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Thursday, March 4, 2010

तू मुसलमान है तो क्यों है...

तमाम वजहों से मुसलमान हर वक्त चर्चा में रहता है लेकिन इन दिनों कुछ ज्यादा चर्चा में है। कभी किसी ब्लॉग पर तो कभी किसी अखबार में। लगता है कि इस समय देश का सबसे जरूरी काम मुसलमानों पर चर्चा करना ही रह गया है। तो मैं भला पीछे क्यों रहूं। मैं अपने इस ब्लॉग पर इस चर्चा को जानबूझकर कर रहा हूं। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों पर फिल्म अभिनेता शाहरुख खान की टिप्पणी के बाद उनकी फिल्म माई नेम इज खान का शिवसेना के गुंडों ने जिस तरह से विरोध की कोशिश की, उसे इस देश के लोगों ने अपने ही ढंग से जवाब देकर उनकी कोशिश को तार-तार कर दिया। हालांकि शिवसेना के लोग यह जाने बिना विरोध कर रहे थे कि हो सकता है कि यह शाहरुख की अपनी फिल्म को सफल बनाने के लिए की गई चालाकी हो, क्योंकि मुझसे निजी बातचीत में तमाम मुस्लिम लोगों ने कहा कि यह सब शाहरुख की चालाकी थी, जिसमें शिवसेना पस्त हो गई। लेकिन मैं शाहरुख पर कोई शक किए बिना इस बात को आगे बढ़ाना चाहता हूं।

इस देश में कट्टरवाद के पोषक एक खास किस्म के तालिबानियों (मैं यहां किसी धर्म विशेष का नाम नहीं ले रहा हूं, आप समझदार हैं) ने जो माहौल बना दिया है, उसमें आम मुसलमान क्या सोचता है, उस पर विचार करना जरूरी हो गया है। चाहे वह किसी राजनीतिक दल का मंच हो, आपका दफ्तर हो या फिर मीडिया हो, एक बहुत खतरनाक कोशिश हो रही है सभी संप्रदायों या धर्म के लोगों को आपस में बांटने की। यानी अंग्रेज जो काम अधूरा छोड़कर गए थे, उसे अब कुछ लोग हवा देना चाहते हैं। यह काम बहुत संगठित तरीके से किया जा रहा है।

मेरे अभिन्न मित्र धीरेश सैनी का ब्लॉग है - एक जिद्दी धुन । धीरेश ने अपने ब्लॉग पर मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन को कतर देश की नागरिकता मिलने पर एक लेख लिखा, जिस पर विरोध में आई टिप्पणियों को आप पढ़ेंगे तो आपको हालात का अंदाजा हो जाएगा। लोग किस गिरी हुई हद तक सोचते हैं, उसका गवाह हुसैन का मुद्दा है। मैंने अपने इसी ब्लॉग पर जब पुणे ब्लॉस्ट पर द हिंदू अखबार की एक रिपोर्ट छापी तो फिर उसी तरह की टिप्पणियां दिखाई पड़ीं। अब देखिए जब मैं बुरके के खिलाफ लेख लिखता हूं तो वही तमाम लोग उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। यानी ऐसे लोगों में एक उम्मीद दिखाई देती है कि देखों एक मुसलमान किस तरह अपनी ही बिरादरी एक मामले पर चोट कर रहा है। लेकिन उसी मुसलमान की बाकी बातें कोई पसंद करने को तैयार नहीं है। धीरेश सैनी के ब्लॉग का लिंक- http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

इसके बाद मुसलमानों पर हाल ही में तीन ब्लॉगों पर ताजा पोस्ट देखने को मिली। भड़ास ब्लॉग पर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने एक पोस्ट लिखी - आरएसएस-अमेरिका भाई-भाई। इस लेख में चतुर्वेदी जी ने लिखा है कि किस तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साजिश करके मुसलमानों को उसमें फंसाया जा रहा है। इस खेल में संघ परिवार से लेकर अमेरिका तक शामिल है। हालांकि उस लेख से यह ध्वनि भी निकलती है कि मुसलमान तो पिटने के लिए ही बना है। बहरहाल, वह पूरा लेख पढ़ें तो आप समझ जाएंगे। जगदीश्वर चतुर्वेदी के ब्लॉग का लिंक- http://bhadas.blogspot.com/2010/02/blog-post_1655.html

