संदेश

इस्लामाबाद में निर्णायक घड़ी: ईरान-अमेरिका बातचीत के बीच बदलता दुनिया का समीकरण

चित्र
यह लेख इस्लामाबाद में हो रही ईरान-अमेरिका वार्ता के बहाने बदलते वैश्विक और मध्य-पूर्वी समीकरणों की गहराई को समझने की कोशिश है। इसमें कूटनीति, युद्ध, सत्ता, और विचारधाराओं के टकराव को विश्लेषित किया गया है। साथ ही यह सवाल उठाता है कि क्या दुनिया एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां बातचीत युद्ध पर भारी पड़ सकती है- या फिर इतिहास खुद को दोहराने वाला है।  Islamabad at a Turning Point: Iran–US Talks Reshape the Power Balance इस्लामाबाद में मंच सज चुका है। ईरानी और अमेरिका के डेलीगेशन अपने-अपने देशों से रवाना हो चुके हैं।  ईरानी डेलीगेशन आज रात इस्लामाबाद में पहुंच जाएगा। इस्लामाबाद वीरान है। दो दिन की छुट्टी घोषित की गई है। ईरानी डेलीगेशन को सात स्तरीय सुरक्षा दी गई है। अमेरिकी डेलीगेशन अलग कमरे में एडवांस कैमरों के ज़रिए ईरानी डेलीगेशन को सुनेगी। अपनी बात कहेगी। दोनों तरफ से ढेरों अनुवादक साथ हैं, ताकि बातचीत की कोई लाइन बिना समझे न रह जाए। इसी बीच यह घटनाक्रम भी हुआ है कि लेबनान और इज़राइल अब सीधे बात कर रहे हैं। लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने नेतन्याहू से फोन पर बात की। उसके बाद ने...

अमेरिका का तेल साम्राज्यवाद: वेनेजुएला से भारत तक ट्रंप की दादागीरी

चित्र
 America Oil Imperialism: Venezuela, Trump and Global Politics अमेरिका की विदेश नीति को अगर एक लाइन में समझना हो, तो वह है- तेल पर नियंत्रण, दुनिया पर नियंत्रण। तेल आज केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि सत्ता की रीढ़ है। जिस देश के पास तेल है, वह स्वतंत्र रह सकता है। और यही बात अमेरिका को सबसे ज़्यादा खटकती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने योजनाबद्ध तरीके से वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लिया। पेट्रो-डॉलर सिस्टम के तहत तेल की खरीद-बिक्री डॉलर में अनिवार्य की गई, ताकि दुनिया अमेरिका की मुद्रा पर निर्भर रहे। नतीजा यह हुआ कि तेल उत्पादक देश अमीर होने के बावजूद राजनीतिक रूप से गुलाम होते चले गए। मध्य-पूर्व, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका- जहाँ भी तेल है, वहाँ अमेरिकी दखल है। यह संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी साम्राज्यवादी रणनीति है। अमेरिका तेल इकोनॉमी पर कब्जा क्यों करना चाहता है? अमेरिका खुद तेल उत्पादक है, फिर भी वह दूसरों के तेल पर नज़र रखता है, क्योंकि: तेल की कीमतें अगर उसके नियंत्रण में हों, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था उसके इशारों पर चलती है। रूस, ईरान, वेनेजुएला जैसे देश तेल स...

लोकतंत्र की कीमत: क्या बिहार विधानसभा चुनाव भारत में निष्पक्ष इलेक्शन का अंत है?

एक बेहद गंभीर सवाल आज देश के सामने खड़ा है- क्या बिहार विधानसभा चुनाव में वोटरों को सीधे-सीधे खरीदा जा रहा है? क्या देश का चुनाव आयोग इतना पावरलेस हो गया है कि वह इसे बस देखता रहेगा? देखिए, कल यानी शनिवार, 1 नवंबर 2025 को बिहार में लगभग 10 लाख महिलाओं को ₹10,000 की छठी किस्त दी गई। और इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि दूसरे चरण के मतदान 11 अक्टूबर से ठीक 4 दिन पहले, 7 नवंबर को एक और किस्त दिए जाने की तैयारी है! आचार संहिता लागू होने के बाद से - तीन नकद किस्तें पहले ही बांटी जा चुकी हैं! आप खुद बताइए, क्या इसे वोट की खरीद नहीं कहेंगे? चुनाव आयोग के लोग इसे यह कह कर सही ठहरा रहे हैं कि यह तो 'पहले से चल रही योजना' का हिस्सा है! लेकिन इस तर्क की कमजोरी देखिए! यह योजना चुनावों की घोषणा से ठीक एक हफ़्ता पहले शुरू हुई थी! और तो और, इसी चुनाव आयोग ने 2023 में तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान 'रायथु बंधु' जैसी पहले से चल रही योजना को तुरंत बंद करवा दिया था। वहाँ योजना बंद, यहाँ बम्पर किस्तों की बौछार! यह दोहरा मापदंड क्यों? अब तक चुनाव आयोग नेता विपक्ष राहुल गांधी के 'वो...

अडानी को एलआईसी का सहारा, और पॉलिसी खरीदने वाली जनता का किसको

चित्र
Adani gets support of LIC, and who gets  support of policy buying public? भारत में एलआईसी की पॉलिसी हर किसी के पास होती ही है। जिनके परिवार में सरकारी नौकरी वाले लोग होंगे। वे इसे बेहतर समझते हैं। एलआईसी एक सरकारी कंपनी या निगम है। मध्यम वर्ग की पहली पसंद एलआईसी ही है। बीमा क्षेत्र में अभी भी एलआईसी का सबसे बड़ा मार्केट शेयर है। राहुल गांधी ने 3 जून को एक ट्वीट किया था और देश के लोगों का चेतावनी दी थी कि पैसा, पॉलिसी, प्रीमियम सब आपका लेकिन इससे फायदा, सुविधा, सुरक्षा अडानी की हो रही है। इसे समझाने के लिए राहुल गांधी ने बताया था कि किस तरह आपके प्रीमियम का पैसा अडानी समूह की कंपनियों में लगाया जा रहा है। आपत्ति क्या है। अरे भाई एक ही समूह की कंपनियों में एलआईसी का पैसा लगेगा और वो कंपनियां डूब गईं तो जनता को एलआईसी कहां से वो लाभ देगा जिसका वादा उसने पॉलिसी बेचते समय किया था। जब पॉलिसी खरीदते समय आप हस्ताक्षर करते हैं तो उसमें यह भी लिखा होता है कि अगर पॉलिसी बेचने वाली कंपनी दिवालिया हो गई तो आपको ठेंगा मिलेगा यानी कुछ नहीं मिलेगा। नेता विपक्ष के तौर पर राहुल गांधी ने 3 जून 2025 क...