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Monday, May 16, 2016

व्हील चेयर पर मां...


-यूसुफ किरमानी

मेरे पास मां नहीं है। ट्वीटर पर डालने के लिए फोटो भी नहीं है। एक फोटो थी, उसे भाई या बहन ने ले लिया, तब से वापस नहीं किया। लेकिन फिर सोचता हूं कि कोई फोटो मेरी मां का वजूद तय नहीं कर सकता। क्योंकि मां के होने का एहसास हर वक्त रहता है।

जिनके पास मां है...उनसे जलन होती है। काश, मेरी मां भी आज जिंदा होती...कुछ नहीं तो फलाने साहब की तरह मां की फोटो ट्वीट कर ज़माने भर की हमदर्दी पा लेता। ...लोग कहते देखों इतना बड़ा लेखक-पत्रकार और मां की फोटो ट्वीट कर रहा है बेचारा। कितना बड़ा दिल है...मां को छोटे-छोटे गमले भी दिखा रहा है।

मां हमेशा अपने बच्चे के लिए ढाल का काम करती है। बच्चे पर कोई आफत आए, मां सबसे पहले उस आफत का सामना करने को तैयार रहती है। बच्चा अगर चोर या गिरहकट है तो भी उसकी मां आसानी से उसे चोर या गिरहकट मानने को तैयार नहीं होती। जब ज़माना आप पर तरह-तरह के आरोप लगाए तो एक मां ही ऐसी होती है जो आपके साथ खड़ी होती है। देश में या विदेश में या फिर किसी कंपनी में जब आपकी साख फर्जी डिग्री, फर्जी हलफनामे, फर्जी जुमलेबाजी से डूबने लगती है तो ऐसे में आप मां को आगे कर देते हैं और ज़माने को आपसे हमदर्दी सी हो जाती है कि देखो इतना बड़ा आदमी...लेकिन मां को नहीं भूला। ...आप मां की व्हीलचेयर की आड़ में बहुत खूबसूरती से खुद को तमाम आरोपों की बौछार से बचा ले जाते हैं।

मुझे चाय नहीं बेचनी पड़ी, ठीक से पढ़ लिख भी गया। फर्जी डिग्री बनवाने की नौबत नहीं आई। हैपी बर्थडे को लेकर भी कोई विवाद नहीं रहा। आधी पढ़ाई मां के सामने कर ली थी और थोड़ा-मोड़ा कमाने भी लग गया था। उन्हें यकीन और सुकून था कि मेरी जिंदगी ठीक से कट जाएगी, चाहे 99 के फेर में रहूं या न रहूं।

कहते हैं मां के पैरों के नीचे जन्नत होती है यानी अगर आप मां की सेवा करते हैं तो आपका स्वर्ग में जाना तय है। हालांकि यह कहावत उन अर्थों में विवादास्पद मानी जाएगी...जब आपके हाथ कई बेगुनाहों के खून से रंगे हों...जब आपने जीतेजी कई मांओं का सिंदूर उजाड़ दिया हो...जब आप के इशारे पर मां बनने से पहले कई बेटियों की इज्जत लूटी गई हो...ऐसे में आपकी मां भला आपको कैसे जन्नत में ले जा सकती है। मुझे इस कहावत में जरा भी यकीन नहीं है कि कोई मां अपने खूनी बेटे को भी जन्नत ले जा सकती है। ...मौलवी-मौलाना और धर्मगुरु कहते हैं कि बेटा जैसा भी हो, एक मां उसके जन्नत में ही जाने की कामना करती है। वो कहते हैं कि चाहे आप अपनी मां को बगीचे  में घुमाए या नहीं, चाहे किसी मॉल में लेजाकर आइसक्रीम खिलाएं या नहीं, वो आपके लिए जन्नत की ही दुआ करेगी। बहरहाल, मुझे इन मुल्लाओं की बात पर भरोसा नहीं है। जन्नत अगर मां की दुआ से मिलती होती तो हिटलर भी जरूर स्वर्ग में बैठा हुक्का पी रहा होगा। मुझे खुद हिटलर या हिटलरनुमा कोई शख्स आकर बताए कि वाकई उसके तमाम पापों को ऊपर वाले ने कूड़ेदान में फेंक दिया और उसकी मां की दुआओं के बदले जन्नत मिल गई।