अभी-अभी मुझे एक और ब्लॉग पर जाने का मौका मिला। ब्लॉग का नाम है आई एम फौजिया डॉट ब्लॉग स्पाट कॉम । इस ब्लॉग को पेशे से रेडियो जॉकी फौजिया रियाज चलाती हैं। उनकी बहुत ज्यादा तारीफ न करते हुए, मैं आप लोगों से अनुरोध करता हूं कि उनके ब्लॉग पर जाकर ताजा पोस्ट पढ़ें- मैं मुसलमान हूं। इस लेख में फौजिया ने एक दर्द बयान किया है कि नास्तिक होने के बावजूद किस तरह उन्हें पाक समर्थक माना जाता है। यह सब उनके साथ अभी से नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान भी हुआ। वह सेकुलर विचारधारा की है लेकिन उन्हें बार-बार अपने देशभक्त होने की गवाही देनी पड़ती है। फौजिया के ब्लॉग का लिंक- http://iamfauziya.blogspot.com/2010/03/blog-post.html


अंत में एक बार फिर से धीरेश के ब्लॉग एक जिद्दी धुन की चर्चा करना चाहता हूं। धीरेश ने उस पर लेखक-कवि-पत्रकार विष्णु नागर की एक कविता लगाई - क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं। उस कविता पर एक मुस्लिम सज्जन ने बेहूदा टिप्पणी की, जिसका मैंने धीरेश के ब्लॉग पर विरोध भी किया। उस कविता में मुसलमान होने की विडबंना कुछ अपने ढंग से ही बयान की गई थी। वह कविता उन मुस्लिम सज्जन को समझ नहीं आई थी और उन्होंने बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर दी थी। मेरे अलावा भी तमाम लोगों ने उसका प्रतिवाद किया। आप लोग उस कविता को पढ़ें और जानें कि मनमोहन, विष्णु नागर या धीरेश सैनी जैसे लोग क्या सोचते हैं और क्या कहना चाहते हैं। भारत को शिव सेना या मुन्ना बजरंगी टाइप जैसे मुट्ठी भर लोगों समूह अपनी तरह हांक नहीं सकता। ऐसे लोगों के रास्ते में विष्णु नागर और धीरेश सैनी जैसे लोग एक मजबूत दीवार की तरह हैं।


विष्णु नागर की वह शानदार कविता


क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मेरे दस सिर हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मेरे बीस हाथ हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मैंने सीता का अपहरण किया है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
सोने की लंका मेरी राजधानी है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मुझे खाक में मिला दिया जाएगा
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

लेकिन मेरी तुलना रावण से करना भी ज़्यादती है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

मेरी क्या हैसियत
कि मैं अट्टहास कर सकूँ
मेरी क्या हस्ती
कि मैं सीता का अपहरण करने की सोच भी सकूँ
मैं हूँ क्या
जो सोने की लंका में रह सकूँ
मैंने ऐसा किया क्या जो तुलसी के राम के हाथों
मरने की कल्पना भी कर सकूँ

क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

(धीरेश सैनी के ब्लॉग से साभार)
***

मैं मुसलमान हूं

-फौजिया रियाज

मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ है यहीं पली बड़ी हूँ अपने मुल्क से बेहद प्यार है. जब छोटी थी तो स्कूल में जब भी किसी क्लास में पाकिस्तान के बारे में ज़िक्र होता तो सब मेरी तरफ देखने लगते. मुझे अपने क्लासमेटस पर बेहद गुस्सा आता. उस वक़्त मेरा बच्चा मन यही सोचता जब इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच होता है तब मैं इंडिया के जीतने की दुआएं मांगती हूँ. फिर ऐसा क्यूँ? सब पाकिस्तान का ज़िक्र आते ही मेरी तरफ क्यूँ घूरते हैं.

