर में , अमल नाम की एक युवती खिड़की के पास बैठी थी , जिसके हाथों में एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में ओसामा अशकर थे । उनके शौहर , जिनसे वह 23 साल से कभी मिली नहीं थी। उनकी प्रेम कहानी चिट्ठियों में लिखी गई थी , जेल की दीवारों के पार फुसफुसाई गई थी। हर मुश्किल के बावजूद उनकी प्रेम कहानी लिखी गई। ओसामा को 19 साल की उम्र में इज़राइली सेना ने गिरफ्तार कर लिया था , उन पर ग़ाज़ा में इज़राइल के कब्जे के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। फिलिस्तीन के लोगों के लिए एक ऐसी आम नियति जो कई लोगों को तोड़ देती है। लेकिन ओसामा अकेले नहीं थे। अपनी जेल की सलाखों के पीछे , उन्हें एक ऐसी महिला के शब्दों से सुकून मिल रहा था , जो उनकी पत्नी बनने वाली थी। (ओसामा अशकार और अमल का असली फोटो ) अमल , उस समय 18 साल की थी। अमल ने ओसामा की बहादुरी और हिम्मत की कहानी खान यूनस से लेकर रामल्लाह की गलियों में सुनी। ओसामा की कहानी से प्रेरित होकर , उन्होंने ओसामा अशकर को खत ...
- प्रताप भानु मेहता हरियाणा राज्य बनाम प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद केस आप जानते होंगे। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित स्तंभकार और विचारक प्रताप भानु प्रताप के इस लेख में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ हैं। इसे अवश्य पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का हरियाणा राज्य बनाम अली खान महमूदाबाद मामले में आदेश उन लोगों की रीढ़ में सिहरन पैदा करने वाला है, जो संवैधानिक मूल्यों की परवाह करते हैं। माननीय जजों ने, सौभाग्यवश, प्रोफेसर खान को जमानत दी। उनकी गिरफ्तारी हमारे नागरिक स्वतंत्रता संरक्षण के मामूली मानकों के हिसाब से भी निंदनीय है। लेकिन यह आदेश, राहत देने के बावजूद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण तो कमजोर हुआ। हम अब एक ऐसे संवैधानिक शासन में हैं जिसमें कोर्ट की परोपकारी उदारता (जमानत देना, जो अब यही बन गया है) से आगे दमनकारी नींव रख दी गई है। ऐसा होने के कई कारण हैं। पहला, आदेश की शर्तें स्वयं में अधिकारों का अनुचित हनन हैं। खान, एक शिक्षाविद, को अपना पासपोर्ट जमा करने और लिखने से बचने के लिए कहा गया है। यह राहत की बात है कि वे जेल में नहीं हैं।...
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