सोचता हूं...अगर आज मां जिंदा होती तो क्या मैं भी अपनी इमेज बनाने के लिए उनकी मार्केटिंग करता...विज्ञापन कंपनियां मां की मार्केंटिंग अपने थर्ड क्लास प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए बहुत पहले से करती रही हैं।...मैगी की वापसी पर एक मां को ढाल बनाकर पेश किया गया। मैगी के पांव अभी दोबारा जमे या नहीं लेकिन मां की मार्केंटिंग उस प्रोडक्ट के लिए मजबूत रही। मेरा बेटा यही काम करता है, हर विज्ञापन के पीछे जो मार्केटिंग दिमाग और कॉपी राइटिंग का कमाल रहता है वो बराबर मुझे बताता रहता है। तमाम अच्छे-बुरे या सड़े-गले विज्ञापनों की जानकारी मुझे उसी से मिलती है। बेटे ने ही बताया था कि मैगी वाली मां का विज्ञापन असरदार है...यानी नेस्ले के मार्केटियर्स ने मां के जरिए मैगी को मार्केट में उतार दिया। ...पता नहीं आपकी नजर में इससे मां की गरिमा घटी या बढ़ी, मुझे इसका अंदाजा नहीं है। बेटा कहता है कि आप लोग अंदाजा लगाते रहिए। मां तो प्रोडक्ट बेचकर और बाजार में मैगी को फिर से जमाकर चली गई। जय हो मां मैगी वाली की...

भारत मां की जय बोलने या न बोलने वालों के बीच अभी हाल ही में हुआ झगड़ा आपको याद है...मैंने इस मुद्दे पर बयान देने वाले तमाम नेताओं की मांओं पर अध्ययन किया तो बहुत दुखद बात पता चली। इनमें से तमाम सफेदपोश अपनी मां का ख्याल नहीं रखते हैं लेकिन भारत मां पर आस्तीनें चढ़ा लेते हैं। वो टोपी वाला मुल्ला अगर उस वक्त ये कहता कि चाहे मेरी गर्दन पर छुरी रख दो, पहले अपनी अम्मी की जय बोलूंगा तब भारत मां की जय बोलूंगा तो शायद विवाद इतना नहीं बढ़ता। लेकिन जब इंसान मां के नाम पर किसी और के एजेंडे को आगे बढ़ाए तो समझिए कि वो भारत मां को भी अपमानित करने जा रहा है। जो इंसान अपनी मां का न हुआ, वो भारत मां का कैसे हो सकता है।...

एक बहुत सीनियर पत्रकार और लेखक विनोद शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि मेरी मां मेरे घर नहीं आती थी...मेरे घर मेरे साथ रहती थी...बहुत वजनदार लाइन लिखी शर्मा जी ने। लेकिन कई भक्त नाराज हो गए कि आखिर शर्मा जी की हिम्मत कैसे हुई की वो फलाने साहब की मां के संदर्भ में अपनी मां का जिक्र करें। फिर क्या था भक्तगण हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए। हालांकि शर्मा जी ने कहीं भी फलाने साहब की मां का जिक्र नहीं किया था।


मेरे बुकशेल्फ में मां उपन्यास आज भी मौजूद है। ...जानते हैं, इसे किसने लिखा है, ...मेरे बहुत ही प्रिय लेखक मक्सिक गोर्की ने। दरअसल, मेरे पास हिंदी वाला ही उन्यास था लेकिन बाद में मेरे अब्बा ने इसी उपन्यास को अंग्रेजी में (द मदर) मुझे खरीदकर पढ़ने को दिया। मैंने उन्हें बताया कि हिंदी में पढ़ चुका हूं तो उन्होंने अंग्रेजी वाला भी पढ़ने की सलाह दी। मां पर यह उपन्यास आज मेरी सबसे बड़ी धरोहर है।