खैर वो बचपन की बात थी पर अब भी हालात बदले नहीं हैं. मेरे ऑफिस में एक जनाब हैं जिन्हें पाकिस्तान से बेहद नफरत है और वो इस नफरत को भारत के प्रति अपना देशप्रेम मानते हैं. पाकिस्तान से नफरत यानी हिंदुस्तान से देशप्रेम ये फिलोसोफी मुझे आजतक समझ नहीं आई. कहते हैं की दोनों मुल्कों के आम लोगों के दिल में एक दुसरे के लिए प्यार है और हुकूमत अपने फायदे के लिए जंग करती है. मगर असल में दोनों ही मुल्कों के आम लोगों के बीच बेपनाह नफरत है. बंटवारे के वक़्त सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं बंटा था बल्कि दिल भी बंट गए थे.

मैं नमाज़ नहीं पढ़ती रोज़े नहीं रखती खुद को नास्तिक मानती हूँ पर ऑफिस में एक शिवसेना समर्थक जनाब की बातें सुन कर लग रहा है की मैं खुद को नास्तिक कह कर पल्लू नहीं झाड सकती. नास्तिकता मेरी विचारधारा है पर जन्म से मैं एक मुसलमान हूँ. इस्लामिक परिवेश में पैदा हुई हूँ, माँ बाप बड़ी बहन, खानदान के लोग सब नमाज़ पढ़ते हैं रोज़े भी रखते है पर साथ ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में हिंदुस्तान की जीत पर ख़ुशी मनाते हैं. जब कहीं ब्लास्ट हो तब वो भी उतने ही परेशां या दुखी होते हैं जितना कोई गेंर मुस्लिम. हालही में मेरे एक दोस्त को किसी ने आतंकवादी कहा क्यूंकि कसाब के ऊपर हो रही किसी debate में उन्होंने कहा "कसाब को इतनी जल्दी फांसी नहीं दी जा सकती क्यूंकि पुलिस को कसाब से बहुत कुछ उगलवाना हज़ाहिर सी बात है यही अगर किसी गेंर मुस्लिम ने कहा होता तो उसकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठता.
ये सब सोच कर आँख में उसी तरह आंसू आ जाते है जिस तरह राष्ट्रगान सुनते हुए जज़्बात में पलकें भीग जाती हैं.

(फौजिया रियाज के ब्लॉग से साभार)

8 comments:

शरद कोकास said...

यह शब्द आपके भीतर से कितनी तकलीफों के बाद निकले होंगे मै समझ सकता हूँ ..उसी तरह से जैसे विष्णु नागर के भीतर से यह कविता या देवीप्रसाद मिश्र के भीतर से कविता "मुसलमान " निकली होगी ।

निर्मला कपिला said...

निशब्द हूँ कुछ कहते नही बन रहा मगर आपके दर्द को दिल से महसूस किया जा सकता है। अगर कोई अच्छा इन्सान बनना चाहे भी तो लोग कहाँ रहने देते हैं । किसी भी सही सोच वाले इन्सान के मन से नागर जी जैसी कविता और फौजिया जी जैसे एहसास उठेंगे ही । मगर चंद लोगों के उन्मान्द से उन्हे। भूल जाना ही बेहतर है। धन्यवाद और शुभकामनायें

शहरोज़ said...

शरद कोकास से सहमत.जगदीश्वर जी का लेख साभार हमने हमज़बान.पर भी दिया था.
शरद कोकास से सहमत.जगदीश्वर जी का लेख साभार हमने हमज़बान.पर भी दिया था.
ढेरों ब्लॉग ऐसे हैं जहां कूड़ा और फ़िज़ूल बकवास ही पढने को मिलती है.मैं हमज़बान पर कोशिश कर रहा हूँ की अच्छे ब्लॉग का लिंक दूं..आपका भी लिंक दिया है.

Sundar Lal said...

ओह, कितनी बढ़िया तस्वीर है. विष्णु नागर जी की कविता का भावार्थ भी लिख दीजिये.

संजय बेंगाणी said...

बजरंगदल, शिवसेना के विरूद्ध मुस्लिम से ज्यादा हिन्दु है. मुझे कट्टर हिन्दु माना जाता है, मगर मेरा मेरे ब्लॉग पर ऐसे संगठनों के विरूद्ध बहुत लिखा जाता है. जम कर आलोचना होती है. अब सीमी जैसे देशद्रोही संगठनों पर कितने मुस्लिम लिखते है यह बता दें.

जय हिन्द!

shashisinghal said...

बस इतना ही कहूंगी कि हमें यह जान लेना चाहिए कि भारत देश में रहने वाला [ वह हिंदू हो मुस्लिम , सिख हो या ईसाई ] हर इंसान सिर्फ और सिर्फ भारत देश का नागरिक है और कुछ नहीं ।

Yusuf Kirmani said...

संजय बेंगाणी जी, आप बहुत पुराने ब्लॉगर हैं। क्या आपके ब्लॉग या कहीं और सिमी जैसे संगठन के खिलाफ कुछ भी लिखे जाने पर क्या मुस्लिम उसी तरह प्रतिक्रिया देते हैं जैसे शिवसेना या संघ परिवार या नरेंद्र मोदी जैसों के खिलाफ लिखे जाने पर बाकी लोग रिएक्ट करते हैं। हालांकि मेरा निजी रूप से मानना है कि देश का बहुसंख्यक वर्ग अब भी बहुत उदार और सहिष्णु है।
लेकिन शिवसेना या ठाकरे खानदान की गुंडागर्दी के खिलाफ चुप्पी साधना खतरनाक नहीं होगा। आखिर सचिन तेंदुलकर, आशा भोंसले भी तो इसी देश के नागरिक हैं जो ठाकरे जैसों की परवाह नहीं करते।
किसी भी तरह के आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों का समर्थन न तो आप करते हैं और न मेरे जैसे लोग करते हैं...फिर विवाद क्या है। मैं वीर संघवी जैसा बड़ा पत्रकार भी नहीं हूं कि अपने लेख में हिंदू तालिबानी शब्द का इस्तेमाल करता हूं।
आशा है, आपका स्नेह मिलता रहेगा।
शशि सिंघल जी, आपने बहुत अच्छी बात कही है। लेकिन क्या आपको कोई शक है कि भारत में रहने वाला भारत का नागरिक नहीं है। कम से कम अभी हमारे देश का संविधान तो नहीं बदला है जिसके तहत कुछ भी नागरिकता लिखने की सुविधा दे दी गई हो।
यह यूपीवाला, बिहारी, भैया, पंजाबी जैसे शब्द तो किसी और के एजेंडे में हैं। जो महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों का बताते हैं और गुजरात सिर्फ मोदी समर्थकों का बताते हैं।
सुंदर लाल जी, नागर जी की कविता का भावार्थ आप धीरेश सैनी के ब्लॉग पर की गई टिप्पणियों के जरिए जान सकते हैं। वैसे वह कविता इतनी मुश्किल तो नहीं है कि उसका मतलब आप जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को बताना पड़ेगा।
शरद जी, निर्मला जी और भाई शहरोज अत्यंत सार्थक टिप्पणी के लिए आप लोगों का शुक्रिया।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

क्या कहें…बस ऐसा लगता है कि पिछले साठ वर्षों में संघ अपने दुष्प्रचार में सफल रहा है और हम लगभग असफल…इसीलिये मेरा मानना है कि यह समय सांस्कृतिक आंदोलन को मज़बूत बनाने का है।