मां का जिक्र हो तो मैं एक शायर का जिक्र न करूं तो तमाम मांओं के साथ बहुत नाइंसाफी होगी। उर्दू के मशहूर और जिंदा शायर रजा सिरसवी साहब ने मां पर एक बहुत खूबसूरत लंबी नज्म लिखी है। हालांकि यह विडंबना है कि रजा सिरसवी को किसी भी सरकार ने आजतक किसी पद्म पुरस्कार के योग्य नहीं समझा। वैसे मां की शान में जावेद अख्तर साहब समेत तमाम शायरों ने अपनी कलम चलाई है। मां पर सबसे पहले जिस शायरी से मेरा आमना-सामना हुआ, वो बॉलिवुड की किसी फिल्म का गाना था, जिसे मोहम्मद रफी साहब ने गाया था – मां तू कितनी अच्छी है, कितनी प्यारी है ओ मां....इसे लिखने वाले शायर का नाम मुझे नहीं मालूम लेकिन मेरा बचपन इसी गाने के साथ बीता। बात हो रही है रजा सिरसवी साहब की नज्म की। यह नज्म आज भी उर्दू बोलने वाले देश भारत व पाकिस्तान समेत तमाम जगहों पर महफिलों और मजलिसों में बहुत सम्मान से पढ़ी जाती है। सुनने वालों की आंखों से आंसू छलक आते हैं। उस लंबी नज्म की चंद लाइनें पेश हैं –


फिक्र में बच्चों की यूं हर दम घुली जाती है मां
नौजवां होते हुए भी बूढ़ी नजर आती है मां....

जिंदगानी के सफर में गर्दिशों की धूप में
कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां

सबको देती है सुकूं और खुद गमों की धूप में
रफ्ता रफ्ता बर्फ की सूरत पिघल जाती है मां

दर्द, आहें, सिसकियां, आंसू, जुदाई, इंतजार
जिंदगी में और क्या औलाद से पाती है मां

प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज है
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है मां.....


(@Copyright यूसुफ किरमानी - प्राइम कंटेंट)


maan kee vheel cheyar ke peechhe kya hai


mere paas maan nahin hai. tveetar par daalane ke lie photo bhee nahin hai. ek photo thee, use bhaee ya bahan ne le liya, tab se vaapas nahin kiya. lekin phir sochata hoon ki koee photo meree maan ka vajood tay nahin kar sakata. kyonki maan ke hone ka ehasaas har vakt rahata hai. 

jinake paas maan hai...unase jalan hotee hai. kaash, meree maan bhee aaj jinda hotee...kuchh nahin to phalaane saahab kee tarah maan kee photo tveet kar zamaane bhar kee hamadardee pa leta. ...log kahate dekhon itana bada lekhak-patrakaar aur maan kee photo tveet kar raha hai bechaara. kitana bada dil hai...maan ko chhote-chhote gamale bhee dikha raha hai.

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phikr mein bachchon kee yoon har dam ghulee jaatee hai maan
naujavaan hote hue bhee boodhee najar aatee hai maan....

jindagaanee ke saphar mein gardishon kee dhoop mein 
koee saaya nahin milata to yaad aatee hai maan 

sabako detee hai sukoon aur khud gamon kee dhoop mein
raphta raphta barph kee soorat pighal jaatee hai maan

dard, aahen, sisakiyaan, aansoo, judaee, intajaar
jindagee mein aur kya aulaad se paatee hai maan

pyaar kahate hain kise aur maamata kya cheej hai
koee un bachchon se poochhe jinakee mar jaatee hai maan.....

1 comment:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 17/05/2016 को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।